Friday, November 7, 2014

प्‍लेइंग इट माई वे


प्‍लेइंग इट माई वे पुस्‍तक पर बवाल मचा हुआ है। सचिन तेंदुलकर ने इसमें अपने क्रिकेटीय जीवन की उन बातों का खुलासा किया है, जो आम क्रिकेट प्रेमी को पता नहीं थीं। इस शताब्‍दी के दूसरे दशक में विचरित देश-दुनिया के लिए क्रिकेट शायद अब वह नहीं रहा, जो दस-बीस साल पहले हुआ करता था। 
          पीछे 2007 में चलते हैं। दक्षिण अफ्रीका में विश्‍व कप क्रिकेट का अन्तिम मुकाबला भारत और आस्‍ट्रेलिया के बीच हुआ। आस्‍ट्रेलिया ने टॉस जीत पहले बल्‍लेबाजी की, तीन सौ से ज्‍यादा रन ठोक डाले। भारत लक्ष्‍य प्राप्‍त न कर सका और हार गया। भारतभर में मैच के दौरान पसरा सन्‍नाटा मैच खत्‍म होने के बाद तक बना रहा। दिनों, हफ्तों और महीनों तक क्रिकेट प्रेमियों का रक्‍तचाप बढ़ा रहा। तनाव, कुण्‍ठा, हताशा और निराशा में वे अपने सामान्‍य जीवन के कार्य भी ठीक से नहीं कर पाए। क्रिकेट के प्रति ऐसा लगाव और उसकी विश्‍व-प्रतियोगिता के अन्तिम मुकाबले में देश का हारना, शायद सन् 2007 तक देश का सबसे बड़ा दु:ख हुआ करता था। 
          सचिन ने क्रिकेट को बड़ा किया है। उनके रहते-रहते क्रिकेट मैच में लोगों की विशेष रुचि हुआ करती थी। वे इस खेल में अपने अप्रतिम योगदान के कारण अत्‍यन्‍त लोकप्रिय रहे और अब भी हैं। 2007 के विश्‍व कप के दौरान भारतीय क्रिकेट टीम के कोच ग्रेग चैपल ही थे। मुझ जैसा क्रिकेट का कीड़ा उन बातों काे तभी समझ-जान गया था, जिन्‍हें प्‍लेइंग इट माई वे के जरिए लोग अब जान रहे हैं। सचिन खेल के दौरान देश में, लोगों और पूंजीवादी व्‍यवस्‍था के परिचालक यानि कॉर्पोरेट घरानों के बीच में प्रिय हुआ करते थे और हैं, और इसी का फायदा उठाकर एफएमसीजी बिक्री बढ़ाने के लिए कम्‍पनियों ने उनका जमकर विज्ञापनी इस्‍तेमाल किया। कहने का मतलब है जब वे चारों ओर से अपने दम पर सबको हिलाने-डुलाने की स्थिति में थे, तो बीसीसीआई की क्‍या औकात थी कि वे सचिन की शिकायत पर ग्रेग चैपल के खिलाफ कोई अनुशासनात्‍मक कार्रवाई नहीं करता। तो फिर सचिन ने चैपल की तानाशाही का खुलासा तब क्‍यों नहीं किया? अगर वे इन बातों को समेट कर तभी पुस्‍तकाकार दे देते, तो उनके प्रति लोगों का सम्‍मान और बढ़ जाता। जब क्रिकेट के प्रति लोगों की दीवानगी चरम पर थी, जब देश का कालाधान आईपीएल के रूप में निवेशित नहीं हुआ था, तब अगर वे ये खुलासे करते तो शायद आज क्रिकेट के प्रति लोगों में स्‍वाभाविक दीवानगी बनी रहती। अब उनके खुलासे का कोई मतलब नहीं रहा। 
         भूखे को रोटी, बीमार को दवा, बेघर को छत ना भी मिले, तो कोई बात नहीं। शासन-प्रशासन लोगों की आधारभूत आवश्‍यकताओं की व्‍यवस्‍था नहीं करता तो भी ज्‍यादा दिक्‍कत नहीं। जनता का खून-पसीना चूसना, कराधान के नाम पर उनके आर्थिक हित हड़पने की ताबड़तोड़ गतिविधियों को चलाना, यह भी लोगों के लिए समस्‍या नहीं है। जीवन की जरूरतों के अभाव के लिए शायद ही कभी ऐसा सामूहिक शोक व दुख देखा गया होगा, जैसा क्रिकेट में हारने का होता हुआ आया है इस देश में। जो लोग क्रिकेट खेलते हैं, जिन्‍हें इसके खेल और खेल इतर नीति के समीकरण मालूम हैं और जो अपनी आर्थिक सम्‍पन्‍नता के बावजूद समय व्‍यतीत करने के लिए इस खेल में दिलचस्‍पी लेते हैं, उनका तो समझ आता है, पर रोटी-पानी के लिए धक्‍के खा रहे लोगों का इसके प्रति रुझान क्‍यों है, यह आज तक समझ नहीं आया। 
विकेश कुमार बडोला 

12 comments:

  1. शायद किसी खेल विशेष के प्रति रूचि बढवाने में मीडिया की भी अहम् भूमिका है न केवल उस खेल की प्रकृति में ..आप किसे कैसे प्रोजेक्ट करते हैं किस माध्यम से आम जनता के लिए यह उसी हिसाब से प्रभावी होता है .
    सचिन जिन्हें क्रिकेट के खेल का भगवन मन जाता है उनके द्वारा उस समय उनकी चुप्पी और अब खुलासा उनके एक ऐसे पक्ष को उजागर करती है जिसे उनके चाहने वाले देखना पसंद नहीं करेंगे.

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  2. उस युग के हर क्रिकेट प्रेमी की तरह मैं भी सचिन का बहुत बड़ा दीवाना था. जैसे जैसे साल गुजरते गए और सोचना अधिक हुआ, तब पाया कि सचिन को जिस तरह मीडिया ने पेश किया वो उसके हकदार नहीं थे. आप अपनी उंगली पर गिन लीजिये, कितने तमगे देश के लिए वो जीत कर लाये. हाँ खुद का करियर रिकॉर्ड पर जरूर केन्द्रित किया और अपने क्रिकेट कौशल का बहुत साथ उन्हें मिला. उसी किताब में उस १९४ नाबाद पारी की बात हुई है जिसमे राहुल द्रविड़ ने उन्हें बुला लिया था.गुस्सा उन्हें बहुत हुआ था. गुस्सा किस बात का..कि एक और दोहरा शतक उनके नाम नहीं हो सका. और यह लालसा उनकी तब थी जब उमके नाम रिकॉर्ड के अम्बार लगे थे.यह यही दिखता है कि उनके लिए अपने करियर में रिकॉर्ड की कितनी अहमियत थी.

    जैसा आपने जिक्र किया है, उनको उचित तो यही था कि देशहित में वो चैपल के खिलाफ तभी बगावत का बिगुल बजाते लेकिन उनमे वो साहस नहीं था. उनकी नेतृत्व क्षमता तो हम पहले भी देख चुके थे. वहीँ धोनी को देखिये...जब समय ने मौका प्रस्तुत किया, उसी क्षण उठे और और वो कर दिखाया जिसकी अपेक्षा सच्चे योद्धाओं से की जाती है. बांकी इतिहास है. हमें ऐसे नायक पसंद हैं. पोस्ट के माध्यम से एक सही चिंतन प्रस्तुत किया है आपने.

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  3. भीड़ से अलग आपके विचारों से मैं भी सहमत हूँ ।

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  4. खुलासे समय निकल जाने के बाद ही क्यों ? सच कहूँ तो ये भी एक खेल ही लगता है |

    विचारणीय पोस्ट है

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  5. उम्दा प्रस्तुति..अनछुए पहलुओं को छूआ आपने।

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ...

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  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ...

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  8. सचिन एक अछे खिलाड़ी हैं पर उनकी नेतृत्व क्षमता कमजोर है. बहुत सुन्दर आंकलन...

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  9. इस खेल को असल में ऐसा प्रोजेक्ट किया गया है ... क्रिकेट को भगवान् का दर्जा दे दिया गया है ... जिसका भरपूर दोहन मीडिया, कारोबारी, बी सी सी आई कर रही है ...
    देख के लिए कोई कोई ही खेलता होगा ... अपने अपने पैसों के लिए ही खेलते हैं सब क्रिकेटर ये बात चायद हर कोई जानता है देख में ... पर फिर भी ... समझ से परे ...

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  10. खेल और खेल इतर नीति के समीकरण मालूम हैं और जो अपनी आर्थिक सम्‍पन्‍नता के बावजूद समय व्‍यतीत करने के लिए इस खेल में दिलचस्‍पी लेते हैं, उनका तो समझ आता है, पर रोटी-पानी के लिए धक्‍के खा रहे लोगों का इसके प्रति रुझान क्‍यों है, यह आज तक समझ नहीं आया।
    .....विचारणीय प्रश्न
    मुझे तो समझ में यही आता है की क्रिकेट और सिनेमा से सबसे ज्यादा मुनाफा होता है जो गरीब मनोरंजन के नाम पर देता है ..
    आज आपका लेख नशनलदुनिया में पढ़कर बहुत अच्छा लगा ..बधाई..

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  11. Playing it my way is a best biography based on a best player of century Mr. Sachin Tendulkar ( The master blaster ) ,awesome !! I love to read this book.thanks for discussing it on your blog.

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