Saturday, July 30, 2016

फेसबुुक की दुनिया

फेसबुक पर डाली गई अपनी किसी रचना के संदर्भ में एक बार मेरे एक भाई और खास मित्र ने टिप्‍पणी करी, ''जल्‍दी ही फेसबुक पर डिस्‍लाइक का बटन भी आनेवाला है।'' उसकी इस टिप्‍पणी पर मैंने लिखा था, ''डिस्‍लाइक वाली स्थिति में तो कोई भी व्‍यक्ति अनियंत्रित हो जाता है। ऐसे में उसका काम केवल डिस्‍लाइक टैब को क्लिक करने से ही नहीं चल सकता। उसका वश चले तो वह उसे, जिसे डिस्‍लाइक करना है, कभी आसपास देखना भी चाहेगा। आप चाहें तो टिप्‍पणी में लिख सकते हैं कि आपको मेरी रचना पंसद नहीं आई, जंची नहीं या ेकार-बकवास है।''
यह बात आज सभी दोस्‍तों को इसलिए बता रहा हूँ कि क्‍योंकि मैं देख रहा हूँ कि आमतौर पर आज सभी व्‍यक्ति और विशेष रूप से फेसबुक से जुड़े व्‍यक्ति अपनी अनदेखी पर बुरी तरह कुंठित हो जा रहे हैं। वैसे सभी दोस्‍त बहुत समझदार हैं लेकिन शिकायत उनसे यही है कि वे समझदारी पर स्थिर नहीं हैं। एक तरफ तो वे सरकार, समाज, मित्रों और नाते-‍रिश्‍तेदारों को किसी बात के लिए अपने दर्शन में तुरंत खारिज कर देते हैं और दूसरी तरफ उनसे आशा भी करते हैं कि वे उनकी अनदेखी करें। भला ये दोनों बातें एक साथ कैसे हो सकती हैं।
जब हम किसी की अनदेखी करेंगे तो फि उसके वैचारिक और भावनात्‍मक क्षेत्र के किसी भी तरह के अधिकारी हम कैसे हो सकते हैं। उससे कैसे सब कुछ अपने मनोनुकूल प्राप्‍त कर सकते हैं। यहां तक कि फेसबुक के लाइक्‍स या टिप्‍पणियां भी। इसलिए किसी भी पोस्‍ट पर कोई भी प्रतिक्रिया देने से पहले हमें उदार दृष्टि अपनानी चाहिए। बात को समझे बिना ही अपनी लठमार प्रतिक्रिया दे देना किसी तरह उचित नहीं। इस संचार संसाधन पर एक-एक क्षण में कई सूचनाओं, आंकड़ों का प्रकाशन और दूसरों की रचनाओं का पुनर्प्रकाशन होता है। साथ ही सभी सूचनाओं आंकड़ों पर अनेक क्रियाएं-प्रतिक्रियाएं भी देखने को मिलती हैं। लेकिन इनमें से जो कुछ हमारे विवेक में संचित होता है, जो भी हमें सही बातों के लिए प्रेरित करता है या जो कुछ हमें उदार बनाता है, हमें वही याद रहता है।
इतना होते हुए भी अनावश्‍यक फेसबुक रचनाओं और उनकी टिप्‍पणियों पर हमारा कुंठित, क्रोधित और आक्रोशित होना बंद नहीं हुआ। कई लोगों ने तो इस अचल सूचना संस्‍थान यानी फेसबुक को मूर्खों की महफि‍ल और नौसिखिए विद्वानों का चलता-फिरता सूचना शिविर भी मान लिया है। ऑनलाइन सोशल मीडिया फोबिया यानी चलता-फिरता सामाजिक जनसंचार रोग जैसा जुमला अगर फेसबुक जैसे प्‍लेटफॉर्मों से परेशान हो चुके और इस से दूर रहनेवाले लोगों द्वारा उछाला जा रहा है, तो इसकी कोई कोई ठोस वजह तो होगी ही।
इसमें फेसबुक को दोषी नहीं ठहरा सकते। इसका सदुपयोग करनेवाले भी निर्दोष ही हैं। दोषारोपण उन पर होना चाहिए, जिन्‍होंने इस माध्‍यम को मात्र एक निम्‍नस्‍तरीय कॉमेडी शो बना दिया है। इसलिए मित्रों कोशिश यह होनी चाहिए कि सूचना का माध्‍यम, चाहे वह ऑनलाइन हो या ऑफलाइन, उसे वाकई सोशल मीडिया बनाया जाए। ''सोशल मीडिया'' अपने आप में बहुत ऊंची अवधारणा है। यदि यह सदैव अपने मूल स्‍वरूप में रहे तो मुख्‍यधारा के मीडिया को धूल चटा दे, उसे धता बता दे।
विकेश कुमार बडोला