Monday, March 23, 2015

चैत्र-फाल्‍गुन का एकांकी-अनुभव

धर एक साल से जीवन बहुत असुरक्षित बना हुआ है। पिछले दस-पन्‍द्रह दिनों से तो आत्‍मविश्‍वास भी हिल गया। फाल्‍गुन-चैत्र का सुंदर परिवेश आंखों में टिका ही नहीं। प्रखर सूर्य प्रकाश और नील नभ के उजाले ने कई बार ह्रदय को झकझोरा, पर परिस्थितियों से उपजा आंखों का पथरीलापन बना रहा।
          आज जब लगा कि समाज के हिस्‍से का मेरा जीवन अगर उपेक्षित, पीड़ापूर्ण है तो इसमें प्रकृति का क्‍या दोष, तब अपनी चेतना से जुड़ पाया और पुन: प्राकृतिक लगन ग्रहण कर पाया।
नीलिमा से रंगा व्‍योम अद्भुत था। वृक्षपत्रों की चमकती हरियाली व्‍योम की अद्भुत छटा की सहायता से लहराती थी। वनस्‍पतियों का नवरूप बरबस मन को उद्भावित करता रहा। इन दिनों जैसा दोपहर का गंभीर सौंदर्य वर्षभर विरले ही देखने को मिलता है। फूलों के आकार-प्रकार, रंगाभूषण ह्रदय को गुदगुदाते हैं। किसी पार्क में अनार की चटकीली लाल कलियां देखीं। पतले तनों के दोनों ओर व्‍याप्‍त गिने-चुने हरे पत्‍तों के बीच उभरीं ऐसी चटख लाल कलियां, संसार की जटिलता-कुटिलता में पिसते मुझ जैसे प्राणियों को जीवन का अलग अनुभव कराती हैं। कुछ देर जिंदगी का यथार्थ असत्‍य लगने लगता है। दोपहर में फाल्‍गुन का यह सौंदर्य मधुरता के भौतिक प्रतिमान स्‍थापित कर देता है। यह समय-स्थिति भी भावनाओं से प्रायोजित होती, तो कितनी मात्रा में एकत्र की जा सकती!
ऐसे प्राकृतिक संप्रभाव में पक्षियों का निरंकुश नभ-विचरण मनुष्‍यता के लिए उपेक्षा उपजाता है। मनुष्‍य रूप में होने का अहसास घृणा बढ़ाता है। पक्षियों को नभ-क्षेत्र में उड़ने की शक्ति है, और वे वहां से धरती के इस समय के सौंदर्य को भी अपने जीवन में समेट रहे हैं, यह भाव मेरे मन का उद्वेग बढ़ाता है। मैं ह्रदय पर हाथ रख तेज-तेज सांस लेने लगता हूं।
इस समय जहां भी जाओ, जिस गली-घर या मार्ग-उपमार्ग कहीं भी उपस्थित रहो, यह प्राकृतिक मधुरिमा अपने संरूप से मूर्छित कर रही है। ऐसे में जीवन के कष्‍ट व्‍यतीत-से लगते हैं। हवा का सरकना, हवा में तैरना और हवाओं में अपने जीवन के मनोभावों को तौलना एक नया अभिसार उत्‍पन्‍न करता है।
न जाने क्‍या-क्‍या है, जो इस प्रकृत शोभा में नवकिरण बनकर व्‍याप्‍त है। मैं सब कुछ अपने एकांकी-अनुभव में समेट नहीं सकता। आजकल रात को आकाश में चांद नहीं है। केवल सितारे हैं। उनकी प्रभा टिमटिमा रही है। संध्‍या समय, सूरज ढलने से पूर्व, जब आकश पथ पर लंबे शीशम के पेड़ के छोटे-छोटे पत्‍ते पवन में सरसरा रहे थे, तब आकाश के किसी कोने पर चंद्रमा की बारीक फांक दिखाई दी। बोगनबीलिया के गुलाबी और श्‍वेत पुष्‍पों का झाड़ कितने प्राकृतिक अपनत्‍व से भरा रहता है। इसे देखने से हर बार अद्भुत शान्ति मिलती है। बोतलपुरुष्‍ा फूलों के गुच्‍छे भी पेड़ों से धरती की तरफ झांककर, उसका प्राकृतिक स्‍वागत करते हैं।
सूर्यास्‍त के बाद पश्चिमी गगन के रंग दृष्टि को ओजपूर्ण कर गए। ढलता दिन, बढ़ती रात फाल्गुन के इस समय को चमत्‍कृत करती रही। मैं प्राकृतिक रूप पर अभिभूत होता रहा। यह स्‍वर्णानुभव मेरे जीवन की भौतिक कंगाली को मिटा रहे हैं। 'यथार्थ में नहीं जीनेवाला' बनकर मैं दुनिया की घृणास्‍पद व्‍यावहारिकता के पैरोकारों के किसी भी दण्‍ड को भुगतने को तैयार हूँ।
विकेश कुमार बडोला

Sunday, March 22, 2015

भ्रमित सामूहिक-जीवन


जीवन में कई बातें हैं। बहुत से कार्य एवं व्‍यवहार हैं। पृथ्‍वी और इसके जैविक चाल-चलन अपने अद्यतन रूप में आने से पूर्व अनेकों घटन-विघटन से होकर निकले होंगे, ध्‍यान से यह बात समझ में आ जाती है। इस आधार पर वर्तमान मानवीय समस्‍याओं तथा सामाजिक विसंगतियों का अध्‍ययन कर, उनका निराकरण भी ढूंढा जा सकता है।
आज मनुष्‍य जीवन भोग-विलास में उलझा हुआ है। तत्‍काल आनन्‍द प्राप्‍त करने तथा येन-केन-प्रकारेण मनोरन्‍जन करने की प्रवृत्ति से मानव का विवेक नहीं रहा। समाज के बहुसंख्‍यक लोग भौतिक, आधुनिक तथा वैज्ञानिक आकांक्षाओं के अनुरूप अपना जीवन व्‍यतीत करने को बाध्‍य हैं। आवश्‍यक नहीं कि इसके लिए लोगों की इच्‍छा मचलती हो। यह सब इसलिए है ताकि वर्तमान जीवन-व्‍यवस्‍थाओं (चाहे वे प्राकृतिक रूप से व्‍यक्ति अनुकूल हों या नहीं) के अनुसार जीने में पिछड़ न जाएं।
लेकिन संवेदनशील मानव एकान्‍त में यह अवश्‍य अनुभव करता है कि जैसे वह जी रहा है, वास्‍तव में जीवन का तात्‍पर्य वह नहीं है। इस विचार बिन्‍दु पर मानव का स्‍वयं से एक अन्‍तर्संवाद नियमित चलता रहता है। विवशता में अंगीकृत आधुनिक जीवन तथा जैविक चेतना में इच्छित सादगीपरक व स्‍वाभाविक जीवन के दो परस्‍पर विचारों का संघर्षण व्‍यक्ति को आत्‍मघाती बना रहा है। वह इनमें से किसी एक जीवन के पक्ष में निर्णायक रूप में खड़ा नहीं हो पा रहा। परिणामस्‍वरूप मनोवांछित सादगी व स्वाभाविक जीवन की इच्‍छाएं, विवशता में अंगीकार किए गए आधुनिक व वैज्ञानिक जीवन-व्‍यवहार तले आजीवन दबी रहती हैं। इससे अधिकांश मनुष्‍यों का जीवन कुण्‍ठाओं, कुतर्कों से उबर नहीं पाता।
इस जीवन व्‍यवहार में पड़ा मानव तो जीवन व्‍यर्थ कर ही रहा है, वह भावी सं‍तति के लिए जीवन को स्‍वाभाविक, प्राकृतिक बना कर एकांगी करने का प्रयास भी नहीं कर पा रहा। वास्‍तव में वह इसके लिए योग्‍य ही नहीं रहा। इस दिशा में कुछ किया जा सकता है, तो उसके लिए सबसे पहले अपनी कुण्‍ठाओं, कुतर्कों तथा मतभेदों को भुलाना होगा।
बच्‍चों के लिए सोचकर हम बहुत सारे काम कर सकते हैं। सर्वप्रथम घर से शुरुआत करें। अपने व्‍यवहार को संयमित बनाएं। टेलीविजन, मोबाइल फोन आदि आधुनिक गैजेट के दुष्‍प्रभावों के बारे में बच्‍चों को ज्‍यादा से ज्‍यादा जानकारी प्रदान करें। उन्‍हें बताएं कि वे इनका यथोचित प्रयोग कर ही इनके लाभ प्राप्‍त कर सकते हैं। टेलीविजन पर अधिक समय चलचित्रों को देखना आंखों के अलावा पूरे शरीर के लिए हानिकारक है। व्‍यवहार में जीवन कैसा है और कल्‍पनाओं-कहानियों के आधार पर टेलीविजन पर प्रस्‍तुत होनेवाले कार्यक्रमों की विषय-वस्‍तु वास्‍तविक जीवन या इसके व्‍यवहार से कितनी अलग है, ऐसी बातें विस्‍तारपूर्वक किशोरवय बच्‍चों को बताई जाएं। 
बच्‍चों को इस दिशा में जागरूक न कर प्रौढ़ व परिपक्‍व व्‍यक्ति आज बच्‍चों के सामने ही टेलीविजन के ऐसे कार्यक्रमों में गम्‍भीर अभिरुचि दिखाता है। उसके हाव-भाव किसी भी समय टेलीविजन कार्यक्रमों के प्रति उपेक्षित नहीं होते। ऐसे में किशोरवय बच्‍चों को यह सोचने-विचारने या समझने का अवसर कैसे, किसकी प्रेरणा से मिलेगा कि वह जो कुछ भी टेलीविजन पर देख रहा है, उसका अच्‍छा-बुरा (अधिकांशत: बुरा) पक्ष क्‍या है। बच्‍चों की कम जीवन-समझ के अनुसार यदि टेलीविजन कार्यक्रम नहीं बन रहे हैं, तो उनके अभिभावक तो उन्‍हें यह बता ही सकते हैं कि उनके लिए क्‍या देखना ठीक है और क्‍या गलत। 
व्‍यावसायिक मानसिकतावाले एवं अधिक धन-सम्‍पत्ति लाभ अर्जित करने का लोभ पालनेवाले लोग समाज, बच्‍चों के लिए कभी नहीं सोच सकते। यह बड़ा दुर्भाग्‍य है कि लोकतांत्रिक शासन पद्धति के अन्‍तर्गत कई चरणों में बच्‍चों के लिए शिक्षा से लेकर मनोरंजन के कार्यक्रम बनाने व उनका क्रियान्‍वयन करने का दायित्‍व ऐसे ही व्‍यावसायिक मानसिकता रखनेवालों के हाथों में है। इसके दुष्‍परिणाम क्‍या हुए, हैं या होंगे, हम देख ही रहे हैं।  
प्रगति की बात होती है, तो इसका तात्‍पर्य क्‍या है। क्‍या यही कि प्रत्‍येक व्‍यक्ति के पास भव्‍य घर, सुविधाओं से युक्‍त वाहन, धन-सम्‍पत्ति का संग्रह  आदि हो। लेकिन थोड़ा सा आज के मुख्‍यधारा के भौतिक विचार से अलग सोचकर देखें तो सर्वथा एक नया विचार उभरेगा। इसमें भौतिक सुख-सुविधाओं के अतिदोहन के दुष्‍परिणाम हमें कई  तरह से पीड़ा दे रहे हैं। आज लोग पहले कभी नहीं महसूस किए गए मनोरोग से पीड़ित हैं। कई बार लगता है कि हम मानवीय संरचना हैं या मशीनी। य‍दि यह वैचारिक लगन क्षण-क्षणांश बढ़ रही है और भौतिक संसाधनों की राक्षसी चाह में आगे भी इसके ऐसे ही बढ़ते रहने की आशंका है, तो तब हमारे पास बचेगा क्‍या। एक रिक्‍त और भावनाशून्‍य जीवन, जिसकी अपने एकान्‍त जीवन में हमें कभी अपेक्षा नहीं रहती, पर आज के भ्रमित सामूहिक-जीवन के कारण हमें भी इसे ही अंगीकार करना पड़ता है।