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Sunday, September 17, 2017

कब निकलेगा कश्मीर वार्ता का हल

विकेश कुमार बडोला
राजनीतिक परंपराओं के हिसाब से भाजपा भी कभी-कभी कांग्रेस और अन्य राजनीतिक पार्टियों की तरह ही प्रतीत होती है। यदि ऐसा न होता तो वह बारंबार कश्मीर पर बातचीत का राग न गाती। पिछले वर्ष इसी माह की बात है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह के नेतृत्व में 28 सदस्यीय सर्वदलीय प्रतिनिधमंडल 4 सितंबर को जम्मू कश्मीर में शांति व्यवस्था बनाने के उद्देश्य से वहां पहुंचा था। ज्ञात हो कि पिछले साल जुलाई और अगस्त माह में कश्मीर में आतंकियों, पत्थरबाजों के देशविरोधी कारनामों ने पूरे देश का ध्यान वहीं पर केंद्रित किया हुआ था। सैन्‍य बल सैन्य नियमों के अनुसार और आधिकारिक आदेश के अंतर्गत जैसी सैन्य-कार्रवाई स्थानीय उपद्रवियों के विरुद्ध कर रहा था, वह भी देशविरोधियों को बर्दाश्त नहीं थी।
स्थानीय मसजिदों से सैनिकों पर पत्थर फेंके जा रहे थे। सैनिकों के लिए कठमुल्लों का मारो-मारो का कर्कश स्वर सुनाई दे रहा था। आतंकियों को शरण देने के लिए स्थानीय उपद्रवी अपनी हरेक देश विरोधी गतिविधि को अपने आकाओं के संरक्षण में उचित मान रहे थे। सर्वोच्च न्यायालय भी जनहित याचिकाओं के नाम पर पत्थरबाजों के खिलाफ पैलेट गन के इस्तेमाल को अनुचित बता रहा था। देशी-विदेशी मानवाधिकार संगठन पत्थरबाजों के उपद्रव करते वीडियो देखकर भी उनके मानवाधिकार को लेकर चिंतित थे। अतः मोदी सरकार पर दबाव बना कि वह लोकतांत्रिक बहुमत को दरकिनार कर केवल अपने गृहमंत्री को कश्मीर न भेजे, बल्कि उनके साथ पक्ष-विपक्ष में मौजूद सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों (धर्मनिरपेक्षता के ध्वजवाहक) को भी भेजे। ऐसा ही हुआ।
कश्मीर में तत्कालीन विवाद, आतंक, उपद्रव और सभी अशांत कृत्यों पर वहां के राजनीतिक व गैर-राजनीतिक जन प्रतिनिधियों से वार्ता हुई। भाजपा के समर्थनवाली गठबंधन सरकार की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने अतिवादियों के समर्थक हुर्रियत आदि नेताओं को भी वार्ता में शामिल होने का निमंत्रण दिया था। लेकिन वे वार्ता के लिए नहीं आए।
यह एक उलझनभरा प्रश्न है कि वार्ता का यह राग आखिर किसके लिए, कब तक और क्यों। जब हजारों वर्षों का मुगल शासन पूरी दुनिया में प्रामाणिक रूप में एक कट्टर व शोषक-शासन बनकर रहा हो और इसकी मंशा दुनिया में अपने से इतर हरेक विचार को दबाने की रही हो तो इस युग में कौन-सा चमत्कार होगा, जो पुरातन मुगल शासन के कामों-कारनामों के हिमायती कश्मीरी अतिवादी और उनके संरक्षक नेता अपने में सुधार कर मोदी सरकार की शांति स्थापनार्थ की जानेवाली वार्ता को सहज लेंगे और उसका अनुपालन करेंगे।
पिछली वार्ता के बाद कश्मीर में शांति तो क्या स्थापित होनी थी, उलटा आतंकी गतिविधियां और ज्यादा बढ़ गई थीं। आतंक-स्‍थलों पर आतंकियों के लिए सुविधावाहक और उनके संरक्षक बने पत्थरबाजों-उपद्रवियों ने शांति वार्ता को धता बताते हुए अशांति, उपद्रव, अव्यवस्था और आतंकवाद को पहले से अत्यधिक व्यापक बना दिया। पिछले वर्ष सितंबर में पहले हफ्ते की शांति वार्ता के बाद तीसरे हफ्ते में ही उड़ी में आतंकवादी हमले में हमारे 18 जवान शहीद हो गए थे। इसकी पूरी देश में बहुत जोरदार प्रतिक्रिया हुई। केंद्र सरकार को कश्मीर के संदर्भ में उसकी शांति वार्ता के लिए कोसा गया। और उस पर कश्मीर में शहीद होते सैनिकों के बाबत अनेक लाछंन उसी बहुसंख्यक वर्ग ने लगाने शुरू कर दिए, जिसके मतों से उसे जीत मिली थी। परिणामस्वरूप माह के आखिर में भारतीय सैनिकों द्वारा सीमा पार पाक अधिकृत कश्मीर में जाकर सर्जिकल स्ट्राइक की गई। तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर और प्रधानमंत्री पर उड़ी आतंकी हमले का इतना जनदबाव था कि जो सर्जिकल स्ट्राइक बाद में कभी बड़े व्‍यापक पैमाने पर होनी होगी, वह उड़ी हमले के आठ-दस दिन बाद ही कर दी गई या कहें करनी पड़ी।
जम्‍मू कश्‍मीर राज्य में आतंकवाद फैलने का बड़ा कारण अवैध मुद्रा का चलन और पोषण है। इसी संदर्भ में हुई जांच में पता चला कि अतिवादियों को नकली भारतीय मुद्रा देने के बदले अतिवाद के लिए उकसाया जाता है। इस तरह की भारतीय नकली मुद्रा की छपाई पाकिस्‍तान स्थित धन-संसाधन संपन्‍न आतंकी समूहों द्वारा की जाती है। बाद में वहां से इसे सीमा से घुसपैठ के माध्‍यम से या भारत की सीमाक्षेत्र से लगे दूसरे देशों के रास्‍ते भारत में चलाया जाता है। इस विषय पर जो समग्र रिपोर्ट तैयार हुई उसमें ज्ञात हुआ कि भारत में आतंकवादियों, नक्सलियों और माफियाओं को पनपाने में भारी मात्रा में संग्रहीत नकली नोटों का बहुत बड़ा योगदान है। चिंतित करनेवाले यही कारण थे जिनसे मुक्ति के लिए आठ नवंबर 2016 को रात आठे बजे एक हजार व पांच सौ मूल्य के रुपयों को चलन से बाहर करने की आधिकारिक घोषणा स्‍वयं प्रधानमंत्री को करनी पड़ी।
आतंकवाद के प्रसार के लिए देशी-विदेशी शत्रुओं द्वारा अवैध भारतीय मुद्रा का सुनियोजित पोषण किया जा रहा था। विभिन्‍न प्रकार के अवैध लेन-देनों के माध्‍यम से नकली मुद्रा के वित्‍तपोषण को कांग्रेसी राज में राज-लिप्‍सा के कारण राजकीय स्‍वीकार्यता दिए जाने के नियम-कानून बनने लगे थे। अर्थव्‍यवस्‍था में माफियाओं द्वारा राजनेताओं, सांसदों, विधायकों और उद्योगपतियों के रूप में निभाई जानेवाली भूमिकाओं का संसद के द्वारा लोकतंत्रीकरण किया जाने लगा था। राज व्‍यवस्‍था का ऐसा दुरुपयोग किए जाने के कारण ही कांग्रेसी राज समाप्‍त हुआ था। जो कुछ मोदी ने अर्थव्‍यवस्‍था को ठीक करने के लिए किया, वही सब करवाने को तो जनता ने उन्‍हें कांग्रेस की जगह बैठाया था। और अगर वे जनता के हित का ध्‍यान कर अपने राजनीतिक निर्णय ले रहे हैं, तो इसमें विरोधियों द्वारा विरोधस्‍वरूप वाणी को इतना असंयमित बनाने का औचित्‍य व्‍यर्थ है।
इनके अलावा भी सरकार द्वारा अनेक कार्य आतंकी गतिविधियों पर नियंत्रण हेतु किए गए और किए जा रहे हैं, परंतु इतने के बाद भी आतंक का पूर्ण सफाया अभी दिवास्वप्न ही बना हुआ है। विगत स्वतंत्रता दिवस पर देश की जनता को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने यह क्या कह दिया- कि कश्मीर का हल न गोलियों से मिलेगा न गालियों से, कश्मीर का हल होगा गले लगाने से, तो इस बार भी गृहमंत्री राजनाथ सिंह 9 से 11 ग्यारह सितंबर तक कश्मीर में शांति वार्ता के उद्देश्य से पहुंच गए। वे भले ही कह रहे हैं कि अब कश्मीर में स्थिति नियंत्रण में है, वहां की समस्याओं को हल किया जा सकता है और वहां के प्रत्येक चेहरे पर मुस्कान लाना चाहते हैं परंतु वास्तविकता कुछ और है। विस्मयकारी है कि सरकारों का यह सच स्वीकार करने में दम क्यों फूल रहा है कि कश्‍मीर में आतंकवादियों और उनके समर्थकों का मकसद अपने लिए जैविक सुविधाओं की निःशुल्क या रियायती मांगें नहीं हैं। वे तो राज्य का पूर्णरूपेण इसलामीकरण चाहते हैं। भले ही ऐसी चाहत में वे पाकिस्तान, पाक प्रायोजित आतंक या किसी अन्य हितसाधक के हाथ की कठपुतली हों, परंतु सत्य यही है कि कश्मीर के संदर्भ में विकास या कल्याण की बातें करके कोई भी सरकार वहां के अतिवादियों को काबू में ला ही नहीं सकती। और अभी भी जो थोड़ा-बहुत नियंत्रण आतंकवाद के संबंध में वहां दिख रहा है, वह सेना की सक्रियता और सरकार द्वारा स्‍थानीय परिस्थितियों के कारण सेना को दिए गए विशेषाधिकार बल प्रयोग अधिनियमों के कारण ही है। जबकि कश्‍मीर को भारत का अभिन्‍न भौगोलिक अंग बनाए रखने के लिए सर्वाधिक त्‍याग व तपस्‍या तो हमारे सैनिक ही कर रहे हैं।  
          विगत समय में हम कश्मीर में ही मुसलिम आतंक का खतरनाक रूप देखते आए थे, जो तमाम सरकारी नियम-कानूनों को ताक पर रख केवल और केवल इसलाम स्थापना के मकसद से भरा हुआ था। लेकिन अब यही रूप न्यूनाधिक रूप में पश्चिम बंगाल, राजस्थान, कर्नाटक, हैदराबाद, केरल व दिल्ली-एनसीआर और देश की हर उस जगह पर देखा जा सकता है जहां-जहां अवैध रूप में घुसपैठ कर आए मुसलमानों ने अपनी बड़ी आबादी की बस्तियां बसा रखी हैं। ऊपर से दुर्भाग्य यह कि अधिकांश राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय राजनीतिक दलों के नेता उन्हें देश के लिए समस्या न मानकर मात्र वोटबैंक के लिए उनका संरक्षण कर रहे हैं। देशी-विदेशी मानवाधिकार संगठन तो उन्‍हें बसाने के लिए भारत जैसे देशों पर संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ के माध्‍यम से दबाव बना रहे हैं। रोहिंग्या मुसलमानों के बारे में भी आजकल देशभर में चर्चाएं हो रही हैं। देश का एक वर्ग उन्‍हें भारत में बसाने के लिए राष्ट्रीय-अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर पैरवी कर रहा है। क्या इस देश का यह दुर्भाग्य कम है कि वह कश्मीर में ही घुसपैठिए मुसलिम आतंकियों के प्रतिरोध में अपने कितने ही सैन्यकर्मियों की बलि दे चुका है, जो अब वह रोहिंग्याओं को देश में शरणार्थी बनने या न बनने देने के बाबत सर्वोच्च न्यायालय से लेकर गृह मंत्रालय तक बहस कर रहा है। यह बड़ी लज्जाजनक स्थिति है। मानवाधिकार की बातें कई स्‍तरों पर अन्‍याय का सामना कर रहे मूल भारतीयों के संदर्भ में क्‍यों नहीं होती। मानवाधिकार का सिद्धांत तो रोंहिग्‍याओं जैसे लोगों को यह समझाना भी होना चाहिए कि जब उनके पास रहने-खाने की व्‍यवस्‍था नहीं तो, वे इतने बच्‍चे पैदा क्‍यों कर रहे हैं।
यदि कश्‍मीर जैसी समस्‍याओं का त्‍वरित निराकरण नहीं होता, रोहिंग्‍या जैसों को भारत में बसाने की न्‍यायिक समीक्षाएं बंद नहीं होतीं तो निश्चित है भारत राष्‍ट्र का इसलामीकरण लाख चाहने पर भी रोका नहीं जा सकेगा। अत: मोदी सरकार को देर किए बिना कश्मीर के संदर्भ में अपनी वर्ष-प्रतिवर्ष चलनेवाली वार्ताओं पर विराम लगाना चाहिए और आतंक के पीछे मुसलमानों की असली मंशा क्या है, इस बात पर ध्यान देकर समस्या का ताबड़तोड़ समाधान ढूंढना चाहिए।
        एक ओर तो वर्तमान सरकार अमेरिका से लेकर चीन तक को वैश्विक आतंक के पूर्ण सफाए के संदर्भ में एकराय करने पर लगी हुई और इसमें सफल भी हुई है तथा दूसरी ओर अपने ही देश के सीमाक्षेत्र के राज्य कश्मीर में आतंकवादियों के संरक्षकों के साथ वार्ता करने का प्रयास कर रही है। यह स्थिति असहज करती है। आतंक के संदर्भ में वर्तमान सरकार को देशी-विदेशी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, उनके संगठनों व उनकी उन संस्तुतियों पर गंभीर होने की आवश्यकता नहीं, जो संयुक्त राष्ट्र के पक्षसमर्थन से जारी होती हैं। इस देश में पहले ही मौजूद विशाल जनसंख्‍या को सही से जीने-रहने-खाने के लाले पड़े हुए हैं, तिस पर सरकारें जनसंख्या नियंत्रण की बातें ही नहीं कर रहीं और हम हैं कि देश-विदेश में बढ़ती मुसलिम आबादी के हमलों को आतंक, घुसपैठ और शरणार्थी के रूप में झेल रहे हैं। ऐसा अधिक दिन तक नहीं चल सकता। सरकार को इस पर गंभीर होकर ठोस समाधान निकालना चाहिए और उसे तत्‍काल लागू करना चाहिए।

Tuesday, September 12, 2017

दुर्घटनाओं के बीच आशा-किरण

--विकेश कुमार बडोला

ये समय बड़ा कठिन है। मानवता एक अविश्वसनीय शब्द लगने लगा है। चारों ओर घात-प्रतिघात है। प्रतिदिन मानवजनित समस्याओं और प्राकृतिक आपदाओं के कारण मनुष्य सैकड़ों-हजारों की संख्या में मौत के मुंह में समा रहे हैं। प्राकृतिक आपदाएं हर ऋतु में कहर ढा रही हैं। क्या बरसात, क्या गरमी क्या सर्दी हर ऋतु में कभी बाढ़ तो कभी भूकंप और कभी मौसमीय रोगों से लोग त्रस्त हैं। कहीं नवजात शिशु मस्तिष्क ज्वर की समुचित चिकित्सा के अभाव में दम तोड़ रहे हैं तो कहीं वर्षाजनित बाढ़ के प्रकोप में लोग काल-कवलित हो रहे हैं। कहीं आतंकवादी हमलों में निर्दोष लोगों सैन्यकर्मियों की जानें जा रही हैं तो कहीं दुनिया के देशों के परमाणु परीक्षणों प्रतिस्पर्द्धाओं के कारण तृतीय विश्व युद्ध का खतरा सिर पर मंडरा रहा है। कहीं जर्जर आवासीय भवनों के नीचे दबकर लोग प्राण गंवा रहे हैं तो कहीं रेल दुर्घटनाओं में हंसते-खेलते मानवीय जीवन मौत से भिड़ रहे हैं। कहीं परस्पर द्वेष, ईर्ष्या, अधिकार धन लिप्सित होकर हत्याएं हो रही हैं तो कहीं वृद्धजन महीनों से मृत हो, कंकाल में परिवर्तित होकर अपने घर में पड़े हुए हैं। कहीं नौ वर्षीय अबोध बालिका के बलत्कृत होने के उपरांत उसके गर्भधारण प्रसूति की विस्मित करनेवाली घटना हो रही है तो कहीं जिलाधिकारी स्तर के व्यक्ति द्वारा आत्महत्या किए जाने की त्रासदी घट रही है।
अभिषेक पटेल
निश्चित रूप से ये सभी घटनाएं जीवन के प्रति मनुष्यों में निराशा, हताशा और मनोवैज्ञानिक विकार पैदा करती हैं। इन घटनाओं से अप्रत्यक्ष रूप से परिचित लोग भले ही इन घटनाओं पर उतने गहन बोध से निराश हों, जितने इन घटनाओं से प्रत्यक्ष जुड़े, पीड़ित लोग हो रहे हैं, परंतु फिर भी कहीं कहीं किसी किसी रूप में ये तमाम घटनाएं सभी जिंदा लोगों को जीवन के प्रति असुरक्षा से तो भर ही रही हैं। साथ ही साथ इन घटनाओं का एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी समाज पर पड़ता दिख रहा है, जिस कारण लोगों में सामाजिक भावना का क्षरण हो रहा है। लोग आत्मकेंद्रित होने की ओर अग्रसर हैं। यह स्थिति राष्ट्र, समाज, परिवार और व्यक्ति के लिए अत्यंत आत्मघाती है।
अभिषेक पटेल बम लेकर
स्‍कूल से दूर भागते हुए 
सरकार और समाज को इस दिशा में गहनतापूर्वक सोच-विचार कर कुछ ऐसे उपाय करने होंगे, जिससे लोगों में जीवन के प्रति आशा विश्वास बढ़े। वे सद्भावना, सदाचरण, परस्पर प्रेम-मैत्री की भावना से जुड़ें और इन सबसे बढ़कर जीवन के प्रति समुत्साही दृष्टिकोण रखें। इस हेतु सरकार को देश-समाज के परोपकारी, ईमानदारी से अपने कर्तव्य निर्वहन और विशिष्ट सेवा भाव से अपने दायित्वों में लगे हुए लोगों के बारे में संवाद सूचना तंत्र बनाना चाहिए ताकि अन्य लोग भी ऐसे महान व्यक्तित्वों से प्रेरणा ले सकें।
विगत 25 अगस्त को मध्य प्रदेश के सागर जिले के सुर्खी पुलिस स्टेशन में तैनात हवलदार अभिषेक पटेल ने जो काम किया है, उसके लिए वे महानता प्रेरणा के जीते-जागते उदाहरण बन गए हैं। अभिषेक जब अपने थाना क्षेत्रांतर्गत चितोरा ग्राम के विद्यालय के पीछे एक 10 किलोग्राम वजनी जिंदा बम पड़े होने की सूचना पर निरीक्षण के लिए पहुंचे तो उन्होंने तुरंत थैले सहित बम उठाकर अपने कंधे पर रखा, भागते हुए 1 किलो मीटर तक गए और बम को नाले में फेंक दिया। अभिषेक के साहस और संवेदना ने विद्यालय में उपस्थित 400 बच्चों के जीवन को सुरक्षित कर दिया। पुलिस जांच में ज्ञात हुआ कि एक गुमनाम व्यक्ति ने सौ नंबर डॉयल कर विद्यालय के पीछे बम पड़े होने की सूचना दी थी। सागर स्थित महार रेजिमेंट सेंटर के जवानों ने जिस तरह से बम को निष्क्रिय किया, उससे साफ पता चल रहा था कि बम जिंदा था और फटने पर बहुत विध्वंशकारी होता। हवलदार अभिषेक पटेल के इस महान कार्य के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें पचास हजार का नकद पुस्कार दिया।
यह घटना समाज में घट रही नकारात्मक घटनाओं के मध्य एक विश्वास पुंज के समान है। कल्पना करिए यदि वह बम फटता तो विद्यालय में बच्चों का क्या होता। दुर्घटना से हुए जान-माल के नुकसान पर मध्य प्रदेश राज्य सहित संपूर्ण भारत में राजनीतिक आरोपों-प्रत्यारोपों का एक लंबा दौर चलता, जिसका आखिरी हासिल कुछ होता। लेकिन यहां एक पुलिसकर्मी की दिलेरी ने ऐसा नहीं होने दिया। तो क्या अब ऐसे पुलिसकर्मी के गुण यशोगान और प्रशंसा-सम्मान पर राष्ट्रीय संवाद नहीं होना चाहिए? निश्चय ही होना चाहिए और निरंतर होना चाहिए तथा मानवता पर छाए अनेकों संकट के इस दौर में तो अभिषेक पटेल के लिए विरुदावलियां गाई जानी चाहिए, ताकि समाज में एक-एक व्यक्ति ऐसे ही साहसी संवेदनशील बनने के लिए आत्मप्रेरित हो।
        वह तो किसी जागरूक व्यक्ति ने अभिषेक पटेल का बम लेकर भागते समय का वीडियो बना कर सोशल साइट पर डाल दिया, तब जाकर उनके इस कार्य की पुष्टि हो सकी। सोशल मीडिया पर जिस तरह लोगों ने अभिषेक के इस कार्य की प्रशंसा की है उसे देखते हुए यह आशा की जा सकती है कि अभी समाज में अच्छे परोपकारी कार्यों की प्रतिक्रिया में सामाजिक मतभेद नहीं हैं। अपनी जान की चिंता नहीं करते हुए दूसरों की जान बचाने के लिए किया गया यह कार्य निश्चित रूप से हमारे देश समाज को अच्छाई, परोपकार के मार्ग पर ले जाने हेतु एक चिरस्थायी प्रेरणा बनेगा। हम सभी को भी सामाजिक जागरूकता दिखाते हुए अभिषेक जैसे अन्य लोगों को देश के सामने लाना होगा ताकि वे अपने परोपकारी कार्यों की ऊष्‍मा से दुर्घटनाओं, त्रासदियों तथा आपदाओं से उपजे देशवासियों के बीमार मनोविज्ञान को दुरुस्त कर सकें।