Tuesday, August 9, 2016

आतंकी हमलों में जान गंवाते जवानों का जीवन-मोल कब समझेंगे हम

यह आलेख लघु रूप में रविवार 3 जुलाई 2016 को दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित हुआ था। स्‍वतंत्रता दिवस के अवसर पर सैन्‍यकर्मियों को समर्पित करने हेतु इस समग्र आलेख को यहां डाल रहा हूँ।  
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ह फरवरी 2016 की बात है, जब पंपोर के उद्यमिता विकास संस्‍थान में घुस आए आतंकियों को मारने के लिए केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 5 जवान शहीद हो गए थे। उस समय तक एक-डेढ़ वर्ष के अंतराल में भारत पर पाकिस्‍तान की ओर से यह चौथा-पांचवा बड़ा आतंकी हमला था जिनमें हमने निरंतर अपने जवानों को खोया। लेकिन यह सिलसिला रुक नहीं रहा है। पंपोर एक बार फि‍र सैनिकों के रक्‍त से रंजित हुआ। एक बार फि‍र भारत सहमा हुआ है कि कब तक उसके सैनिकों के प्राण व्‍यर्थ ही जाते रहेंगे। विगत शनिवार को पंपोर पुन: 8 भारतीय जवानों की कीमती जिंदगी को आतंकवादियों के घात लगाकर किए गए हमले में लील गया। इस बार केरिपुब के सैनिक गश्‍त लगाकर अपने मुख्‍यालय लौट रहे थे। स्‍थानीय मसजिद में छुपे हुए आतंकवादियों ने सैनिक गश्‍ती दल पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाईं। इस हमले में जब तक सैनिक जवाबी हमला कर पाते, तब तक 8 जवान शहीद हो चुके थे। हमले में 21 जवान बुरी तरह से घायल हैं और जिंदगी व मौत के बीच झूल रहे हैं। सैनिकों के जवाबी आक्रमण में दो आंतकवादी भी मारे गए। लश्‍कर-ए-तैयबा के प्रवक्‍ता गजनवी ने फोन पर इस हमले की जिम्‍मेदारी लेते हुए आने वाले दिनों में आतंकी हमले तेज करने की धमकी दी है। उल्‍लेखनीय है कि दो जुलाई से श्री अमरनाथ यात्रा शुरू हो रही है। स्‍पष्‍ट है कि इस तरह के आतंकी हमलों से पाकिस्‍तानी आतंकवादी हिन्‍दू धार्मिक यात्रा को हतोत्‍साहित करने के लिए कश्‍मीर घाटी में डर का वातावरण बनाना चाहते हैं। इस माह आंतकवादियों का सुरक्षा बलों पर यह दूसरा हमला है। तीन जून को बिजबिहाड़ा में सीमा सुरक्षा बल के दल पर आतंकी हमले में तीन जवान शहीद हो गए थे। कुल मिलाकर बीते चार वर्ष के दौरान श्रीनगर के बाहरी क्षेत्र में राष्‍ट्रीय राजमार्ग पर सुरक्षाबलों के दल पर यह दूसरा बड़ा हमला है। इससे पहले 24 जून 2013 को तत्‍कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के घाटी आगमन से पूर्व हैदरपोरा में भी आतंकी हमले में 9 सैन्‍यकर्मी शहीद हो गए थे।
            यह सब लिखते हुए खुद सहित पूरे भारतीय शासन-प्रशासन पर बहुत अचरज हो रहा है, जो आंतकवादियों की ओर से लगातार घात लगाकर किए जा रहे हमलों में अपने सैनिकों के कीमती जीवन गंवाते हुए देखने के सिवा कुछ नहीं कर रहा। सैनिकों की मौत पर राजनीतिज्ञों और जनता को गहन दुख नहीं होता। आधुनिक, अधिकांश भारतीय जनमानस उनकी जीवन परिस्थितियों के बारे में गंभीरता से नहीं सोच पाता। यह इसलिए क्‍योंकि हमारे यहां सिविल सोसायटी में यह वैचारिक कुंठा जड़ जमाए हुए है कि यदि सैनिकों पर ज्‍यादा सरकारी खर्च हो रहा है तो उन्‍हें देश के लिए लड़ना और मरना ही पड़ेगा। लेकिन अभी तक यह नागरिक समाज सैनिकों, देश के लिए उनकी अहम जरूरतों और उनकी जीवन-परिस्थितियों के बारे में अपनी दूसरी दृष्टि विकसित नहीं कर पाया। इन्‍हें यह अवश्‍य सोचना-विचारना चाहिए कि ज्‍यादा सरकारी खर्च के बाद देश की सुरक्षा के लिए तैयार सैनिक का जीवन आए दिन होनेवाली आतंकवादियों मुठभेढ़ों में यूं ही व्‍यर्थ न जाए। बल्कि नागरिकों को यह समझ रखनी चाहिए कि आए दिन होनेवाली ऐसी आतंकी मुठभेढ़ों की चुनौतियों से हमारे सैन्‍यकर्मी घायल हुए बिना ही निपट सकें, उनके मूल्‍यवान प्राण बचें रहें और वे भारत व भारतीयों की सुरक्षा के लिए अत्‍यधिक समर्पण भावना के साथ सीमाओं पर डटे रहें। नागरिकों का इस तरह का अभिबोध सरकार और शीर्ष सैन्‍य तंत्र पर सैन्‍यकर्मियों के लिए ऐसी सुरक्षा व्‍यवस्‍था करने का दबाव अवश्‍य बना सकेगा, जिसमें वे दुश्‍मनों को मारने के बाद स्‍वयं को भी सुरक्षित रख सकें। अपने सैनिकों के लिए सरकार और जनता को ऐसी सोच रखनी चाहिए। इस सोच के साथ मजबूत होकर खड़ा रहना चाहिए। इसके बाद निश्चित रूप से खतरनाक से खतरनाक आतंकी हमलों या आसन्‍न युद्ध संकट के दौरान भी हमारे सैनिक शौर्य और पराक्रम का अभूतपूर्व प्रदर्शन कर सकेंगे। सैनिकों के लिए जनता के इस मूलभूत भावना-प्रदर्शन के बाद अवश्‍य ही केंद्र सरकार और शीर्ष सैन्‍य तंत्र को यह आभास होगा कि राष्‍ट्र की सीमाओं के प्रहरियों, हमारे वीर सैनिकों को हर प्रकार के आतंकी या दुश्‍मन के हमलों के दौरान ऐसे अस्‍त्र-शस्‍त्र, सैन्‍य वर्दी और अन्‍य सुरक्षात्‍मक उपकरण उपलब्‍ध कराए जाएं जो उन्‍हें किसी भी कीमत पर सुरक्षित, जीवित रख सकें।
            विडंबना ही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सद्भावना कूटनीति भी पाकिस्‍तान सरकार को भारत विरोधी आतंकी गतिविधियां रोकने के लिए प्रोत्‍साहित नहीं कर पा रही। मोदी अपनी सरकार के शपथ-ग्रहण समारोह में पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को बुलाते हैं। मोदी तीन-चार देशों की यात्रा के बाद वापसी के समय लाहौर जाते हैं। उनका उद्देश्‍य भारत सरकार की पुरानी राजनीतिक और कूटनीतिक विरासत से अलग दुश्‍मन देशों से नए तरीके से रिश्‍ते सुधारने का था। इतने प्रयासों के बाद भी पाकिस्‍तानी शासक भारतीय मंशा को गंभीरतापूर्वक नहीं लेता। पाकिस्‍तान में आतंकवादियों को शरण देकर उन्‍हें भारत के साथ युद्ध करने के लिए जो प्रशिक्षण मिलता है, उसमें पाकिस्‍तानी सरकार और जनता के साथ-साथ चीन का भी बड़ा सहयोग है। अब यह तो स्‍पष्‍ट हो ही चुका है कि चीन एशिया प्रशांत में भारत के आर्थिक-सामरिक रूप से बड़ी शक्ति बनने की राह में रोड़े अटकाने के लिए पाकिस्‍तानी आतंकवादियों और वहां की धरती का इस्‍तेमाल कर रहा है। कभी वह मुंबई और पठानकोट हमलों के पाकिस्‍तानी आतंकी मुखियाओं को भारत के साक्ष्‍य के बावजूद अंतर्राष्‍ट्रीय बिरादरी में अपने वीटो पॉवर का इस्‍तेमाल कर छुड़वा देता है तो कभी परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में भारत की सदस्‍यता का तीखा विरोध करता है। इतना ही नहीं, वह हिन्‍दू राष्‍ट्र नेपाल की राजनीति का रुख भी मोड़ता है और भावनात्‍मक रूप से पूरी तरह हिंदू एक राष्‍ट्र को जबरन संवैधानिक रूप से धर्मनिरपेक्ष बनाने में भी बड़ी भूमिका का निर्वहन करता है। नेपाल में कुछ दिनों पूर्व हुई सत्‍ता उठापटक को क्‍या संज्ञा दी जाएगी, यह समझने के लिए नेपाल की नहीं अपितु चीन की राजनीतिक दृष्टि भांपने की अत्‍यंत जरूरत है। यह उसी का षड्यंत्र था जो उसने नेपाल में भारतीय संस्‍कृति और धर्म के राजनीतिक प्रतिनिधियों को आर्थिक रूप से सुदृढ़ करने का लालच देकर धर्मनिरपेक्षता के संविधान को मानने पर विवश किया। और किसी भी देश में धर्मनिरपेक्षता के संविधान तले क्‍या होता है, यह हम सभी ने अच्‍छी तरह देख ही रखा है। भारत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।  
            इतना सब होने के बाद भारत को अब अच्‍छी तरह समझ, चेत जाना चाहिए कि वह पाकिस्‍तान व चीन के किसी भी झांसे में न आए। भारत शांति और समता के सिद्धांत पर अडिग रहते हुए उन्‍नति करना चाहता है। इसके लिए वह दुनिया के अधिकांश देशों के साथ-साथ अपने पुराने दुश्‍मन देशों चीन व पाकिस्‍तान के साथ भी मैत्रीपूर्ण संबंध रखना चाहता है। लेकिन उसे हर हाल में यह सुनिश्चित करना ही पड़ेगा कि मैत्रीपूर्ण संबंधों की आड़ में चीन-पाक का आतंकी गठजोड़ सीमाओं पर तैनात भारतीय सैन्‍यकर्मियों की जान से न खेले। वैश्विक विकास नीति की विवशताओं के कारण भारत आज पाकिस्‍तान के साथ सीधे युद्ध में नहीं उतर सकता और ना ही यह आज की जैविक जरूरत लगती है। लेकिन शीर्ष भारतीय शासकों को यह संकल्‍प अब प्राणपण से लेना ही होगा कि पाकिस्‍तान की ओर से तैयार होकर आनेवाले आतंकवादियों द्वारा हमारे सैनिकों पर घात लगाकर होनेवाले हमले बिलकुल न हों। और अगर ऐसे आतंकी हमलों को भारत सरकार जम्‍मू एवं कश्‍मीर के मुसलिम समुदाय के वोट बैंक, स्‍थानीय मुसलिम आबादी के पाकिस्‍तान प्रेम और अन्‍य किन्‍हीं निरर्थक कारणों से रोकने में विफल रहती है तो उसे यह व्‍यवस्‍था अवश्‍य ही करनी होगी कि कश्‍मीर और अन्‍य भारतीय सीमाओं पर तैनात सैन्‍यकर्मियों को इन आतंकी व ओछी राजनीतिक परिस्थितियों में जीवन-रक्षक सैन्‍य सुरक्षा-कवच उपलब्‍ध कराए जाएं। ये सुरक्षा-कवच ऐसे हों जो उन्‍हें आतंकवादियों के अप्रत्‍याशित हमलों से सुरक्षित रख सकें, उन्‍हें ऐसे हमलों का मुकाबला करने के दौरान जीवित रख सकें।
सैनिकों की मौत के बढ़ते आंकड़ों पर गौर करते हुए कश्‍मीर में लागू सशस्‍त्र सैन्‍य बल विशेषाधिकार अधिनियम को भी संशोधित किए जाने की अत्‍यंत जरूरत है। इसे सैनिकों के पक्ष में अत्‍यधिक लचीला बनाया जाना चाहिए। सैनिकों को यह अधिकार अधिक संवैधानिक शक्ति के साथ दिया जाना चाहिए कि वे आतंकवादी घटनाओं में अप्रत्‍यक्ष रूप से शामिल स्‍थानीय युवकों, निवासियों से भी सख्‍ती से पूछताछ कर उन्‍हें तत्‍काल कारागार में डाल सकें। जिस तरह पूरी दुनिया में आतंकवाद की घटनाएं हो रही हैं उनको ध्‍यान में रखते हुए आतंकवाद के प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष संरक्षकों और मददगारों को भी आतंकवादी के रूप में देखने की जरूरत है। दुनिया के आधे से अधिक देश इस दृष्टि के अभाव में ही अपने यहां आतंकवाद के फलने-फूलने की परिस्थितियों की अनदेखी करते रहे, जिसकी परिणति आईएस के रूप में आज सबके सामने है।
भारतीय लोगों को सैनिकों को भी वैसा ही प्‍यार, सम्‍मान देना चाहिए जैसा वे फि‍ल्‍मी अभिनेताओं और अभिनेत्रियों को देते हैं। जैसे किसी प्रसिद्ध बॉलीवुड अभिनेता या अभिनेत्री के निधन पर संपूर्ण भारतीय जनमानस बुरी तरह सहम कर भावनात्‍मक हो जाता है और कालांतर में इसकी परि‍णति फि‍ल्‍म उद्योग के चौतरफा विकास व सुख-समृद्धि के रूप में सामने आती है, ठीक उसी तरह की भावनाएं भारतीयों को सैनिकों की राष्‍ट्रीय सेवा, समर्पण, त्‍याग और बलिदान के प्रति भी रखनी चाहिए। इस जन भावनात्‍मक दबाव से सरकार येन-केन-प्रकारेण सैनिकों की जीवन-सुरक्षा के लिए सब कुछ करेगी। और यदि ऐसा होगा तो हम अपने सैनिकों के मूल्‍यवान जीवन कम से कम घात लगाकर किए गए आतंकी हमलों में तो नहीं खोएंगे। 
विकेश कुमार बडोला

1 comment:

  1. यूँ ही अलख जगाते रहिए ।

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