महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Monday, September 21, 2015

वस्‍तुओं का दासत्‍व न स्‍वीकारें

तनी ताकत भी नहीं बची कि किसी के लिए शुभकामना कर सकूं। ऐसी जिन्‍दगी का हिस्‍सा होना बहुत दुख देता है। खुद को अपनी ही कमियों से बचाता हुआ कब तक मैं भागता रहूँगा। और यह भी समझ नहीं आता है कि भागना कहां है, जब कोई एक लक्ष्‍य जीवन में है ही नहीं। इस युग में एक आदमी का जीवन, सच बताऊं तो, जंजाल के सिवाय कुछ नहीं है। हमारी आशावादी बातें या सकारात्‍मक विचार भी तो जंजाल में फंसे होने के प्रतिरोध में ही निकलते हैं। तो यह स्‍वीकार करने में हिचक क्‍यों कि मैं दुखी हूँ और सुखी होने का दिखावा करता हूँ। क्‍या इस स्थिति में मुझ पर असत्‍यवादी होने का आरोप नहीं लगना चाहिए कि मैं विकट दुखों को छानता हुआ दुनिया को कहता फि‍रूं कि मैं खुश, प्रसन्‍न हूँ।
कभी-कभी लोगों की जीवन सम्‍बन्‍धी सीखें बहुत खोखली लगती हैं। इनमें हमारे लिए किए जानेवाले उनके किसी षड्यन्‍त्र का आभास होता है। लगता है कि कहीं वे सीख देने की आड़ में अपनी कोई बात तो नहीं थोप रहे या अपना कोई काम तो नहीं निकलवा रहे।
कुछ वर्षों से मानवीय जीवन अपना स्‍वभाव बिलकुल भूल गया है। हरेक व्‍यक्ति अपने उस स्‍वरूप को प्रकट करने के लिए बेचैन रहता है जो वास्‍तव में उसका स्‍वरूप होता ही नहीं। और अपना मूल स्‍वरूप छिपाकर रखना उसे अच्‍छा लगता है। वह सोचता है कि ऐसा करके वह आधुनिक दौड़ में बना रह सकता है। ऐसी स्थितियां हैं कि आप को लाख ना चाहते हुए भी वह बनना पड़ता है, जो आप बनना ही नहीं चाहते। इस बनने की प्रक्रिया में हमारा स्‍वाभाविक जीवन हमारी इच्‍छा, कामना में तो रहता है पर हमारे कार्यकलापों से वह अदृश्‍य हो जाता है। ऐसी आत्‍मघाती स्थिति को प्रतिदिन ही अपने जीवन में अपनाना और रात्रि के एकान्‍त में इसके लिए पछताना हमारी नियति हो जाता है। वर्षों की यह आदत एक दिन बड़ा मानसिक रोग बन जाती है। और आज अधिकांश लोग जो या जिस स्थिति में हैं, वह इसी रोग के कारण हैं।
मनुष्‍य जीवन आज वस्‍तुओं का दास है। अब हम अपने विचार से नहीं चलते। हमें चलानेवाली वस्‍तुएं हैं। किस वस्‍तु का आकर्षण कितना है, हम उसके अनुसार अपने भाव-विचार या दिनचर्या तय करते हैं। हमें किस वस्‍तु ने सौंदर्य की अनुभूति नहीं कराई, इसके अनुसार हम भाव-विचारों व दिनचर्या को स्‍थगित कर देते हैं। यह स्थिति भला हमें सच्‍चा मनुष्‍य कहां बनने देगी! ऐसी स्थिति के वश में रहना जीवन में रहना कैसे हो सकता है! वस्‍तुओं को जीवन का सबसे बड़ा अवलम्‍ब बनाना ठीक नहीं। दुनिया में वस्‍तुओं का आदान-प्रदान मात्र जीवन की आवश्‍यकताओं के लिए होना चाहिए। अपनी आवश्‍यकता के लिए ही वस्‍तुओं के प्रयोग की कामना न हो। प्रयत्‍न हो कि सभी मनुष्‍यों को उनकी आवश्‍यकतानुसार वस्‍तुएं उपलब्‍ध हों। किसी के पास उनकी अति न हो और ना ही कोई उनके अभाव में रहे। यह सन्‍तुलन स्‍थापित हो तो समाज की दशा सुधरे।
तो वही बात फि‍र मस्तिष्‍क में कौंधती है कि हम किस आधार पर प्रसन्‍न, आशान्वित और आनंद से लाभान्वित हों! किस प्रेरणा से शुभकामनाएं रखनेवाला ह्रदय पाएं! जब चारों ओर निराशा फैल रही हो और एक-दूसरे को हानि पहुँचानेवाले षड्यन्‍त्र चल रहे हों तो ऐसे में मानव किस सूत्र से जीवन के लिए एक श्रेष्‍ठ भावना अर्जित करें। लेकिन फि‍र भी सही दिशा में अग्रसर होने के यत्‍न चलते रहने चाहिए।
सड़े हुए फल से भी बीज निकलते हैं। यह बीज मिट्टी के अंदर से शक्ति पाकर अंकुरित होंगे। जरूरी नहीं कि ये भी सड़ी हुई अवस्‍था में हों। इन्‍हें स्‍वास्‍थ्‍य, हरियाली और प्रकृति की श्रेष्‍ठ शक्तियों से पोषित करना होगा। यही बात सड़े-गले समाज या परिवेश में अच्‍छी बातों या विचारों के लिए लागू होती है। यहां अच्‍छी बातों व विचारों को नए बीजों की संज्ञा दी जानी चाहिए। इनके लिए स्‍वस्‍थ, हरा-भरा और प्राकृतिक वातावरण बनाना ही होगा। यही आशा है। इससे निरन्‍तर जुड़े रहना होगा। इस उपक्रम में एक भाव सदैव मन-मस्तिष्‍क में रहे कि हमें कभी भी वस्‍तुओं का दासत्‍व स्‍वीकार नहीं करना।
विकेश कुमार बडोला

Monday, September 14, 2015

उनके बच्‍चे को डेंगू बुखार हुआ था...

नके बच्‍चे को डेंगू बुखार हुआ। वे अपने बच्‍चे को बचा नहीं पाए। और उन दोनों पति-पत्‍नी ने एक-दूसरे के हाथ रस्‍सी से बांधे और कूद गए एक ऊंचे भवन से। वे भी आखिर में अपने बच्‍चे के पास पहुंच गए। हम सबने कहानी की तरह यह सब पढ़ा। कुछ नहीं हुआ हमें और लग गए अपने काम-धन्‍धों में। सरकार, समाज और मानवता असहाय होकर यह सब ताकती रही।
जब किसी की सहायता नहीं हो सकती तो उसका नाम याद करके करना ही क्‍या। दो या तीन दिन पहले इस मशीन यानि मैंने ये खबर पढ़ी कि डेंगू बुखार से अपने सुपुत्र को न बचा पानेवाली दम्‍पत्ति ने भी मृत्‍यु अंगीकार कर ली। चिकित्‍सालय में समय पर भर्ती न हो पाने और उसके बाद उचित चिकित्‍सा के अभाव में उनके बच्‍चे ने दम तोड़ दिया। मां-बाप इस अप्रत्‍याशित स्थिति की कल्‍पना भी नहीं कर सकते थे। वे इतने निराश हुए कि बेटे की अकाल मृत्‍यु के तीन दिन बाद पति-पत्‍नी ने एक ऊंचे भवन से कूदकर आत्‍महत्‍या कर ली। इस तरह एक परिवार जो अपने को दुनिया, समाज व मानवता के बीच पाकर सुरक्षित मानता था वह उसी दुनिया, समाज व मानवता की उपेक्षा, असहायता और असहयोग के कारण काल कवलित हो गया।
            मुझे मरनेवालों के नाम याद नहीं। उनके मुख याद नहीं हैं। इतना स्‍मृति में कौंध रहा है कि इस तरह एक परिवार शासन-समाज के बीच कितनी अमानवीयता से ग्रस्‍त हुआ! क्‍या किसी सभ्‍य व जागरूक समाज में इस तरह की दुर्घटना की कल्‍पना की जा सकती है? यह एक अप्रत्‍याशित अशुभ समाचार है। इस पर हमारे कर्ताधर्ताओं सहित पूरे जन समुदाय को रुककर अवश्‍य सोचना चाहिए। क्‍या ऐसे परिवार के पास-पड़ोसवाले उसकी सहायता नहीं कर सकते थे? जहां वह व्‍यक्ति अपने तीन सदस्‍यीय परिवार के लिए रोजगार करता था, क्‍या उस नियोक्‍ता का यह दायित्‍व नहीं था कि वह उनके बारे में सोचता? यदि कोई परिवार इकाई अपने दुख से लोगों को परिचित नहीं करा पाती तो क्‍या लोगों का दायित्‍व नहीं कि वे अपनी सुख-सुविधाओं के समय में से कुछ समय निकालकर ऐसे परिवार के प्रति तन-मन-धन से समर्पित हों? आखिर सम्‍पन्‍नता की स्थिति में पहुंचे लोगों का सम्‍पन्‍न होने से क्‍या मतलब है? क्‍या उन्‍हें सम्‍पन्‍नता के समानांतर स्‍वाभाविक रूप से उपजनेवाले सामाजिक कर्तव्‍य के प्रति सचेत नहीं होना चाहिए? क्‍या उन्‍हें इतनी फुर्सत भी नहीं थी कि वे आत्‍महत्‍या करनेवाले परिवार को भावनात्‍मक सहारा देते, उनके बेटे के रोगग्रस्‍त होने पर उनकी सहायता करते?
            हमें स्‍वयं को इन प्रश्‍नों से अवश्‍य परेशान करना चाहिए। अन्‍यथा समाज का लक्षण समाप्‍त हो जाएगा। इस तरह मृत्‍यु को अंगीकार करनेवाले परिवार की स्थिति में कभी भी कोई भी परिवार हो सकता है। हमें इस तरह से अंतर्मुखी नहीं होना कि हमारा मनुष्‍य होने का आधार ही न रहे। अपने पास-पड़ोस, परिवेश में उन लोगों की ओर हमें अपना ध्‍यान फैलाना ही होगा, जिन्‍हें सच में तन-मन-धन से हमारी सहायता चाहिए। मनुष्‍य होने का यही उद्देश्‍य है। इसके बिना हम कैसे आत्‍ममुग्‍धता में ही अपना सारा जीवन गुजार सकते हैं?
................................इस मशीनी जिन्‍दगी में क्‍या कोई शख्‍स दिल भी रखता है?
.......................या जालिम आंखों औ' पत्‍थर मन से सिर्फ खूनी महफि‍ल तकता है?
विकेश कुमार बडोला

Monday, September 7, 2015

दृष्टिकोण बदलने से मिलती सुख-शांति

ब इस बात की कोई संभावना न हो कि भविष्‍य में आपके जीवन में क्‍या होगा, तो आप के पास क्‍या उपाय बचता है? हममें से बहुत लोग इस विचार बिन्‍दु पर निरुपाय ही रहते हैं। लेकिन यदि हम कुछ अलग तरह से सोचें तो पाएंगे कि यहीं से हममें सभी भौतिक व प्राकृतिक घटनाओं के प्रति एक उन्‍मुक्‍त दृष्टि जन्‍मती है। इसी से हमारे लिए हर जीवन अनुभव नया व विशेष बन जाया करता है। हम अपने परिवेश को उसके पुराने आवरण की तुलना में एक नए स्‍वरूप में देखने लगते हैं। यह सब कुछ हम सबके दैनिक जीवन में सामान्‍य रूप से घटता है। आवश्‍यकता इस घटनाक्रम को विशेष बनाने की होनी चाहिए।
            आप स्‍वयं सोचें कि आखिरी बार आपने अपनी मां को भोजन बनाते हुए कब देखा। आपके सामने पका हुआ भोजन आ जाता है। आप उसे किसी तरह पेट तक पहुंचाने का ही कष्‍ट कर पाते हैं। यहां तक कि आप मां द्वारा प्रेमपूर्वक पकाए भोजन का मूल स्‍वाद भी नहीं चखते। ह्रदय से सोचें कि मां तरह-तरह के व्‍यंजन बनाने के लिए कितना परिश्रम करती है। उसके पाक-कौशल, पूरे परिवार के भोजन की व्‍यवस्‍था करने में संयुक्‍त उसके उत्‍तरदायित्‍व के बारे में सोचें। कभी इस ओर भी ध्‍यान दें कि आपके सम्‍मुख बनकर तैयार भोजन कैसे व कितने समय में बना। इसे बनाने में किन-किन सामग्रियों को कितनी मात्रा में परस्‍पर मिलाया गया आदि। निश्चित रूप से यह सोचने के बाद आप मां के प्रति सुन्‍दर भावनाओं की एक संपूर्ण नई दुनिया से भर जाएंगे।
            कितना कुछ है जीवन में--घर व बाहर चारों ओर बहुत कुछ फैला है जो हमें जीवन के बारे में मीठी भावनाओं से उन्‍मुक्‍त करने को तैयार है। घर, इसके द्वार व रोशनदान, सूर्यप्रकाश व चन्‍द्रप्रकाश के घर में बिखरे अमूल्‍य रत्‍न, मोहिनी हवा, पक्षियों की चहचहाहट, नीले नभ का शांतिपूर्ण विस्‍तार, इसमें विचरते पक्षी, धरती के अंदर अपनी समृद्ध जड़ों को गहराई तक फैलाए वृक्ष-वनस्‍पतियां, जलवायु का आकलन करते धरती से बाहर के इनके पत्र-पुष्‍प-शाख व उप-शाख, जीवन को सुगम बनाती असंख्‍य भौतिक वस्‍तुएं आदि।
            हमें निष्‍ठापूर्वक स्‍वयं से पूछना चाहिए कि क्‍या हम इन उपरोक्‍त प्राकृतिक व भौतिक कार्यक्रमों को कभी अपनी वृद्ध दृष्टि के बजाय युवा दृष्टि से देखते हैं? और यदि नहीं देखते तो इसमें किसकी हानि है। लघु जीवन में हमारे पास क्‍या व्‍यर्थ-निरर्थक होने का इतना अधिक समय है? दृष्टिकोण में थोड़ा सा भी अच्‍छा-सच्‍चा परिवर्तन हमें सुख-शान्ति की उन संवेदनाओं से परिपूर्ण करता है, जो हम अपने लिए स्‍वयं निर्मित करते हैं। तो ऐसी परिपूर्णता के लिए हम दूसरों पर निर्भर क्‍यों रहें!
विकेश कुमार बडोला

Wednesday, September 2, 2015

स्‍वाध्‍याय के गुण

संसार में दो प्रकार के लोग हैं--रचनात्‍मक और द्वंदात्‍मक। 'मेरे पास समय नहीं है' कहनेवालों को 'समय नहीं कट रहा है' कहते हुए भी सुना जा सकता है। द्वंदों से घिरे व्‍यक्ति इसी भावना से परिचालित होते हैं, जबकि रचनात्‍मक कार्य करनेवालों को जीवन बहुत छोटा लगता है। इसीलिए उनके पास समयाभाव व समय-भार का भाव-विचार कभी नहीं होता। उनकी दृष्टि में संसार अनेक सकारात्‍मक कार्यों से भरा हुआ है। उनके पास रचनात्‍मक विचारों व कार्यों की भरमार है। अभिभावकों, गुरुजनों, बुजुर्गों व समाज से वे जो कुछ भी सीखते हैं, वे केवल उसी से संतुष्‍ट नहीं होते। पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्‍तांतरित ज्ञान प्राप्ति के बाद भी उनमें जीवन परिवेश के प्रति सदैव एक नवीन इच्‍छा बनी रहती है। नवज्ञान प्राप्ति की ऐसी जिज्ञासा दुनिया के बारे में स्‍वाध्‍याय करने के फलस्‍वरूप ही पनपती है। स्‍वाध्‍याय व्‍यक्तिवाद और ज्ञानाडंबर का नाश करता है। स्‍व, स्‍वार्थ व अभिहित से प्रतिपादित ज्ञान की धारा स्‍वाध्‍याय की चट्टान से टकराकर निर्मल हो जाती है। एक व्‍यक्ति के जीवनकाल में जो कुछ भी दृष्टिगोचर होता है, उसे साकार कैसे करना है व सद्भाव से कैसे सींचना है, यह आत्‍मशोध स्‍वाध्‍याय के आधार पर ही फलीभूत होता है। किवदंतियों, लोकोक्तियों एवं कहावतों का व्‍यक्ति स्‍तरीय संधान पुरानी व नई विचारधाराओं में से गंदगी छांटकर उसे दूर करने में बड़ा सहायक है। यह खोज परंपरा व आधुनिक विचारधाराओं में से श्रेष्‍ठ मूल्‍यों की पहचान कर उन्‍हें स्‍थापित करने पर आधारित है। ऐसा प्रयोग संसार में स्‍वर्ण-चेतना जगाता है और स्‍वाध्‍याय की निश्चित रूप से इसमें सबसे बड़ी भूमिका होती है। स्‍वाध्‍याय परंपरा से मतैक्‍य नहीं रखता। यह परंपरागत व आधुनिक जीवन का गहन विवेचन कर एक नई वैचारिकी उत्‍पन्‍न करता है। स्‍वाध्‍ययन सीधे जीवन से जुड़ा होता है। इस प्रक्रिया में सीखने-सिखाने का तनाव नहीं होता। स्‍वाध्‍याय में ज्ञानधारा स्‍वत: ही निकलती है। इसकी प्रश्‍नोत्‍तरी में उत्‍तीर्ण-अनुत्‍तीर्ण होने की समाज शासित लालसा नहीं होती बल्कि यह ज्ञान की व्‍यक्तिगत खोज है। इस परीक्षा में अनुत्‍तीर्ण होने पर निराशा-हताशा नहीं घेरती बल्कि यह श्रेष्‍ठतापूर्वक उत्‍तीर्ण होने का सन्‍मार्ग प्रशस्‍त करती है। अकादमिक शिक्षा हमें केवल बाह्य जगत के प्रति सजग करती है, जबकि स्‍वाध्‍याय जीवन के आंतरिक आदर्शों व मूल्‍यों के प्रति एकाग्रचित करता है। अकादमिक शिक्षा ग्रहण करनेवालों के ह्रदय में सदैव विद्वता का एक बोझ रहता है, लेकिन स्‍वाध्‍याय में व्‍यक्ति जीवनभर हंसी-खुशी रमा रहता है।
विकेश कुमार बडोला