Tuesday, August 15, 2017

अभिनव संदर्भ में हो स्वतंत्रता का स्मरण

अंग्रेजों से स्वतंत्रता मिले आज हमें सत्तर वर्ष हो गए। आज का दिन भले ही आजादी के पर्व के रूप में मनाया जाए लेकिन इस दिन की महत्ता का अनुभव देश के प्रत्येक नागरिक को वर्षभर होना चाहिए। तब ही हम हजारों-लाखों स्वतन्त्रता सेनानियों के बलिदान को दिल से समझ सकते हैं। वास्तव में आजादी का अर्थ यह नहीं था कि भारतीय भूखंड का हस्तांतरण गोरे अंग्रेजों के हाथों से निकल कर भारतीय लोगों के हाथों में जाए। जितने संघर्षों और बलिदानों के बाद हमें आजादी मिली उससे भी अधिक संघर्ष और परिश्रम की जरूरत देश को इसके सांस्कृतिक, सामाजिक और स्वनिर्मित आर्थिक वातावरण में ढालने की थी। दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से पिछले सात दशक में उस दिशा में कोई विशेष प्रयास नहीं हो सका। स्वातंत्रयेत्तर सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों द्वारा यदि अंग्रेजों से आजादी का अर्थ केवल यह लगाया गया कि अंग्रेजों के स्थान पर भारतीय मूल के लोग सत्तारूढ़ हों और अंग्रेजों के बनाए राष्ट्रीय नियम-कानूनों और सामाजिक व्यवस्था को ही संभालें, तो यह आजादी के लिए सतत संघर्षशील रहे और अंततः शहीद हुए लोगों के साथ बहुत बड़ा अन्याय है। यह राजनीतिक कार्यव्यवहार आजादी के तत्काल बाद से लेकर आज तक देश में चल रहा है। और आज भी देश में अंग्रेजों द्वारा विरचित और प्रचलित तमाम प्रशासकीय, राजनयिक और कुछ हद तक सामाजिक व्यवस्था यथावत चल रही है। स्वतंत्रता की वार्षिक उपासना के समय हमें जरूर इस बात पर मंथन करना चाहिए कि आजादी के बाद के कालखंड में हमने ऐसा क्या किया, जिसे याद कर स्वतंत्रता का आरंभिक जोश बना रहे और स्वतंत्रता संग्राम में तन-मन-धन से समर्पित, स्वयं का बलिदान देने वालों के स्वप्नों के अनुरूप राष्ट्रीय चरित्र तैयार हो सके। 
भारतीय नगर का नागरिक होने का कर्तव्य तभी पूर्ण होगा, जब हमारा भारतीय शासन की राजनीति से निरंतर परिचय होता रहे। यदि ऐसा नहीं होगा तो कोई नागरिक शासकीय कार्यप्रणाली से कैसे अवगत होगा। कैसे वह वर्तमान पूर्ववर्त्ती शासन में उसके कार्यों के संबंध में अंतर कर सकेगा। जब हम सभी का जीवन सामूहिक रूप में एक राष्ट्र तथा उसकी शासन व्यवस्था के अन्तर्गत संचालित है, तो हमें शासकीय राजनीति की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तथा गुप्त मंशाओं के प्रति सचेत भी रहना ही चाहिए। यदि राष्ट्रीय नगर का कोई नागरिक यह कहे कि शासन तथा उसकी राजनीतिक बातों, व्यवहार और कार्य में क्या रखा है, तो यह भाव हमें राष्ट्र की नागरिकता की ही नहीं अपितु मानवीयता की योग्यता से भी वंचित रखता है। अतः हमें (जब तक हम पहले से निर्मित किसी राष्ट्र के नागरिक हैं और जब तक हम अपना नया राष्ट्र नहीं बना लेते) राष्ट्र, राष्ट्र की लोकतान्त्रिक व्यवस्था तथा इसके गुण-दोषों के प्रति एक नागरिक के रूप में विशिष्ट सजगता तो अपनानी ही होगी। हम राष्ट्रीय शासन की गतिविधियों के प्रति क्रूर तटस्थता, सर्वथा आलोचना तथा उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण कदापि नहीं रख सकते। हम किसी भी राजनीतिक, बौद्धिक, सामाजिक संघ के विचारक हों या भले ही हमारा शासन-सत्ता के व्यक्तियों से अनेक विषयों पर मतभेद हो, परन्तु जीव जीवन के सम्बन्ध में हमारे मौलिक विचार स्थिर रहने चाहिए। सत्ता-प्रतिष्ठान के साथ अनेक सैद्धान्तिक मतभेदों के होते हुए भी हमें मानवीयता, कल्याण, परोपकार तथा परसेवा के श्रेष्ठ मूल्यों के सम्बन्ध में सत्ताधारकों का सहयोग करना चाहिए। ऐसे मानवीय मूल्यों से सत्ता-प्रतिष्ठान की विमुखता के प्रति हमें उसकी समालोचना भी उदारतापूर्वक करनी चाहिए।
यही आवश्यक उपाय हैं, जिन्हें अपना कर हम सत्तर वर्षीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था को संवैधानिक और सामाजिक मूल्यों पर स्थिर होकर चलने के लिए विवश कर सकते हैं। देश इसके लोगों को एक बात पर और ध्यान देना चाहिए कि कोई भी लोकतंत्र एक निश्चित कालखंड में बने संविधान पर ही टिके नहीं रह सकता। देश-दुनिया में अनेक वैज्ञानिक, प्रौद्योगिकीय और वैकासिक परिवर्तनों के उपरांत जिस अनुपात में सामाजिक मूल्यों का विघटन हुआ और मानव जीवन का स्वभाव असामान्य होकर भ्रमित हुआ, उसके लिए दशकों पुराने संवैधानिक प्रावधान वर्तमान में अत्यंत अप्रासंगिक लगने लगे हैं। सात दशकों में मानवीय जीवन में जिस हिसाब से बदलाव आया, उस हिसाब से समूचा लोकतांत्रिक संविधान संशोधन की मांग करता है। वर्तमान सरकार को इस दिशा में व्यावहारिक दृष्टि उत्पन्न कर तदनुसार लोकतांत्रिक नियमों, कानूनों और संविधानों में जनानुकूल परिवर्तन करने चाहिए। यह इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि हम देखते आए हैं कि देश में दशकों पुराने संविधान, न्याय और कानून की सरकारी व्यवस्था के बावजूद पीड़ितों, वंचितों, शोषितों और सामाजिक अधिकारिता से उपेक्षित लोगों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। कहीं कहीं संविधान के अव्यावहारिक प्रावधान भी इस स्थिति के लिए उत्तरदायी हैं क्योंकि कुछ संवैधानिक प्रावधान अधिकारहीन लोगों के सशक्तिकरण के बाद भी उनके लिए अनावश्यक रूप से लाभांवित होने के कारक बने हुए हैं। ऐसे में देश के सामान्य वर्ग के सम्मुख सामाजिक-आर्थिक संकट के साथ-साथ व्यक्तिगत अभिवेदन का संकट भी खड़ा हो गया है।
आज स्वतंत्रता के पर्व को सर्वथा एक नए राष्ट्रीय, सामाजिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक संदर्भ में लेने की जरूरत है। यह आयोजन ध्वजारोहण, सार्वजनिक अवकाश, राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत और अन्य स्वतंत्रता संबंधी अजैविक प्रतीकों के आधार पर ही देश के नागरिकों के बोध में नहीं रहना चाहिए। आजादी का यह उत्स आजादी के लिए तन-मन-धन से समर्पित और काल-कवलित लोगों को सच्ची श्रद्धांजलि देने के रूप में होना चाहिए, ताकि हम सत्तर वर्ष पूर्व के उनके स्वप्न के अनुरूप अपने राष्ट्र का निर्माण कर सकें।
विकेश कुमार बडोला