महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Cosmetic

loading...

Sunday, February 23, 2014

आज अच्‍छा लग रहा है


ज अच्‍छा लग रहा है। कार्यालय के साथियों के साथ बैठ कर कुछ व्‍यक्तिगत बातें कीं। उनकी निजी जिन्‍दगी में झांकने की कोशिश की तो पता चला गुजर चुके अन्‍य दिनों की अपेक्षा आज मैं उनसे बहुत ज्‍यादा जुड़ाव महसूस कर रहा हूं। इस वार्ता से यह निष्‍कर्ष निकला कि एक आदमी को अपने समाज, वातावरण या कार्यालय के साथियों से प्रेम के दो शब्‍द सुनने को मिल जाएं तो वह बाग-बाग हो उठता है। और ज्‍यादातर लोग इसी सुगम काम को करने से बच रहे हैं।
     आज पता नहीं क्‍यूं मेरा दिमाग बड़े ही सकारात्‍मक ढंग से हर चीज के बारे में सोच रहा है। आज अपनी सोच, अपने व्‍यक्तित्‍व, साथियों की सोच, उनके व्‍यक्तित्‍व से एक अद्वितीय लगाव महसूस हो रहा है। तन-मन में लगाव की तरंगे रबड़ की तरह खिंचती हुई अनुभव हो रही हैं। आशा करता हूं कि यह अनोखा अनुभव सदैव रहे तो जीवन कितनी ऊंचाई प्राप्‍त कर ले! एकदम लगा कि आगे की आशा-निराशा में मत झूल। इस समय जो आनन्‍द, सामूहिक और सामाजिक लगन अन्‍दर-बाहर गूंज रही है, उसमें स्थिर हो बैठा रह बस। ये गुंजन हमेशा नहीं होता। यह ईश्‍वर की कृपा लगती है। आज वह मुझ पर प्रसन्‍न लगता है।
तेईस फरवरी सन् 2014 का समय मेरे मन में विराट रूप धारण किए हुए है। कार्यालय आते समय राह चलते जितने भी लोगों के चेहरे देखे, सब की भंगिमाएं याद आ रही हैं। केवल याद ही नहीं आ रही हैं, उनके बारे में गहराई तक ज्ञान भी हो रहा है कि उनके पीछे की कहानी क्‍या है। सुखी भंगिमावाले व्‍यक्तियों को छोड़ कर दुखित व्‍यक्तियों के लिए शुभकामना, सम्‍मान, प्‍यार उमड़ रहा है।
फरवरी फरफरा रही है। चल वसंत चलायमान है। मौसम का ही असर था कि पन्‍द्रहवीं लोकसभा के आखिरी सत्र में सालों से एक-दूसरे की आंखों में धूल-मिर्ची झोंक रहे सांसद भावुक हो उठे। लालकृष्‍ण आडवाणी तो रो भी पड़े। पता नहीं कौन सी हूक उनके दिल में उठी होगी कि वे आंसुओं को पोंछते हुए दिख पड़े।
 नरेन्‍द्र मोदी की सभाओं में उमड़ती भीड़ का उत्‍साह भी मौसम के प्रभाव में चौगुना हो गया है। मंच से मोदी गरज रहे हैं। उनके भाषणों में गजब आकर्षण है। वे जो कुछ बोल रहे हैं, उसे पढ़ कर नहीं बोल रहे हैं। इससे सिद्ध होता है कि जिस आदमी के पास विवाहित होकर भी ब्रह्मचर्य सी शक्ति है उसके पास आत्‍मविश्‍वास की बहुतायत होती है। और ब्रह्मचर्य से पोषित आत्‍मविश्‍वास किसी को किसी राष्‍ट्र का प्रधानमन्‍त्री क्‍या जनसम्राट तक बना सकता है। युवाओं को ऐसे नेता को प्रधानमन्‍त्री बनते देखने का अवसर प्राप्‍त हो या न हो, पर वे उसकी ओजस्‍वी वाणी का कारण ढूंढने बैठें तो उन्‍हें जीवन में ब्रह्मचर्य की महत्‍ता का अहसास जरूर होगा। क्‍या ये किसी नेता का अपने देश के युवाओं पर कम उपकार होगा!
देश की चारों दिशाएं एक नए जोश से भरी हुईं हैं। मैं क्‍या उस जोश का समाचार पढ़ने या देने के लिए ही बना हूं? मुझे भी उसमें शामिल हो कर उमंगित, उल्‍लसित नहीं होना चाहिए? आडवाणी जी इसलिए नहीं रोए कि उन्‍हें संसद का पिता कहा गया। वे रोए क्‍योंकि उन्‍हें चारों दिशाओं से उठनेवाले जोशीले तूफान का प्रत्‍यक्ष हिस्‍सा नहीं बन पाने का दुख है। उन्‍हें ये सुखानुभूति भी है कि जो कमल खिलनेवाला है, उसका खाद-पानी कीचड़ नहीं बल्कि राष्‍ट्र की करोड़ों निर्मल आकांक्षाएं होंगी।
आज सचमुच बहुत अच्‍छा लग रहा है। नव उत्‍साह, उमंग के साथ आगे ही आगे बढ़ने की शक्ति शरीर में संचारित हो रही है। और जिसे ऐसे वातावरण में घुटन हो रही हो उसकी सद्बुदि्ध के लिए मंगलकामनाएं हैं।

Thursday, February 20, 2014

लेखन की कलंक कथा (मेरी भड़ास)

कुछ दिनों से पता नहीं क्‍या हो रहा है कि मैं लिखने के प्रति असहज हो गया हूं। लगता है जो भी लिखा जा रहा है, सब व्‍यर्थ और निरर्थ है। जब किसी के अच्‍छे-से-अच्‍छे लिखे से भी कोई प्रभावित नहीं हो रहा है, कोई बदल नहीं रहा है, तो क्‍या फायदा लिखने पर सिर खपाने से। लेकिन कहीं न कहीं लिख कर खुद को संतुष्‍ट करने का जो एक कीड़ा है वो हरेक लेखक को काट रहा है। और जब तक यह कीड़ा काटने का काम करेगा, अक्षर, शब्‍द, वाक्‍य से होते हुए लेखन-यात्रा पुस्‍तकों, पत्रों और अब ब्‍लॉग पत्रों के रूप में जारी रहेगी।   
     आज-कल दिल्‍ली में पुस्‍तक मेला लगा हुआ है। लाखों लोग वहां घूम रहे हैं। प्रकाशकों और लेखकों की बाढ़ आई हुई है। लेकिन पाठक की बात पर सब को मायूस हो जाना पड़ता है। आज एक अच्‍छा और सच्‍चा पाठक ढूंढे से भी नहीं मिल पा रहा है। अरे भई प्रकाशक लोग अपने स्‍टॉल पर अगर किसी नई पुस्‍तक का विमोचन या प्रदर्शन कर रहे हैं तो वे हमेशा विमोचनकर्ता के रूप में बड़े नेता या लेखक को ही क्‍यूं चुनते हैं? क्‍या विमोचन का कार्य अच्‍छे पाठक के हाथों नहीं होना चाहिए? क्‍या उसे इस कार्य के लिए थोड़ा सा पत्रम-पुष्‍पम नहीं दिया जाना चाहिए? जो बेचारा अपने जीवन के अनुभव मार कर दूसरों के अनुभवों और लिखे हुए को ही पढ़ता रहा, क्‍या उसका कोई मोल नहीं है। आखिर इतने प्रकाशक या लेखक होने का उद्देश्‍य तभी तो सार्थक होगा, जब इनसे कई गुणा ज्‍यादा सच्‍चे पाठकगण हों, इनको पढ़नेवाले हों।
     आज हर कोई अपनी पुस्‍तक छपवाने के लिए मरा जा रहा है। नए लेखकों ने जो कुछ लिखा है, उससे वे खुद भी अप्रभावित रहते हैं। इतनी आत्‍महीनता के बावजूद भी उनकी पुस्‍तक छपने की महत्‍वाकांक्षाएं कुलांचे मार रही हैं। मैं ऐसे लेखकों से ही सवाल करता हूँ कि वे जिस किसी की लिखी गई कोई किताब पढ़ते हैं तो उसे कितनी तन्‍मयता से पढ़ते हैं या पढ़ने के बाद उसमें से कौन सा ज्ञानसूत्र सीख कर वे याद रखते हैं? शायद ज्‍यादार लेखक इस बारे में निरुत्‍तर और अनभिज्ञ ही होंगे। और जब ऐसा है तो क्‍यों वे अपनी किताबें छपवाने और उनके ढेर लगाने को विवश हैं?
प्रकाशक अगर अपने जुगाड़ से किताबों के सरकारी, गैर-सरकारी विक्रय अनुबन्‍ध कर भी लेता है तो ध्‍यान रहना चाहिए कि उनके द्वारा बेची गईं ये किताबें अपनी अप्रभाविता के चलते सही पाठकों तक पहुंचने के बजाय मात्र सजावटी शोकेसों तक ही पहुंच पाती हैं। तो ऐसे में पुस्‍तक प्रकाशित करवाने के पीछे की महत्‍वाकांक्षा लोगों की खत्‍म क्‍यों नहीं हो रही? बड़े अचम्‍भे की बात ये भी है कि शानो-शौकत, ऐशो-आराम का जीवनयापन करनेवाले लोग अगर लेखक बन रहे हैं तो वे ऐसा क्‍या रच पाएंगे, जिससे एक बड़ा पाठक वर्ग चाव से पढ़े!
नाश्‍ता, लंच और डिनर समय पर लेते हुए होनेवाला लेखन मात्र लेखनकर्म की भीड़भाड़ ही सिद्ध होगा। जब तक लेखन या रचना की बात से लेखक का व्‍यावहारिक तादात्‍म्‍य नहीं होगा, उसका लेखन भाड़ में जाने के अलावा कुछ नहीं हो सकता। और आज कल तो हर काम की तरह लेखन उद्योग में भी जुगाड़बाजी, शिविरबद्धता जैसी कलंक-कथाएं घट रही हैं। ऐसे में लेखन, उसके मनन और उससे ज्ञानार्जन की बात बहुत बचकानी ही रहेगी। क्‍या करें लेखन के कीड़े का, जो काट तो रहा है पर कटने से बहने वाला खून यानि लेखन कोई क्रान्ति ही नहीं कर पा रहा है।

Monday, February 17, 2014

अन्‍धविश्‍वासों का दायरा

जीवन के गूढ़ दर्शन के विश्‍लेषण में आत्‍मलीन, मानव आवास से सुदूर कन्‍दराओं, गुफाओं, अगम जंगलों में रहनेवाले महात्‍माओं, सन्‍तों की अनगिन वर्षों की तपस्‍या कलिकाल के पाखण्‍डी बाबाओं ने मिट्टी में मिला दी। आज के समय का पारिवारिक, सामाजिक, शासकीय जीवन क्‍या कम मुसीबत में था जो आत्‍मशान्ति के आखिरी ठौर धर्ममार्ग को भी उजाड़ दिया गया? आस्तिकता और नास्तिकता के बीच दुनिया का विश्‍लेषण करनेवाले दिग्‍गजों के लिए चिन्‍ता की कोई बात नहीं है। उन्‍हें भगवान को मानने या न मानने के लिए किसी के ज्ञान की कोई जरुरत नहीं है। वे अपनी कपोल कल्‍पनाओं से जीवन और इसके बाद के सभी सूत्रों, बातों की जानकारी रखते हैं। उन्‍हें अपने पाप, पुण्‍य मोक्षा‍दि की चिंता नहीं है पर वे इन मानसिक पूर्वाग्रहों से पीड़ित लोगों के लिए अवश्‍य चिंतित हैं। क्‍योंकि वे ऐसे अधिसंख्‍य लोगों के बीच रह कर ही जीवन गुजार रहे हैं। आखिर इनके प्रति उनका कोई फर्ज तो बनता ही है।


जिन्‍हें पूजा जाना चाहिए, वे योगी या साधु ऐसे होते हैं
मैं भी आस्तिक व नास्तिक के बीच की कड़ी हूँ। भगवान को मानता भी हूँ और नहीं भी। जब मेरी बुद्धि, विवेक दुरुस्‍त रहता है तो लगता है भगवान है और जब मैं व्‍यक्तिगत भ्रष्टाचार की गिरफ्त में होता हूँ तो नास्तिकता हावी रहती है। पर अपनी उलझन से मुक्ति के लिए मुझे धर्मज्ञानियों, बाबाओं की जरुरत कभी नहीं पड़ी। अपना बाबा मैं खुद ही बना।
स्‍वाभिमान के शिखर पर विराजमान मैं शहरों-नगरों में घूमते, प्रवचन करते बाबाओं से हमेशा खुन्‍दक खाता रहा। अधिकांश धार्मिक लोग जो बाबाओं, सन्‍तों के प्रवचन सुन कर ही खुद को कुछ सोच-समझ रखने लायक समझते उनकी नजरों में मुझ जैसा मूर्ख ही होता। उन्‍नीस साल पहले बारहवीं में मेरे साथ पढ़नेवाली मेरी एक मित्र खुद को अंग्रेजी भाषा की विद्वान और उस समय विशेष की प्रगत लड़की समझती थी। एक दिन पहली बार जब मैंने उसके नए घर की बैठक में टंगी आसाराम की विशाल फोटो देखी तो सहसा मेरे मुंह से निकल गया तुम लोग भी इसके चक्‍कर में आ गए क्‍या’? सुनते ही मित्र ने जो मुखचित्र बनाया उसमें यही आग्रह था कि अभी इस घर से बाहर चले जाओ और आज के बाद हमारी दोस्‍ती खत्‍म। उसके बाद मैं कई दिनों तक हमारी मित्रता खत्‍म होने और मित्र की गुरुभक्ति का अपमान करने के दो दुखों से पीड़ित रहा। लेकिन इसके अलावा मेरे साथ मेरा यह सुखानुभव भी था कि चलो मूर्खता की शरण में गए मूर्ख दोस्‍त से अच्‍छा अपना वो विश्‍वास है, जो उदारीकरण के दौर में उग आए हाई टेक बाबाओं की असलियत को पहचानने की कूवत रखता है। सोचता हूँ आज वह मित्र किस पर विश्‍वास कर रही होगी? बाबा पर, खुद पर या मुझ पर। या उस भगवान को धन्‍यवाद दे रही होगी जिस तक पहुंचने के लिए बाबा ने भक्‍तों के साथ मिल कर न जाने क्‍या-क्‍या पाखण्‍ड खेले होंगे!
बात केवल बाबा पर अंधविश्‍वास की और अंधविश्‍वास की बाबा की ओर की उघड़ी सच्‍चाई की  नहीं है। अंधविश्‍वास की चूलें हिल जाने के बाद भी, बाबागीरी की अत्‍यधिक घृणित सच्‍चाई जानने के बाद भी देशवासियों की प्रतिक्रियाएं खासकर तथाकथित बाबा के भक्‍तगणों की समझौतावादी प्रतिक्रियाएं क्‍या सिद्ध करती हैं, यह जानने की ज्‍यादा जरुरत है। ऐसे मामले में लोगों की सुसुप्‍तावस्‍था इस बात को पुख्‍ता करती है कि चरित्रहीनता की जड़ें लोगों में गहरे पैठ बना चुकी हैं। बाबा के विरुद्ध शिकायत करनेवाले शायद आधुनिक दुनिया के सन्‍त ही थे तब ही तो अपनी लड़की के साथ हुई घटना से उन्‍हें धक्‍का लगा। बाबा ने औरों के साथ भी तो वही किया था जो शिकायत करनेवाली लड़की के साथ किया होगा। तो औरों की माताओं पिताओं को धक्‍का क्‍यूं नहीं लगा। एक तरह से उन लोगों ने स्‍वीकार कर लिया था कि चरित्रहीनता के पक्षकार उनमें और बाबा में कोई खास फर्क नहीं है। दूसरी तरफ बाबा और उसके भक्‍तगणों सहित भारतवर्ष के लोगों ने इतने वर्षों से राजसत्‍ता द्वारा बोई गई चरित्रहीनता की फसल काटने के अलावा आज तक किया ही क्‍या है? इस दृष्टिकोण से तो क्‍या बाबा, उसके भक्‍तगण और क्‍या आम जनमानस सभी ने चरित्रशून्‍यता के ऊपर धूर्तता से लेपी गई खोखली विद्वता ओढ़ रखी है।
इस सन्‍दर्भ में श्रीलाल शुक्‍ल का आचार्य विनोबा भावे द्वारा प्रणत भूदान आंदोलन की पृष्‍ठभूमि में लिखा गया विस्रामपुर का संत उपन्‍यास का प्रमुख पात्र राज्‍यपाल याद आता है। वह सुन्‍दर महिलाओं के सपनों, फतांसियों में जीता है। आंदोलन की एक कार्यकत्री के प्रति आसक्‍त यह पात्र एक दिन गलत नीयत से उसके घर जाता है। वह सो रही होती है और यह उसके नग्‍न मेरुदण्‍ड सहित अनेक अंग-प्रत्‍यंगों को छूने का प्रयास करता है लेकिन फिर न जाने क्‍या सोच कर उलटे पैर वापस हो लेता है। कार्यकत्री को पहले से उसकी नीयत का पता होता है और इसकी चर्चा वह आंदोलन के दूसरे कार्यकर्ता अपने प्रेमी से करती है। प्रेमी राज्‍यपाल का पुत्र होता है। पिता को जब पता चलता है कि वह अपने बेटे की प्रेमिका पर आसक्‍त था तो आज के हिसाब से नगण्‍य इसी अपराधबोध के चलते अन्‍त में वह नदी में कूद कर आत्‍महत्‍या कर लेता है। आज अगर देखें तो विस्रामपुर का यह सन्‍त आसाराम जैसे सन्‍तों से कहीं ऊपर है। इसी प्रकार वरिष्‍ठ कथाकार बल्‍लभ डोभाल की जय जगदीश हरे कहानी आसाराम जैसे विसंगत सन्‍दर्भों को बहुत पहले ही उघाड़ कर रख चुकी है। न जाने आम लोग भक्‍त बनने के फेर में सच्‍चाई से लुटने-पिटने के बाद ही अवगत क्‍यों होते हैं, क्‍या इस सवाल का कोई सही जवाब हो सकता है?

Monday, February 3, 2014

हृदय में वसंत

ये बात कई बार पहले भी कही गई होगी, पर मैंने अब अनुभव की। पहले भी अनुभव हुई होगी पर अब मुझे अपने स्‍तर पर इसका वर्णन करना है। मनुष्‍य का जीवन प्रतिदिन एक प्रकार से नवजीवन ग्रहण करता है। शायद ज्‍यादातर लोगों को यह आभास होता होगा। लेकिन उनके द्वारा इसका मौखिक और लिखित वर्णन करना किसी न किसी कारण टल रहा होता है। मेरे साथ भी यही होता है।
रातभर नींद में हम स्‍वयं से अनभिज्ञ होते हैं। सपने अगर आते हैं तो हमारी नजर में हमारी जीवन-उपस्थिति बनी रहती है। सपने नहीं हैं, नींद गहरी है तो सुबह जागने पर समझा जा सकता है कि हमारा जीवन नींद के अन्‍धेरों से निकल कर जो एक नई सुबह, प्रकाश देखता है, वह कितना मूल्‍यवान है! यह अहसास हमें प्रतिदिन होना चाहिए। ऐसा होते रहने से यह विचार भी हममें घनीभूत होता है कि जीवन में कुछ बड़े कार्य करने के लिए नियति ने हमें फिर एक अवसर दिया है। इसलिए जीवित रहते हुए हमारा उद्देश्‍य क्‍या हो, इस पर अवश्‍य ही गहन विचार किया जाना चाहिए।
ईश्‍वर में हम कैसे आस्‍था रखें अगर हम विचारवान नहीं हैं। विचार करते रहना और विचारी गईं जीवन अनुभूतियों के बाद स्‍वयं से बात करना कितना प्रभावित करता है! ईश्‍वर तो हममें से किसी ने नहीं देखा, पर उसी का वास्‍तविक पयार्य प्राकृतिक स्थितियां विचारशील, सृजनशील होने में हमारी सबसे अच्‍छी मित्र सिद्ध हो सकती हैं। हम प्रकृति को देख, उसको संस्‍पर्श कर, उसके ध्‍वनि-संकेतों को भांप कर एक ऐसी आत्‍मविवेचना करने योग्‍य हो जाते हैं, जिसमें हमें सुख-शान्ति के लिए प्रकृति और अपने बीच कुछ भी नहीं चाहिए होता।
प्रकृति-विस्‍तार पर अन्‍तर्दृष्टि फैलते ही मनुष्‍य जीवन के निर्धारित भौतिक-मानक एकाएक बेमानी लगने लगते हैं। इस दौरान हमारा हृदय विश्‍लेषण करने की ऐसी शक्ति प्राप्‍त करता है, जिसमें कोई पूर्व विचार-विभेद आड़े नहीं आता। यह ज्ञान की स्‍वाभाविक अवस्‍था होती है, जो हमें उस समय मिलती है जब हम सब भूल कर पूरी तरह से प्राकृतिक हो जाते हैं।
हरे-भरे पेड़ों की ओट से नीला आसमान देखने का दिव्‍यावसर हमें सदा कहां प्राप्‍त होता है। यह संयोग जब भी बनता है तो इस तरह की समयावधि बहुत कम होती है। लेकिन इस छोटे से समय में भी जैसी हरियाली-नीलिमा आंखों से दिखती है वह कितनी अद्भुत रंगावली होती है, इसकी कल्‍पना इसे देख कर ही की जा सकती है।
इसके इतर भी दैनंदिन की जलवायु में कितना कुछ दिखता है, जो आत्‍मा को तर कर देता है। पक्षी चुपचाप नभ विचरण कर रहे होते हैं। हवा शान्‍त-प्रशान्‍त बहती है। मिट्टी में नए पेड़-पौधों का अंकुरण होता है। रात को गिरी हुई ओंस धरती के उन ओटों में देर-दोपहर तक रहती है, जहां सूर्य किरणों को पहुंचने में समय लगता है। फूलों के खेत में इस वसंत में खड़े होकर चहुंओर देखना आंखों में प्रकृति रत्‍न भरने जैसा लगता है। राह चलते हुए दाएं-बाएं रास्‍तों को देखिए। उनके किनारे खड़े पेड़ों की छायाएं रास्‍तों पर पसर कर वसंत-वसंत गा रही होती हैं। शहरों के आसमान में आमतौर पर गिद्ध कहां होते हैं भला। लेकिन वासंती आभास उन्‍हें भी आकाश में घूमने को विवश कर ही देता है। आज दोपहर उन्‍हें आकाश में मंडराते देख आश्‍चर्य हुआ। 
वसंत पंचमी के बाद पहाड़ी गांवों में 'पैंया' नामक वृक्ष की एक मजबूत टहनी को काट कर होलिका के रूप में स्‍थापित किया जाता है। इसके बाद होलिका दहन तक इस तने को सजाया-संवारा जाता है। चांदनी रातों में युवकमण्‍डल गांव-गांव जाकर होली गीत गाते हैं। वसंत पंचमी से लेकर होली के दिन तक पूरा पहाड़ संजीवित हो उठता है। अकल्‍पनीय रंग-सुगन्‍ध के फूल और वनस्‍पतियों से वहां का सारा जीवन नवोमंगित रहता है। अब शहर में रहते हुए यह प्रतीति स्‍वप्‍न लगती है। 
जग के रोगाणु भी जब पीत वासंती प्रकाश में जल जाते हैं तो मनुष्‍यास्तित्‍व क्‍यों रोग-शोक में रहे। यह भी पुराना बाना छोड़े और नए का धारण करे। नववर्ष अब आ रहा है। नई चेतना अब जागी है। अगले वर्ष इस समय तक पुन: लौटने के लिए जीवन सम्‍पूर्ण ऊर्जा प्राप्‍त कर ले। वसंत की उमंग, ऊष्‍मा फैले हृदय से हृदय तक। सब मंगल हो सबका मंगल हो इस कामना के साथ वसंत ॠतु की बधाई।

Saturday, February 1, 2014

 नरेन्‍द्र, स्‍वराज, समर्थक
गभग तीन महीने से ज्‍यादा हो गया इस पेपर कटिंग को मेरे पास। इससे पहले कि इसका कागज गल जाए और इसमें लिखे गए उद्देश्‍य की प्राप्ति हो जाए मैं इसके बारे में बता देता हूं। रविवार 20 अक्‍टूबर, 2013 के हिन्‍दुस्‍तान हिन्‍दी दैनिक समाचार-पत्र के दिल्‍ली-एनसीआर संस्‍करण की पृष्‍ठ संख्‍या चौदह। इस पृष्‍ठ पर एक सज्‍जन
लज्‍जा राम द्वारा दिया गया विज्ञापन

श्री लज्‍जा राम आईआरएस (सी ऐंड सीई) रिटायर्ड 40/159, सी.आर. पार्क, नई दिल्‍ली-110019 ने आगे आओ देश बचाओ देश बचाओ मोदी लाओ शीर्षक से राष्‍ट्रकवि मैथिली शरण गुप्‍त की दो कविताएं विज्ञापन स्‍वरूप में छपवाईं हैं। अखबार में इस विज्ञापन को छपवाने के लिए अनुमानित एक लाख रुपए तक की लागत तो आई ही होगी। एक व्‍यक्ति देश हित में, लोक हित में अपनी जेब से खर्चा कर रहा है। ये किसी कम्‍पनी के उत्‍पाद का विज्ञापन नहीं था कि इसे धनार्जन के लिए छपवाया गया हो।
      इसी अखबार में शनिवार 16 नवम्‍बर 2013 को पृष्‍ठ संख्‍या 2 पर आधे पृष्‍ठ का एक और विज्ञापन छपा। वन्‍दे मातरम् जालिम हाथ का खूनी पंजा एक सत्‍यता नामक शीर्षक एवं उप-शीर्षक से प्रकाशित इस विज्ञापन में भी नरेन्‍द्र की सराहना की गई है। इसमें नरेन्‍द्र द्वारा कांग्रेस के हाथ के निशान को खूनी पंजा कहने को कुछ पुराने उद्धरण प्रस्‍तुत कर उचित ठहराया गया है। इस विज्ञापन को देनेवाले हैं
मुकेश परमार द्वारा दिया गया विज्ञापन
डा. मुकेश कुमार परमार, एमबीबीएस, एमएस, एलएल.बी, मेरठ उत्‍तर प्रदेश, ई-मेल-parmaar@hotmail.com, एसएमएस हेतु मोबाइल 09412784555। इसी अखबार में एक बार पहले भी इन महाशय का आधे पृष्‍ठ का विज्ञापन छप चुका है। करोड़ों की प्रसार संख्‍यावाले इस अखबार में आधे पृष्‍ठ का विज्ञापन कम से कम लाखों रुपए देकर छपवाया गया होगा।
      इन दो उदाहरणों से समझा जा सकता है कि नरेन्‍द्र को प्रधानमन्‍त्री पद पर बिठाने के लिए लोग अपने-अपने स्‍तर पर अपनी पूंजी खर्च कर कितना प्रयास कर रहे हैं। भारतीय राजनीतिक इतिहास में संभवत: ऐसा पहली बार हुआ होगा। ऐसे में समाचारपत्रवालों को भी कुछ शर्म जरूर आई होगी। उन्‍हें लगा होगा कि वे तो उलटे-साधे विज्ञापन छाप कर मुद्रा कमा रहे हैं। सेक्‍स पॉवर बढ़ाने, मुंह चमकाने, कोल्‍ड ड्रिंक पीने आदि का आहवान करते अखबारी विज्ञापनों से प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष रूप से जनमानस पर कितना दुष्‍प्रभाव पड़ता है, इस ओर सोचने के लिए न लोग तैयार हैं और ना ही पत्रकार बिरादरी। इस विषय में सरकार की मतिगति क्‍या है, उसकी तो बात ही छोड़ दीजिए। उसका तंत्रात्‍मक संचालन हवा में लाठियां भांजना ही सिद्ध हो रहा है। जनसंचार में तो बस सामाजिक और राष्‍ट्रीय चरित्र की जड़ों में मट्ठा डालनेवाले विज्ञापनों के द्वारा पैसा कमाने की होड़ मची हुई है। विज्ञापनदाता कम्‍पनियों ने समाज, संस्‍कृति को बिगाड़ने के लिए विज्ञापन के रूप में इतने हथकंडे अपना लिए हैं कि अब इनके बगैर समाज की कल्‍पना अवास्‍तविक लगने लगी है। स्‍वयं सामाजिक गति एक प्रकार से तंत्र-उदयोगपतियों और विज्ञापनमूलक मीडिया के द्वारा प्रचलित किए जानेवाले जीवन मानकों से तय हो रही है। ऐसे में संवेदन मन में यह प्रश्‍न उठना स्‍वाभाविक है कि कहां तो समाज को लोकतान्त्रिक जीवन मानकों के हिसाब से चलना चाहिए था और कहां सामाजिक व्‍यवस्‍था सरकारों को पालनेवाले पूजीपतियों के हिसाब से चलती हुई आ रही है और न जाने कब तक ऐसा ही चलता रहेगा।
इस दुर्व्‍यवस्‍था से छुटकारा पाने के लिए आज देश के प्रबुद्ध लोग नरेन्‍द्र की ओर बड़ी आशाभरी दृष्टि से देख रहे हैं। लोग बदलाव की इस बयार को केवल देख ही नहीं रहे हैं बल्कि वे अपने-अपने स्‍तर पर इस बयार को आंधी बनाने का प्रयास कर रहे हैं। इसी क्रम में कोई अपने पैसे खर्च कर अखबारों में नरेन्‍द्र मोदी के पक्ष में विज्ञापन छपवा रहा है तो कोई सभा-सम्‍मेलनों का आयोजन कर रहा है। कोई प्रत्‍येक भारतीय से अपने मत का प्रयोग करने की अपील कर रहा है तो कोई लोगों को अपने मत का सही प्रयोग करने की सलाह दे रहा है।
पूंजीपतियों और व्‍यावसायिकों को समर्थन देने की बात पर यहां यह प्रश्‍न उठना भी जरूरी समझा जा सकता है कि नरेन्‍द्र भी तो गुजरात में बहुत हद तक यही योजनाएं चला रहे हैं। कि वे भी तो कॉरपोरेट केन्द्रित समाजार्थिक विकास का ही समर्थन करते हैं। समर्थन क्‍या करते हैं वे गुजरात प्रदेश के हर क्षेत्र के लिए जो भी कार्य कर रहे हैं उन कार्यों का वैकासिक रास्‍ता पूंजीपतियों के हित और उस आधार पर होनेवाली प्राकृतिक ह्रास की अवधारणा से ही होकर गुजरता है। लेकिन इस विषय में आम आदमी को अभी बहुत अध्‍ययन की जरुरत है। वह तब ही मनमोहनी विकास और गुजराती विकास की तुलनात्‍मक व्‍याख्‍या को आसानी से समझ सकता है। गुजरात के विकास कार्यक्रमों को देश-दुनिया से इतर तो डिजाइन और क्रियान्वित नहीं किया जा सकता। यहां भी वही योजनाएं, नीतियां, मशीनरी और अवधारणा काम करेगी जो दुनिया में चल रही है। इसलिए यह कहना कि नरेन्‍द्र शासित गुजरात कॉर्पोरेट के हाथों की कठपुतली के सिवाय कुछ और नहीं है एकदम बचकानी बात है।
 स्‍वराज की अवधारणा को क्रान्तिकारी तरीके से लागू करने के लिए जनमानस को अपनी आवश्‍यकताएं रोटी, कपड़ा, मकान और बहुत जरूरत होने पर स्‍वास्‍थ्‍य तक सीमित करनी पड़ेंगी। और जिस दुनिया या देश की युवा पीढ़ी जीवन के उक्‍त चार आधारों को युवकत्‍व के जोश में तिलांजलि देकर मशीनरी संकल्‍पनाओं को ही जीवन का मूलाधार मान कर चल रही हो, वहां कोई शासक या लोकतान्त्रिक नेतृत्‍व मशीनों की परिकल्‍पना, निर्माण, प्रयोग, उपभोग को सांगठनिक स्‍तर पर चलाने वाले पूंजीपतियों, कॉर्पोरेट की अवहेलना, उनकी उनकी अनदेखी कैसे कर सकता है। क्‍या मार्क्‍स-समाज-बहुजनसमाज-अन्‍यान्‍य वादियों को आज पूंजीपतियों या कॉर्पोरेट घरानों को बुरा कहने से पहले यह नहीं सोचना चाहिए कि उनकी सांगठनिक या लो‍क‍तान्त्रिक उत्‍पत्ति और अस्तित्‍व को इन्‍होंने ही सहारा दिया है।
केवल जीवन की आधारभूत आवश्‍यकताओं की पूर्ति करने के सिद्धान्‍त को दुनिया में बहुत पहले से चुनौती मिलती रही है। यह केवल कुछ हजार वर्ष पहले की बात नहीं है। लाखों वर्ष पूर्व से साधन सम्‍पन्‍न बुद्धिजीवी चैन से बैठने की बजाय ज्ञान-विज्ञान की दिशा में अग्रसर होते हुए आए हैं। वे खा कर सोने और जीवन काटने की चिंता से उठ कर जीवन-विषयक गहरी पड़ताल करने के चक्‍कर में जो एक बार फंसे और इसके परिणामस्‍वरूप मान्‍यताओं के जो दो वैज्ञानिक एवं आध्‍यात्मिक ध्रुव बने उनका सामाजिक अनुसरण आज तक हो रहा है। लेकिन इन दो वैचारिक ध्रुवों का आरम्‍भ में अपने-अपने विचार, प्रयोग, अनुसन्‍धान और आविष्‍कार से कोई सामूहिक नकारात्‍मक प्रभाव संसार पर नहीं पड़ा। इनकी अपनी-अपनी वैचारिक दशा-दिशा एक प्रकार से मानव कल्‍याण पर टिकी थी। परन्‍तु शनै:-शनै: इन दो ध्रुवीय विचारों के प्रचार-प्रसार से दुनिया के तरह-तरह के लोग जुड़ते चले गए और यह दुनिया का दुर्भाग्‍य ही रहा कि विज्ञान-आध्‍यात्‍म के आरम्भिक काल की विचारधारा में कालान्‍तर में मानव-कल्‍याण के स्‍थान पर व्‍यक्तिगत अहं, स्‍वार्थ, लोभ, लालच जैसे अमानवीय विषैले विचारतत्‍व प्रवेश करने लगे। यही विषैली मानवीय प्रवृत्ति आज तक चली आ रही है। विज्ञान-आध्‍यात्‍म आज भी इस दुष्‍प्रवृत्ति से पीड़ित है। और इसी का प्रभाव दुनिया और भारत के राज, समाज पर भी पड़ रहा है।
नरेन्‍द्र जैसे व्‍यक्तित्‍व यदि स्‍वराज सिद्धान्‍त को व्‍यावहारिक बनाने का प्रयास करेंगे भी तो यह चुटकी बजा कर स्‍वराज प्राप्‍त होने जैसा व्‍यवहार नहीं होगा। इसके लिए सर्वप्रथम उन्‍हें लोकतान्त्रिक बहुमत से राज व्‍यवस्‍था में आना होगा। स्‍वराज अनुकूल योजनाओं, नीतियों को साकार करने की सरकारी, सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक और सबसे बढ़कर आध्‍यात्मिक व्‍यवस्‍था बनानी होगी। दो हजार चौदह से अगले पांच साल यानि 2019 तक यह सब कुछ पूरे भारत में सम्‍पन्‍न नहीं हो जाएगा, जनमानस को यह भी समझाना होगा। लाखों-हजारों वर्षों की विचारधारा की लड़ाई को कोई नेतृत्‍व इक्‍कीसवीं शताब्‍दी में मात्र पांच या दस वर्ष में समाप्‍त करके विकास के सारे लक्ष्‍य प्राप्‍त कर लेगा, इतनी जनापेक्षा भी सपने जैसी ही होगी। नरेन्‍द्र के सत्‍तासीन होने पर यह जनापेक्षा ज्‍यादा सही होगी कि उनके आने के बाद रामराज स्‍थापित हो या ना हो पर चरमासीन रावणराज कम से कम घुटनों के बल तो आ सके।