Wednesday, January 29, 2014

इतिहास के लिए बेचैन वर्तमान

आंखों पर कई परतों में काली पट्टी बांध कर केवल भविष्‍य, विकास के बारे में सोचनेवालों को अचानक इतिहास में दर्ज होने की याद सताने लगी है। स्‍वार्थ का इससे बड़ा उदाहरण और क्‍या हो सकता है! जिन्‍हें अपने पुरखों के इतिहास पर गर्व होना चाहिए था आज वे उस विराट ऐतिहासिक परम्‍परा के केवल बाहरी आवरण को ही ओढ़ पाने में सक्षम हैं। उनके आदि धर्म, परम्‍परा, संस्‍कार ने स्‍वयं को स्‍थापित करने में जैसी समस्‍याएं झेलीं, जिनके कारण झेलीं उन तत्‍वों से मित्रता करने को वे मरे जा रहे हैं। उनका इतिहास जिस धार्मिक विशालता के लिए जाना जाता है उससे शायद वे परिचित भी नहीं हैं। जैसे बलिदान, सामूहिक बलिदान उनके वंशजों ने अपने धर्म के पक्ष में किए हैं वे अन्‍य धर्मावलम्बियों के लिए भी अन्‍तर्प्रेरणा हैं। और धर्मभावना के जिस मूल बिन्‍दु से उनके धर्मदर्शन को एक नया आयाम मिला, जिससे मूल धर्म भी कई प्रकार से परिमार्जित और परिष्‍कृत हुआ, उसकी अपेक्षा की बजाय वे उसकी उपेक्षा के मतवाहक बन रहे हैं।
     यदि कोई चाहे कि उसकी मृत्‍यु के बाद जीवित लोग उसकी चर्चा करें तो उसका ये कर्तव्‍य भी बनता है कि वह शासन-समाज के शीर्ष पर बैठ कर समाज के युवाओं को संस्‍कारित करे। उन्‍हें वैसी शिक्षा-दीक्षा दे जो उन्‍हें ज्ञानार्जन करने और ज्ञान का समुचित प्रयोग करने के लिए प्रेरित करे। वर्तमान के शासक क्‍या अच्‍छा-बुरा कर रहे हैं यदि यह इतिहास में दर्ज होता है और वे भावी पीढ़ियों से इसे पढ़ने की अपेक्षा करते हैं तो उन्‍हें कम से कम इस हेतु एक आधार तो बनाना ही पड़ेगा। आधार से तात्‍पर्य यहां यह नहीं है कि वे अपने बारे में असंख्‍य पुस्‍तकें प्रकाशित करवा कर उन्‍हें पुस्‍तकालयों में संग्रहीत कर दें, सजा दें। आधार से अभिप्राय है कि मार्गदर्शक वर्तमान किशोरवय और नौजवान पी‍ढ़ी के लिए आदि संस्‍कारों से अन्‍तर्सिंचित होने का मार्ग प्रशस्‍त करे। ना कि अपनी तरह केवल उन आदि संस्‍कारों के बाह्य आवरण को लपेटे रहने का अभिनय करे और वास्‍तव में धतकर्मों को बढ़ावा देनेवाले शासकीय निर्णय, कर्म करें।
इतिहास की मोटी पुस्‍तकों को रुचि से पढ़ने के लिए पाठकों में असीम धैर्य, विवेक, संवेदना होना बहुत जरूरी है। और अगर पाठकगण आधुनिकता, विकास के नाम पर फैलाए जा रहे भोग-विलास में आकण्‍ठ डूबे रहेंगे तो वे इतिहास कैसे पढ़ेंगे? ऐसे में उन्‍हें अपने वर्तमान, अपने बारे में ही ज्ञात हो सके कि वे मानव हैं और कुछ समय के लिए ही धरती पर विद्यमान हैं तो यही पर्याप्‍त होगा। लेकिन दुखद तो ये है कि नई पीढ़ी वर्तमान और अपने आप से भी अनभिज्ञ हो चुकी है। विलासिता की एकल चाल से अलग कोई चलना ही नहीं चाहता। ऐसे में इतिहास इकट्ठा करने का क्‍या लाभ? कौन इसे पढ़े, इससे प्रेरणा ले और इसके अच्‍छे-बुरे पाठ के अनुरूप अपने व्‍यक्तित्‍व का निर्माण करे?
     एक तरह से इतिहास भी खुद को दोहराता है। जब आज के वयस्‍कों, वृद्धों ने अपने से पूर्व के इतिहास को सम्‍मान नहीं दिया तो उनके साथ भी तो वैसा ही होनेवाला है। उन्‍होंने कब अपने वंशजों की सुविचारित जीवन पद्वतियों का सही अनुसरण किया, वे कब अपने से पूर्व के जीवन की सर्वश्रेष्‍ठ बातों-कार्यों को अपने जीवन में उतार पाए! यही उनके साथ भी होनेवाला है।
यदि आपको लगता है कि वर्तमान जनसंचार माध्‍यमों ने आपकी उपलब्धियों को नहीं गिनाया और आपके किए गए देशहितैषी कार्यों का समुचित प्रसार नहीं किया तो यह गलत है। आपके राजकाज के दौरान उठे बवाल, हुए घोटाले और नवउदारवाद की विध्‍वसंक उथल-पुथल के बावजूद भी आपके ही केन्‍द्रीय शासन के अन्‍तर्गत कार्यरत सूचना एवं दृश्‍य प्रसार निदेशालय (डीएवीपी) ने आपके कार्यकाल के दौरान किए गए कार्यों और योजनाओं के प्रचार-प्रसार पर अरबों रुपया फूंका। क्‍या प्रचार-प्रसार पर खर्च करने के लिए यह राशि और माध्‍यम कम है? यदि आपके किए गए का वास्‍तव में कोई प्रभाव होता तो लोगों की निराशा प्रतिबिम्बित होकर आपके चेहरे पर नहीं आती। ऐसे में आपके नेतृत्‍व का कौन सा पाठ इतिहास दर्ज करेगा पहले तो यही जटिलता देश के सामने है, दूसरा यदि आप इतिहास में दर्ज हो भी जाते हैं तो आपको पढ़ने की रुचि समाप्‍त करने में भी आपका और आपकी योजनाओं का ही हाथ था, है और होगा। अपने गौरवशाली इतिहास की अवहेलना करके कोई कैसे गौरवशाली इतिहास हो सकता है!

Thursday, January 23, 2014

पैंसठवां गणतन्‍त्र

26 जनवरी, 1950 को संविधान-सभा में जो प्रस्‍ताव रखे गए और भारत सरकार अधिनियम, 1935 से इनका मिलान, विश्‍लेषण, अध्‍ययन करने के बाद जो निर्णय लिए गए, वे भारतीय संविधान के शासन प्रलेख के रुप में दर्ज हो गए। छब्‍बीस जनवरी को सन् 1930 की स्‍वतन्‍त्रता की घोषणा के सम्‍मान में चुना गया था। तब से लेकर गणतन्‍त्र की आधिकारिक घोषणा को प्रत्‍येक वर्ष 26 जनवरी के रुप में मनाया, याद किया जाता है। एक तरह से गणतान्त्रिक भारतीय व्‍यवस्‍था का यह दूसरा सबसे बड़ा पर्व है। स्‍वतन्‍त्रता दिवस और गांधी जयन्‍ती दो अन्‍य राष्‍ट्रीय पर्व हैं, जिससे 26 जनवरी अर्थात् गणतन्‍त्र दिवस का पर्व सोद्देश्‍य संलग्‍न है।
 गणतन्‍त्र का उत्‍साह हमेशा ऐसा क्‍यों नहीं होता हर क्षेत्र में
इस दिन राजधानी दिल्‍ली में देश के प्रथम नागरिक राष्‍ट्रपति भारतीयता के प्रतीक तिरंगे ध्‍वज को फहराते हैं। इसके बाद वे थल, जल, नभ तीनों सेना प्रमुखों का अभिवादन स्‍वीकार करते हैं। राजपथ पर देशभर के राज्‍यों के रहन-सहन, भाषा-बोली, वेशभूषा, सांस्‍कृतिक विरासत और नई उपलब्धियों को दर्शाती झांकियों का रेला निकलता है। तीनों सेनाएं अपने रण-कौशल, सुरक्षा ज्ञान-विज्ञान को प्रस्‍तुत करती हैं। अनेक सैन्‍य टुकड़ियां सैन्‍य बेड़े में शामिल किए गए अपने नवीनतम अस्‍त्र-शस्‍त्रों के गुणों और दक्षताओं की चल प्रदर्शनी करती हैं। केन्‍द्र, राज्‍य सरकार के महत्‍वपूर्ण विभाग, निगम अपनी नवोन्‍नत कार्यप्रणालियों तथा नवीन अनुसन्‍धान से आम और खास को परिचित कराते हैं। हमारा देश अनेक धर्मों, जातियों, भाषाओं का देश है। गणतान्त्रिक ताने-बाने में इन विशिष्‍टताओं का सुसंगत समावेश करने के उद्देश्‍य से भी संविधान की भूमिका अत्‍यन्‍त महत्‍वपूर्ण है। इसका ध्‍यान रखते हुए भी इस देश के गणतान्त्रिक संविधान में आवश्‍यक प्रावधान किया गया है, और इसके बने रहने के संकल्‍प के साथ प्रतिवर्ष राजपथ पर सामु‍दायिक एकता दर्शातीं झांकियों के प्रदर्शन का उद्देश्‍य भी इसी में निहित है। इसी प्रकार देश के प्रमुख विद्यालयों के विद्यार्थी पठन-पाठन, जानवर्धन, शारीरिक-मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य सम्‍बन्‍धी जागरुकता की झांकियां प्रस्‍तुत करते हैं। इन सम्‍पूर्ण गतिविधियों का तात्‍पर्य यह दर्शाना होता है कि भारत के संविधान प्रदत्‍त गणतन्‍त्र के वैशिष्‍ट्य को कालखण्‍ड के अनुरुप सशक्‍त बनकर आगे ही आगे बढ़ते जाना है।
लेकिन आज गणतन्‍त्र दिवस की 65वीं वर्षगांठ मनाते हुए क्‍या हम भारतीय गणतान्त्रिक परिभाषा के व्‍यावहारिक पक्ष को किसी भी क्षेत्र में घटित होते हुए देख पा रहे हैं? ज्‍यादातर लोगों को इस प्रश्‍न पर मौन रह जाने को विवश होना पड़ेगा। यदि पिछले 64 वर्षों के गणतान्त्रिक ताने-बाने पर सरसरी नजर डाली जाए तो यही पाएंगे कि अमीरी-गरीबी की खाई में वृद्धि होती जा रही है और जल, अन्‍न, स्‍वास्‍थ्‍य, न्‍याय के मोर्चे पर अधिसंख्‍य लोगों को आज तक धक्‍के खाने पड़ रहे हैं। देश-दुनिया में विज्ञान ने यदि पिछले 5-6 दशकों में अभूतपूर्व उपलब्धि दर्ज की है तो इस वैज्ञानिक चमत्‍कार का हासिल आम जनता को खुद की अनदेखी के रुप में ही मिला है।
बाल स्‍वास्‍थ्‍य, महिला सुरक्षा, भ्रष्‍टाचार, घोटाले, कृषि योजनाओं की विफलता, एफडीआई, महंगाई, विद्यालयों और महाविद्यालयों में वृत्तिक पढ़ाई के साथ-साथ नैतिकता के पाठ्यक्रमों को लागू करने में पूर्ण विफलता, विचित्र किस्‍म की अराजकता, बढ़े-बुजुर्गों के प्रति सौतेला व्‍यवहार, सामाजिक संस्‍कारों का ह्रास, आदि विषयों पर न तो कोई सुदृढ़ नीति बनाई जा रही है और ना ही इस ओर किसी राजनीतिक पार्टी का ध्‍यान जाता है। विकास करने और आगे बढ़ने के नाम पर एक प्रकार की औपचारिकता का चोला सम्‍पूर्ण समाज ने ओढ़ रखा है, जिसके अन्‍दर झांकने पर न तो विकास दिखाई देता है और ना ही विकास के लिए सुनियोजित, समुचित कार्यनीतियां।
इसके अलावा सामरिक दृष्टि से भी हमारी समस्‍याओं को हमारे कर्ताधर्ताओं ने बयानबाजी करने में ही उलझा कर रख दिया है। विश्‍वासघात करनेवाले देश के दुश्‍मनों के विरुद्ध ठोस कार्यवाही करने की सूरत न "मुंह की खाने" के दौरान बनी और ना ही "पीठ पर छुरा घुंप जाने" पर।
ऐसे में भारतीय गणतान्त्रिक विशिष्‍टता और सम्‍पूर्णता का राजपथ पर होनेवाला प्रतिवर्ष का प्रदर्शन इस बार भी मात्र अपनी दैनिक उपस्थिति दर्ज कराएगा या राष्‍ट्रीय चेतना के रुप में लोगों के मन में सदैव बसने की दिशा में आगे बढ़ेगा, ये कुछ ऐसे प्रश्‍न हैं, जिनके हल हुए बिना एक राष्‍ट्र के रुप में हमारे विकसित होने और आगे बढ़ने का सपना हमेशा सन्‍देहास्‍पद ही रहेगा।

Saturday, January 18, 2014

माघ, मूसलाधार, मैं (पुन:)

माघ, मूसलाधार, मैं  नाम से गत वर्ष (माघ, मूसलाधार, मैं 2013) भी एक संस्‍मरण लिखा था। तब माघ के उत्‍तरार्ध में उस रात भी ऐसी मूसलाधार वर्षा हुई जैसी इस वर्ष माघ के पूर्वार्द्ध में ही हो गई। जहां-जहां भी इस माघ की वर्षा हुई उन स्‍थानों पर आधी रात के बाद जो भी व्‍यक्ति जाग रहा होगा और असहाय कर देनेवाली बादलों की कड़कड़ाहट सुन पा रहा होगा, वह तो जैसे वर्षा थमने और बिजली की खूंखार गड़गड़ाहट के रुकने तक हृदयाघात  की स्थिति में था।
प्रकृति के आगे बेबस दुनिया
     रात का वर्णन लिखने के दौरान सुबह भी रात के द्वारा रौंदे जाने से बुझी, डरी, सहमी और कुरुप बनी हुई है। मन में तो यह है कि यह मौसम शीघ्र कटे और नया सुहावना दिन आए, पर किसानों और फसलों के बारे में सोच कर इस समय को भी सहर्ष आत्‍मसात कर लिया।
वैसे रात्रि के समय अन्‍य जीवों, प्राणियों की मन:स्थिति क्‍या रही होगी इसका मैं एक अनुमान ही लगा सकता हूँ, पर मैं स्‍वयं आकाशीय बिजली की ध्‍वनि से इतना भयभीत था कि आती हुई नींद भी तब तक के लिए स्‍थगित हो गई जब तक बिजली की कड़कड़ाहटें और वर्षा बूंदों की झमझमाहटें पूरी तरह बन्‍द नहीं हो गईं। निरन्‍तर गिरतीं मोटी जलधारों के बीच-बीच में जब आकाश को स्‍थान-स्‍थान से फाड़ती, कड़कती और भूकम्‍पन करती बिजली चमक रही थी तो मानवीय अस्तित्‍व इस समय कितना दीनहीन बना हुआ था! अधिकांश लोगों की तरह ही मैं भी इस प्राकृतिक झंझावात के व्‍यतीत होने की प्रतीक्षा करता रहा। सिर की छत के ऊपर आकाशीय बिजली गिरने के आभास को शीघ्रातिशीघ्र असत्‍य घोषित करनेवाले व्‍यतीत क्षणों को धन्‍यवाद देता रहा। इस समय मैं किसी ऐसे भूतल कक्ष में शरण लेना चाहता था, जहां नभ विद्युत की ध्‍वनि सुनाई ही न दे, उसका प्रकाश दिखाई ही न दे। 
ठण्‍ड में मौसम के आक्रमण से सुरक्षित मैं जब घर के अन्‍दर अप्रत्‍यक्ष मौसमीय ध्‍वनि से इतना असहाय, व्‍याकुल था तो उन प्राणियों, जीवों पर क्‍या बीतती होगी जो इस प्राकृतिक, विद्युत-जल सम्मिश्रित प्रलय को प्रत्‍यक्ष झेल रहे होंगे! ऐसे में जब घर भी असुरक्षित लगने लगे तो बेघर कितना जीवनहीन महसूस कर रहे होंगे! यह स्थिति किसी भी मानव को विनम्र बनाने के लिए कितनी उपयोगी हो सकती है, यह सोच कर लगा कि घमण्‍ड और स्‍वार्थ के शीर्ष पर बैठे हुओं को प्रतिपल ऐसे ही मौसमीय अट्टाहस मिलते रहने चाहिए, ताकि वे अपने वास्‍तविक अस्तित्‍व को पहचानें और कुछ वर्षों के अपने जीवन को ईश्‍वरीय-प्राकृतिक शक्ति से श्रेष्‍ठ न समझें।
मूल जीवन सिद्धान्‍तों को चुनौती देते आधुनिक बुदि्धीवीरों को चेताने के लिए ही प्रकृति क्रुद्ध हो ऐसा मौसमीय मंचन करती है लेकिन दुखद है कि स्‍वयं को एक प्रकार से अमर समझनेवाले आज के अधिकांश मानव माघ की मौसमीय चेतावनी से अनभिज्ञ नशे में चूर मूर्छित हो पड़े होंगे।
कुछ भूक्षेत्र ऐसे भी रहे होंगे जहां कल रात केवल शान्‍त वर्षा ही हुई होगी। ये उस भूक्षेत्र में रहनेवालों का भाग्‍य होगा कि उन्‍होंने कल रात नभमण्‍डल में बिजली की असहनीय ध्‍वनि टंकार नहीं सुनी। पता नहीं बिजली चमकने, कड़कड़ाने और गिरने से कल रात कौन-कौन घायल हुआ होगा! जिस प्राणी, जीव ने भी इस सबसे डरावनी ध्‍वनि को घर की मजबूत चाहरदीवारियों से बाहर खुले में सुना या देखा होगा उसका भला तो भगवान ही कर सकता था। और उनके शक्तिवान हृदय पर भी कम आश्‍चर्य नहीं किया जा सकता, जिन व्‍यक्तियों ने कल रात की सृष्टि, विद्युत वृष्टि को भी पूर्व की भान्ति सामान्‍य समझ कर उसका आनन्‍द लिया होगा।
     जो भी हो मैं तो कल रात तब तक दम साधे बैठा रहा जब तक जगह-जगह एकत्रित अन्तिम वर्षा जल बून्‍दें धरती पर टपक नहीं गईं। जब तक रात के सन्‍नाटे में पुन: दीवाल घड़ी की टिक-टिक सुनाई नहीं देने लगी।
(18.1.2014, 12.30, दोपहर)

Wednesday, January 15, 2014

मेरा आजकल

कार्यालय के बड़े परिसर में रखे पंक्तिबद्ध गमलों में उगे लाल-पीले फूलों को देखता हुआ जब घर की तरफ आ रहा था तो मन्‍द, मीठी सर्द हवा का अनोखा अनुभव हुआ। लगा कि हवा वस्‍तु रूप में मेरे शरीर से लिपट गई। कुछ देर मंत्रमुग्‍ध हो अपने मन-शरीर को हवाओं की अदृश्‍य लहरों में झूलने के लिए छोड़ दिया। हवाई आकर्षण और मुग्‍धता से छूट कर लगा कदाचित् निर्मल भावनाओं और संवेदनाओं का यही प्रतिफल होता होगा व्‍यक्ति के लिए। कार्यालय में रात को साढ़े दस बजे पूष का माघ में बदलने का यह पहला मौसमीय आभास था। एक प्रकार से यह प्रारम्‍भ फाल्‍गुन-चैत्र के सुमधुर मौसम-समय को पुष्पित-पल्‍लवित करने का बीजारोपण है।



मेरी तरह पता नहीं कितनों ने चांद
के पास से सरकते बादल देखे होंगे

घर पहुंचने पर देखता हूं कि लोग अपने-अपने घरों में सो चुके हैं। कंक्रीट के बीच जो हरियाली दीखती है, जो पेड़ नजर आते हैं वे मन्‍द-मन्‍द हिलमिला, खि‍लखिला रहे हैं। तीसरी मंजिल पर स्थित घर के गलियारे में खड़ा मैं मध्‍य नभ में विद्यमान चन्‍द्रमा के दाएं-बाएं तेजी से गुजरते, बिखरते और सरसराते बादलों को देखने रुक जाता हूं। पूष को उड़ा कर दूर बहा ले जानेवाला समय जैसे इन्‍हीं क्षणों में आकाश में चलचित्रित हो रहा है। मौसम की लगन देख के प्रतीत हुआ कि माघ, पूष की इस अन्तिम चन्‍द्ररात को विदा करने आ गया है।
मेरे लिए औरों ने जो राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक और कानूनी जीवन बना रखा है दिनभर उसमें पिसने के बाद रात को मैं अपने आत्मिक जीवन में पग धरता हूं। यहां मेरी बाहरी दुनिया के नियम-कानून और इनको बनानेवाले व इनसे संचालित होनेवाले लोग एकदम से विस्‍मृत हो जाते हैं। मेरे बाह्य जीवन में जो लोग मुझे जैसे होंगे, आत्मिक अवस्‍था में मैं उन्‍हीं को ढूंढता हूं। उनके बाह्य जगत पर मेरा कोई अधिकार नहीं हो सकता पर उनके भीतरी संसार पर मेरी दृष्टि बराबर लगी रहती है। मैं सोचता हूं कि मेरे और उनके भीतर का संसार जब एक है तो हम अपने बाहरी संसार को भी ऐसा ही क्‍यों नहीं बना सकते। हम थोपे गए बाहरी जीवन का बोझ कब तक उठाएंगे। जब इससे मन बुरी तरह खट्टा हो गया है तो इसको ढोने से क्‍या लाभ?

ये भी तो पूष का माघ में बदलना देख रहे हैं


एकान्‍त, प्रशान्‍त व्‍यक्तियों के लिए दुनिया की द्विअर्थी नीतियों-रीतियों की क्‍या आवश्‍यकता! समाज-सरकार के नियम अपराधियों को दण्डित और नियन्त्रित करने तक ही क्‍यों होते हैं? जीवनपर्यन्‍त अच्‍छे-सच्‍चे बने रहनेवालों को कोई नियम-कानून सम्‍मानित और विभूषित क्‍यों नहीं करता? अच्‍छाई और सच्‍चाई को चुन-चुन कर पुरस्‍कृत करने से बुराई रोकने का एक नया रास्‍ता जब स्‍वत: ही बन सकता है तो क्‍यों नहीं इस दिशा में क्रान्ति होती?
आधी रात के बाद जब नींद आने और न आने के बीच करवट बदलता हूं तो माघ का चन्‍द्रमा पश्चिम दिशा में दीख पड़ता है। कक्ष के अन्‍दर अन्‍धेरे की कालिख में लिपटा हुआ मेरा शरीर बहुत भीतर अंत:स्‍थल में धवल-उज्‍ज्‍वल बना हुआ है। रात को इसलिए प्रेम करता हूं क्‍योंकि इसमें मेरे स्‍मृतिपट पर न जाने कितने आत्मिक अनुभव अंकित होते हैं और वे मुझे सुबह अपने बाह्य जग में विचरण करने के लिए एक नए भ्रमातीत व्‍यक्तित्‍व में परिवर्तित करते हैं, जिससे मैं बाहर से लड़ने योग्‍य बन पाता हूं।
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इतिहास वर्तमान भविष्‍य, सोचते हुए मैंने रात बिताई
समय की मृदा में मिल, जीवाश्‍म बनीं जीवनियां याद आईं
स्‍वयं को भूल दुखियों की दृष्टि से, दुखानुभवों को जीवन में उतारा
एकांत में जन्‍मे और मरे हुओं को, अन्‍तर्वेदनाओं का मिला सहारा
इस आधुनिक कारागार में, गांव-बचपन कितना याद आता है
शरीर को अकेले यहां छोड़, आकाश में मन नहीं उड़ पाता है
भोला बालपन सुगन्धित यौवन, अब लौट कर नहीं आनेवाला
कलिकाल के इस बियाबान में, आजकल मेरा है खोनेवाला

Sunday, January 5, 2014

आगे बढ़ने में पीछे छूटा जीवन

मैं जीवन में बहुत सारी घटनाओं, अनुभवों को उनके होने के दौरान वैसा भावमान नहीं देता जैसा उनके घटने के कई दिनों के बाद उनके बारे में महसूस होता है। तब घटनाओं में शामिल जीवित पात्र, मौसम, परिवेश की क्रिया-प्रतिक्रिया क्रमवार फिर से दिमाग में घूमने लगते हैं। मैं चाहता हूँ कि यह सब कुछ दोबारा घटे। जो मानवीय कार्य मैं इस घटने के दौरान नहीं कर पाया था वो कर सकूं। लेकिन ये तो केवल एक दिमागी भ्रम है। एक निरर्थक दर्शन, फीका सा सिद्धांत। वास्‍तव में इसके कोई मायने नहीं हैं। अचानक फिर याद आता है कि जो करना है अब करो। अभी क्‍या बिगड़ा है। कौन सा सामाजिक परिवर्तन हो गया है। सब कुछ ठीक थोड़े ही हुआ है जो मुझे अतीत में कुछ नहीं करने का पछतावा है। यह भी लगता है कि जहां नौकरी हो रही है वहां तो अपनी जिम्‍मेदारी ठीक से निभा रहा हूँ तो काहे का संताप है, जो खाए जा रहा है घुन की तरह कि नहीं कुछ न कुछ तो अधूरा है। कुछ तो ऐसा है जिसके पार जाए बिना किसी किस्‍म का संतोष नहीं मिल सकता दिल को।

क्‍या-क्‍या पीछे छूटा आगे बढ़ते रहने में
     चाहे पारिवारिक समस्‍या हो या फिर नौकरी की दिक्‍कतें या समाज और सरकार के बुरे प्रभाव इन सभी से समझौता करते-करते आखिर में कहां जाना है! इस एक बिन्‍दु पर अगर कभी रुक कर सोचता हूँ तो शरीर में जमा रक्‍त पानी बनने में देर नहीं लगाता। अपनी अकेली जिन्‍दगी में तो दुनिया, देश, राज्‍य, नौकरी, परिवार भी प्रवेश नहीं कर पाते। इस जीवन के दुख-सुख परिवार, सम्‍बन्‍ध, जाति, धर्म, देश, दुनिया के पूर्वाग्रहों और पूर्वसंकेतों के बिना उत्‍पन्‍न होते हैं। लेकिन असल में ये कोई दुनिया होती नहीं है। यह सोच कर वापस मुड़ जाता हूँ और उसी धरातल पर खुद को पाता हूँ, जहां सबका हाड़-मांस का मानुषिक जीवन एक अजीब भ्रम में बंधा हुआ सा लगता है। एक ऐसा भ्रम जो हमें मनुष्‍य होने से हटा रहा है। 
जो लोग पेट के लिए दो रोटी, तन ढकने को कपड़ा, सिर पर मौसम की मार से बचने के लिए एक छत और बीमार होने पर दवा के अलावा जीवन में और कोई आकांक्षा नहीं रखते उनके हिसाब से दुनिया चलती, उनसे प्रेरणा लेकर राजकाज होता तो पक्‍का था कि सब कुछ एकदम शांत बहते जल की तरह रहता। सौ बरस की जिन्‍दगी में हजारों-लाखों की संख्‍या में सामान इकट्ठा करने, करवाने की होड़ आखिर किस उल्‍लू के पट्ठे ने लगवाई। वह तो न जाने कौन से जीवाश्‍म में बदल कर कहीं निर्जीव पड़ा होगा, लेकिन उसने मानव जीवन का, उसके निर्धारित समय का स्‍वाभाविक आनन्‍द भी छीन लिया। आगे बढ़ना जैसे दो शब्‍द अभी न जाने कितने इतिहास बनाएंगे और इनको पूरा पढ़ने के लिए न जाने कब मानव जीवन अमर होगा। आगे बढ़ने की हर नई परिभाषा इतनी उलझी हुई है कि इसमें नया और परिवर्तनकारी सार्थक विचार, कार्य ढूंढना कठिन है।
कम्‍प्‍यूटर के एचटीएमएल प्रोसेस पर नाचती आज की दुनिया शायद वह सब कुछ बनाए बिना नहीं रुकना चाहती, जो आनेवाले सालों में मनुष्‍यों को करना पड़े। तो फिर उस समय के मनुष्‍य क्‍या करेंगे? इतना भी क्‍या आगे बढ़ना कि हमारा आस-पास ही खत्‍म हो जाए, हमारा वर्तमान ही हम से कट जाए। इस आगे बढ़ने में जीवन न जाने कितना पीछे छूट गया है!

Wednesday, January 1, 2014

वीर चन्‍द्र सिंह गढ़वाली – पुण्‍य स्‍मरण


लियांवाला बाग में अंग्रेज सैन्‍य अधिकारी ने जब स्‍वतन्‍त्रता आन्‍दोलन के लिए एकत्रित हजारों लोगों को मारने का आदेश गोरखा रेजिमेन्‍ट के सिपाहियों को दिया होगा तो वे अपनी उंगली को बन्‍दूक के घोड़े पर ये सोच कर बार-बार मोड़ रहे होंगे कि वे ब्रिटिश शासन की फौज की ओर से निर्धारित सिपाही के कर्तव्‍य का निर्वाह कर रहे हैं। बालक भगत सिंह ने अपनी जागती आंखों से यह खूनी चलचित्र देखा था। यहीं से देश के लिए कुछ करने का भाव उनके अवचेतन में तब तक बैठा रहा जब तक उन्‍होंने पूरे भारत की हवाओं में क्रान्तिकारी रंग नहीं घोल दिए। इसलिए जलियांवाला बाग हत्‍याकाण्‍ड आज तक भारतवासियों की स्‍मृतियों में पछतावा और प्रेरणा दोनों रूप में विद्यमान है।
लेकिन सन् 1930 में पेशावर में असहयोग अहिंसा शास्‍त्र में शामिल लोगों पर अपने अफसर के आदेश पर गोली चलाने से मना करनेवाले गढ़वाल रायफल्‍स के हवलदार वीर चन्‍द्र सिंह गढ़वाली भारतीय जनमानस की स्‍मृति-पटल पर अंकित होने के लिए हमेशा संघर्ष करते रहे। देखा जाए तो यह घटना जलियांवाला बाग की घटना की तुलना में ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण थी। क्‍यों‍कि यहां पर निर्दोष आन्‍दोलनकारियों की जिन्‍दगियां चन्‍द्र सिंह गढ़वाली और उनकी बटालियन की वजह से बच गईं। जब पेशावर छावनी में तैनात सेकंड रायल गढ़वाल रायफल्‍स के हवलदार वीर चन्‍द्र सिंह गढ़वाली को ये खबर हुई कि अंग्रेज उन्‍हें और उनकी बटालियन के सिपाहियों को अपने ही लोगों को मारने के लिए खड़े करनेवाले हैं तो उन्‍होंने अपने फौजी जोश और विवेक का इस्‍तेमाल राष्‍ट्रभक्ति की नई सोच को व्‍यावहारिक बनाने के लिए किया।
 वे पेशावर छावनी से शहर आते-जाते जनता के हाव-भाव पढ़ते। असहयोग आन्‍दोलन के कारण शहर में जो हलचल हो रही थी उसकी छोटी-सी-छोटी जानकारी वे अपनी बटालियन के सिपाहियों को देते। शहर में असहयोग आन्‍दोलन के लिए एकत्रित होनेवाले स्‍थानीय पठान जनसमूह पर ब्रिटिश फौज की हिंसात्‍मक कार्रवाई की योजना से चन्‍द्र सिंह अवगत हुए। उन्‍होंने अहिंसात्‍मक रूप से असहयोग आन्‍दोलन करनेवाले निहत्‍थे लोगों पर गोली चलाने की कार्रवाई में शामिल होने से मना करने के 60 सिपाहियों व छोटे अफसरों के इस्‍तीफे बड़े साहब के पास भिजवाए दिए। बड़े अफसर सकते में आ गए। अदना सा हवलदार उनके आदेश को चुनौती दे रहा है। मामला विचाराधीन हुआ। लेकिन 22 अप्रैल सन् 1930 को सेकंड बटालियन को फालिन किया गया। उनको पेशावर शहर में जाने का हुक्‍म हुआ। सिपाही सशस्‍त्र खड़े रहे। अपनी जगह से हिले तक नहीं। गढ़वाली अफसर बंगले झांकने पर विवश हो गए। बड़े अंग्रेज अफसरों को वस्‍तुस्थिति पता चली तो बवाल हो गया। ब्रिगेडियर पहुंचे। सेकण्‍ड रायल गढ़वाल रायफल्‍स की दो प्‍लाटूनों के साठ सिपाहियों को लारियों में बैठाकर शहर के लिए रवाना होने का आदेश हुआ। हवलदार चन्‍द्र सिंह ने 17 सिपाहियों के इस्‍तीफे का कागज पेश कर दिया। बाकी सैनिकों के दस्‍तखत वाला कागज पेश नहीं होने पाया। ब्रिगेडियर समझ गया कि गढ़वाली सिपाही अब हमारे लिए नहीं लड़ेंगे। उनको हथियार छोड़ने को कहा गया। उन्‍होंने पहले इनकार किया। फिर विवश होकर क्‍वार्टर गार्ड में हथियार रख दिए। कुछ सिपाहियों ने तो ब्रिगेडियर की ओर संगीन भी कर दी थी, लेकिन गोली नहीं छोड़ी। परिणामस्‍वरूप 60 गढ़वालियों पर म्‍यूटिनी (विद्रोह, बगावत) का अभियोग लगाया गया। पूरी सेकंड बटालियन काकुल (एबटाबाद) में नजरबन्‍द कर दी गई।
पेशावर-कांड का नतीजा ये हुआ कि अंग्रेजों की समझ बदल गई। वे गहराई से अनुभव करने लगे कि भारतीय सेना में विद्रोह का विचार गढ़वाली सिपाहियों के आह्वान  पर ही पनपा है। आजाद हिन्‍द फौज का बीजारोपण एक प्रकार से इसी घटना की परिणति थी। सन् 1930 में पेशावर में बोया गया यह बीज सन् 1942 में सिंगापुर में अंकुरित हुआ। जब 3000 गढ़वाली सिपाही और अच्‍छेअच्‍छे गढ़वाली अफसरों ने देशभक्‍त सुभाषचन्‍द्र बोस के नेतृत्‍व में आजाद हिन्‍द फौज में भर्ती होने का नि‍श्‍चय किया। बीस हजार भारतीय सिपाही जापानियों के कैदी बने। इनमें से तीन सौ गढ़वाली सिपाही थे। इन्‍होंने हिन्‍दुस्‍तान को आजाद करने का बीड़ा उठाया था। महापण्डित राहुल सांकृत्‍यायन ने वीर चन्‍द्र सिंह गढ़वाली नामक अपने उपन्‍यास में बड़े दुख से लिखा है कि गढ़वालियों का दुर्भाग्‍य ही है कि पेशावर-काण्‍ड के सूत्रधार चन्‍द्र सिंह गढ़वाली की अनदेखी गढ़वाली लोगों ने ही नहीं आजाद भारत के नेताओं ने भी की।  
‘‘हम नहीं आएंगे, चाहे तोप से हमें उड़ा दो’’, ‘‘हम बूढ़ों-बच्‍चों को मारने के लिए तैयार नहीं इन वाक्‍यों की गूंज ने पेशावर में एक बड़े जनसंहार को रोक दिया था। इतिहास की यह घटना कितनी प्रेरणादायी है। युवाओं और नौजवानों को ऐसे ऐतिहासिक घटनाक्रम से सीख लेनी चाहिए। आज जब हमारे सामने राष्‍ट्रसेवा के वर्षों पुराने उद्धरणों का वर्णन होता है तो एक क्षण के लिए लगने लगता है कि हमें अपने गौरवशाली इतिहास की जितनी जानकारी होनी चाहिए उतनी है नहीं। वर्तमान का सामूहिक जीवन पूर्वजों द्वारा स्‍थापित व्‍यावहारिक व सांकेतिक श्रेष्‍ठ जीवन मानकों के कारण संचालित है। इस युग की पीढ़ी को इसका आभारी तो होना ही चाहिए।
वीर चन्‍द्र सिंह गढ़वाली का जन्‍म सन् 1869 के पौष (जनवरी) माह में एक साधारण परिवार में हुआ था। उन्‍होंने अपने बारे में लिखा है कि उनके पूर्वजों का निवास संभल, मुरादाबाद था। वे चौहान थे। पूर्वज गढ़वाल की चांदपुरी गढ़ में आकर बस गए। हमारा परिवार चौदह पुश्‍तों से गढ़वाल में रह रहा है, लेकिन मुझे अपने से पहले छह पुश्‍तों का ही ज्ञान है। उनके पिता का नाम जाथली सिंह था। उनके दो भाई और एक बहन थी।
पेशावर काण्‍ड की वजह से उस वक्‍त उन्‍हें पूरे देश में मान-सम्‍मान प्राप्‍त हुआ। उस समय के कई बड़े नेताओं ने उन्‍हें यथासम्‍भव सहायता भी देनी चाहिए, लेकिन स्‍वतन्‍त्रता के बाद तो जैसे उन्‍हें उनके अभूतपूर्व योगदान की सजा मिली। उनको एकदम से विस्‍मृत कर दिया गया। मुकदमा फारिग होने के बाद उन्‍हें अपने गुजारा लायक पेंशन तक के लिए विकट संघर्ष करना पड़ा। बाद के दिनों में वे मार्क्‍सवादी कम्‍युनिस्‍ट पार्टी की तरफ से चुनाव भी लड़े। लोगों के लिए हमेशा कुछ करने की इच्‍छा रखनेवाले चन्‍द्र सिंह गढ़वाली अपने ही गढ़वाल में इतने उपेक्षित हो गए कि जीवन के आखिरी वर्ष उन्‍होंने गुमनामी में गुजारे। पारिवारिक दायित्‍वों का निर्वाह करते हुए उन्‍हें चूल्‍हा-चौका तक की छोटी-छोटी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
इतिहास के ऐसे वीर पुरुष के प्रति उसके अपने समाज के मूलनिवासी व देशवाले ही जब घोर उदासीन बन जाएंगे तो देश का अपनी भावी पीढ़ियों से अच्‍छे संस्‍कार की उम्‍मीद करना अपने आप ही बेमानी हो जाएगा। एक समय था जब अंग्रेज सरकार को हिला कर रख देनेवाले इस वीर के साथ जेल में अपनी ड्यूटी देने के लिए अंग्रेज सिपाही अपने से बड़े अफसरों के पास सिफारिशें लिख कर भेजते थे। वे चन्‍द्र सिंह के साथ पहरेदारी करने में गर्व महसूस करते। पेशावर के पठान-समुदाय को जब पता चला कि उनके प्राणों की रक्षा के लिए चन्‍द्र सिंह ने अंग्रेजों का उन पर गोली चलाने का हुक्‍म ठुकरा दिया तो उनकी दृष्टि में चन्‍द्र सिंह भगवान बन ग। वे जेल में उनके लिए तरह-तरह के पकवान ले जाया करते। एक तरह से वे उनके लिए पूजनीय बन गए थे।
ऐसे महान पुरुष के लिए कोई भी श्रद्धांजलि हमेशा कम ही रहेगी। उनका जन्‍म माह पौष ही उनके स्‍मरण का एकमात्र कारक नहीं बन सकता। उन्‍हें स्‍मृति में बसाना और उनके जीवन से प्रेरणा लेना युवाओं के लिए हमेशा अनिवार्य होना चाहिए।