Monday, August 1, 2016

प्राकृतिक आपदाओं से कराहता उत्तराखंड

उत्‍तराखंड प्राकृतिक आपदाओं से बुरी तरह कराह रहा है। पिछले एक दशक में यह लगभग हर वर्ष की त्रासदी बनती जा रही है कि वर्षा ॠतु के शुरू होते और खत्‍म होते-होते देवभूमि में बादल फटने, बिजली गिरने, अतिवृष्टि के बाद भूस्‍खलन होने से स्‍थानीय जनजीवन बुरी तरह उजड़ जाता है। पहली जुलाई को राज्‍य के पिथौरागढ़ और चमोली जिले में मानसून की शुरुआत कहर बन कर आई। इन दोनों जिलों में छह से अधिक स्‍थानों पर बादल फटने से जनजीवन त‍बाह हो गया। बादल फटने के बाद आए उफान के मलबे में 39 लोग दब गए। आपदा राहत कार्यों में लगे सरकारी और स्‍थानीय लोगों ने इस घटना के दो-तीन बाद 15 लोगों के शव मलबे में से निकाल लिए हैं। इस जलजले में 19 लोग अभी तक लापता हैं। आपदा से 60 से अधिक घर क्षतिग्रस्‍त हो गए और 100 से ज्‍यादा घरों के क्षतिग्रस्‍त होने की आशंका है। इस प्राकृतिक कोप में पिथौरागढ़ में ज्‍यादा नुकसान हुआ। यहां के बस्‍तड़ी गांव में एसडीआरएफ व असम रेजिमेंट के जवानों ने जब मलबे में दबे लोगों को खोजने का अभियान चलाया तब जाकर एक दर्जन से ज्‍यादा शव निकाले जा सके। इसी बीच अरुणाचल प्रदेश के पश्चिमी कामेंग जिले के भालुकपोंग में भी बारिश के कारण हुए भूस्‍खलन में 10 लोग मर गए।
अति‍वृष्टि के लिहाज से चमोली जिला हर वर्ष अतिसंवेदनशील होता जा रहा है। सन् 2013 की आपदा ने चमोली जिले के 84 गांवों पर कहर बरपाया था। मरनेवाले तो मर गए पर जीवित बचे लोगों का जीवन मौत से भी बद्दतर हो गया। सरकार ने बचे हुए लोगों को आपदा से जर्जर हुए इन क्षेत्रों से कहीं दूर सुरक्षित स्‍थानों पर बसाने का निर्णय तो ले लिया, लेकिन इस पर अभी तक ठोस काम कुछ नहीं हुआ। आपदाओं को देखते हुए सर्वेक्षण के लिए चमोली जिले में सरकार की तरफ से भू-वै‍ज्ञानिकों की टीम भेजी गई थी। लेकिन अब तक 84 में से केवल 17 गांवों का ही सर्वेक्षण हो पाया कि गांवों को विस्‍थापित किया जाए अथवा नहीं। तीन वर्ष पहले की आपदा के बाद हर वर्ष यहां का जनजीवन पर्यावरणीय दृष्टि से असुरक्षित होता जा रहा है। लेकिन अभी तक सरकार बचे हुए लोगों के पुनर्स्‍थापन के लिए केवल कागजों में ही हेर-फेर करने पर लगी हुई है। जबकि इस समय चमोली जिले के इन गांवों का हाल यह है कि बरसात आते ही लोग जान की खातिर रतजगा करने को विवश हैं। आपदा प्रभावित संघर्ष समिति के अध्‍यक्ष राकेश लाल खनेड़ा के अनुसार कई बार अनुरोध करने के बाद भी सरकार आपदा प्रभावित गांवों का सर्वेक्षण करने में रुचि नहीं ले रही। इससे लोगों के सामने जीवन का संकट खड़ा हो गया है। 2013 की आपदा में लापता लोगों का आंकडा 4035 तक पहुंच चुका है।
एक ओर प्रकृति के असंतुलन का सीधा असर स्‍थानीय उत्‍तराखंड निवासी भुगत रहे हैं तो दूसरी ओर केंद्र और राज्‍य सरकार केवल अपने-अपने राजनैतिक हित साधने में ही लगे हुए हैं। सरकारों को पर्वतमाला के विघटन के कारण पूरे देश में होनेवाली पर्यावरणीय अस्थिरता का भान गंभीरता से नहीं है। यदि होता तो वे इस दिशा में कुछ ठोस कार्य करते और उत्‍तराखंड सहित सभी पर्वतीय राज्‍यों के वनों, पर्यावरण और भूगोल को दृष्टिगत रखते हुए एक सर्वथा पृथक हिमालय मंत्रालय ही गठित कर चुके होते। अब जब वैज्ञानिक सर्वेक्षणों में निकलकर आया कि उत्‍तराखंड में जून 2013 में आई आपदा का कारण केदारनाथ के ऊपर स्थित एक ग्‍लेशियर झील का टूटना था और इसी कारण पूरी केदारघाटी में जमकर तबाही मची थी, तो सरकार को ग्‍लेशियरों के असंतुलन सहित अनेक प्राकृतिक असंतुलनों के लिए दोषी राज्‍य में चलायमान जल‍-विद्युत परियोजनाओं, विनिर्माण की विस्‍फोटक तकनीकों और खनन व खदान की अप्राकृतिक प्रक्रियाओं पर तत्‍काल प्रभाव से रोक लगा देनी चाहिए। पर्वतीय राज्‍य की सरकार के राजस्‍व के लिए पर्वतों का अस्तित्‍व मिटाना कुछ वैसा ही होगा जैसे जिस डाल पर बैठे हों उसी को आरी से काटना।
हाल ही में गंगोत्री नेशनल पार्क और पंडित गोविन्‍द बल्‍लभ पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्‍थान, अल्‍मोड़ा के वैज्ञानिकों ने गोमुख ग्‍लेशियर का एक हिस्‍सा टूटने की पुष्टि करते हुए आशंका प्रकट करी कि कहीं यह ग्‍लेशियर टूटने का असमय क्रम राज्‍य में 2013 की आपदा को न दोहरा दे। क्‍योंकि सामान्‍यत: गोमुख ग्‍लेशियर जुलाई आखिर या अगस्‍त के आरंभ में टूटते हैं। ग्‍लेशियर विज्ञानी कम बर्फबारी को इस सबका कारण मान रहे हैं। इसे लेकर वैज्ञानिक सचेत हैं क्‍योंकि सन 2012 में भी ग्‍लेशियर टूटा था। तब ग्‍लेशियर के टूटने के बाद आनेवाले जल उफान को रोकने के लिए वैज्ञानिकों ने एकाध स्‍थान पर बांध भी बनाया था, लेकिन अतिवृष्टि का उफान उस बांध को ही बहा ले गया। उन्‍हें यह भी अभी पता चला है कि गोमुख ग्‍लेशियर का एक हिस्‍सा टूटकर भागीरथी नदी में समा गया है। यह ग्‍लेशियर के बाईं तरफ का हिस्‍सा था। इसका तब पता चला जब ग्‍लेशियर के टुकड़े उत्‍तरकाशी से 18 किलोमीटर दूर गंगोत्री में भागीरथी के प्रवाह में देखे गए।
उत्‍तराखंड में आपदा की प्रमुख वजह बर रही अतिवृष्टि से बचने के लिए राज्‍य सरकार ने कृत्रिम बारिश कराने की मैग्‍नेटिक टेक्‍नोलॉजी के उपयोग पर विचार शुरू कर दिया है। इस कड़ी में यूएई की एक निजी कंपनी इंजियोसर्विस ने सचिव आपदा प्रबंधन के समक्ष इस तकनीक के प्रयोग पर प्रस्‍तुतीकरण दिया। राज्‍य आपदा न्‍यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र में कंपनी के विशेषज्ञ गैरी डी ला पोमेराय ने मैग्‍नेटिक तकनीक के जरिए अत्‍यधिक घनत्‍व वाले बादल को कृत्रिम बारिश कराकर कमजोर करने की तकनीक की विस्‍तृत जानकारी दी। उन्‍होंने बताया कि ऐसे बादल को चिन्हित कर अधिक घनत्‍व प्राप्‍त करने से पूर्व ही मैग्‍नेटिक तकनीक के माध्‍यम से न केवल कई छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ा व फैलाया जा सकता है बल्कि कृत्रिम बारिश कराकर कमजोर भी किया जा सकता है। यूएई, चीन जैसे देशों में इस तकनीक का प्रयोग हो चुका है। लेकिन यह सब करते हुए हमारे वैज्ञानिकों को यह भी ध्‍यान में रखना होगा कि चीन ने भी अपने यहां अतिवृष्टि को रोकने के लिए कई कृत्रिम प्रयोग किए थे, जिनका दो-तीन वर्ष बाद विपरीत असर हुआ और चीन भी लगभग हर वर्ष बरसात में अपने यहं की आपदा, बाढ़ को रोकने में नाकाम हो रहा है। अभी भी वहां बाढ़ की स्थिति बनी हुई है। दक्षिणी चीन के ग्‍वांगशी झुआंग स्‍वायत्‍तशासी क्षेत्र स्थित औद्योगिक शहर लियूझोऊ पूरी तरह बाढ़ के कारण जलमग्‍न है। चीन में इस बरसात की बाढ़ से 128 लोगों की मौत हो गई और 47 लाख एकड़ फसल नष्‍ट हो चुकी है। वहां अतिवृष्टि से 11 प्रांत प्रभावित हैं, 43 नदियां खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं और 41 हजार घर बाढ़ में बह गए हैं। इन सबसे वहां अब तक 384 अरब रुपए का नुकसान हो चुका है। इसलिए उत्‍तराखंड  सरकार को कृत्रिम बारिश के प्रतिरोध से अतिवृष्टि को रोकने के अपने फॉर्मूले पर फि‍र से विचार करना चाहिए। क्‍योंकि इस तरह की तकनीक बेचने वाली कंपनियां तो अपना मुनाफा बनाने के लिए अपनी तकनीक को कारगर बताएंगी ही, पर हमारे सामने चीन का प्रत्‍यक्ष उदाहरण है, जो अपने यहां इस तरह की तकनीक को अपनाने के बाद भी अतिवृष्टि की विभीषिका से बचने में असफल ही रहा।
पुरालेखों में गलत नहीं कहा गया कि जब दुनिया खत्‍म होगी तो कई तरह की आपदाएं एक साथ आएंगी। दुनिया के देश एक तरफ तो जलवायु परिवर्तन की समस्‍या का हल निकालने को निरंतर शिखर सम्‍मेलन कर रहे हैं, तो दूसरी ओर नाभिकीय व परमाण्विक शस्‍त्रों से लैस होने के लिए भीषण होड़ मचाए हुए हैं। इस तरह दो नावों पर पैर रखकर आधुनिकता के शिखर पर बैठने की आज के मनुष्‍य की कामना उसे आखिर में ले ही डूबेगी। कुछ भी हो पर मनुष्‍य जाति को प्रकृति से अपनी आत्‍मघाती प्रतिस्‍पर्द्धा बंद करनी ही पड़ेगी।
विकेश कुमार बडोला

5 comments:

  1. दुखद व चिन्ताजनक . वास्तव में जो लोग नियन्ता हैं वे आराम से रहते हैं .संट में फँसे लोगों की पीडा उन्हें तब दिखाई देती है जब शोर उठता है .

    ReplyDelete
  2. प्रभु सब की रक्षा करें |


    ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " पिंगली वैंकैया - भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के अभिकल्पक “ , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    ReplyDelete
  3. मेरी बहन अर्चना चावजी के समधी और समाधान दोनों ऐसी ही एक आपदा के शिकार हुए और उनके मृत शरीर भी प्राप्त नहीं हुए. आपने सचाई से रू ब रू कराया!

    ReplyDelete
  4. सच्चाई से रूबरू कराती अच्छी पोस्ट ... पर आज मीडिया को इतना सब दिखाने की फुर्सत नहीं ... गंदे घटिया बयानों पर चर्चा सारे रोज होती रहती है ...
    कई बार लगता है पूरा देश आज़ादी के बाद से ही समस्याओं पर बस ढक्कन लगाने का काम कर रहा है

    ReplyDelete
  5. अति , अनदेखी आदि ही विनाश का कारण होता है । पर...

    ReplyDelete

Your comments are valuable. So after reading the blog materials please put your views as comments.
Thanks and Regards