Wednesday, August 24, 2016

बुलंदशहर में हुई दुष्कर्म की घटना पर

ह दुर्भाग्‍यशाली ही कहा जाएगा कि देश में होनेवाली हर किस्‍म की दुर्घटनाएं राजनीतिक दलों को अपनी राजनीतिक मंशा पूरी करने का माध्‍यम ही नजर आती हैं। उन्‍हें पीड़ितों से सीधे-सीधे कोई सरोकार नहीं होता। जब सिर पर बन आती है या अपनी राजनीतिक जमीन खिसकने का भय उन्‍हें सताने लगता है तो उनका पुलिस-प्रशासन सचेत होता है। उत्‍तर प्रदेश के बुलंदशहर में हुई बलात्‍कार की घटना को इस संदर्भ में व्‍यापकता से देखा व समझा जा सकता है। नोएडा का एक परिवार अपनी कार में सवार होकर राष्‍ट्रीय राजमार्ग 91 से होते हुए पारिवारिक कार्यक्रम में शामिल होने शाहजहांपुर जा रहा था। रात डेढ़ बजे अपराधियों ने पहले उनकी चलती कार के आगे कुछ फेंका ताकि वे रुक जाएं। पहली बार में तो चालक ने गाड़ी नहीं रोकी। लेकिन दूसरी बार भी जब कार के आगे कोई चीज गिरने की आवाज सुनाई दी तो परिवार आशंकित हो गया और चालक ने कार रोक दी। इतने में पीछे से आई कार से छह-सात आदमी उतरे। परिवार की कार में तीन पुरुष और तीन महिलाएं बैठी थीं। अपराधी उन्‍हें बंदूक की नोक पर राजमार्ग पर‍ स्थित फ्लाईओवर के नीचे संपर्क मार्ग की तरफ ले गए। यहां उन्‍होंने तीनों पुरुषों को कार में बंधक बना लिया और तीन महिलाओं में से दो के साथ सामूहिक बलात्‍कार किया।
                हालांकि बलात्‍कार की यह अकेली घटना नहीं जो राजनीति से लेकर पुलिस-प्रशासन की अकर्मण्‍यता और कारगर व्‍यवस्‍था के अभाव की पोल खोलती हो। इससे पहले भी देशभर में इस तरह की अनेक घटनाएं हुईं और राष्‍ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्‍यूरो के अनुसार तो 2010 से 2014 तक देश में दुष्‍कर्म के मामलों में निरंतर वृद्धि हुई है। यहां सवाल मात्र दुष्‍कर्म का नहीं। दुष्‍कर्म जैसे अपराध तो घर की चाहरदीवार में भी होते हैं। विशेषकर दुष्‍कर्म पीड़ितों के नाते-रिश्तेदार या दोस्‍त ही इसमें लिप्‍त रहते हैं। इस पर पुलिस या प्रशासन प्रत्‍यक्ष रूप से कोई नियंत्रण नहीं कर सकता। ऐसे मामलों को सामाजिक माहौल में सांस्‍कृतिक विचारधाराओं का विकास कर नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन राष्‍ट्रीय, अंतर्राष्‍ट्रीय राजनीतिक और सामाजिक व्‍यवस्‍थाएं आज इस स्थिति में हैं कि विकास के अभिशाप के रूप में उभरी सामाजिक बुराइयां मिटाना उनकी कार्यसूची में है ही नहीं। परंतु इस स्थिति में जब आधुनिकता के बिगड़ते मिजाज से व्‍यक्ति-व्‍यक्ति में मानसिक विकार तेजी से बढ़ रहे हैं, सरकारों को अपनी पुलिसिंग व्‍यवस्‍था में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्‍यकता है। विधान-संविधान और नियम-कानूनों को देश के भीतर सुदूर सुनसान स्‍थानों में घटित होते अपराधों के अनुसार इतना लचीला होना चाहिए कि अपराधियों को तुरंत पकड़कर ऐसे दंड का प्रावधान हो कि अपराध करने से पहले कोई भी व्‍यक्ति दंड के भय के बाबत अवश्‍य विचार करे। यह विडंबना ही है कि जब अपराध की घटनाओं का मीडिया द्वारा व्‍याख्‍यान होना शुरू होता है और जब देश के एक बड़े जनसमूह तक ऐसी घटनाओं की सूचना प्रसारित हो जाती है, तब उस स्‍थान की राज्‍य-व्‍यवस्‍था अपराधियों की धरपकड़ के लिए सक्रिय होती है, जहां अपराध हुआ होता है।
                संविधान के अंतर्गत केंद्र व राज्‍य सरकारों के अधीन जैसी पुलिसिंग प्रणाली की कल्‍पना साठ-सत्‍तर साल पहले की गई थी, उसमें अब बहुत व्‍यापक सुधार की आवश्‍यकता आन पड़ी है। एक आम आदमी की नजर में आज पुलिसिंग कार्यप्रणाली हंसी-ठट्ठे का खेल बन कर रह गई है। खासकर उत्‍तर प्रदेश व बिहार जैसे राज्‍यों के पुलिस बल के सामाजिक और सरकारी कार्यों, दायित्‍वों और नागरिक सुरक्षा के उनके कर्त्‍तव्‍यों की अवधारणा इतनी खोखली हो चुकी है कि वे दिन के कुछ घंटों में बंधुआ श्रमिकों की तरह अपना ड्यूटी रोस्‍टर पूरा कर रहे होते हैं। आज देश में छोटे-बड़े कई तरह के अपराध तेजी से घट रहे हैं। इसके अलावा इंटरनेट और साइबर अपराधों में भी दिनोंदिन वृद्धि हो रही है। परंपरागत अपराधों में तो पुलिस सरकार के दबाव में अपराधियों को देर-सवेर पकड़ ही लेती है लेकिन साइबर अपराधों की जड़ तक पहुंचने और अपराधियों को दबोचने के लिए अभी तक देश का पु‍लिस बल इतना काबिल नहीं हो सका है।
सड़क से लेकर घरों में होनेवाले अपराधों के पीछे न जाने कितने किस्‍म के व्‍यक्तिगत मानसिक विकार होते हैं। इन परिस्थितियों में पुलिस बल को अपराधों की श्रेणियों के अनुसार प्रशिक्षण देकर उन्‍हें और उनके अधिकारों को विकसित करने की जरूरत  है। इतना ही नहीं उनके लिए पुलिसिंग से संबंधित समन्‍नुत साधन-संसाधन भी उपलब्‍ध होने चाहिए। यहां तक कि एक पुलिसवाले की ड्यूटी आठ-दस-बारह घंटे के बजाए चार-पांच घंटे की होनी चाहिए। कहने का तात्‍पर्य यह है कि हरेक पुलिसकर्मी चार घंटे ड्यूटी पर तैनात रहे और बाकी के चार घंटों में उसे शारीरिक व मानिसक रूप से स्‍वस्‍थ, सक्रिय, ऊर्जावान रखने तथा पुलिस कर्त्‍तवयों से संबंधित साहित्‍य पढ़ने को बाध्‍य किया जाए और श्रेष्‍ठ पुलिसिंग का प्रशिक्षण दिया जाए। इस तरह की पुलिसिंग कार्यशालाएं देशभर में अवश्‍य शुरू होनी चाहिए। इस उपक्रम से देश का पुलिस बल तो समन्‍नुत होगा ही होगा साथ में  बेरोजगारी भी दूर होगी, क्‍योंकि चार घंटे का ड्यूटी रोस्‍टर और चार घंटे पुलिसिंग प्रशिक्षण नियत होगा तो एक स्‍थान पर दो व्‍यक्तियों की तैनाती सुनिश्चित हो सकेगी।
अपराधों से बचने के लिए जनता को भी सरकार और पुलिस के साथ जागरूक बनना पड़ेगा। प्राय: देखा जाता है कि लोग स्‍वार्थवश और नागरिक दायित्वों के प्रति उदासीन होने के कारण अपराधों के घटने की पूर्व जानकारी या सूचना को पुलिस के साथ नहीं बांटते। पूर्व में इसके लिए पुलिस और प्रशासन के गलत बर्ताव को दोषी ठहराया जाता था, लेकिन अब जब पुलिस खुद विज्ञापन और सूचनाएं देकर नागरिकों से उनके नाक-कान बनने का आग्रह कर रही हो, तब तो जनता को उन्‍हें सहयोग देना ही चाहिए। इन्‍हीं उपायों को अपनाकर और नियम-अनुशासन बनाकर बढ़ते अपराधों पर नियंत्रण पाने की दिशा में कुछ कदम आगे बढ़ा जा सकता है। हालांकि देश, राज्‍य या समाज को पूर्णत: अपराधमुक्‍त करने के लिए सरकारों को आधुनिकता की विसंगतियों की ओर भी ध्‍यान लगाना होगा। भारत जैसे देश में तो आधुनिकता की विसंगतियां ही नहीं पारंपरिक राजनीति करने के मोहरे जैसे आरक्षण, जाति-धर्म आदि भी अपराधों के अहम कारक हैं। अपराधों पर नियंत्रण पाने में अगर अभी तक कामयाबी नहीं मिली तो इसके लिए भी पारंपरिक राजनीति करने के मोहरे ही जिम्‍मेदार हैं।
समाज में हो रहेे दुष्‍कर्मों, लूटपाट, हिंसा और यहां तक कि आत्‍महत्‍याओं की घटनाओं में भी अपराध घटित होने के प्रथम सूचना विवरण दर्ज करानेे से लेकर अपराधी को पकड़ने तक का समस्‍त कार्य तो पुलिस का है, लेकिन क्‍या अपराध घटित होने की प्रक्रिया में नागरिक, पुलिस, समाज और सरकार सभी की बेईमानी और अकर्मण्‍यता जिम्‍मेदार नहीं? इस बात पर अवश्‍य विचार हो और जितनी जल्‍दी हो सके देश के पुलिस बल को नई शक्तियों, अधिकारों और सुविधाओं से लैस करने की दिशा में काम किया जाए। ऐसा होगा तो हम उम्‍मीद कर सकते हैं कि देश में किसी के साथ कोई भी यूं ही राह चलते दुष्‍कर्म, लूटपाट और दुर्व्‍यवहार करने की जुर्रत नहीं कर सकता।
पूरे देश में लड़कियों और महिलाओं के विरुद्ध लैंगिक भेदभाव और अत्‍याचार भावना दिनोंदिन बढ़ रही है। आशंका है कि कहीं इसकी परिणति आनेवाले वर्षों में समाज के लिए आत्‍मघाती न हो जाए। इस बात का ध्‍यान देशभर के पुलिस-प्रशासन को अवश्‍य रखना होगा। दुष्‍कर्म की घटनाएं देश में एक सतत् अभ्‍यास बन चुकी हैं लेकिन इस पर पूर्ण प्रतिबंध के लिए सरकार, न्‍यायपालिका और पुलिस-प्रशासन की कार्यप्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव बिलकुल नहीं आया। जब तक न्‍याय की सर्वोच्‍च संस्‍था इस संबंध में दुष्‍कर्म पीड़ितों की पीड़ा को अपने विवेक के केंद्र में रख निर्णय नहीं करेगी तब तक इस समस्‍या से छुटकारा मिलना असंभव ही प्रतीत होता है। न्‍यायिक व्‍यवस्‍था भी कहीं न कहीं अपनी धारा की राजनीति के हित के अनुसार चल रही है। या तो न्‍याय व्‍यवस्‍था स्‍वावलंबी बने और पीड़ितों के पक्ष में त्‍वरित और क्रांतिकारी निर्णय ले या उस राजनीति को समाज और खासकर महिलाओं के प्रति सम्‍माननीय दृष्टिकोण अपनाने को विवश करे, जिस राजनीतिक विचारधारा के समर्थन में उसके निर्णय पीड़ितों के प्रतिकूल हो रहे हैं। अन्‍यथा जनजीवन में बलात्‍कार पीड़ित महिलाओं का दर्द अन्‍य सामाजिक अव्‍यवस्‍थाओं और उनसे निकली पीड़ाओं की तरह एक रूटीन बन जाएगा। और यदि किसी लोकतांत्रिक देश में ऐसा होता है तो लोकतंत्र अपने आप में विडंबनात्‍मक और अप्रासंगिक हो जाएगा। हमारे जनप्रतिनिधियों को इस विषय पर अपना न्‍यूनतम विचार तो करना ही चाहिए। माना कि वे बड़ी जिम्‍मेदारी के निर्वहन के लिए अयोग्‍य हैं, पर अपनी विचारशक्ति बढ़ाकर राजनीतिक रूप से योग्‍य हो सकते हैं। फलतउन्‍हें समस्‍याओं को सामान्‍य तरीके से सुलझाने का ही काम नहीं करना बल्कि समस्‍याओं के पैदा होने के कारणों की पड़ताल कर उन्‍हें समूल मिटाने के लिए भी कमर कस लेनी चाहिए।
बुलंदशहर में दुष्‍कर्म की घटना एक मामूली घटना नहीं रही। पूरे दो हफ्ते तक जनसंचार के केंद्र में ठहरी इस घटना के कई अन्‍य वीभत्‍स राजनीतिक और सामाजिक पहलू भी सामने आए। घटना के कुछ दिनों बाद ज्ञात हुआ कि अपराधियों ने दुष्‍कर्म का वीडियो भी बनाया तथा उसके आधार पर पीड़ित परिवार को धमकाने और चुप कराने की पूरी तैयारी उन्‍होंने कर रखी थी। पिछले दिनों केंद्र सरकार ने जब पोर्नोग्राफी पर प्रतिबंध के लिए कड़ा कानून बनाने की पहल की थी तो प्रगतिवाद के कई तथाकथित झंडाबरदारों ने इस पर आपत्ति प्रकट करी और इसे सभ्‍य और आधुनिक समाज के लिए बड़ा रोड़ा बता कर खूब विवाद उत्‍पन्‍न किया था। लेकिन बच्‍चों, युवतियों और यहां तक कि प्रौढ़-वृद्ध स्त्रियों के साथ आए दिन होनेवाली दुष्‍कर्मों की घटनाओं को ध्‍यान में रखते हुए उनकी दलील सरकार के विरोध में थोथी ही प्रतीत होती है। देखा जाए तो समाज के इस तरह के विघटन के लिए वास्‍तविक दुष्‍कर्मी यही लोग हैं। 

विकेश कुमार बडोला

5 comments:

  1. बढती संवेदनहीनता, आसानी से पैसा कमाने की ललक, बढती आबादी ... गिरते मूल्य और सभी समस्याओं का समाधान राजनीति में देखने का बढ़ता चलन और मीडिया की भूमिका ... सच मानों तो ये सभी बातें जिम्मेदार हैं ऐसी अमानुष घटनाओं के लिए ...

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  2. सरकार को दृढ़ता के साथ प्रतिबन्ध लगाना चाहिये क्योंकि दुराचार हिंसा से भी भयानक विषय है जिसे बढ़ावा देने में इनटरनेट बहुत बड़ा बल देरहा है . मेरी दादी एक कहावत कहती थीं कि जितने ऊमर (गूलर) फोड़ोगे उतने ही कीड़े निकलेंगे . अखबार और समचार चैनल सूचना देते हैं जबकि समाधान उसके हाथ में नहीं जनता उबलती रहती है कि कब दोषी को सजा मिलेगी ..कानून में भी सख्त व त्वरित कार्यवाही का प्रावधान होना चाहिये .सजा कठोर हो तो अपराधी चार बार सोचेगा अपराध से पहले . और विरोधियों की तो बात करना ही बेकार है उन्हें तो विरोध से मतलब है चाहे वह कितना ही कुत्सित क्यों न हो .

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  3. बहुत सटीक और सारगर्भित आंकलन...

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  4. अपने समाज के पिछड़ेपन और नाकामी पर भी कितनी गंदी राजनीति होती है । आपने सही कहा कि सब दुष्कर्मी ही लगते हैं । इनसे किसी सुधार की अपेक्षा भी आस नहीं बंधाती है । समाज को खुद ही बदलना होगा ।

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  5. भारतीय कानून मज़बूत है: मगर किताबी रूप में. यथार्थ में मज़बूत इसलिये नहीं है क्योंकि हमारे देश के राजनेता बहुत भ्रष्ट हैं और अपनी-अपनी चलाते हैं. अभी भी एक ईमानदार पुलिसकर्मी छः महीने टिक नहीं सकता अपने पद पर. क्योंकि किसी ना किसी नेता से उसकी ठन जाती है. जो वाकया आपने कहा है वह पुलिस का घोर निकम्मापन है. लेकिन अगर इतिहास के पन्नों से गुजरें तो १९८४ के दंगे, १९९२ का बाबरी काण्ड तथा २००२ जैसे जघन्य नरसंहार राजनेता प्रायोजित पुलिसिया नाकामी के उदाहरण हैं. क़ानून कितना भी मज़बूत हो जाए, भारत में न्याय तब तक नहीं मिल सकता जब तो पुलिस की स्वायत्तता सच्चे अर्थों में स्थापित की जाए. सीबीआई का हाल देख लीजिये. वह सत्ताधारी दल की कठपुतली होती रही है. अगर वह एक स्वायत्त संस्था होती तो वाड्रा, कलमाडी जैसे लोग वहीँ होते जहाँ अब तक उन्हें हो जाना चाहिए था.

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