Friday, November 29, 2013

इन दिनों साहित्‍य में


क्षेत्र तो कोई ऐसा नहीं बचा जिसमें ध्‍यानाकर्षण हलचल नहीं हो रही है, लेकिन आजकल साहित्‍य के क्षेत्र में विचित्र घटनाएं हो रही हैं। समालोचक, कवि, साहित्‍यकार नामवर सिंह ने अभी कुछ दिन पहले एक पुस्‍तक का विमोचन किया। इस अवसर पर जिस व्‍यक्ति की पुस्‍तक का विमोचन बड़े जोर-शोर से किया गया है उसकी आपराधिक संलिप्‍तता पूर्व में चर्चा के केन्‍द्र में रह चुकी है। ऐसे में एक स्‍वाभाविक प्रश्‍न चारों ओर से, खास कर विद्वान लेखकों-साहित्‍यकारों के जगत से उभरता है कि क्‍या अब ऐसे व्‍यक्ति को साहित्‍य के मंच पर स्‍थापित किया जाएगा, जो हत्‍या के अपराध में सिद्धदोषी है।
प्रश्‍न का आशय यह नहीं है कि कोई हत्‍यारा, चोर-डकैत या गलत व्‍यक्ति समयान्‍तर में साहित्‍यकार नहीं हो सकता। प्रश्‍न के छुप हुए सन्‍दर्भों में यह बात भी हरगिज नहीं है कि इस तरह के व्‍यक्ति को कालान्‍तर में साहित्‍य के क्षेत्र में आने से रोका जाए। बल्कि प्रश्‍न के केन्‍द्र में निराशा का वह भाव है जिसमें कोई भी संवेदनशील यह महसूस करता है कि हमारे देश में आज भी कई ऐसे लेखक और साहित्‍यकार हैं, जिनके सृजन को प्रणाम करके उनका समुचित सम्‍मान किया जाना चाहिए था, लेकिन दुर्भाग्‍य से उनकी रचनाएं, उनका साहित्‍य पहले तो प्रकाशन के स्‍तर पर ही इतना अलोकप्रिय था कि उस तक जनसाधारण की पहुंच ही नहीं हो पायी और दूसरा उनके अग्रज साहित्‍यकारों ने उन पर अपने 'अहं' के चलते भरोसा ही नहीं किया। ऐसी स्थिति में उनका मनोबल कितने हिस्‍सों में टूटा होगा, इसकी कल्‍पना बेमानी है। अपने गहन अध्‍ययन, चिन्‍तन और उत्‍कृष्‍ट सृजन से साहित्‍य को सींचनेवाले कई श्रेष्‍ठ लेखक  हुए हैं। ऐसे साहित्‍यकारों की भी देश में कोई कमी नहीं है जिनके साहित्‍य-सृजन के मर्म को समझ कर अनेकों समाजोत्‍थान के कार्य सुनियोजित तरीके से किए जा सकते हैं, लेकिन ऐसी साहित्यिक धरोहरों की अनदेखी करके धनलाभ के लिए पनपनेवाली फूहड़ लेखन-चाल में अपने को शामिल करने की जो विवशता राष्‍ट्रीय साहित्‍य अकादमियों, उनके संचालकों ने अपनाई है उसने लेखन-साहित्‍य के प्रति आम लोगों में घोर निराशा उत्‍पन्‍न कर दी है।
आज जब समाज को सही दिशा देने के लिए तमाम राजनीतिक प्रयास असफल  हो चुके हैं और यह सब राजनीतिक भ्रष्‍टाचार, विसंगतियों के परिणामस्‍वरूप हो रहा हो तो ऐसे में राजनीति से पोषित समाज में भ्रष्‍ट से श्रेष्‍ठ की नई अवधारणा पनप रही है। मतलब पहले जम कर बदमाशी, अपराध करो और जब इन सबसे मन भर जाए तो समाज-सुधार के किसी घटक के रूप में स्‍थापित हो जाओ। किसी अपराधी का लेखक-साहित्‍यकार बनना इसी स्‍थापना की एक बानगी है। इस प्रक्रिया में कथित लेखक यदि अपने को भगत सिंह, चन्‍द्रशेखर आजाद समझता है तो ये उसकी बड़ी भूल है।
     क्‍या वाकई भारतीय साहित्‍य को ऐसे पथिक की जरूरत है, जिसकी बाह्य ही नहीं आन्‍तरिक दृष्टि भी भावशून्‍य हो। साहित्‍यशाला में इस तरह के राजनीतिक प्रयोग साहित्‍य को निश्चित रूप से पंगु कर देंगे और साहित्यिक यात्रा के आरम्‍भ से लेकर जिस श्रेष्‍ठ साहित्यिक मनोरथ के पूर्ण होने की अपेक्षा देशी-विदेशी साहित्‍य-जगत ने लगा रखी थी, ऐसे में वह अपूर्ण ही रहेगा।
     ज्ञान-विज्ञान, धर्म-अध्‍यात्‍म के सम्मेलन से जिस सामाजिक संचेतना की जरूरत मनुष्‍य जाति को हमेशा से है उसमें साहित्‍य का योगदान बहुत ज्‍यादा रहा है। ऐसे में साहित्‍य के क्षेत्र का प्रतिनिधित्‍व साहित्‍य के तपस्‍वी ही करें तो बेहतर होगा।

Sunday, November 24, 2013

सुस्‍त मौसम में बदलाव की आन्‍धी

जकल का समय बड़ी सुस्‍ती से कट रहा है। आधी रात के बाद जहां बैठा हूँ वहां से धुंधला चांद दिख रहा है। पूर्व दिशा में संतरी रंग का बुझा-बुझा चन्‍द्रमा अपने साथ एकमात्र टिमटिमाते तारे को लेकर खुश है। अपने प्रशंसकों के लिए इस वक्‍त जैसे वह अपनी असली चमक खो चुका है। तभी तो उसके साथ इस गुलाबी ठंड में केवल एक ही तारा मौजूद है। मैंने भी उसकी तरफ एक नजर देखा और दरवाजे, खिड़कियों के परदे गिरा कर बैठ गया। कहीं दूर किसी के विवाह समारोह में बज रहे गानों की धीमी आवाज सुनाई दे रही है। ज्‍यादातर लोग गुलाबी ठंड में अपने बिस्‍तरों पर सिमट चुके हैं। मैं भी घर, बिस्‍तर और अन्‍त में अपने अन्‍दर तक सिमट गया हूँ। कुछ ऐसा नहीं सोच पा रहा हूँ, जिससे आत्‍ममुक्‍तता का अनुभव हो। बस अपनी स्‍मृतियों को पलटने पर लगा हुआ हूँ। इनमें से क्‍या-क्‍या निकल रहा है और क्‍या-क्‍या भूला-बीता हो रहा है, इसकी भरमार है।
सन्‍तरी रंग का अर्द्धचन्‍द्र
संसार में, भारत में आज से लेकर पिछले कुछ दिनों तक जो कुछ घटित हुआ उसकी स्‍मृतियां मेरे दिमाग से हटने लगी हैं। कल नहाने की शुरुआत करते ही कुछ प्रभावशाली विचार स्‍मृति में आए थे, लेकिन स्‍नानघर से बाहर आते-आते और सम्‍पूर्ण दिनचर्या से निपटते-निपटते तक प्रभावशाली विचार विस्‍मृत हो गए। आधे घंटे तक यूं ही बिना कुछ सोचे बैठा रहा। जब ये अहसास हुआ कि नहीं ऐसे कैसे मूढ़ मस्तिष्‍क के साथ समय गुजार रहा हूं तो तुरन्‍त विचारमग्‍न हो गया, पर ये भी लगा कि विचार करुं तो किस विषय पर! आज सब कुछ, सभी विषय आपस में इतने गड्डमड्ड हो चुके हैं कि उनमें से एक को छांट कर उस पर बात करने के सच्‍चे आधार ढूंढने बैठो तो असफलता ही हाथ लगती है।
जीवन सम्‍बन्‍धी विषयों के आपस में गड्डमड्ड होने का मतलब बहुत गहरा, गोपनीय है। देशी-विदेशी शासन के गठजोड़ से समाज का जो नया रूप तैयार हो रहा है उसे कोई भी सच्‍चा गृहस्‍थ, संत या आम व्‍यक्ति मन से स्‍वीकार करने की स्थिति में बिलकुल नहीं है। बेशक समाज का यह नया रूप आम जीवन के व्‍यवहार में मौजूद है या कह सकते हैं कि इसे जबरन आम जीवन पर थोपा गया है, लेकिन अन्‍दर-ही-अन्‍दर आम जीवन की आत्‍मा इस नए रूप से बचने के लिए छटपटा रही है। जनसाधारण के जीवन की रचनात्‍मकता, स्‍वाभाविकता बाहर आने के लिए कुलबुला रही है। जब किसी स्‍थूल या निर्जीव वस्‍तु को भी प्रकृति के विरुद्ध बांध कर नहीं रखा जा सकता तो मनुष्‍य तो भावनाओं का ज्‍वालामुखी है। आखिर उसे कब तक उस राह पर चलने को विवश किया जा सकता है, जिसकी मंजिल का पता ही नहीं। झूठ, फरेब और धोखे से जनमानस को कुछ समय तक बहकाया जा सकता है और अब यह कुछ-समय की अवधि खत्‍म हो गई है। इसलिए भारतीय जनमानस के अन्‍दर भभकते बदलाव के ज्‍वालामुखी से देश-दुनिया के शासक बुरी तरह डरे हुए हैं।    
इन लोगों को इस बार ज्‍यादा डर इसलिए लग रहा है क्‍योंकि बदलाव की आंधी दुनिया को सभ्‍यता सिखानेवाले भारत में बह रही है। अगर भारत में बह रही यह आंधी पुराने राजनैतिक, शासकीय कचड़े को बहा ले जाती है तो निश्चित ही एक नए समाज का सूत्रपात होगा। संसार के शासकों की कुटिलता को हमेशा से  छुपा कर रखनेवाले और अपने को छदम विद्वता के वेश में प्रस्‍तुत करनेवालों के लिए ये बड़े संकट की घड़ी है। उन्‍हें समझ नहीं आ रहा कि वे करें तो क्‍या करें। जिनके बूते उनकी पत्रकारिता (मैं इसे पत्रफाड़िता कहूंगा) चल रही है वे तो अब किनारे बैठने वाले हैं और जिनके विरुद्ध इन्‍होंने झूठी बातों, वक्‍तव्‍यों, वाद-विवाद को हवा देने में कोई कोर-कसर बाकी न रखी वे सिंहासन पर बैठने वाले हैं। इन्‍हें यह अहसास भी है कि आगामी शासक इनकी धूर्तता को पहचानता है। वह इन्‍हें किसी भी कीमत पर अपने साथ नहीं जोड़ेगा। अब तो लोगों ने भी इन पर भरोसा करना छोड़ दिया है। तब इनके पास अपने छदम रूप के साथ आत्‍महत्‍या करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है। इसलिए ये बदलाव की आंधी को रोकने के लिए कुण्ठित शासक के हर आदेश का पालन कर रहे हैं, ताकि इनको पालनेवाला यह तंत्र सुरक्षित रह सके।

Sunday, November 17, 2013

समय-समय के पूर्वाग्रह


पूर्वाग्रहों का क्‍या अर्थ है? यही कि अगर बिल्‍ली वो भी काली बिल्‍ली रास्‍ता काट दे तो अपशकुन तय है। काला कौवा घर के आंगन में कांय-कांय करे तो बुरी खबर मिलने के आसार हैं। इनके अलावा भी कितनी ही बातें पूर्वाग्रह के अन्‍दर आती होंगी। मेरे अबोध दिमाग में जब ये बातें पड़ी होंगी तो निश्चित रुप से मैं इन्‍हें नकार नहीं सकता था क्‍योंकि इनके बारे में मुझे मेरे बड़ों द्वारा बताया गया था। आज जब दीन-दुनिया को खुद समझ सकता हूँ तो अबोध स्‍मृति में कैद हुए पूर्वाग्रहजनित अनुभव मुझे अब भी कहीं न कहीं किसी न किसी बात पर या घटना होने पर विचलित करते हैं। मैं ही क्‍यों जीवन परिवेश के तमाम लोगों को मैंने ऐसे पूर्वाग्रहों से ग्रसित पाया। यह ठीक है या गलत इस बात की पड़ताल तो वही कर सकता है जिसके पास ऐसा कोई अहसास ही न हो। इनके बारे में जाननेवाला, सोचनेवाला तो इनसे छुटकारा पाने को भी छटपटाता है और किसी न किसी स्‍तर पर इनसे प्रभावित भी रहता है। 
कल रात घर की सीढ़ियों पर चढ़नेवाला ही था कि एक काली बिल्‍ली ने रास्‍ता काट दिया। इसे सामान्‍य घटना समझ कर भूलने के बजाय मैं इसकी आशंकाओं से घिर गया। पहला खयाल तो यही आया कि घर में सब ठीकठाक होगा या नहीं! तुरन्‍त अपने विचार को पलटा। काली बिल्‍ली, इसका रास्‍ता काटने की बात से ध्‍यान हट गया। याद आया कि मैं भारत के राज्‍य उत्‍तर प्रदेश में रहता हूँ। राज्‍य सरकार की कार्यप्रणाली प्रबुद्ध व्‍यक्तियों की दृष्टि में नकारा ही है। जिस हिसाब से पिछले दो-तीन साल से राज्‍य चल रहा है उस स्थिति में तो लाखों-करोड़ों काली बिल्लियों को लोगों का रास्‍ता प्रतिपल काटना चाहिए। इस प्रकार से तो यहां के कौओं के साथ-साथ प्रवासी कौओं को विशाल संख्‍या में आकर हमेशा के लिए यहीं हिन्‍दुस्‍तान में बसना होगा।
बात पूर्वाग्रह की है। बचपन में मेरे मस्तिष्‍क को जिन उपर्युक्‍त पूर्वाग्रहों से भरा गया था, एक प्रकार से ये मुझे या मेरे जैसों को किसी भावी अनहोनी के प्रति सचेत करते हैं। इनसे व्‍यक्ति विशेष दुर्घटनाओं की आशंका से भर जाता है। बेशक किन्‍हीं परिस्थितियों में ये आशंकाएं सच साबित हो जाया करती हैं, किन्‍तु इसका अर्थ यह नहीं कि इस प्रकार के पूर्वाग्रहों पर वाद-विवाद या विचार-विमर्श होता है। ऐसा भी नहीं कि इस विषय के विवाद व वितर्क मनुष्‍यों के बीच लड़ाई का कारण बनें।
इन पूर्वाग्रहों के सम्‍बन्‍ध में कई घटनाएं मेरे सामने घट चुकी हैं, जिनसे यही सिद्ध हुआ कि लोग, वो भी खास गाड़ी-घोड़ावाले इनके प्रभाव में मजबूती से जकड़े हुए हैं। यातायात नियमों का उल्‍लंघन करते हुए कान फोड़ सकनेवाले और दिल का दौरा ला सकनेवाले तीखे हॉर्नों पर न सरकार का और ना ही वाहन चलानेवालों का नियन्‍त्रण है। जरुरी काम से जा रहे हैं या बिना काम के गति के मामले में भी वाहन चालक कोई समझौता नहीं करते हैं।
एक बार कहीं जा रहा था। देखा पीछे से जोर से हॉर्न बजाता तीव्र गति से चलता चौपहिया आ रहा था। अपने को इससे बचाऊं, इसे आगे जाने दूं ये सोचकर मैं एक किनारे खड़ा हो गया। अचानक मेरे पैरों से होते हुए बिल्‍ली सड़क के दूसरी तरफ चली गई। वाहन चालक ने तीव्रगति में चलती गाड़ी को रोका और इंतजार करने लगा कि पहले मैं सड़क पार करुं। मतलब अब उसे कोई जल्‍दी नहीं थी। जब मैं भी अपनी जगह से नहीं हिला और हम दोनों के अलावा फौरन किसी तीसरे के आने की संभावना भी उस मार्ग पर नहीं रही तो वाहनचालक बिल्‍ली द्वारा काटे गए मार्ग से आगे नहीं बढ़ा। उसने गाड़ी को पीछे मोड़ा और उसी दिशा में चल दिया जहां से वह आ रहा था।
कहने का तात्‍पर्य ये कि मनुष्‍य पूर्वाग्रहों से इतना जकड़ा हुआ है कि वह इन्‍हें साथी मनुष्‍यों की जरूरतों, कष्‍टों, चिन्‍ताओं से ज्‍यादा सम्‍मान देता है। यातायात नियम भले ही उस व्‍यक्ति के नजर में कुछ नहीं थे, लेकिन बिल्‍ली द्वारा उसका रास्‍ता काटना और उसका उस रास्‍ते को पार न करना कितनी नियमबद्ध बात हो गई! बिल्‍ली के उसका रास्‍ता काटने से पहले वह यातायात के नियमों की धज्जियां उड़ाता हुआ, पैदल यात्रियों की जान को जोखिम में डालता हुआ, कानफोड़ू हॉर्न बजाता हुआ दनदनाता हुआ ऐसे भागा जा रहा था मानो अपने गंतव्‍य पर फौरन न पहुंचा तो दुनिया का कोई सामूहिक हित नहीं सधेगा।
लेकिन आज के सन्‍दर्भ में यदि इन पूर्वाग्रहों का अध्‍ययन हो तो एक गोपनीय और रहस्‍यमय जानकारी मिलती है। आज देश-विदेश के सूत्रधार पुरातन पूर्वाग्रहों के स्‍थान पर राजनीति, शासननीति के लालच में मनगढ़ंत पूर्वाग्रहों का सृजन करने पर लगे हुए हैं। पुराने पूर्वाग्रह अगर मानव-समाज की भलाई को केन्‍द्र में रखकर बनाए गए थे तो इस युग में आज पूर्वाग्रहों को सत्‍ता प्राप्ति के लिए नए कलेवर में ढाल दिया गया है। नए बच्‍चों की समझ में धर्मनिरपेक्षता, अल्‍पसंख्‍यक, आरक्षण इत्‍यादि के नाम पर आज जो पूर्वाग्रह डाले जा रहे हैं क्‍या उनके पीछे मानव और समाज कल्‍याण की कोई भावना परिलक्षित होती है? यदि नहीं तो क्‍यों इन्‍हें इस समयकाल के शिशुओं, उनकी अबोध स्‍मृति में जमाया जा रहा है? ये बच्‍चे जब बड़े होंगे और इन्‍हें इन पूर्वाग्रहों की सच्‍चाई ज्ञात होगी तो क्‍या ये चुप बैठ सकेंगे? क्‍या ये हमारी तरह अपने विवेक से अपने शिशुकाल के पूर्वाग्रहों का सही-गलत आकलन कर पाएंगे?
हमारे बचपन के पूर्वाग्रह बड़े होने पर विमर्श, विचार का आधार बन सके क्‍योंकि इनमें जो वैज्ञानिक-धार्मिक गुत्‍थी उलझी हुई थी, वह सार्थक समाजानुकूल थी। हमने उन्‍हें उनकी आवश्‍यकता-अनावश्‍यकता के अनुरुप स्‍वीकार-अस्‍वीकार किया है। लेकिन आज के समय के पूर्वाग्रह और इनको सीखनेवाले शिशु क्‍या भविष्‍य में इनसे कोई उपयुक्‍त सामंजस्‍य बिठा पाएंगे, ये सोचकर विनाश का आभास ही होता है।


Saturday, November 9, 2013

प्रलय की परिभाषा


न 2012 में प्रलय की भविष्‍यवाणी करनेवाले ने ये न सोचा होगा कि उसके प्रलय का तात्‍पर्य लोग धरती के सम्‍पूर्ण विनाश से लगाएंगे। वैसे भी अगर कहीं से या किसी से लोग जो कुछ भी सुनते हैं या सीखते हैं, वे उसमें अपने अनुसार अपना मनोविज्ञान जरुर लगाते हैं। एक तरह से वे निश्चित घटनाओं या बातों को अपनी कपोल कल्‍पनाओं से अपने अनुकूल साधने की कोशिश करते हैं। प्रलय के रुप में आए दिन होनेवाली घटनाओं-दुर्घटनाओं को वे प्रलय नहीं मानेंगे। उनकी नजर में प्रलय तब सार्थक होगी जब इसके बाद इसका मंथन करने के लिए कोई मानवजीवन ही कहीं अस्तित्‍व में नहीं होगा। उन्‍हें केदारनाथ मन्दिर की घटना कहीं से, किसी दृष्टिकोण से प्रलय जैसी नहीं लगी। वे वर्ष-दर-वर्ष मौसम के दुष्‍प्रभावों से होनेवाले खतरनाक परिवर्तनों को कुछ दिन मौसम ठीक रहने के कारण शीघ्र ही भूल जाते हैं। दुनियाभर में लगभग शान्‍त महीनों में भी आनेवाले तूफान, आन्‍धी, चक्रवात, अतिवृष्टि की घटनाएं इतनी जल्‍दी सामूहिक विस्‍मृतियों में कैद हो जाती हैं कि लगता है कुछ हुआ ही नहीं।
सुनता था कि सन्‍त जनता के विवेक को जगाने का काम करते हैं। वे जीवन की क्षणभन्‍गुरता का प्रवचन कर लोगों को पारिवारिक, सामाजिक दायित्‍व अच्‍छे से निभाने के लिए प्रेरित करते हैं। भौतिक जद्दोजहद में गहरे उतरे, दिनचर्या के लिए विवश लोगों को आत्‍मविश्‍वास की खुराक देकर उन्‍हें संकल्‍पशील, धर्मभीरु और सज्‍जन बनाते हैं लेकिन आज अधिकांश सन्‍त खुद उस स्थिति के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं, जिसमें एक जनसाधारण बुरी तरह संलिप्‍त है। क्‍या ये बातें, ऐसी घटनाएं प्रलय के उदाहरण नहीं हैं? क्‍या प्रलय की ये परिस्थितियां जनमानस में तब स्‍थायी रुप से अंकित हो सकेंगी जब इनका भी आडम्‍बरपूर्ण विज्ञापन दिया जाएगा या इनका पूंजीगत प्रचार किया जाएगा? क्‍या इतना उलट-पुलट होने के बाद भी हम में संचेतना नहीं जागेगी कि अब हमें अन्‍धदौड़ बन्‍द कर देनी चाहिए? अब हमें वापस अपने ग्राम्‍य जीवन की ओर मुड़ जाना चाहिए। एक पीढ़ी को थोड़ा ज्‍यादा त्‍याग करना पड़ेगा। कुछ अधिक श्रम करना होगा। इससे निश्चित रुप से आगे की पीढ़ियों का जीवन सुधर जाएगा। क्‍या हममें इतना साहस और संकल्‍प है कि हम विवशता में अपनाई गई आज की जिन्‍दगी को बदल सकें? 
     आज यहां-वहां जहां देखो देशी-विदेशी सैनिक और सुरक्षाकर्मी अपने हाथों में अपनी ऊंचाई से बड़े हथियार लिए जैसे आक्रमण करने के लिए तत्‍पर हैं। आतन्‍क, अवसाद से दिग्‍भ्रमित समाज कितना असुरक्षित और असहाय बना बैठा है! हड्डियों पर खड़ा मांस का लोथड़ा है ही क्‍या लेकिन इसे मारने के लिए, इस पर आक्रमण करके इसे खत्‍म करने के लिए दुनियाभर की प्रयोगशालाओं में एक-से-एक रासायनिक सूत्र, हथियार तैयार हो रहे हैं। मानव जीवन के लिए जो जरुरी सामग्री आसानी से उपलब्‍ध हो सकती है वह शासकों के परस्‍पर अहम टकराव से दुर्लभ हो गई है। मिलावटी भोजन, रोगों, असुविधाओं से त्रस्‍त मनुष्‍य का जीवन आज एक अबूझ पहेली बन गया है, जिसका हल होते हुए भी उसका हल नहीं किया जा रहा है। इस काल-समय में रहते हुए प्रलय शब्‍द को हम क्‍या किसी और रुप में प्रस्‍तुत कर सकते हैं? अगर नहीं तो अब यह मान लिया जाना चाहिए कि संसार का यह समय प्रलयंकारी समय है। 
प्रलय के इतने जटिल और प्रत्‍यक्ष रुप देख कर भी जनसाधारण 2012 में प्रलय की भविष्‍यवाणी करनेवाले को बेवकूफ समझता है। प्राकृतिक आपदाओं, विपदाओं में असमय मर चुके लोगों की आत्‍माओं से अगर संवाद किया जाए तो वे हमें चीख-चीख कर बताएंगी कि हां प्रलय की भविष्‍यवाणी करनेवाला सही है। जीवित संवेदनशील लोगों को भी यही लगता है, पर ऐसे लोग कम ही हैं। ज्‍यादातर व्‍यक्ति स्‍वार्थ की गुत्‍थी में इतने उलझ चुके हैं कि वे जीते जी श्‍मशान स्‍थल को भी स्‍वप्‍न ही समझते हैं। जिन लोगों का अपने जीवनकाल में जन्‍म-मृत्‍यु के दार्शनिक विचार से कभी पाला नहीं पड़ा, जो मनुष्‍य जिन्‍दगी की इन दो सबसे बड़ी घटनाओं को भी सामान्‍य घटनाओं की तरह ही मानते रहे, उनके सामने अगर उन जैसे हजारों व्‍यक्ति प्राकृतिक आपदा में मर जाते हैं या उनकी धार्मिक मान्‍यताओं के गुरु अगर बुरे कर्मों में संलिप्‍त पाए जाते हैं तो भी वे इन घटनाओं को नितान्‍त सामान्‍य घटनाएं समझ कर भूल जाते हैं। ऐसे लोगों के लिए प्रलय के मायने उनके अपने अनुसार होते हैं। यदि उनके करीबी या वे खुद मरते हैं तो प्रलय हो गई नहीं तो कुछ भी नहीं है, सब ठीक है।
     डर, आतन्‍क और विनाश के तले चल रही दुनिया और इसके लिए दोषी व्‍यक्तियों के लिए मन से निकली कुछ पंक्तियां--

तेरी क्‍या पहचान है?
आतन्‍की जरा कुछ पल रुक
जगा विवेक अब न बहक
ध्‍यान से सुन इंसानियत चुन
नश्‍वर को मारना कहां है बड़ी बात
करवा तो जानें अमर मानव जात
हो भी जाए कभी आतंकी राज तो क्‍या
होके राजा तू भी जीता कहां रहेगा सदा
ये हथियारों की होड़
वर्ग-धर्म का जोड़तोड़
क्‍या कोई मायने रखता है
जब तू मारता या मरता है
क्‍या इससे कभी बाद का शून्‍य भरता है
हथियारों के सौदागर
अपने रोजगार से तुझे बर्बाद करते
अपना आबाद करके तेरा घर फूंकते
कसम ले अपनी प्रिय पसंद की
खूनी खेल बन्‍द करने की
किसी रोज उठ उगता सूरज देख
पिछला भूलकर कुछ नया रेख
सोच जीवन कितना मूल्‍यवान है
ढूंढ इसमें तेरी क्‍या पहचान है?

Friday, November 1, 2013

प्रकृति के साथ


श्चिमी छोर की खिड़की से अचानक बाहर देखा। मन्‍द हवा चल रही थी। दुनियाभर की घटनाओं को सोच-सोच कर तपा हुआ दिमाग और शरीर नहाने के बाद थोड़ी ठण्‍डक तो महसूस करते हैं लेकिन ज्‍यादातर भारीपन ही लिए हुए होते हैं, पर बाहर से आती हवा ने जैसे दिमाग और पूरे शरीर के ताप को अमृत शीतलता प्रदान कर दी। सूरज के जलाभिषेक के लिए पानी से भरा लोटा एक किनारे रख दिया और योग की मुद्रा में बैठकर बाहर चलती हवा को बारी-बारी दोनों नथुनों से अन्‍दर खींचने लगा। इसके बाद आंखें बन्‍द कर बहुत देर तक चुपचाप बैठा रहा। बाहर मन्‍द‍ लहराते पेड़ों की हरियाली और आसमानी आकर्षण को बीच-बीच में आंखें खोलकर देखता रहा। धरती पर होते हुए भी परालौकिक गमन का ऐसा अनुभव मुझे अपनी नजरों में ऊंचा उठा गया। बन्‍द आंखों में सतत् शान्ति की प्रतीति और आंखें खोलकर सम्‍मुख विहंसती प्रकृति….आह, इससे बेहतर जिन्‍दगी और क्‍या हो सकती थी मेरे लिए!
कई बार और अनेक अवसरों पर अपनी ही दृष्टि में बोझिल लगनेवाला अपना जीवन आज की इस मधुधार में कितना स्‍वच्‍छन्‍द लगने लगा था। एकदम से अनुभव हुआ कि मेरे साथ पहले भी ऐसे ही कुछ पल घटित हो चुके हैं। लगा कि आज का यह नया संजीवन स्‍पर्श अपने पूर्व के अभ्‍यास को दोहरा रहा है। दिल-दिमाग को सोच-विचार से एकदम खाली रखकर तनावमुक्‍त करने के लिए ऐसी विशिष्‍ट परिस्थिति का अभ्‍यास बहुत फलदायी है। कुछ देर के लिए मुझे ऐसे लगा जैसे मैं कहीं हूँ ही नहीं। जैसे मैं स्‍वयं को हवा के स्‍पन्‍दन से पुलकित हुआ शीतलता का भान ही समझता रहा। 




अपने विवेक से और खुली आंखों के सहारे जिस भौतिक दुनिया को मैं देखता हूँ उसमें आम आदमी बुरी तरह त्रस्‍त है। खास लोग भी अनावश्‍यक व्‍यस्‍तता के कारण जीवन का वैसा सुख-चैन कहां प्राप्‍त कर पा रहे हैं, जिसका अनुभव मुझे आज योगमुद्रा में बैठकर प्रकृति को देखकर हुआ। सामग्री केन्द्रित हो चुके मनुष्‍यलोक में भागमभाग और लालची गुणा-भाग ही तो दिखाई देता है। संतोष इस बात का है कि ऐसे विनाशी समय में मेरा मनलोक संवेदना को मजबूती से पकड़े हुए है। शायद इसी का यह असर होगा कि मैं जब-तब मौसम के प्रभाव में आत्मिक हो जाया करता हूँ। सच कहता हूँ ये स्थिति बड़ी मूल्‍यवान होती है। आखिर हम सब जीवन में मूल्‍यवान होने के लिए ही तो हाथ-पैर मार रहे हैं। जीवन का सर्वोच्‍च सुख पाने के लिए ही तो अपना मूल्‍य बढ़ाने का प्रयास निरन्‍तर कर रहे हैं। फिर इसके लिए हम क्‍यों नहीं रोज थोड़े समय के लिए प्रकृति के साथ रहें। प्रकृतिस्‍थ रहकर अपना एकांत अवलोकन करें। देखें कि हमें इसमें कितनी शान्ति मिलती है! शान्ति की जिज्ञासा कितनी फलेगी इसकी चिन्‍ता छोड़कर जीवन की सुखद गति के लिए प्रतिदिन कुछ समय आंखें बन्‍द कर शान्‍त व स्थि‍र बैठें। आंखें बन्‍द कर आत्‍मावलोकन हो और थोड़े-थोड़े अन्‍तराल में प्रकृति को निहारने के लिए आंखें खोलते रहें। यह क्रम तोड़े बगैर जीवन चलेगा तो व्‍यक्तित्‍व अभिसार के दर्शन होंगे। तब जीवन में सुख, शान्ति व समृद्धि बढ़ने लगेगी। मैं चाहता हूँ कि कई जटिल समस्‍याओं से जकड़ी हुई दुनिया के डरे सहमे लोग इस नई लगन से अपना जीवनमार्ग आलोकित करें।
महत्‍वपूर्ण जीवन पर कई परतों में चढ़े हुए बेकार आवरण हटाकर इसके अन्‍दर देखने की बुद्धि हमें क्‍या कभी आ पाएगी? क्‍या हम प्रकृत अनुभूतियों की शान्‍त जीवन झन्‍कार सुनने योग्‍य बन सकेंगे? जितनी जल्‍दी हो सके सभी लोगों को इन प्रश्‍नों के उत्‍तर हां में दे देने चाहिए।