Saturday, August 20, 2016

सोशल मीडिया की शक्ति से परिचित राजग

यह आलेख मूल रूप से दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में
रविवार 21 अगस्‍त 2016  को प्रकाशित हो चुका है।
रविवार 21 अगस्‍त 2016 को दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में
विगत दिनों वित्‍त मंत्री अरुण जेटली ने एक महत्‍त्‍वपूर्ण वक्‍तव्‍य दिया। इसमें उन्‍होंने मंत्रियों और प्रशासकों को सोशल मीडिया पर अपनी बात रखने की खुली छूट दिए जाने के पक्ष में अपने तर्क रखे। उन्‍होंने कहा अगर यह व्‍यवस्‍था शुरू होती है तो इससे शासन के कार्यों में पारदर्शिता आएगी, शासन-प्रशासन की समस्‍त कार्यप्रणाली सुचारू होगी और सर्वोपरि शासन-प्रशासन में कार्यरत् एक व्‍यक्ति को एक सामान्‍य नागरिक के रूप में अभिव्‍यक्ति की वास्‍तविक स्‍वतंत्रता प्राप्‍त हो सकेगी। माइगॉव.इन कम्‍प्‍यूटर एप्लिकेशन की दूसरी वर्षगांठ के अवसर पर वित्‍त मंत्री का ऐसा वक्‍तव्‍य राजग सरकार की स्वच्‍छ और साफ कार्यप्रणाली की ओर संकेत करता है। हाल ही में कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग ने अपनी सेवा शर्तों का नया मसौदा तैयार किया है। इसमें स्‍पष्‍टत: एक प्रस्‍ताव है, जिसमें उल्लिखित है कि शीर्ष सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को खुले तौर पर फेसबुक, ट्विटर और लिंक्‍डइन जैसी सोशल नेटवर्किंग साइटों पर खुद को अभिव्‍यक्‍त करने की छूट हो लेकिन इस मसौदे में सरकार की आलोचना पर प्रतिबंध अभी भी बना हुआ है। मसौदे के नियमानुसार अधिकारियों को टेलीविजन, सोशल मीडिया और किसी अन्‍य संचार माध्‍यम से यहां त‍क कि कार्टून के माध्‍यम से भी सरकार की आलोचना करने का अधिकार नहीं है। कुल मिलाकर इस मसौदे की शर्तों को देखकर सरकार का उद्देश्‍य इस रूप में दृष्टिगोचर होता है कि सरकारी कर्मचारी विभिन्‍न सोशल साइटों पर किसी खास सरकारी निर्णय के लागू होने या कानून बनने से पहले तो उस पर अपने विभिन्‍न मतों को प्रकट कर सकते हैं, सरकार भी जरूरी मतों पर ध्‍यान देते हुए उन्‍हें अपनी सरकारी नीति के नियमों का हिस्‍सा बना सकती है, लेकिन निर्णय हो जाने के उपरांत या कानून बन जाने के बाद सरकारी कर्मचारियों को उसमें मीन-मेख निकालने की अनुमति नहीं दी जाएगी। सरकार के अनुसार सोशल मीडिया‍ विभिन्‍न दृष्टिकोणों, आलोचनाओं, टिप्‍पणियों और सुझावों को सामने रखता है। इसलिए पारदर्शी सरकारी प्रणाली में सोशल मीडियाा पर मंत्रियों और अधिकारियों को अपनी राय रखने देने में कोई समस्‍या नहीं  होनी चाहिए। सरकार का मत है कि इससे परामर्श की प्रक्रिया को बढ़ावा मिलता है। वित्‍त मंत्री ने सोशल मीडिया के लाभ गिनाते हुए बताया कि पहले जनमत या सुझावों के लिए केवल बड़े महानगरों की ओर ही देखा जाता था, लेकिन अब सोशल मीडिया की सहायता से विद्यालयों, महाविद्यालयों, द्वितीय-तृतीय और यहां त‍क कि उससे भी छोटे स्‍तर के शहरों और गांवों से भी किसी सरकारी मत पर लोगों की स्‍वतंत्र राय मिल जाती है। उनका कहना है कि अब युवाओं के पास किसी भी विषय के संबंध में अधिकाधिक सूचनाएं हैं और सरकार का उद्देश्‍य इन के साथ अपनी मानव मशीनरी यानि अधिकारियों और कर्मचारियों का संवाद सुनिश्चित करना है, ताकि उसे जनता के लिए आवश्‍यक नीतियां बनाने में सहायता मिले।
          एक तरफ राजग सरकार सोशल मीडिया के लाभों से उल्‍लसित होकर इससे अपने अधिकारियों और कर्मचारियों को जोड़कर अपनी राजनीतिक दशा-दिशा को मांझना चाहती है और जितना अधिक हो सके जनहितैषी होने में उसे कोई समस्‍या नहीं है तथा दूसरी ओर संप्रग सरकार थी, जिसने अपने घपलों-घोटालों को मुख्‍यधारा के मीडिया में अपनी सांठगांठ के चलते बहुत दबाने की कोशिश की और जब सोशल मीडिया में उसके प्रति देश की जनता आग उगलने लगी, उसके घोटालों को उजागर करते हुए उसे सत्‍ताच्‍युत करने के संकल्‍प करने लगी तो उसने इस पर प्रतिबंध की तैयारी भी शुरू कर दी थी। उस काल में मुख्‍यधारा के मीडिया में जो संप्रग के घोटाले बाद में उजागर होने शुरू हुए, वे भी इस डर से हुए कि कहीं मुख्‍यधारा का मीडिया जनमानस की दृष्टि में हास्‍यास्‍पद और पूरी तरह अनदेखा न हो जाए। इसलिए मुख्‍यधारा के मीडिया ने भी सोशल मीडिया की ताकत को भांपकर अपनी विचारधारा तत्‍कालीन संप्रग सरकार के घोटालों और अवैध गतिविधियों को उजागर करने के रूप में बदलनी शुरू कर दी। इसमें भी वे मीडिया संस्‍थान सुस्‍त रहे जो पूरी तरह या किसी न किसी रूप में कांग्रेसियों, वामदलों और संप्रग के गठजोड़ से चल रहे थे। आज भी यही स्थि‍ति है। कुछ मीडिया संस्‍थान अब सोशल मीडिया के रुख से खुद को संचालित कर रहे हैं। इसी में उनकी भलाई भी है। लेकिन अभी भी कुछ संस्‍थान ऐसे हैं, जो जनता को बेवकूफ समझ कर भ्रम का आवरण फैलाने में लगे हुए हैं। उनकी यही चाल-ढाल रही तो आनेवाले एक या दो सालों में वे पूरी तरह खत्‍म हो जाएंगे।
इस संदर्भ में राजग ने सोशल मीडिया से जुड़ने के संबंध में जो विचार प्रकट किए हैं, वे उसकी स्‍वच्‍छ राजनीतिक छवि और उसके पारदर्शी सुशासन का स्‍पष्‍ट संकेत हैंं। जनमानस को इसे समझना चाहिए।
विकेश कुमार बडोला

7 comments:

  1. व्यापक पहुँच के बाबजूद सोशल मीडिया भी काफी संकीर्ण दायरों में बट चूका है, किन्तु फिर भी पहल अच्छी है .....

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  2. पारदर्शिता का पहले मन तो बने ....

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  3. कहने और करने का अंतर भी देखना पड़ेगा ... कई बार ऐसी मंशा सिर्फ छवि सुधारने के लिए ही होती है ... और असल में करते इसका विपरीत ही हैं ...

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  4. कविता जी और दिगंबर जी तुलनात्‍मक रूप से भाजपा की सरकार बाकी सरकारों से तो बहुत अच्‍छी है। रही कुछ मुद्दों पर बवंडर काटने की बात तो ये उस तथाकथित मीडिया की वजह से जो धुर वामपंथी है और हिंदू मान्‍यताओं का सम्‍मान करनेवाली बीजेपी और उसके अनुसरणकर्ताओं को फूटी आंखों नहीं देखना चाहते। इन्‍होंने और इनके चहेते मीडियाकर्मियों ने ही निरर्थक मुद्दों पर भाजपा के केंद्रीय शासन को घेरने की दुर्नीति बनाई हुई है। आप लोग यदि वामपंथी नहीं हैं तो आपको यह बात समझनी चाहिए। मैं देख रहा हूँ कि सोशल मीडिया पर वामपंथियों के विरुद्ध मेरे उग्र होने से, जो जायज भी है, मेरे द्वारा उनके खिलाफ खुल कर लेख लिखने व टिप्‍पणियां आदि करने से मेरे कई ब्‍लॉगर मित्र भी मुझसे वैर भावना रखने लगे हैं। जबकि सच्‍चाई यह है कि वामपंथियों के दर्शन से किसी भी देश में विनाश ही हो सकता है। सनातन धर्म की अवधारणा ही जो सब कुछ सं‍तुलित कर सकती है। आज दिमाग से नहीं चीजों को दिल से सोचने की जरूरत है। और अगर ऐसा होता है तो निश्चित रूप से आप लोग तथाकथित कांग्रेस, वाम, सपा-बसपा, त्रणमूल आदि विध्‍वंशक राजन‍ीतिक दलों से श्रेष्‍ठ भाजपा को ही पाएंगे। बाकी इस विषय में बहुत लंबी चर्चा की जा सकती है, जिसका मैं समझता हूँ कोई लाभ नहीं है।

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  5. विकेश जी, सोशल मीडिया की शक्ती से आज हर कोई वाकिफ हो चुका है। भाजपा थोड़ी बहुत पारदर्शिता लाने की कोशिश कर रही है, जिसके असल परिणाम थोड़े समय बाद ही अच्छे से पता चल पायेंगे।

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  6. जब चिड़िया चुगती है खेत तो बात समझ में आती है ।बस जनमानस चिड़िया न बने ।

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  7. पहल तो अच्छी है लेकिन जब तक आलोचना की छूट नहीं तो तो व्यवस्था प्रजान्त्रिक होकर भी वास्तविक अर्थ में चीनी 'वामपंथी' ढर्रे की हो जायेगी.

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