महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Thursday, August 14, 2014

लड़खड़ाती स्‍वतन्‍त्रता

ड़खड़ाती स्‍वतन्‍त्रता कभी भी किसी के पकड़े पकड़ में ही नहीं ती
 चुपके से एक दिन का अहसास दे तीनसौ चौंसठ दिन बेगानी हो जाती

Sunday, August 3, 2014

सुयोग्‍य एवं अनुशासित व्‍यक्ति तो समय की जरूरत है ही

च्‍चतम न्‍यायालय के न्‍यायाधीश एआर दवे ने वैश्‍वीकरण के समय में सम-सामयिक विषय तथा मानवाधिकारों की चुनौतियां विषय पर आयोजित एक अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन को सम्‍बोधित करते हुए विचारणीय बात कही। उन्‍होंने कहा कि भारत को अपनी प्राचीन परम्‍पराओं की ओर अग्रसर होना चाहिए तथा महाभारत एवं भगवद्गीता जैसे शास्‍त्र बच्‍चों को बचपन से पढ़ाए जाने चाहिए। उनके अनुसार यदि गुरु-शिष्‍य जैसी हमारी प्राचीन परम्‍पराएं अभी तक चल रही होतीं तो देश में हिंसा, आतंकवाद जैसी समस्‍याएं नहीं होतीं। उन्‍होंने आत्‍मबल से स्‍वीकार किया कि यदि वे भारत के तानाशाह होते तो पहली कक्षा से ही गीता एवं महाभारत को शुरु करवा देते।
चूंकि यह बात उच्‍चतम न्‍यायालय के न्‍यायाधीश ने कही है, इसलिए कोई धर्मनिरपेक्षी नेता अभी तक इसके विरोध में अपनी धर्मनिरपेक्ष टिप्‍पणी नहीं कर सका है। यही बात हिन्‍दू मान्‍यताओं के पक्षधर किसी नेता ने कही होती तो अभी तक निराधार, बचकानी, मूर्खतापूर्ण प्रतिक्रियाओं का अम्‍बार लग गया होता।
 वैसे इसमें कोई आश्‍चर्य की बात नहीं है कि सर्वोच्‍च न्‍यायालय के न्‍यायाधीश ने हिन्‍दू धर्म ग्रन्‍थों को बचपन से पढ़ाने की बात करी। न्‍याय की शासकीय व्‍यवस्‍था से जुड़ा व्‍यक्ति धर्म ज्ञान से संचित पुस्‍तकों के महत्‍व को जानता है। समाज की गति-दुर्गति से भलीभांति परिचित एक न्‍यायाधीश यदि प्राथमिक कक्षाओं में धार्मिक शिक्षा देने की बात करता है तो इसके पीछे कई कारण रहे हैं। अपने जीवन में अधिवक्‍ता से लेकर न्‍यायाधीश का कार्य करते हुए न्‍यायालयों में उन्‍होंने अपराध, आतंक, भ्रष्‍टाचार के जितने भी वादों पर न्‍यायिक निर्णय किया होगा, उससे कहीं न कहीं उनके अन्‍तर्मन को ऐसी समस्‍याओं के जड़मूल तक पहुंचने में वास्‍तविक दृष्टिकोण प्राप्‍त हुआ होगा। इसी भावना के चलते उन्‍होंने गीता, महाभारत जैसे ग्रन्‍थों के शिक्षण पर बल देने की बात कही।
और दवे अकेले व्‍यक्ति नहीं हैं, जिन्‍होंने मानव जीवन को श्रेष्‍ठता प्रदान करने का यह उपाय सुझाया हो। विज्ञान, तकनीकी, प्रौद्योगिकी, अभियान्त्रिकी आदि क्षेत्रों के कई पुरुषों ने जीवन में सकारात्‍मकता लाने के लिए हिन्‍दू धर्म ग्रन्‍थों के पठन-पाठन की बात कही है। इन लोगों ने अपने काम के प्रति सच्‍चे व्‍यक्तित्‍व के सहारे लगने व कार्यों के जनकल्‍याण भाव में हमेशा स्थिर रहने के लिए धर्म ग्रन्‍थों के अध्‍ययन को बहुत उपयोगी माना है।
उदाहरण के लिए मेट्रो रेल के सेवानिवृत्‍त अध्‍यक्ष मेट्रोमैन ई. श्रीधरन अपने कार्यकाल के दौरान नवनियुक्‍त प्रत्‍येक कर्मचारी को गीता ग्रन्‍थ भेंट करते थे। वे तो पूरी तरह से तकनीकी कार्य करते थे। आम सामाजिक समझ के अनुसार उन्‍हें धर्म से क्‍या लेना-देना। लेकिन अनुभवी श्रीधरन को पता है कि जीवन में ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी उन्‍नति के लिए मनुष्‍य को सर्वप्रथम मनुष्‍यता के गुणों से युक्‍त होना होगा। इसी उद्देश्‍य से उन्‍होंने अपनी धार्मिक भावना का अपने कर्मीदल में प्रसार किया। इसके लिए उन्‍होंने किसी कर्मचारी पर दबाव नहीं बनाया। उन्‍होंने धार्मिक ग्रन्‍थ गीता के महत्‍व से सबको परिचित कराने के लिए मात्र एक पदाधिकारिक आहवान किया।
दवे यदि यह कहते हैं कि गीता व महाभारत पढ़ने के लिए तानाशाही नियम होना चाहिए तो यह उनकी विवशता है। उन्‍हें न्‍यायालयी अनुभव से ज्ञात है कि लोकतान्त्रिक और शासकीय लाड़-पुचकार से अपराधियों को मानवता के पथ पर अग्रसर नहीं किया जा सकता। जिस तरह बच्‍चे के अच्‍छे-बुरे के लिए अभिभावकों की डांट-फटकार जरूरी है और इसमें राष्‍ट्र-नियम-कानून कुछ नहीं कर सकते, उसी प्रकार आज विश्‍वव्‍यापी आतंक व भ्रष्‍टाचार के जड़मूल नाश के लिए वैश्विक अभिभावक के रूप में एक सुयोग्‍य एवं अनुशासित व्‍यक्ति तो समय की बहुत बड़ी जरूरत है ही। इस तथ्‍य को किसी भी कुतर्क से असत्‍य नहीं ठहराया जा सकता।
--विकेश कुमार बडोला