Friday, June 28, 2013

मेरा प्रियमित्र बेलवृक्ष



(३० मई, २०१३ का संस्‍मरण)
पिछले सोलह दिनों से लगातार कार्यालय जा रहा था। साथी छु‍टिट्यों में अपने गांव गया हुआ था इसलिए मुझे अपने दो साप्‍ताहिक अवकाशों पर भी कार्यालय जाना पड़ा। इतने दिनों तक अपने निवास के आसपास की प्रकृति, खासकर दोपहरी परिवेश से मिलने, उससे वार्ता करने का मौका नहीं मिल पाया। आज 30 मई, 2013 बृहस्‍पतिवार के दिन मैं अपने तृतीय तल के कमरे से दोपहर बारह बजे से सायं पांच बजे के क्षणों को इकट्ठा कर लिख रहा हूँ। भारतीय भूखण्‍ड की पर्वतमालाओं में विगत एक-दो दिन में जितनी भी वर्षा हुई, उसके प्रताप से यह शहर भी चमक उठा है। बेशक गर्मी है, लोग घरों में कैद हैं लेकिन मैं तो जैसे अपने घर के सामने खड़े बेलवृक्ष की बांहों में पड़ा हुआ हूँ। कमरे की खिड़की से पांच हाथ की दूरी पर धीमे-धीमे हिलता, हरियाली से पूर्ण बेलवृक्ष इन दिनों मेरा सबसे अच्‍छा मित्र बना हुआ है। मैं इसी के साथ अपने मन की बात करता हूँ। सुबह उठ कर अपनी हथेलियों को देखने के बाद इसी के दर्शन, दोनों हाथ जोड़ कर इसे प्रणाम करता हूँ। इसमें शिवत्‍व ढूंढता हुआ स्‍वयं को शक्तिशाली बनाने की कामना करता हूँ। बेल की भूरी ट‍हनियां, इन पर खिले घने हरे पत्‍ते, पत्‍तों के झुरमुट में अंकुरित छोटे-छोटे दाने देख कर मन में उत्‍पन्‍न नए भाव-विचार मेरे अस्तित्‍व का ननिर्माण करते हैं। मैं बेलवृक्ष की ओर जितना एकाग्र होता हूँ यह उतनी ही तेजी से झूमने लगता है। …….सर सर सर सरासर सरसराहट जैसी ध्‍वनियां मेरे कानों में प्रवेश करती हैं तो लगता है कि जीवन में जो कुछ, जैसा सुनना चाहता हूँ वही सुन रहा हूँ। तेज हवा से हिलता पूरा बेलवृक्ष जैसे मेरा आलिंगन पाने को व्‍यग्र हो उठता है।
अभी कुछ दिन पहले की बात है। वृक्ष के बीच से गुजरनेवाली बिजली, केबल, टेलीफोन की तारों के खराब होने के कारण किसी ने उद्यान विभाग में इसकी शिकायत कर दी। विभाग का कर्मचारी बेल के पेड़ की उन शाखाओं को काट कर अलग कर गया जिनमें तारें फंस रही थीं। उसके ऐसा करने से पहले मैंने उसे मना किया। उसे पेड़ के एक भी पत्‍ते को हाथ लगाने से रोका। उस निर्दयी ने अपने साहब की ओर उंगली से इशारा किया और पेड़ के पत्‍तों, तनों, शाखाओं पर भारी दराती से निर्मम प्रहार करने लगा। लगा जैसे यह मेरे शरीर को ही काट रहा है। खाना छोड़ इस सारे उपक्रम में शामिल देख पत्‍नी ने मुझे डांट पिला दी। पेड़ काट रहा आदमी और कटते हुए पेड़ को देखने एकत्रित लोग मुझे जल्‍लाद नजर आने लगे। उन्‍होंने मेरी मन:स्थिति का तनिक भी सम्‍मान नहीं किया। मैं अपने मित्र बेलवृक्ष के लिए कुछ कर पाता, इससे पहले ही इसकी उत्‍तर दिशा की पांच-छह बड़ी शाखाएं कट कर सड़क पर बिछ चुकी थीं। उनमें लगे हुए पवित्र, पके बेलों का भी तिरस्‍कार हुआ। वे पच्‍चीस-तीस फुट की ऊंचाई से गिर कर फट के बिखर गए। मनुष्‍य के हाथों मनुष्‍य के लिए अमृत समान पदार्थ की ऐसी दुर्गति देख कर मन रो पड़ा, मुंह सूख गया। यह सोच कर खुद को तसल्‍ली दी कि जिनका पेड़ है वही तो इसको कटवा रहे हैं। मेरे स्‍वामित्‍व में यह है नहीं, मैं किस आधार पर इसको कटने से बचाऊं।
आज वह दिन याद करता हूँ तो डर जाता हूँ। सोचता हूँ काश इस पेड़ को कोई छेड़ता भी नहीं तो कितना अच्‍छा होता! आज इसके हरे पत्‍तों की झुरमुटों से स्‍वच्‍छ नीले आसमान को देखने पर जीवन नई शक्ति, ऊर्जा, तरुणाई से आच्‍छादित हो जाता हैबेलवृक्ष के अनुभव से प्रभावित जेठ की चटक, पीली धूप भी सहज, सुखद व जीवंत लगने लगती है। पड़ोस के बन्‍द घर के दरवाजे पर ऊपर की ओर टंगी आम के सूखे पत्‍तों की माला बेलवृक्ष की हवा से नई, ताजा प्रतीत होती है। यह समय मुझे फाल्गुन का अनुभव करा रहा है। धन्‍य है यह बेलवृक्ष, प्रजाति जिसने मुझे जीवन का एक नवीन अनुसार, विपुल विचार दिया। यहां-वहां, सड़क, घरों पर फैली इसकी झूमती परछाइयां केवल परछाइयां ही नहीं हैं। ये वृक्ष का आर्शीवाद, प्रसाद हैंजहां ये फैल रही हैं वो स्‍थान कितना पवित्र बन जाता! जिको ये प्राप्‍त हो रही हैं, वे प्राणी बहुत बड़े धन्‍यभागी बन रहे हैं। तितलियां, मधुमक्खियां, चिड़ियों के झुण्‍ड इस पर मंडराने के लिए जैसे आरक्षण प‍द्वति से होकर आते हैं। क्‍योंकि किसी दिन तो मैं इस पर कीट-पतंगों, पक्षियों की बहुत भीड़ देखता हूँ और कभी इसे बिलकुल पक्षी, पखेरु विहीन। एक दिन इस पर श्‍वेत तितलियों का बसेरा होता है तो दूसरी सुबह छोटी काली मधुमक्खियां इसके चारों ओर घूमती नजर आती हैं।
बहुत इच्‍छा होती है कि रोज ही बेल का जूस पियूं, मुरब्‍बा खाऊं। पत्‍नी को कहता हूँ कि कोई बेल बेचनेवाला आए तो दस-बारह किलो एक साथ ले कर रख दो। पत्‍नी कहती है, जब से हमने इकट्ठे इतने बेल खरीदने का विचार बनाया है तब से कोई बेलवाला नजर ही नहीं आया। मण्‍डी में बेल के दाम सुन कर कान झड़ जाते हैं। सौ-सवा सौ रुपए किलो के बेल कौन खरीदेगा। बस इसी तरह समय गुजर जाएगा और मन-शरीर बिना बेल का जूस, मुरब्‍बा के ऐसे ही मायूस पड़े रहेंगे। पत्‍नी से बच कर सोचता हूँ कि मुझे नजर तो आए कार्यालय आते-जाते समय कहीं कोई बेलवाला, हजार रुपए किलो ही क्‍यों न बेच रहा हो तब भी ले लूंगा। पर बात वही है ना कि पहले नजर तो आए कोई कहीं।

Wednesday, June 26, 2013

मृतकों की बेकद्री



दस जून से देहरादून, कोटद्वार होते हुए सतपुली एकेश्‍वर पौड़ी गढ़वाल अपने गांव गया हुआ था। इस बीच 16 17 18 जून को जो हुआ उस पर और गढ़वाल के हालातों पर शायद मेरे पास फुर्सत में लिखने के लिए अभी कुछ नहीं है। अभी हतप्रभता हावी है। तब तक अपने मन का हाल नीचे के शब्दों के अनुसार प्रस्‍तुत है:  
स्‍तु विनिमय के माध्‍यम मुद्रा यानी रुपए को जब साधन के बजाय साध्‍य मान लिया गया हो, जीवन की क्षुद्र सच्‍चाइयों व पीड़ांतक अनुभवों से नहीं गुजरे सत्‍ताधारकों को सुख-सुविधाओं वाले अपने सिद्धांत सब से उचित लगते हों तो ऐसी जीवन परिस्थितियों में केदारनाथ मन्दिर के प्राकृतिक ध्‍वस्‍तीकरण को संवेदनशील मनुष्‍य अप्रत्‍याशित नहीं मान सकता।
हजारों लोगों, अनेक भवन व घर, होटल व सराय जब पांच मीटर वृत्‍ताकार की वर्षा जलधार की चपेट में आए होंगे, जब इतनी विस्‍तृत और अति गतिमान जलधार से बड़ेबड़े पर्वत शिलाखण्‍ड टूटटूट कर गिरे होंगे तो केदारनाथ परिसर और इसका बीस एक किलोमीटर का परिक्षेत्र कैसी साक्षात् प्रलय झेल रहा होगा! एक क्षेत्र का जीवन तो इस प्रलय से समाप्‍त ही हो गया है। अनहोनी के व्‍यतीत होने के बाद केदारनाथ और गढ़वाल की भौगोलिक और पर्यावरणीय व्‍याख्‍या सुलटा रहे सुविधाभोगियों, तथाकथित वैज्ञानिकों के लिए ईश्‍वर या कहें प्रकृति की ओर से यह एक छोटी सी चेतावनी मात्र है कि अब भी सुधर जाओ। किसी देश विशेष को चलाने के लिए आज के शासकों से पहले भी शासक हुए हैं। तो आज के ये शासक ऐसा क्‍यों समझ रहे हैं कि विकास के नाम पर जो कुछ वे कर रहे हैं सब ठीक है। ऐसा अन्‍धा, सस्‍ती लो‍कप्रियता को समर्पित विकास आखिर क्‍यों और किसके लिए हो रहा है। आज केदारखण्‍ड बर्बाद हुआ है। कल दिल्‍ली और बाद में पूरा देश बर्बाद हो जाएगा तो क्‍या विकास श्‍मशान की खामोशी के लिए किया जा रहा है। आखिर विकास को देखने के लिए कोई तो जीवित होना चाहिए। और जब कोई जीवित ही नहीं बचेगा तो किसी भी वैकासिक गतिविधि के क्‍या मायने।
जब एक छोटी चेतावनी को हमारा विवेक अनहोनी मान बैठा है तो निरन्‍तर हो रहे प्रकृति के अनादर के बड़े दण्‍ड के रुप में भगवान न जाने हमें क्‍या दिखाएगा! या फिर ऐसे दण्‍ड के घटित होने पर शायद हममें से कोई इसकी व्‍याख्‍यावर्णन करने को जीवित ही न बचे! बचपन में सोचता था कि यदि पृथ्‍वी, जल, जंगल, हवा, पानी कुछ भी नहीं होता तो क्‍या होता! खुद से पूछे गए इस गूढ़ प्रश्‍न का हल भी मेरा विवेक ही देता था कि कुछ न होता तो घोर, गहरा अन्‍धकार होता। रात में अन्‍धकार दिन में भी अन्‍धकार होता। इसकी कल्‍पना मात्र से मस्‍तक पर पसीने की बूंदें उभर आतीं थीं। काश मेरा यह विचार, अनुभव हमारे सत्‍ता प्रतिष्‍ठापक, आधुनिक विकास के लिए हमारे प्रतिष्‍ठापकों को भड़काने वाले दुनिया के चौधरी समझ पाते तो कितना अच्‍छा होता!
दूसरी ओर सेना के जवान क्‍याक्‍या झेलेंगे। प्राकृतिक आपदा में फंसे पीड़ितों को बचाने के लिए तनमनधन से समर्पित सेना नायकों की अपनी टुकड़ी पर जब श्रीनगर में आंतकी आक्रमण हुआ तो मेरा मन देश की सरकारी विडंबना पर खूनी आंसू बहाने लगा। अतिवृष्टि से लोग मर रहे हैं। सेना उन्‍हें बचा रही है। सेना आंतकियों से भी लड़ रही है। आंतकियों से उन्‍हें खुल के लड़ने नहीं दिया जा रहा है। परिणामस्‍वरुप उन्‍हें अपनी कीमती जानें गंवानी पड़ रही हैं। आंतकी संगठन और घटना के लिए उनकी जिम्‍मेदारी लेने की बात से मन में विचित्र विरोध लहराने लगता है। लोगों के मरने, जवानों के बलिदान पर झूठा रोना कब तक चलता रहेगा। मौतों पर हो रही तुच्‍छ देशी-विदेशी नीतियों पर थूकने का ही मन करता है। मृतकों की ऐसी बेकद्री की भरपाई क्‍या किसी चीज से हो सकती है।
 



Sunday, June 9, 2013

वन्‍यजीव संरक्षण के मायने



प्रैल में जब कोटद्वार, उत्‍तराखण्‍ड किसी काम से गया था तो समाचारपत्रों के स्‍थानीय संस्‍करण बाघ यानि कि गुलदार द्वारा कई पहाड़ी ग्रामीणों को मारने के समाचारों से पटे पड़े थे। इन दुर्घटनाओं पर लोगों का आक्रोश विचारणीय था। गुलदारों से पहाड़ी लोगों के जीवन पर मंडरानेवाली आशंका, भय के निवारणार्थ स्‍थानीय प्रशासन की शिथिलता विचलित करती थी। समाचार में जब पढ़ा कि एक ग्रामीण महिला को गुलदार रसोईघर से उठा के ले गया और बाद में उसका क्षत-विक्षत शरीर ग्रामीणों को कहीं दूर वन में मिला तो सरकार के प्रति गुस्‍सा दिमाग में तपने लगा। ग्रामीणों के बारम्‍बार अनुरोध पर भी स्‍थानीय प्रशासन गुलदार के आक्रमण से जीवन गंवा चुके लोगों के प्रति कोई संवेदना प्रकट करने की स्थिति में नहीं आया। औपचारिकतावश उसने कुछ शिकारियों को गुलदार के संभावित शरणस्‍थलों पर तैनात तो कर दिया पर यह तैनाती गुलदारों को मारने के लिए नहीं थी। शिकारियों को लोहे के जाल सौंपे गए थे। उन्‍हें आदेश था कि वे गुलदारों को पकड़ कर इन जालों में बन्‍द कर दें। ऐसे में प्रश्‍न यह उठता है कि जब गुलदारों को पकड़ कर जाले में बन्‍द कर रखना था तो उन्‍हें पहाड़ी जंगलों में छोड़ा ही क्‍यों गया? और जब उन्‍हें वन्‍यजीव संरक्षण कानून के अन्‍तर्गत अपना भोजन ढूंढने के लिए जंगली क्षेत्रों में छोड़ दिया गया है, और वे भी जंगली जानवरों का आखेट करने के बजाय पालतू मवेशियों एवं विशेषकर मनुष्‍य को अपना भोजन बना रहे हैं तो ऐसे में एक नैतिक प्रश्‍न चारों ओर से उठता है कि क्‍या अब वन्‍यजीवों (आदमखोर गुलदार, बाघ इत्‍यादि) का संरक्षण मनुष्‍य के जीवन मूल्‍य पर होगा! वन्‍यजीव या कोई भी कानून आसमान से नहीं टपका है। इसे मनुष्‍य ने ही बनाया है। अपनी पर्यावरणीय और जलवायु की आवश्‍यकताओं में तथाकथित सन्‍तुलन स्‍थापना के उद्देश्‍य हेतु इसे हमने ही निर्मित किया है। आज जब यह कानून वन जीवों के संरक्षण के नाम पर खूंखार जंगली जानवरों द्वारा मनुष्‍य जीवन के लिए जोखिम बन गया है तो क्‍या तब भी इसमें संशोधन की आवश्‍यकता का अनुभव नहीं हो रहा कर्ताधर्ताओं को? या पहाड़ों में कठिनता से जीवन बसर कर रहे लोगों की सुरक्षा की बात उनके लिए उतनी महत्‍वपूर्ण नहीं जितनी अंतर्राष्‍ट्रीय वन्‍यजीव प्रदर्शनी विषय पर अपने देश के वन क्षेत्रों में वन्‍यजीवों का बेहतर रिकार्ड दिखाने की। भारत जैसे देशों में जब से सत्‍ता प्रतिष्‍ठान मुद्रा व पूंजी के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गए हैं, तब से उनके निर्णय जनहितैषी न हो कर अंतर्राष्‍ट्रीय मुद्राकोष और पूंजीतन्‍त्र के संकेतों पर निर्भर हैं। विदेशी बिरादरी को अपने वैज्ञानिक सूत्रों, जीवन रुचियों के अनुरुप जो नियम बनवाने होते हैं, दूसरी-तीसरी दुनिया के देशों (भारत सहित) में उन्‍हीं का अंधानुकरण होता है। चूंकि पहाड़ से अत्‍यधिक लोगों का पलायन हो चुका है और वहां बहुत कम लोग स्‍थायी रुप से रह रहे हैं इसलिए वहां सत्‍ता-प्रतिष्‍ठान के निर्माण हेतु आवश्‍यक जनमत का अभाव है। ऐसे में वहां के लिए सरकारी स्‍तर पर ठोस, जनानुकूल नवनीतियां बनने का प्रश्‍न ही नहीं होता। यदि वहां विशाल वोट बैंक की संभावनाएं होतीं, वहां की जनसंख्‍या ज्‍यादा होती तो निसन्‍देह उत्‍तराखण्‍ड या केन्‍द्र सरकार वन्‍यजीव संरक्षण कानून को तुरन्‍त बदल देती, इसे पहाड़ में रह रहे लोगों की जीवन-सुरक्षा के लिए तत्‍काल परिवर्तित कर देती। तब उसे गुलदारों या बाघों के संरक्षण की चिंता इतनी नहीं होती जितनी आज है। बात यदि पारिस्थितिकीय सन्‍तुलन, पर्यावरण संरक्षण की है और देशी-विदेशी पर्यावरणीय प्रतिष्‍ठान, मंत्रालय प्रकृति संरक्षा के निमित्‍त सोच कर गुलदार जैसे खूंखार जानवरों को स्‍थानीय पहाड़ी निवासियों के जीवन की कीमत पर भी नहीं मारने का कानून पारित करवाते हैं, तो उन्‍हें स्‍वयं को पहाड़ियों के स्‍थान पर रख कर अपने वन्‍यजीव संरक्षण कानून के बिन्‍दुओं पर पुनर्विचार करना होगा। उन्‍हें यह भी सोचना होगा कि जीव-जगत का सन्‍तुलन प्रकृति के अनुसार रहने दिया जाए तो ज्‍यादा सही होगा। स्‍वयं चहुंमुखी सुविधा, सुरक्षा में जीवनयापन करते हुए मात्र अपनी रुचियों के लिए धन बल के दम पर वन्‍यजीव प्रदर्शन का स्‍वांग अब बन्‍द होना चाहिए। यदि ऐसे लोगों को गरीब लोगों के जीवन मूल्‍य पर अपना यह शौक बनाए रखना है और इसके लिए प्रभावित लोगों को कानून का डर दिखा कर उन्‍हें अपनी सुरक्षा के लिए खूंखार जानवरों को नहीं मारने के राष्‍ट्रीय-अंतर्राष्‍ट्रीय खोखले संदेश प्रदर्शित करते रहना है तो यह अब सहनयोग्‍य नहीं है। गुलदार द्वारा मारे गए बच्‍चों, बड़ों, मवेसियों को लेकर स्‍थानीय निवासियों की आंखों में व्‍यवस्‍था के कुप्रबन्‍धन के प्रति जो जलते अंगारे मैंने देखे हैं अगर वे आग बन गए तो बहुत कठिन स्थितियां उत्‍पन्‍न हो जाएंगी। यह तो विचारणीय है ही कि आदमी की कीमत पर गुलदार जैसे आदमखोर की चिंता निरर्थक है। इसके कोई सामाजिक, पर्यावरणीय मायने नहीं हैं।

Friday, June 7, 2013

नक्‍सलवाद से निपटने के अनुचित तरीके



पिछले साल जून महीने की बात थी जब छत्‍तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ और नक्‍सलियों के बीच हुई गोलीबारी में 20 नक्‍सली मारे गए थे। विगत शनिवार की शाम को छत्तीसगढ़ के जगदलपुर की गीदम घाटी में नक्‍सलियों ने कांग्रेस की परिवर्तन रैली पर हमला किया। इसमें कांग्रसे पार्टी के 30 से अधिक कार्यकर्ताओं की मौत हो गई। कई लोग घायल हुए। एक साल के दौरान हुई इन दो बड़ी खूनी दुर्घटनाओं के अलावा नक्‍सलियों, सेना व पुलिस के बीच सालभर छोटी-बड़ी अनेक मुठभेड़ की घटनाएं तो बहुत आम बात हो गई हैं। इसी का परिणाम है कि आज फिर से हमने नक्‍सलियों द्वारा किए गए बड़े जनसंहार को देखा और इस पर अपनी चिंता प्रकट करने और इसके आगे न झुकने जैसे रटे-रटाए सरकारी वक्‍तव्‍य सुने।
     मानुषिक वेदना पर आज आधुनिकता की ऐसी घोर काली परत चढ़ गई है, जिसके नीचे दूर देश के कोने में हुई या हो रही मरने-मारने की दुर्घटनाओं का विडंबनात्‍मक सच दम तोड़ रहा है। जिन्‍हें आज हम नक्‍सली कह रहे हैं, ये कौन हैं? हमारे भाई, साथी, देशवासी होते हुए भी इन्‍होंने नक्‍सलपंथ क्‍यों चुना? क्‍या ये पागल हैं जो इन्‍हें बंदूकों, बारुद, बमों, आदि से खूनी खेल खेलना पसंद है? क्‍या हमारी सरकार द्वारा कभी इनके नक्‍सल-अस्तित्‍व उभार के बिंदुओं पर गौर से विचार किया गया कि इनके ऐसे मार्ग पर चलने के कारण क्‍या हैं?
अगर विचार करें तो यही निष्‍कर्ष निकलेंगे कि भूख, बीमारी से त्रस्‍त और नागरिक सुविधाओं, अधिकारों से वर्षों तक वंचित रहनेवाला, समाज की मुख्‍यधारा से अलग-थलग पड़े रह कर अपने लिए हमेशा सरकार की ओर से कुछ होने की उम्‍मीद पालनेवाला तबका कब तक धैर्य की परीक्षा देता! अंत में उनका धैर्य सरकारी तंत्र की अनदेखी, विश्‍वासघात और टाल-मटोल के रवैये से टूट गया और वे ऐसे मार्ग पर निकल आए, जहां उनकी आत्‍मा, अस्मिता, नैतिकता, मौलिकता उन्‍हें एकजुट होकर वह सब करने को तैयार कर गई, जिसके चलते उन्‍होंने ससम्‍मान न सही देशद्रोह के नाम पर ही अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। अन्‍यथा तो वे करबद्ध रह कर याचना का बारंबार अभ्‍यास करते हुए ठगे ही जा रहे थे।
हो सकता है कि अब नक्‍सलियों का उद्देश्‍य पथभ्रष्‍ट हो गया है। उनके कारनामों को आंतक फैलाने का दुस्‍साहस या देशद्रोही गतिविधि बताया जा रहा है। परन्‍तु उनकी पहले और बाद की दोनों स्थितियों के लिए ढुलमुल सरकारी रवैया ही जिम्‍मेदार है। पाकिस्‍तानी आंतकियों को तो हम साक्ष्‍य, पूछताछ और आंतक-तंत्र तक पहुंचने का आधार बता कर खूब पाल-पोस रहे हैं, समय काट रहे हैं पर विवशता में नक्‍सली बने भारतीयों और मजबूरी में उनसे जूझ रहे भारतीय सेना, पुलिस के जवानों के आपसी खूली खेल को हमेशा के लिए बंद करने हेतु कुछ नहीं कर रहे हैं।
आम आदमी के नक्‍सली बनने के इतिहास पर दृष्टिपात करने से ज्ञात होता है कि 2 मार्च, 1967 को पश्चिम बंगाल के दूर-दराज के गांव नक्‍सलबाड़ी में एक जनजातीय नौजवान विमल किसान ने न्‍यायिक आदेश मिलने के बाद मुक्‍त घोषित अपनी भूमि को जोतने की कोशिश की तो एक स्‍थानीय भूस्‍वामी ने भाड़े के बदमाशों के साथ मिल कर उस पर जानलेवा हमला कर दिया। नक्‍सलबाड़ी क्षेत्र के जनजातीय लोगों ने उन पर पलट कर हमला कर दिया और अपनी-अपनी भूमि को पुन: कब्‍जाने लगे। परिणामस्‍वरुप एक बड़ा विद्रोह उठ खड़ा हुआ और देखते-देखते एक पुलिस निरीक्षक सहित नौ जनजातीय लोगों की हत्‍या हो गई। उस समय दो माह की छोटी सी अवधि में यह घटना भारत सहित पूरी दुनिया में आग की तरह फैल गई।
तब से लेकर अब तक समय-समय पर केवल नक्‍सलियों द्वारा ही नहीं बल्कि माओवादी, आदि विद्रोही संगठनों द्वारा भी अपने अधिकारों के लिए सरकारी नीतियों के विरोध में भारत में अनेक विद्रोह किए गए। सरकार ने स्‍पष्‍ट नीति के अभाव में इस विषय को सुलझाने के कई प्रयास भी किए पर वे व्‍यावहारिक कम और औपचारिक अधिक सिद्ध हुए। आज दशकों पुराना यह सरकार, शासन विरोधी आंदोलन,जब तक नेताओं पर हमले जैसी घटना न हो, बस एक आम घटना बन कर रह गया है। यह देखते हुए भी कि अब तक इस संघर्ष में अनगिन नक्‍सलियों, सेना और पुलिस के जवानों की जानें जा चुकी हैं और लगातार लाशों के अंबार लग रहे हैं, सरकार की चिंता मामले को पूरी तरह से हल करने की परि‍णति तक नहीं पहुंच सकी है। आधुनिक भारत निर्माण की ताल ठोकनेवाले, मीलों हम आ गए मीलों हमें जाना है के जुमले उछालनेवालों को खुद से पूछना होगा कि परिवर्तन रैली पर हुए नक्‍सली हमले की जड़ें कहां हैं। नक्‍सली जंगली जानवर नहीं हैं। मिसाइलों, आधुनिक शस्‍त्रों की नई से नई प्रौद्योगिकी अपने पास होने पर अभिमान, गर्वोक्ति से भर उठनेवाले भारत की सर्वोच्‍च संस्‍था के संचालकों को सोचना होगा कि नक्‍सलियों के पास भी आधुनिक अस्‍त्र-शस्‍त्र मौजूद हैं। यही नहीं वे इनको चलाने में सिद्धहस्‍त भी हैं। यहां तक कि वे गोरिल्‍ला प्रशिक्षण भी प्राप्‍त कर चुके हैं। जब वे अपने लोकतान्त्रिक प्रतिनिधियों की तरह ही उनके शस्‍त्र प्रेम को अपने स्‍तर पर बनाए हुए हैं तो उन्‍हें मूर्ख, नासमझ, हिंसा का चुनाव करनेवालों के रुप में परिभाषित करना कहीं से भी युक्तिसंगत नहीं लगता। उनके विरुद्ध आक्रामक होने के बजाय सरकारी नीति उन्‍हें मुख्‍य धारा में सम्मिलित कर उन्‍हें सुविधा, अधिकार संपन्‍न बनाने की होनी चाहिए। परस्‍पर खूनी खेल पर निश्चित रुप से हमेशा के लिए विराम तब ही लगाया जा सकेगा।

Wednesday, June 5, 2013

सत्‍तू दादाजी

न्‍नीस मई दो हजार तेरह को रात्रि साढ़े नौ बजे पिताजी ने फोन पर सूचित किया कि सत्‍तू दादाजी अचानक चिरनिद्रा में लीन हो गए। सुन कर ऐसे लगा जैसे किसी ने आगे-पीछे से जोर का धक्‍का दिया हो। धड़कन बढ़ गई, हाथ-पैर कांपने लगे। कुछ क्षणों पूर्व का मेरा परिवेश जैसे मेरे लिए नितान्‍त अपरिचित हो गया। जेठ का थका हुआ अर्द्धचन्‍द्र चमकने के प्रयास में अभी लगा ही था कि मद्धिम हो कर धुंधला गया। कुछ देर बाद मां ने फोन किया। कह रही थी-चिन्‍ता मत करना, खाना खा लेना, गर्मी है परेशान न होना, गांव के हम सब लोग कल से सरसों तेल का त्‍याग करेंगे, मैंने तेरे पिता को कहा कि उसे कल बताना पर इन्‍हें तो जल्‍दी रहती है। ठीक है कहते-कहते मैंने फोन बन्‍द कर दिया। कार्यालय से घर पहुंचने तक होनेवाले नोएडा शहर के उपक्रमों को देखता रहा। साथ चल रहा साथी रोज की तरह निश्चिंत, शाब्दिक आक्रामकता से वातावरण को बिगाड़ता हुआ चलता रहा। उत्‍तराखण्‍ड के मेरे गांव, आसपास के गांवों और जिले तक सत्‍तू दादाजी की ज्‍योतिषीय ज्‍योति का प्रभाव तो था ही। प्रभावित क्षेत्र के लोगों के उत्‍तराखण्‍ड से बाहर देश-विदेश में रह रहे सम्‍बन्धियों के माध्‍यम से दादाजी का नाम, सम्‍मान, आदर एक प्रकार से अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर का भी था। लेकिन यह किसी व्‍यक्ति की सस्‍ती लोकप्रियता नहीं थी, जिसे हरेक भारतीय जाने। यह एक प्रकार की विशेष लोकप्रियता थी, जो चयनित लोगों के मध्‍य ही प्रसारित थी। इसलिए यह शहर, इसका आसमान, धरती, लोग, वाहन, अच्‍छाइयां, बुराइयां सब जैसे मेरे गांव के दादा जी को उनकी मृत्‍यु पर चिढ़ा रहे थे। क्‍योंकि मेरे अतिरिक्ति कोई उनके निधन दुख में नहीं था यहां। आज दादाजी का ज्‍योतिषीय ज्ञान, ब्रह्म विवेक, ज्‍योतिष अंक विद्या और इनके बल पर अर्जित उनका स्‍वाभिमान, दम्‍भ सब तिरोहित हो गए थे। मैं सोचता रहा वे मर गए और शहर चल रहा है पूर्व की भांति, विचित्र स्थिति है ये। घर के निकट आ कर मुझे अनमना देख साथी ने कहा क्‍या बात है, चुप क्‍यों है। उसे ज्ञात हुआ पर उसने औपचारिकतावश अच्‍छा कहा और अपने घर की ओर चल दिया। चन्‍द्रमा पुन: चमकने लगा था। घर पहुंचा तो बिजली नहीं थी। पत्‍नी को कुछ नहीं बताया। सोचा खाने से पहले बता दिया तो ये खाना नहीं खाएगी। बाद में उसे पता चला तो वह भी विडंबनात्‍मक भाव में स्थिर हो गई। पश्चिम छोर की खिड़की के निकट टेबल पर रखे प्‍लास्टिक बॉडी रुम कूलर के किनारों पर चन्‍द्रप्रकाश के तन्‍तु बिखरे हुए थे। दोपहर में अंगार बरसानेवाली हवा इस समय रिमकते हुए हलकी ठण्‍डक दे रही थी। बिजली नहीं होने के कारण शांत वातावरण में झींगुरों की तीव्र झींगुराहट, कुरकुराहट कर्णद्वारों में प्रवेश करती रही। मैं सत्‍तू दादाजी के सदैव के लिए स्थिर शरीर के निकट पहुंच गया। उनके बारे में सोचने लगा। इस अविवाहित पैंसठ वर्षीय ब्राह्मण ने कितने लोगों का अच्‍छा मार्गदर्शन किया। कितने जनकल्‍याणकारी कार्य किए। गांव में रहने पर मैं उनके पास अवश्‍य जाता था। घंटों हमारे बीच संसार, जीव-जगत के अस्तित्‍वअ‍नस्तित्‍व पर विमर्श होते। ये उनकी वाणी और ज्ञान का ही प्रभाव था कि उनकी अधिकांश व्‍यक्तित्‍व-वृद्धि की बातें मेरे कंठस्‍थ थीं। मैं उन बातों का वर्षों से अनुसरण करता हुआ आ रहा था। पारिवारिक उलझनों से घिरे रहने पर वे मेरे बताए बिना ही समझ जाते थे कि मैं किसलिए तटस्‍थ नहीं हूँ। कहते थे पूजा-पाठ करते हो। मेरे हां कहने पर पूछते कि कभी भगवान शिव को ध्‍यान से देखा है। हां कहता तो पुन: पूछते कि उनके चित्र में ऐसा क्‍या देखा है, जिसे तुमने अपने जीवन-संबल के लिए प्राप्‍त किया है। जब उन्‍हें लगता कि मेरे पास उनके प्रश्‍न का उत्‍तर नहीं है तो स्‍वयं बताने लगतेसर्प, गऊ, बैल, अनेक जीवों को कभी एक साथ बिना युद्ध के, बगैर परस्‍पर उलझन के शांत देखा है कहीं। नहीं ना। शिव के सान्निध्‍य के अतिरिक्‍त ये एक साथ कहीं और शांतमय हो ही नहीं सकते। इतनी शक्ति है शिव में। उनकी इस उक्ति के वर्णन का ध्‍येय मैं तुरन्‍त समझ गया था। तब से आज तक मैं जीवन-जंजालों से उबरने के लिए इसी शिव-ध्‍यान उक्ति का पालन करता आया हूँ। पंडितों, ब्राह्मणों में विद्यमान विसंगतियों के उन्‍मूलन के लिए उन्‍होंने इसके निमित्‍त सर्वप्रथम स्‍वयं को प्रस्‍तुत किया। देवी-देवताओं को प्रसन्‍न करने के लिए जीव हत्‍या कर्म का उन्‍होंने खुल कर विरोध किया। जीवन की गुणवत्‍ता के बाबत भी उन्‍होंने अनेक बातें बताईं थीं, जिनके परिणाम सुननेवालों के अच्‍छे व्‍यक्तित्‍व परिवर्तन के रुप में सामने आए। वे आधी रात के बाद अध्‍ययनलीन, बी.बी.सी. रेडियो पर राष्‍ट्रीय-अन्‍तर्राष्‍ट्रीय समाचारों को सुनते हुए पाए जा सकते थे। सुबह भी जल्‍दी उठ कर वे अपनी ज्‍योतिषीय गणनाओं, नवानुसन्‍धान में रमे हुए नजर आते थे। रात्रि के डेढ़ बजे बिजली आई तो उनके बारे में ये संस्‍मरण लिखने बैठा। रात के तीन बज कर दस मिनट का ये समय। बाहर व्‍याप्‍त अंधकार में चन्‍द्रमा ढूंढता हूँ। वह भी पं. सतीश चन्‍द्र बडोला, सत्‍तू दादाजी की तरह विलीन हो गया है। वैसे देखा जाए तो ऐसे लोग शरीर ही तो त्‍यागते हैं, इनके जीवन-संबल, सशक्‍त विचारों का प्रभाव तो मुझ जैसों पर आयुभर रहता है। निसन्‍देह मेरे बाद भी रहेगा।

Saturday, June 1, 2013

इस समय जो दिमाग में आया, वो बाहर निकाला


र्तमान को पकड़नेवाले कहते हैं बीती बातों-घटनाओं को थाम कर क्‍या करना। कब तक उन्‍हें याद रखें, उन पर बात करें, उन्‍हें रोने-धोने का विषय बनाएं। आज मैं आप लोगों को अगस्‍त २०११ के अन्‍ना आंदोलन, रामलीला मैदान दिल्‍ली का नजारा याद कराऊं। मैं स्‍वयं यहां एक दो दिन उपस्थित था। लोगों के नारे, आक्रोश, राष्‍ट्र भावना देख कर सहसा किसी को भी यकीन नहीं हो सकता था कि इससे पहले भी कुछ इस तरह रहा होगा या इसके बाद भी कुछ ऐसा होगा। बदलाव की तैयारी में भिंची मुटि्ठयां हवा में लहरा रही थीं। राष्‍ट्रभक्ति से ओतप्रोत नारों-गीतों-भजनों की आवाज कानों में पड़ती तो मानो हर नौजवान खुद को शहीद भगत सिंह, चन्‍द्रशेखर आजाद, सुभाष चन्‍द्र बोस समझने लगता और हरेक नवयुवती स्‍वयं को रानी लक्ष्‍मी बाई मानने लगती। हजारों-लाखों की भीड़ के हाथों में लहराते तिरंगे झण्‍डे जब आसमान की ओर हवा में एक साथ उड़ते थे तो स्‍वतन्‍त्रता संग्राम के दौर का अनुभव जैसे सभी एकत्रित देशभक्‍तों में जोर मारने लगता। उस समय निश्चित रुप से कोई भी महसूस कर सकता था कि अब देश में परिवर्तन होकर रहेगा। इसके बाद एक वर्ष बीता। आंदोलन, देशभक्ति, राष्‍ट्रीय एकता को लकवा मार गया। मुंबई में अनशन करने बैठे अन्‍ना के साथ बहुत कम लोग एकत्रित हुए और अनशन को बीच में छोड़ने का निर्णय कर लिया गया। बीते दिसंबर में बसंत विहार दिल्‍ली की घटना ने जिस तरह से युवाओं को व्‍यवस्‍था की अकर्मण्‍यता के प्रति एकत्रित किया और इस एकता ने जिस नए स्‍वत:स्‍फूर्त कहे जानेवाले आंदोलन के रुप में अपनी पहचान बनाई, वह भी धीरे-धीरे समय की गर्द में मिलने के लिए मुड़ गया। गांधी नगर दिल्‍ली में बच्‍ची के साथ हुई दुर्घटना ने एक बार फिर उम्‍मीद जगाई कि लोग समाज के गलत कार्यों और इनकी सरकारी अनदेखी से परेशान हो कर सड़कों पर उतरने लगे हैं।
     लेकिन वही हुआ, उन्‍हीं के मन का हुआ जो कहते हैं कि बीती बिसार दे, आगे देख। कुछ दिन अपने मीडिया ने दिल्‍ली के अपराधियों पर हो रही अदालती कार्रवाईयों की सूचना दी। बन्‍द कमरों में हो रही सुनवाई की भी कवरेज की। पर अब सब कुछ शांत है। आईपीएल में साल के डेढ़ महीने झोंकने के बाद लोगों, मीडिया, सरकार को शायद अब फुर्सत मिलेगी और अधर में अटके पड़े उन कामों पर ध्‍यान लगाएंगे, जिनके बारे में पिछले दो-तीन साल से देश में धरने-प्रदर्शन-आंदोलन हो रहे हैं। नक्‍सल गतिविधियां जब तक जवानों, लोगों, नक्‍सलियों की जानें ले रही थीं तब तक यह सामान्‍य बात थी। कांग्रेसी नेताओं पर हुए नक्‍सली हमले ने इसे प्रमुख मुद्दा बना दिया। तथाकथित इसे देश की संप्रुभता पर खतरा, लोकतन्‍त्र की आस्‍था पर कलंक कहते हुए थक नहीं रहे हैं। शायद कुछ दिन बाद इसे भी भुला दिया जाएगा। क्‍योंकि आनेवाले बरसात के मौसम में मीडिया जल-प्‍लावन से होनेवाली जनसमस्‍याओं पर केन्द्रित होगा। बरसाती कहर से उत्‍पन्‍न समस्‍याओं पर सरकारी अव्‍यवस्‍थाओं का रोना रोया जाएगा। क्‍या पता इस बीच देश में कहीं किसी कोने में एकाध बम विस्‍फोट हो जाएंफिर लोगों का ध्‍यान उधर भटक जाए। नकली खाने, संस्‍कृति, जीवन ने हमारी स्‍मृतियों को इतना कुन्‍द कर दिया है कि हमें आस पास की जरुरतों के सिवाय अन्‍य अनुभव, विचार या काम गहरे नहीं लगता। इसी का परिणाम है कि एक के बाद एक हो रही सामाजिक विसंगतियों, विभीषिकाओं पर दिन गुजर जाने पर हमारा ध्‍यान-प्रभाव जाता रहता है और राज करनेवाले, तंत्र चालक कुछ भी नया और ठोस करे बिना समय काट रहे हैं। सही कहते हैं कहनेवाले बीती बिसार, आज में जी। अपने को देख और भरपूर जी। धन्‍य है मेरे कलियुगी मानव तू। तेरे स्‍वार्थ को प्रणाम।