महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Saturday, April 27, 2013

आनन्द का अन्तिम सफर








राजेश खन्‍ना के निधन के बाद 28 07 2012 को रचित संस्‍मरण।



माज में दो तरह के लोग रहते हैं-अमीर और गरीब या कहें नामी व गुमनाम। प्रसिद्ध व्यक्ति के जीवन में जो उतार-चढ़ाव होते हैं, आम आदमी को उनकी सैद्धांतिक जानकारी नहीं होती। इसी तरह आम आदमी के जीवनकाल में जो प्रसंग-परिस्थितियां होती हैं, प्रसिद्ध हस्ती का उनसे चाहा-अनचाहा सरोकार होता है। हिन्दी सिनेमा के महान अभिनयकार राजेश खन्ना का जीवन महान होने के साथ-साथ पारिवारिक त्रासदी की विडंबना से भी पूर्ण था। लोगों की दृष्टि में एक ओर वे अप्रतिम अभिनय प्रतिभा के धनी थे तो दूसरी ओर वे उनके पारिवारिक जीवन के बारे में प्रवचन करते समय उनकी व्यक्तिगत कमियों का रोना भी रोते थे। कोई कहता कि वे अधिक मदिरा का सेवन करते थे...किसी के मुंह से निकलता कि उनके कई लड़कियों से प्रेम सम्बन्ध थे....कोई उन्हें व्यवहारकुशलता में पिछड़ा हुआ सिद्ध करता तो किसी के लिए वे कुंठित होकर रोगग्रस्त व्यक्ति के समान थे और कोई तो उन्हें आत्ममुग्ध कहते अघाता नहीं था। लेकिन इतने प्रवचनों, लांछन और कयास लगाने के बाद लोग भूल जाते हैं कि उनकी ओर से कभी किसी बात के प्रत्युत्तर नहीं आए। वे अपने लिए की जानेवाली टिप्पणियों पर सफाई देने के लिए सार्वजनिक तौर पर कभी नहीं मचले। उन्होंने विसंगतियों से समझौता नहीं किया। शायद इसीलिए वे सिनेमा की अभिनय-यात्रा के प्रकांड होते हुए भी अभिनय इतर गतिविधियों से विमुख ही रहे।
समाज से कट कर एकात्म हो कर रह रहे सुपरस्टार पर लगे अनेक आरोपों का एक ही उत्तर है.....प्रेम-विहार, विचरण, व्याप्ति की वास्तविकता और प्रासंगिकता, जिसे जतिन यानी राजेश खन्ना नामक प्रेमप्राणी आज के विनाशी युग में भी साकार कर रहा था। यदि कोई अपने प्रेम सम्बन्धों के प्रति भावनाप्रद और संवेदनशील रह कर विसंगत सामाजिक जीवन से विमुखता प्रदर्शित करता है तो इसके नकारात्मक अर्थ नहीं लगाए जाने चाहिए। कह सकते हैं कि कलयुग में भी कोई प्रेम सागर में डूबा हुआ है......राजेश खन्ना के साथ भी यही स्थिति थी। वैसे सच्चे प्रेम सम्बन्धों की पराकाष्ठा राजेश खन्ना के जीवन के समान ही होती है। अन्तर यहां से उत्पन्न होता है कि आम आदमी तो रोजी-रोटी के धक्कों में प्रेम की भावना भूल जाता है जबकि प्रतिष्ठित, धनसम्पन्न व्यक्ति के लिए अपनी प्रेम भावनाओं में बहने के लिए रोजगार की चिंता की बाध्यता नहीं होती। समाज के प्रत्यक्ष ताने सहने के लिए आर्थिक अवलम्ब का अभाव नहीं होता। कोई यदि धनवान रहते सच्चे प्यार में पड़ता है तो उसकी सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक विवशताएं निर्धन व्यक्ति से अलग होती हैं। वह इनके मध्य समायोजन और समझौता करने का अधिकारी बना रहता है। प्यार की पवित्रता जीने के लिए जरूरत बस इतनी होती है कि अमीरी की सामाजिक विसंगतियों से दूर रहना पड़ता है। आधुनिकता के वर्तमान चोंचलों से कटना पड़ता है। मेरे विचार से रोटी’’ का मंगल इन सब सन्दर्भों में शत-प्रतिशत खरा उतरा। इसके प्रमाण में इतना कहना पर्याप्त होगा कि बचपन से अमीरी में पला और नौजवानी आते-आते हिंदी सिनेमा के शिखर पर विराजमान हुआ राजेश अपनी अभिनयगत भावप्रवणता में एकदम जींवत लगता था। अभिनय की दुनिया से बाहर वास्तविक जीवन में भी उसकी भावुकता एक श्रेष्ठ वैयक्तिक मनोविज्ञान की परिणति थी। इसी दम पर वह अपने दर्शकों और चहेतों के दिलों में राज करता था......कर रहा है....और निसन्देह करता रहेगा। दारा सिंह के बाद एक और हस्ती राजेश खन्ना का महाप्रयाण भारतीय भूखण्ड के लिए अत्यन्त दुखदायी है। ऐसे लोगों का जीवन दृष्टांत और मृत्यु मर्म आम आदमी को कहीं न कहीं एक ऐसे दर्शन से जरूर जोड़ता है, जिसमें मनुष्यता अपनी सम्पूर्ण नैतिकता में विचरती नजर आती है। राजेश खन्ना की आत्मा के लिए शांति प्रार्थना के साथ-साथ उनके अन्तिम संस्कार में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से सम्मिलित भावप्रण लोगों और आनंदके बैकुंठ सफर से उदित मानवता को सादर प्रणाम।

Wednesday, April 24, 2013

आलेख पर मेरी टिप्‍पणी



नसत्‍ता में 23.04.2013 को मुद्रित कृष्‍णदत्‍त पालीवाल का आलेख पढ़ा। लेखक ने आज के भारत के सन्‍दर्भ में गांधी जी और नेहरु के मतैक्‍यों का उल्‍लेखनीय मूल्‍यांकन किया है। गांधी जी और नेहरु के वैचारिक टकराव और फलस्‍वरुप व्यवहृत होनेवाले साम्राज्‍यवाद ने अंत में नेहरु को ही उनके मूल्‍यहीन सिद्धांत के लिए आधुनिकता, उत्‍पादन, पूंजी मानसिकता के नौसिखियों के मध्‍य महिमामण्डित किया। गांधी जी की हिन्‍द स्‍वराज की मूल्‍य-पोषित अवधारणा को ऐसे तिरष्‍कृत किया गया मानो नवसाम्राज्‍यवाद के उपासक नेहरु सहित अनेक मूल्‍यभ्रष्‍ट नेताओं, लोगों को आधुनिकतावाद के पूंजी-यंत्र पूजकों से अमर-अजर होने का मंत्र मिल गया था। लेकिन हुआ क्‍या! जीवन मूल्‍यों की समृद्धि के पक्षकार गांधी जी और उद्योग-यंन्‍त्राधारित दुनिया बनाने के विघ्‍नपालक नेहरु दोनों के मानव शरीर आज अविद्यमान हैं। मूल्‍य-पोषित जीवन के पक्षधर गांधी के मूल्‍य तो आज भी, यदि समझे जाएं तो, अत्‍यन्‍त प्रासंगिक हैं। पर नेहरु के सिद्धांत की पहचान आज उन लोगों को भी नहीं रही, जो उनके निर्देशित कुपथ पर चलते हुए अंतत भोगवाद में स्थिर हो गए हैं और मार्गदर्शक या देश की तो छोड़ दें, वे अपनी पहचान और व्‍यक्तित्‍व तक को भी खो चुके हैं।

      ग्रामाधारित संस्‍कृति यदि गांधी के सिद्धांत के अनुसार फलित होती तो हो सकता था अभी तक दुनिया में पुन: दूध की नदियां बहने लगतीं। हो सकता है मनुष्‍य मानव-मूल्‍यों से लद कर ऐसा परमशरीर बन जाता, जो सर्वथा कल्‍याण प्राप्ति और अर्पण मति का संवाहक होता। यह अनुमान नहीं है। यदि गांधी के निदर्शन पर चला जाता तो निश्‍चय ही ऐसा होता। लेकिन नहीं बहुराष्‍ट्रीयता के नाम पर, असभ्‍यता के वाहक पश्चिम देशों ने सभ्‍यता और मानवोचित मूल्‍यों के पालक भारत को भी भारतीय कांग्रेस के नेतृत्‍व में एक भोगवाद की अपसंस्‍कृति में परिवर्तित कर दिया है। कहने को तो हम एक विश्‍वग्राम में परिवर्तित हो चुके हैं। परन्‍तु मानवीय अवधारणा, संकल्‍पना में हम स्‍वयं से भी विलग हो चुके हैं। मात्र उपभोग के लिए समर्पित और इस हेतु तैयार एक उत्‍पाद बन चुके हैं।

      जैसे प्रत्‍येक व्‍यक्तित्‍व में एक कमी होती है, उसी प्रकार गांधी जी में भी एक कमी थी। उन्‍होंने सरदार भगत सिंह और चन्‍द्र शेखर आजाद जैसे क्रान्तिकारियों के राष्‍ट्र संचालन सूत्रों को अपने हिन्‍द-स्‍वराज के सिद्धांत के सा‍थ मिल जाने दिया होता, और तत्‍पश्‍चात राष्‍ट्र निदर्शन तैयार होता तो निश्चित रुप से आज के भारत की स्थिति गांधी जी और नेहरु के वैचारिक टकराव के कारण नेहरुमय (गई गुजरी) न होकर गांधी जी और क्रान्तिकारियों के सर्वोच्‍च सिद्धांतों से मिल कर रामराज्‍य के समान होती।



 

Sunday, April 21, 2013

राख भावनाओं पर अवाक राष्‍ट्र



बेबस बचपन


लेक्‍ट्रॉनिक मीडिया से मोहभंग हुए तीन वर्ष व्‍यतीत हो गए। हिन्‍दी समाचार पत्रों को मात्र भाषा मानकों का अध्‍ययन करने हेतु लेता हूँ। जनसंचार माध्‍यमों द्वारा दी जानेवाली भ्रष्‍टाचार, बलात्‍कार, नकार, विकार सम्‍बन्‍धी सूचनाएं प्राप्‍त कर हम क्‍या करेंगे! बुराईयों के विरुद्ध लड़ने, कुछ करने के हमारे अधिकारों को जब कानूनी पहेलियों में उलझा दिया गया हो। कानून एक नि:शक्‍त अवधारणा के अतिरिक्‍त कुछ भी प्रतीत नहीं हो रहा हो। तब इस का उपहास करने की विवशता ही जनता के पास होती है। ऐसे में लोकतान्त्रिक मानदण्‍ड निजी राय और विचार थोपने तक ही सिमट कर रह गए हैं। जनकल्‍याण की बात तो दूर की है अपने हाल पर भी लोगों को रहने नहीं दिया जा रहा है। व्‍यतीत छह दशक सत्‍ता-प्रतिष्‍ठानों के नेतृत्‍व में जनमानस की मिट्टी को ऐसे विकृत करते हुए निकले हैं, मानो इस समयकाल के नेतृत्‍वकर्ताओं को मनुष्‍य से अधिक हिंस्र पशुओं को बसाने की चिंता रही हो।
     दो राय कहां हैं इसमें कि नेतृत्‍वकारों को मनुष्य से अधिक पशुओं की चिंता है। वो भी जितना अधिक हिंस्र पशु होगा, उसकी उतनी अधिक चिंता होगी। उस पर आवश्‍यकता से अधिक मुद्रा और समय खर्च करने के बाद भी तन्‍त्रात्‍मक अधिपति विचलित नहीं होते। उन्‍हें ज्ञात है इसकी भरपाई भी उसी सज्‍ज्‍न समुदाय के श्रमदान से होगी, जो अनेक माध्‍यमों से हिंस्र पशुओं की हिंसा झेल रहा है। अचानक हुई गोलीबारी में मरें अपने लोग। परेशान हों उनके सम्‍बन्‍धी। देश, समाज, अर्थव्‍यवस्‍था सब पर पड़े अतिरिक्‍त चिंता का भार। समुचित साक्ष्‍य होने पर भी दोषी को मृत्‍युदण्‍ड देने के लिए सरकार विवश। तब गोलीबारी करनेवाले पर कानून चार-पांच वर्ष तक अपना न्‍यायिक अध्‍ययन करता है। सत्‍ता-प्रतिष्‍ठान आतंक-तन्‍त्र तक पहुंचने का सूत्र बताकर उसकी सेवा-सुश्रूषा करता है।
चार माह पूर्व जिन पशुओं ने बसंत विहार सहित दुनिया को विकृत किया था और उससे पूर्व, उस समय तक, उसके बाद और अब तक उन जैसे पिशाच विकृति की जिन नई पराकाष्‍ठाओं को नित लाघंने पर लगे हुए हैं और दण्‍ड के नाम पर उनका समय आराम से व्‍यतीत करवाया जा रहा है, उससे सज्‍जन मनुष्‍य की दशा-दिशा दिग्‍भ्रमित हो गई है। सीधे व्‍यक्ति का विवेक तिरोहित हो गया है। अब फिर एक बार और जब हमारे कान दिल्‍ली, गांधी नगर, बच्‍ची, पांच वर्ष, बलात्‍कार, बसंत विहार से भी जघन्‍य अपराध जैसे शब्‍द-युग्‍मों को सुन रहे हैं और मन-मस्तिष्‍क इन सबसे क्षुब्‍ध हो कर इनकी अनदेखी कर देश से दूर कहीं जंगल में जाने का विचार कर रहे हैं, तो आत्‍मा की ध्‍वनि पर रुक कर हमारा दूसरा मन हमसे विकराल-विपरीत परिस्थितियों से लड़ने को कहता है।
     लेकिन मैं परिस्थितियों से युद्ध करने की भावना के इस ज्‍वार से बाहर आता हूँ तो कुछ और ही पाता हूँ। परिस्थितियों से लड़ने का विचार इतना कमजोर है कि दिन के चौबीस घंटे तक भी यह स्थिर नहीं हो पाता। जबकि अपसंस्‍कृतियों के आक्रमण से तहस-नहस भारत को, इसके निवासियों को विकृतियों के जड़मूल नाश हेतु सदियों तक निरंतर संघर्ष करने की जरुरत है। क्‍या मैं, आप और हम सब इसके लिए तैयार हैं? पिशाचों को पराजित कर जीवन को साफ-सुथरा बनाने का हमारा संकल्‍प निश्चित रुप से हमारी भावनातिरेक के बने रहने तक है और इसके निरंतर बने रहने की आशा बहुत कम है।
     कार्यालय कैंटीन में एक साथी के साथ पीड़ित बच्‍ची के बाबत गुमसुम शब्‍दों में विमर्श हो रहा था। दूर दूसरी टेबल पर बैठे व्‍यक्ति को विमर्श के विषय का भान हो आया था। निकट आ कर बैठते ही उसने कहा, "लद्दाख में चीनियों ने चौकी लगा ली है। यहां एक बच्‍ची के साथ हुई दुर्घटना पर ही सारा राष्‍ट्रीय तामझाम लगा हुआ है। परिणाम क्‍या होगा ये सभी जानते हैं। चार माह पूर्व के पिशाचों का क्‍या हुआ। ये तो पीड़ित के अभिभावकों ने पुलिसवालों से पैसे नहीं लिए इसलिए मामला आग बन गया। वरना इस देश में ये नई बात थोड़े ही है। इस चहुंओर के शोर में अब भी कई स्‍थानों पर मासूमों, अबलाओं पर अत्‍याचार हो रहे होंगे। उनकी चिंता कौन करेगा! उन्‍हें सुरक्षा, सुविधा, चिकित्‍सा कौन देगा! तुर्क, मुगल, अंग्रेज सबने भारत पर राज किया है। एक बार चीन को भी मौका देने में क्‍या बुराई है। स्‍वयं के बनाए गए नियमों पर ढंग से चलना तो अभी बहुत दूर की बात है। हम तो अंग्रेजों के छोड़े गए देश चलाने के तरीकों को ही ठीक से लागू नहीं कर पा रहे हैं। जब यहां वालों ने कुछ नहीं करना तो चीन आए या जापान क्‍या बुराई है! कम से कम आधुनिकता को संभालने का उनका तरीका तो यहां के लोगों को पसंद आ ही जाएगा। रही देशभक्ति की बात तो वह छोटे बच्‍चे तक के लिए एक गंदा चुटुकुला बनी हुई है"। मैं उस व्‍यक्ति के मुख से नई और विचारणीय बात सुन कर अवाक था।

Saturday, April 20, 2013

अपना दु:ख मैं ना बोलूंगा




आकाश का घन, मेरा मन
 अपना दु: मैं ना बोलूंगा
दूजे की सुनता जाऊंगा
अपनी अपने मन में रहेगी
वहीं उठेगी वहीं दबेगी
अपना दु:ख बतलाए बिना,
कितने ही मर जाते हैं
अपना दु:ख बतलाने वो,
फिर कब धरती पर आते हैं
ऐसा ही मानव बन जाना
मैंने भी है सीख लिया
कब दु:ख के तानेबाने ने
हमको सच्‍चा प्रेम दिया

Wednesday, April 17, 2013

अवचेतन मन का प्रवाह



दोस्‍तों की याद के साथ, शाम और रात का मिलन
ठोस व्‍यस्‍तता के बावजूद एक बार फिर मन को बाहर उड़ेलने बैठा हूँ। दिन के रात में मिलने और परिणामस्‍वरुप उभरनेवाले प्रकृति प्रभावों को देख घर में आने का मन नहीं हुआ। काम के बोझ का विचार विवश कर गया अन्‍दर आने को। लेकिन तब भी ठान ली कि आज ब्‍लॉगर दोस्‍तों के लिए कुछ लिखूंगा। गर्मी है पर दिन ढलने पर चलती, लगती हवा ने नवप्राण दे दिए। 
    छुट्टी का दिन था आज। सोचा एक घंटे सो जाऊं। नींद में उतरा ही था कि लगा जैसे कोई मुझे हिलाते हुए उठा रहा है। अज्ञात सपनों को पकड़ने की कोशिश में आंखें नहीं खोलीं। सात सेकंड तक खाट सहित हिलता रहा तो देखना पड़ा कौन है। कोई नहीं था। भूकंप आ रहा है, तुझे भी लगा, मैं तो यहां बैठा हुआ था, मैं तो टीवी देख रही थी, जोर-जोर से सब हिलने लगा-ऐसी आवाजें सुनाई दीं तो बाहर देखा लोग सड़क पर आए हुए थे। दोपहर सवा से साढ़े चार के बीच का समय था ये। 
     एक महीने पहले तक हरे पत्‍तों से सघन घर के सामनेवाले बेलवृक्ष के पुराने हरे-पीले पत्‍ते सूख कर झड़ रहे हैं। उसकी शाखाएं ऊपर से धीरे-धीरे खाली हो रही हैं। पके अधपके बेल अब साफ दिखाई देने लगे हैं। गिरे हुए पत्‍तों को नीचे रहनेवालों ने इकट्ठा कर जलाने का उपक्रम बनाया हुआ है। छत पर टहलते हुए शाम का रात में बदलना देखता रहा। झड़झड़ खड़खड़ करके झकझोर कर हिलता बेलवृक्ष हवा आने, उसके स्थिर रहने का संचार माध्‍यम बना हुआ है। पश्चिम आकाश के भाग में ऊपर अर्द्धचन्‍द्र, पहरेदारों के रुप में उसके दाएं-बाएं खड़े सितारों को अभी दिन रहते-रहते देखना एक उत्‍ताल भावना से  गुम्फित करता है। नभमंडल में चांद के निकट छितरे हुए पारदर्शी सफेद बादल देखते-देखते अदृश्‍य हो जाते हैं। आकाश के पूर्वी भाग पर सफेद बादलों के बड़े-बड़े चित्रखण्‍ड अब भी मौजूद हैं। दूर आधुनिक अट्टालिकाओं से गुंथा हुआ आसमान संध्‍या और रात्रि मिलन के लिए अपरिभाषित रंगों का मिश्रण बना हुआ है।
     ब्‍लॉगर मित्रों के साथ एक जानकारी साझा करनी है यह विचार अचानक दिमाग में आया और मैं आकाश, चांद-सितारों को बाद में देखने के संकल्‍प के साथ कमरे में आ कर कम्‍प्‍यूटर पर बैठ गया हूँ। एक हिन्‍दी अखबार में ब्‍लॉग जगत, सूचना प्रौद्योगिकी के खिलाड़ियों के लिए कुछ अच्‍छी खबर थी। शनिवार 13 अप्रैल 2013 को इसमें प्रथम पृष्‍ठ के सबसे नीचे (खुद ही तय करें, मौत के बाद कौन पढ़े ई-मेल) शीर्षक से खबर आई थी। इसमें किसी ई-मेल धारक के निधन के बाद उसके ई-मेल अधिकारों के हस्‍तांतरण, किसी के द्वारा मृतक के ई-मेल और उससे सम्‍बन्धित आंकड़ों के गलत प्रयोग की आशंकाओं को समाप्‍त करने के क्रम में गूगल के (इनेक्टिव अकाउंट मैनेजर) के बाबत लिखा गया था। ब्‍लॉगर दोस्‍तों के लिए मैं वह लिंक यहां लगा रहा हूं। हिन्‍दुस्‍तान
     गूगल के इस भावनात्‍मक निर्णय के लिए मन में खुशी का संचार हुआ था। लगा कि मेरे मन में कुछ दिन पहले तक जिन ब्‍लॉगर मित्रों की राजी-खुशी की कामना के साथ भविष्‍य में उनसे विलग होने की जो बुरी परन्‍तु सच्‍ची भावना जागृत हुई थी, उसको साझा करने का समय आ गया है। ये कैसा अनुभव होता है कि जिन मनुष्‍यों को हम अपने आसपास गतिमान देखते हैं, एक दिन वे यादें बन जाते हैं। यादें शब्‍द से पहले मात्र इसलिए नहीं लगाया कि किसी की (यादें) उसकी मनुष्‍यगति से अधिक सशक्‍त होती हैं। जीते जी यदि कोई व्‍यक्ति समुचित सत्‍कार नहीं पा सका हो, लेकिन जीवन-पराजय मिलने पर उससे अनजान व्‍यक्तिगण भी अपनी स्‍मृतियों में उससे निस्‍वार्थ, निष्‍छल, निष्‍कपट भाव-सम्‍बन्‍ध बनाते हैं। मुझे और आपको कई बार ऐसा लगता नहीं कि कभी कहीं आते-जाते चाहे-अनचाहे देखे गए, केवल देखे गए किसी गुजर चुके व्‍यक्ति की याद अचानक आ जाती है। आधुनिकता, समय की कमी, दुश्चिंताओं के कारण ऊपरी तौर पर बेशक हम स्‍वयं को स्‍वार्थी समझें या अपनी व्‍यक्तिगत कमियों के चलते अपने को दुत्‍कारें कि जो होना, किया जाना चाहिए वह नहीं हो रहा है। पर हमारे अवचेतन मन का प्रवाह बड़ा ही विचित्र है। उसमें सभी के लिए चिंताएं हैं। उसकी पकड़ तात्विक तो है परन्‍तु वहां स्थिरता संकुचित हो जाती है। वह हर गतिविधि के ठीक होने, प्रत्‍येक मनुष्‍य के सुखी होने की कामना में चिंताओं का ऐसा बियाबान बन जाता है, जो अनचाहे ही अग्नि की चपेट में आकर भष्‍म हो जाता है।
     वैसे तो ऐसी भावनाएं कविताओं के माध्‍यम से ज्‍यादा मुखर हो कर बाहर आतीं। पर मैं देर में और अत्‍यन्‍त संवेदन होने पर अचानक लिखी जानेवाली कविता तक अपने मन की कहने की प्रतीक्षा नहीं कर सकता था। इसलिए संस्‍मरण को आधार बनाया। एक-दूसरे के ब्‍लॉग पढ़ने, परस्‍पर टिप्‍पणियां करते रहने के फलस्‍वरुप इस जगत से गहन लगाव हो गया है। इसलिए अब अपने अंत:करण में प्रभु स्‍मरण करते हुए उनकी कृपादृष्टि को ब्‍लॉग दुनिया के मित्रों तक फैलाने, बनाए रखने की प्रार्थनाएं करता हूँ।

Friday, April 12, 2013

एफडीआई और महंगाई



वालमार्ट का खेल, एफडीआई झेल


यूपीए ने पूंजी लाभ कमाने में दलाली की सीमा पार कर दी है। नौ साल पहले जब ये केन्द्र की सत्ता में आयी तो इसके पास एनडीए की सन्तुलित और बेहतर अर्थनीतियों को विस्तार दे कर देश को लाभान्वित करने का अच्छा अवसर था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। लोगों के बेहतर जीवन के लिए आर्थिक गतिविधियों के समुचित बने रहने देना भी इसे रास नहीं आया। यदि यूपीए सत्ता में आकर एनडीए की अर्थ समावेशी नीतियों को आगे बढ़ाता तो यकीनन भारत की विकास दर दुनिया के लिए एक आदर्श होती! लेकिन नहीं, विरोधी पार्टी के रूप में भाजपा और सहयोगियों दलों की जनकल्याणोन्मुखी अर्थनीति से भी कांग्रेस को परहेज था। यह जानते हुए भी कि सत्ता में आकर कोई भी पार्टी यही काम तो देश के लिए करना चाहेगी, उसने मंदी में फंसे यूरोपीय देशों के आर्थिक मॉडल और विश्व व्यापार संगठन की मनमानी को चुपचाप अपना लिया। परिणामस्वरूप विगत आठ वर्षों में एक धनी वर्ग के विलासी जीवन का सपना सच करने के लिए देश के अधिसंख्य जीवन के रहन-सहन को अत्यधिक खर्चीला बना दिया गया है।
     ज्यादा पैसे कमानेवाले वर्ग और आम आदमी की क्रयशक्ति में सरकार को कोई अन्तर नजर नहीं आ रहा है। सब्सिडी के नाम पर किसानों, गरीबों, वंचितों को मुहैया सिलेंडर, डीजल, राशन वितरण की कांग्रेस सरकार की सेवाएं कभी भी दलाली से मुक्त नहीं हो पायीं। गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करनेवालों को प्रदान की जा रही तरह-तरह की सेवाओं की सब्सिडी अनिश्चित समय तक बनी रह सकती थी। लेकिन अल्पसंख्यक और साम्प्रदायिक इन दो शब्दों के जाल में इस देश में विगत एक दशक में जिस बड़ी जनसंख्या का आयात हुआ है, उसने इस देश के गरीबों का हक भी मार दिया। सत्ता में बने रहने के खेल में चाहे-अनचाहे भारत में घुसे ऐसे लोगों को पहचान कर बाहर खदेड़ने के बजाय उलटे उन्हें वोट बैंकिंग का अहम कारक बना दिया गया है। कह सकते हैं कि उनकी देश के उपभोज्य संसाधनों में बढ़ती हिस्सेदारी से ही सरकार ने वस्तुओं के मूल्यों में अतिशय वृद्धि की है। मतलब मनरेगा जैसी योजनाओं की जरूरत इसलिए नहीं पड़ी कि इससे भारतीय गरीबों का भला होता, इसकी आवश्यकता के पीछे की साजिश में वह मत-लालच ही था, जिसके दम पर मौजूदा सरकार अपने कार्यकाल को निरन्तर बढ़ाना चाहती है और देश को भ्रमित करके मनमाने तरीके से पूंजी पोषण करते रहना चाहती है। 
          आज यदि कालेधन के लिए कोई विधेयक अभी तक नहीं बन पाया है तो इसके लिए संसद में मानसून या किसी सत्र में कामकाज नहीं होने का बहाना नहीं बनाया जा सकता। इसके लिए खुद सत्तासीन जिम्मेदार हैं। पिछले लगभग एक दशक से सरकार के समानांतर एक और सरकार चल रही है। इसने वैध रूप से धन निवेश करने के बजाय माल, मल्टिप्लेक्सेस, कुकरमुत्तों की तरह फैले निजी कॉलेजों को खोलने का जो अभियान चलाया, उसका उद्देश्‍य कालेधन को ठिकाना लगाना ही था। विडंबना ही है कि देश में सरकारी स्तर पर कॉलेजों, अस्पतालों, विद्यालयों की उस संख्या में स्थापना नहीं की गई जितनी कि आम आदमी की जरूरत के विपरीत बिग बाजारों, माल और निजी कॉलेजों को खोल दिया गया।
     फिल्मों के कारोबार में भी अवैध पूंजी का बहुत ज्यादा निवेश होता रहा है। इसी के चलते कई फिल्मी अभिनेताओं और अभिनेत्रियों की हत्या कर दी गई। लेकिन इस पर कोई समिति गठित करने या इसकी छानबीन करने की कोशिश भारत सरकार ने उस तरह से नहीं की, जिस तरह से धार्मिकता साम्प्रदायिकता के नाम पर वह अदालत के साथ मिलकर चाक-चैबन्द हो कर हिन्दू विरोधी दर्शनों का विरोध करती रही है।
    सरकारी मंशा तो यही लगती है कि अकूत कालेधन को ठिकाने लगाने के लिए माल, आईपीएल, बिग बाजार, अयोग्य छात्रों की संख्या बढ़ाते निजी कॉलेजों इत्यादि जैसे धननिवेश मार्गों से वह पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं कर पा रही है। इसलिए अब उसने कालेधन को एक बार में ही श्वेत करने का निर्णय एफडीआई यानी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के रूप में किया है। उसे इस बात की चिंता कतई नहीं है कि जनादेश इसकी अनुमति देगा या नहीं। उसने तो अपनी दलाली मजबूत करने के क्रम में एक कदम और बढ़ाया है। इससे जिसको नुकसान होगा वह है इस देश की आम जनता, जिसके बारे में किसी भी विदेशी नीति पर निर्णय करते समय कभी भी सोचा ही नहीं जाता है। संवैधानिक लोकतान्त्रिक प्रणाली की धज्जियां कैसे उड़ती हैं इसकी बानगी तो विपक्ष के साथ सरकार के सहयोगी दलों द्वारा महंगाई और एफडीआई के विरूद्ध आहूत भारत बन्द के जवाब के तौर पर सरकार द्वारा एफडीआई लागू करने की अधिसूचना जारी करते ही पेश हो गई थी। उसे इसका बिलकुल भी आभास नहीं था कि त्रृणमूल कांग्रेस के सांसदों के इस्तीफे देने के बाद आधिकारिक तौर पर सरकार अल्पमत में थी और वह सरकार में सम्मिलित घटक दलों के साथ ज्वलंत एफडीआई मुद्दे पर आम सहमति बनाए बगैर इसकी अधिसूचना कैसे जारी कर सकती थी! इस देश की जनता पूछ रही है कि यह नाटक क्यों खेला जा रहा है? क्या लोकतन्त्र ध्वस्त होने के कगार पर पहुंच गया है?


Wednesday, April 10, 2013

नाम बड़े दर्शन छोटे



दो नावों की सवारी, भारत पर भारी


कुछ अनुभव पीछा नहीं छोड़ते। विशेषकर जब ये देश, संस्कृति, सभ्यता और भाषा से जुड़े हों तो मन-मस्तिष्क पर सदैव हावी रहते हैं। प्रायः हम अपने बच्चों का नामकरण विशुद्ध हिन्दी या संस्कृतनिष्ठ शब्दों में करते हैं। उनके जन्म सम्बन्धी और अन्य आयोजनों का निर्वाह हिंदू कर्मकांड प्रथा के साथ सम्पन्न करते हैं। अपने और अपने परिवार की कुशलक्षेम के लिए दैनंदिन के पूजाकर्म करते हैं। ईश्वर के प्रति आस्थावान रहते हैं एवं प्रयत्न करते हैं कि बच्चे भी इस संस्कृति का अनुसरण करते हुए अपना जीवन संचालित करें। लेकिन विडंबना देखिए कि आम जीवन में हम इन हिन्दू संस्कारों के विपरीत आचरण करते हैं। बच्चों को अंग्रेजी की शिक्षा प्रदान कर रहे विद्यालयों में पढ़ाते हैं। सुबह से सायं तक उनके साथ अंग्रेजी भाषा में वार्तालाप करते हैं। बच्चों से उनका नाम पूछने पर सुनने में आता है......आरव, काव्य, निधित्व, शिवांगी, अनुष्का, ऐश्वर्य आदि। माता-पिता का नाम पूछने पर उत्तर में एस. शर्मा, एल.एन. मिश्रा, वी. सी. विज सुनाई देता है। विद्यालय की जानकारी मांगो तो मांटेसरी, समरविले, डी.ए.वी., सेंटर स्कूल और कक्षा के बारे में पूछा जाता है तो नर्सरी, के.जी. फर्स्‍ट व सेकेंड सुनते रहो। कहने का तात्पर्य है कि नाम को छोड़ कर बाकी सब कुछ जैसे भोजन, वस्त्र, मनोरंजन, घर, परिवार सब अंग्रेजियत के पराभूत है। देश के संचालनकर्ता, शिक्षा प्रशासक और घर-परिवारी ये कौन सी जीवन-यात्रा कर रहे हैं, जिसमें दो नावों पर पैर रख कर आगे बढ़ने की प्रवृत्ति पनप रही है? ऐसे चलते रहने से न तो अपना धर्म, संस्कार, संस्कृति, भाषा फलीभूत होगी और ना ही पाश्चात्य अपसंस्कृतियां हमारा भला कर सकेंगी। यह तो अन्धेरी गुफा में अलक्षित मार्ग पर आंख मूंद कर चलने की आत्मघाती प्रवृत्ति है, जिससे अंततोगत्वा विनाश के व्यूह की ही रचना होगी। जब हमारे मन में अपने बच्चों के विशुद्ध हिन्दी नाम रखने की इच्छा है तो हम उन्हें हिन्द भूमि की शिक्षा, संस्कार, संस्कृति, सभ्यता क्यों नहीं सिखाते हैं? क्यों उन्हें उनके नामों जैसा नहीं बनाते हैं? हमारी शिक्षा और सभ्यता में जीवन का समस्त सुन्दर आभास है, मानवता की सच्ची लगन है, सज्जनता की गहराई है। और जहां ये सब मानवोचित श्रेष्ठ गुण हों वहां की भाषा, शैक्षिक वातावरण को नहीं अपना कर हम अपने और बच्‍चों के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात कर रहे हैं। कह सकते हैं कि भारत देश के सन्दर्भ में आज नाम बड़े दर्शन छोटे’’ की कहावत एकदम सटीक है।

Monday, April 8, 2013

सम्‍मेलनों का औचित्‍य




विवार को नई दिल्‍ली स्थित विज्ञान भवन में मुख्‍यमन्त्रियों एवं मुख्‍य न्‍यायाधीशों के सम्‍मेलन के उदघाटन के बाद दिए गए अपने व्‍याख्‍यान में प्रधानमन्‍त्री ने स्‍वीकारा कि दिल्‍ली सामूहिक बलात्‍कार दुर्घटना ने सरकार को कानून बदलने हेतु बाध्‍य किया। उनके अनुसार अभी भी महिलाओं के विरुद्ध अपराधों से लड़ने के लिए बहुत कार्य किया जाना बाकी है। न्‍यायिक सुधारों एवं विधि प्रक्रियाओं में परिवर्तन की मांग के महत्‍व में वृद्धि के बाबत समझाते हुए उन्‍होंने कहा कि ऐसे में यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विवेक और तर्क की आवाज क्षणिक आवेश में झूठी गवाही में न बदले। प्राकृतिक न्‍याय के मूल तत्‍व और समय के साथ परखे गए सिद्धांतों का उन तीखे स्‍वरों को संतुष्ट करने हेतु समझौता नहीं होना चाहिए जो प्राय: हमारे राजनीतिक संवाद को परिभाषित करते हैं और कई बार न्‍याय तथा तर्क की अपीलों को गिराने में सफल होते हैं।   

            प्रधानमन्‍त्री के उपरोक्‍त वक्‍तव्‍य में महिला सुरक्षा और न्‍याय व्‍यवस्‍था हेतु किसी समुचित नवीन कानून तथा उसके त्‍वरित कार्यान्‍वयन की इच्‍छाशक्ति का सर्वथा अभाव है। महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में वृद्धि और इसके लिए कानून की सक्रियता के बाबत उनका सम्‍बोधन श्रृंगारिक शब्‍द-विन्‍यास भर है। क्‍या इससे वास्‍तविकता में कोई अन्‍तर पड़ेगा? श्रीमान प्रधानमन्‍त्री जी जब राष्‍ट्र के सम्‍बन्‍ध में सभी लोक निर्माण कार्य करने के शीर्ष अधिकार लोकतान्त्रिक व्‍यवस्‍था के अन्‍तर्गत आपके पास विद्यमान हैं तो फिर आप किससे कह रहे हैं कि ये करना चाहिए वो होना चाहिए। और जब ऐसे अधिकार कांग्रेस दल के पास पिछले छह दशकों से हैं तो क्‍या तब भी न्‍यायिक अकर्मण्‍यता, अव्‍यवस्‍था, अस्थिरता के लिए आप सार्वजनिक मंचों से विवशता का रोना रोते रहेंगे।

      कार्यपालिका, विधायिका, न्‍यायपालिका के बीच समन्‍वयकारी भावना का सच कानून मन्‍त्री की उपस्थिति में मुख्‍य न्‍यायाधीश ने स्‍वयं ही स्‍वीकार किया है। उनके अनुसार भारतीय प्रशासनिक सेवा की तरह अखिल भारतीय न्‍यायिक सेवा का सृजन करने पर राज्‍यों में कोई सहमति नहीं है। एक हां कहता है तो दूसरा नहीं। यह विषय पिछले चार वर्ष से अटका हुआ है। दूसरी ओर उच्‍च न्‍यायालय में वर्तमान नियुक्ति प्रक्रिया के स्‍थान पर न्‍यायिक नियुक्ति आयोग बनाने के सरकार के प्रस्‍ताव का मुख्‍य न्‍यायाधीश विरोध करते हैं। उनके अनुसार वर्तमान प्रक्रिया पूर्णत: पारदर्शी है। इसमें परिवर्तन की आवश्‍यकता नहीं है। सरकार और न्‍यायपालिका के इन परस्‍पर विरोधाभासों के चलते समुचित सामाजिक विकास मात्र एक कोरा सपना बन कर रह गया है।

      ऐसे अदूरदर्शी वक्‍तव्‍यों से तो यही लगता है कि दिल्‍ली बलात्‍कार घटना पर यदि युवा आंदोलन नहीं होता तो सरकार अपराध कानून में परिवर्तन नहीं करती। यह देख आभास होता है कि भविष्‍य में भी ऐसी ही विडंबनाएं बनी रहेंगी। अर्थात् जब तक किसी दुर्घटना पर सामाजिक दबाव नहीं बनेगा सरकार उस के निराकरण हेतु कोई पहल नहीं करेगी। यदि सरकार सकारात्‍मक सामाजिक परिवर्तन के लिए हर बार जनता का ही मुंह ताके कि जब किसी दुर्घटना पर जन आंदोलन होगा तब ही वे कुछ कदम उठाएंगे तो फिर उनका अपना विवेक, नीति और निर्णय क्‍या हैं और किस लिए हैं।

 सरकार को राष्‍ट्र की बिगड़ती स्थितियां स्‍वीकार करने में हिचक नहीं हो रही है। पर बिगड़ती स्थितियों के लिए वह स्‍वयं को समाज के समुचित प्रतिरोध पर भी एक सुरक्षित स्थिति में रखने का प्रयत्‍न कर रही है लोगों की भलाई के लिए लोकतंत्रात्‍मक अधिकारों का प्रयोग करने में सरकारी विफलता का दोष लोगों पर नहीं लगाया जा सकता। मात्र दीप-प्रज्‍वलन, व्‍याख्‍यान, जलपान, मनोरंजन तक सीमित रह जानेवाले ऐसे सम्‍मेलनों का औचित्‍य क्‍या रह जाता है यदि इनके आयोजन के बाद भी राष्‍ट्रीय स्थितियां पूर्ववत ही बनी रहें।


Sunday, April 7, 2013

सीजीएचएस और निजी चिकित्‍सालयों का संघर्ष




सीजीएचएस और 
निजी चिकित्‍सालयों का संघर्ष



राष्‍ट्रीय समाचारपत्र के अन्‍दर के पृष्‍ठ पर लघु समाचारलापरवाही के चलते सीजीएचएस पैनल से हटे अस्‍पताल। सीजीएचएस (सेन्‍ट्रल गवर्नमेंट हेल्‍थ स्‍कीम) अर्थात् केन्‍द्र सरकारी स्‍वास्‍थ्‍य योजना। सरकारी सेवा में कार्यक्षमता से पूर्ण समयकाल, युवा शरीर, मस्तिष्‍क लगाने के बाद प्रत्‍येक कर्मचारी की इच्‍छा होती है कि वह अपना बुढ़ापा पेंशन, स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाओं के भरोसे काटे। पेंशन तो चलो सेवामुक्‍त कर्मचारियों को मिल रही है और यह आवश्‍यक भी है। अन्‍यथा ऐसे युग में जब अधिकांश बच्‍चे चाहे-अनचाहे अपने मां-बाप से अलग रहने को विवश हैं और कुछ तो बच्‍चों की अनदेखी से अनाथालयों में दिन काट रहे हैं, पेंशन का अत्‍यधिक सहारा है। कहा भी जाता है कि ये पेंशन नहीं प्राण है। निश्चित रुप से आज के समय में नौकरी से मुक्‍त लोगों के लिए पेंशन प्राण समान ही है। परन्‍तु भविष्‍य में सीजीएचएस के अन्‍तर्गत निजी चिकित्‍सालयों में नि:शुल्‍क स्‍वास्‍थ्‍य उपचार कराना सेवानिवृत्‍त वृद्धजनों के लिए कठिन होता जाएगा। बीमारियों की उपचार दरों को न्‍यायसंगत बनाने और भुगतान में विलंब जैसे कारणों से कुछ शीर्ष निजी चिकित्‍सालय सीजीएचएस चिकित्‍सालयों की सूची से हट गए हैं।
इस कारणवश सरकारी और सार्वजनिक उपक्रमों के हजारों कर्मचारी सीजीएचएस योजना के अन्‍तर्गत शीर्ष निजी चिकित्‍सा संस्‍थानों में चिकित्‍सा सेवा प्राप्‍त नहीं कर सकेंगे। शुक्रवार को केन्‍द्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय ने दिल्‍ली स्थित श्री बालाजी एक्‍शन मेडिकल इंस्‍टीट्यूट को  सीजीएचएस में सम्मिलित चिकित्‍सालयों की सूची से हटा दिया है। इस वर्ष कम से कम अन्‍य पांच शीर्ष निजी चिकित्‍सालयों को भी सीजीएचएस की सूची से हटाया गया है। इनमें एस्‍कार्टस हार्ट इंस्टिट्यूट एंड रिसर्च सेंटर, मैक्‍स सुपर स्‍पेशलिटी हॉस्पिटल, मैक्‍स देवकी हार्ट एंड वस्‍कुलर इंस्टिट्यूट और गर्ग हास्पिटल्‍स सम्मिलित हैं।
सीजीएचएस का लाभार्थी बेहतर स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाएं प्राप्‍त करने के उद्देश्‍य से निजी चिकित्‍सालय में भर्ती हो कर अपनी चिकित्‍सा कराता है। चूंकि उसे इस हेतु एक पाई नहीं देनी पड़ती इसलिए वह अपनी पूर्ण शारीरिक जांच करवा लेता है। जांच के दौरान पाए गए रोगों का निदान होने के उपरांत जांच, रोग निदान और इसमें प्रयुक्‍त हुए चिकित्‍सा यंत्रों व दवाईयों का बिल जब सीजीएचएस पैनल को भेजा जाता है तो वह इसका समुचित मिलान करने में ही अधिक समय लेता है। सम्‍बन्धित चिकित्‍सालय द्वारा पैनल को भेजे गए लाभार्थी रोगियों के बिलों से पैनल के डॉक्‍टर कभी भी संतुष्‍ट नहीं होते। उनका आरोप होता है कि चिकित्‍सालय ने प्रत्‍येक चिकित्‍सा सेवा मद के निर्धारित मूल्‍य में अतिशय वृदि्ध करके बिल बनाया है। जबकि निजी चिकित्‍सालयों का मत होता है कि उन्‍होंने अंतर्राष्‍ट्रीय मानदण्‍डों के अनुसार रोग निदान, चिकित्‍सा सुविधाएं प्रदान की हैं। उनके अनुसार स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय सरकारी चिकित्‍सालय में प्रदान की जानेवाली चिकित्‍सा सेवाओं के खर्चे के अनुरुप निजी चिकित्‍सालयों के बिलों पर विचार करते हैं। जबकि सभी को ज्ञात है कि निजी व सरकारी चिकित्‍सा सेवाओं और सुविधाओं में क्‍या अन्‍तर है। फलस्‍वरुप सीजीएचएस पैनल व निजी चिकित्‍सालयों के मध्‍य विवाद बढ़ते हैं और विवादों को उपभोक्‍ता फोरम एवं न्‍यायालयों के द्वारा सुलझाने की प्रक्रिया में सेवानिवृत्‍त लोगों की नि:शुल्‍क स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल का सीजीएचएस का मुख्‍य उद्देश्‍य नेपथ्‍य में पहुंच जाता है। अब इसे सरकारी कमी कहें या निजी चिकित्‍सालयों की मनमर्जी यह इतना विचारणीय नहीं है, जितना कि लाभार्थियों के सम्‍मुख आ खड़ा हुआ नि:शुल्‍क स्‍वास्‍थ्‍य सेवा प्राप्‍त करने का संकट।
सेवानिवृत्ति के बाद यह कोई अकेला संकट नहीं है, जिसे सरकारी कर्मचारी झेलेंगे। चार वर्ष पूर्व सेना की (एक रैंक एक पेंशन) जैसी समस्‍या के बाबत सेना से सेवानिवृत्‍त होनवाले सिपाहियों, अधिकारियों और जनता को व्‍यवस्‍था की प्रशासनिक कमी का भान हुआ था। यह सामान्‍य बात बिलकुल नहीं थी। क्‍योंकि सैन्‍य प्रतिष्‍ठान सरकार से सम्‍बद्ध है। और सरकारी ढील के कारण ही ऐसे प्रतिष्‍ठान के सेवामुक्‍त कर्मचारियों को भी पद व पेंशन जैसी समस्‍या झेलनी पड़ी।
      समस्‍या का दूसरा पहलू देखें तो यहां वे छोटे-मोटे सरकारी कर्मचारी दिखाई देंगे, जिन्‍हें प्रथम दृष्‍टया हम समस्‍याओं का कारण मानते हैं। जबकि ऐसा भी नहीं है कि सरकारी कर्मचारी कार्य नहीं करना चाहते। पर उन्‍हें कार्य करने के लिए शासन से स्‍पष्‍ट दिशानिर्देश तो मिले। सामान्‍यत: बाबू और छोटे सरकारी अधिकारियों द्वारा किए जानेवाले कार्य तब ही सुचारु हो सकते हैं जब उनसे बड़े अधिकारियों के किसी विशिष्‍ट कार्य संबंधी सभी निर्णय, नीतियां, दिशानिर्देश सही समय और दृष्टिकोण से हों। बड़े अधिकारियों की भी निर्णय लेने की क्षमता, नीतियां बनाने की इच्‍छाशक्ति, दिशानिर्देश पारित करने के अधिकार उनके ऊपर के अधिकारीगणों, विधायिका और कार्यपालिका की कार्यप्रणाली से नियत होते हैं। और जब शीर्षस्‍थ स्‍तर पर घोर अकर्मण्‍यता व्‍याप्‍त हो, सोचे-विचारे बगैर विसंगत नीतियां बनाई जाती हों और दबाव में उनका पालन करवाया जाता हो तो निचले स्‍तर के सरकारी कर्मचारियों को उनकी हरामखोरी, बदमाशी, भ्रष्‍टाचार के लिए अकेले दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कहने का तात्‍पर्य यह है कि सरकारी सेवाओं में बरती जा रही ढील और कार्यों में होनेवाले भ्रष्‍टाचार के लिए केवल उन कारकों को जिम्‍मेदार नहीं ठहराया जा सकता है, जो पीड़ितों को प्रत्‍यक्ष दिखाई देते हैं, अनुभव होते हैं। 
       एक ओर सरकार अधिकांश सरकारी प्रतिष्‍ठानों का निजीकरण, अर्द्ध-सरकारीकरण कर रही है तो दूसरी ओर उनके और अपने बीच कार्य-समन्‍वय को ठीक करने के प्रतिमान भी नहीं निर्धारित कर पा रही है। ऐसे में समस्‍याओं का प्रत्‍यक्ष बोझ तो साधारण जन पर ही पड़ता है। सीजीएचएस पैनल और निजी चिकित्‍सालयों के प्रशासनिक मतैक्‍य और विवादों से उत्‍पन्‍न होनेवाली समस्‍याओं का सामना इनके कर्ताधर्ताओं को नहीं करना पड़ेगा। इनके निरर्थक अधिकारों की लड़ाई में सरकारी सेवा से सेवानिवृत्‍त आम लोग ही पिसेंगे।