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Saturday, August 26, 2017

राष्ट्रव्यापी संवाद का केंद्र हों भक्ति यादव जैसी डॉक्टर

भारतीय नागरिकों की सामूहिक मानसिकता विचित्र विरोधाभासों से घिरी हुई है। इसका नवीनतम उदाहरण देश में घटी दो घटनाएं हैं। पहली घटना थी स्वतंत्रता के इकहत्तरवें उत्सव से कुछ दिन पूर्व उत्तर प्रदेश के गोरखपुर स्थित एक चिकित्सा महाविद्यालय में साठ से अधिक बच्चों नवजात शिशुओं की मौत। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया। मौत के कारणों के बारे में जो भी खबरें अब तक आई हैं, उनके अनुसार मौतें चिकित्सालय में ऑक्सीजन की आपूर्ति रुकने, सेवारत डॉक्टरों की लापरवाही, संस्थान के शासन-प्रशासन की अकर्मण्यता, बच्चों के इंसेफलाइटिस (दिमागी बुखार) के चपेट में आने और इन सबसे ऊपर राज्य सरकार की असंवेदना से हुईं।
इस त्रासद स्थिति में सत्ता प्रतिष्ठान के शीर्ष से लेकर निचले स्तर के तंत्र तक सभी को समाज और लोगों के साथ मिल बैठ कर ऐसा वातावरण बनाने की जरूरत है, ताकि भविष्य में बच्चों की इस तरह मौतें हो पाएं। बच्चों की इन मौतों का वास्तविक दुख और वेदना शासन व्यवस्था से लेकर मीडिया जगत तक कितने लोगों को हुई होगी इसकी तो कोई गणना संभव नहीं, परंतु इन मौतों पर अब तक हो रही तरह-तरह की राजनीति आरोपों-प्रत्यारोपों ने देश में मानवीयता के पहलू को अत्यंत खोखला अवश्य सिद्ध कर दिया है।
दूसरी घटना थी मध्य प्रदेश स्थित इंदौर की डा. भक्ति यादव की चौदह अगस्त को 92 वर्ष की आयु में दुखद मृत्यु की। डाक्टर भक्ति ने अपने जीवनकाल में यथा नाम तथा कामकी आदर्श उक्ति को भलीभांति चरितार्थ किया। मृत्यु से पूर्व उन्होंने चिकित्सा क्षेत्र में एक अद्वितीय योगदान के माध्यम से चिकित्सा पेशे से जुड़े सभी लोगों के लिए महान उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने चिकित्सकीय सेवाकाल में 1 लाख निर्धन महिलाओं की निःशुल्क प्रसूति की थी। उन्होंने ऐसी स्त्रियों से किसी प्रकार का कोई शुल्क कभी नहीं लिया।
डाक्टर भक्ति यादव भारत की समाजसेवी चिकित्सक थीं। वे एक स्त्री रोग विशेषज्ञ थीं। वे गरीब स्त्रियों की निःशुल्क चिकित्सा करती थीं। सन 1952 में भक्ति यादव इंदौर की पहली स्त्री थीं, जो एमबीबीएस डॉक्टर बनीं। उनका जन्म 3 अप्रैल 1926 को उज्जैन के निकट स्थित महिदपुर में हुआ था। वे मूलतः महाराष्ट्र के प्रसिद्ध परिवार से थीं। जिस समय भारतीय समाज में लड़कियों को पढ़ाना अनुचित समझा जाता था, तब भक्ति ने विद्याध्ययन हेतु अपनी गहन इच्छा के बारे में अपने अभिभावकों को बताया। उनके पिता ने उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए उन्हें निकटवर्ती गरोठ कस्बे में पढ़ाई के लिए भेज दिया। वहां से उन्होंने सातवीं कक्षा उत्तीर्ण की।
इसके बाद उनके पिता इंदौर गए। भक्ति की पढ़ाई के प्रति अटूट लगन को देखते हुए पिता ने उन्हें अहिल्या आश्रम स्कूल में प्रवेश दिलवा दिया। उस समय इंदौर में वह एकमात्र विद्यालय था, जो बालिकाओं के लिए था और जहां छात्रावास की सुविधा भी थी। वहां से 11वीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद भक्ति ने 1948 में इंदौर के होल्कर साइंस कॉलेज में बीएससी प्रथम वर्ष में प्रवेश में लिया। वे बीएससी प्रथम वर्ष में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुईं। उस समय शहर के महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज (एमजीएम) में ही एमबीबीएस का पाठ्यक्रम था और उन्हें 11वीं कक्षा के अच्छे परिणाम के आधार पर उसमें प्रवेश मिल गया। उस समय उस कॉलेज में एमबीबीएस के लिए चयनित कुल 40 छात्रों में से 39 लड़के थे और भक्ति ही अकेली लड़की थी। भक्ति एजीएम कॉलेज की एमबीबीएस के पहले बैच की पहली महिला छात्र थी। वे मध्य भारत की भी पहली एमबीबीएस डॉक्टर थीं।
सन् 1952 में भक्ति की तपस्या फलीभूत हुई और वे एमबीबीएस डॉक्टर बन गईं। उन्होंने एमजीएम मेडिकल कॉलेज से ही एमएस किया। सन् 1957 में उन्होंने अपने साथ पढ़नेवाले डाक्टर चंद्र सिंह यादव से विवाह कर लिया। उनके पति भी जीवनभर रोगियों की सेवा में तन-मन-धन से समर्पित रहे। स्थानीय लोगों में  डाक्टर भक्ति का नाम काफी प्रसिद्ध था। वे संपन्न परिवार के रोगियों से नाममात्र का शुल्क लेती थीं और गरीब मरीजों का तो उन्होंने जीवनभर निःशुल्क इलाज किया। तब से डाक्टर भक्ति चिकित्सा क्षेत्र में परोपकार में लीन रहीं। सन् 2014 में 89 वर्ष की अवस्था में उनके पति डा. चंद्र सिंह यादव का निधन हो गया। डा भक्ति को भी 2011 में अस्टियोपोरोसिस नामक खतरनाक बीमारी हो गई, जिस कारण उनका वजन लगातार घटते हुए 28 किलो रह गया।
डाक्टर भक्ति को उनकी सेवाओं के लिए 7 वर्ष पूर्व डा मुखर्जी सम्मान प्रदान किया गया था। वर्ष 2017 में उन्हें पदम् श्री से सम्मानित किया गया। अधिक आयु होने के कारण वे पुरस्कार वितरण समारोह में सम्मिलित हो सकीं। अतः नियमानुसार इंदौर के कलेक्टर ने उन्हें उनके घर जा कर पुरस्कार प्रदान किया।
किसी चिकित्सक का ईश्वरीय रूप क्या होता है, अपने परोपकारी जीवन से भक्ति यादव ने यह महान उदाहरण प्रस्तुत किया। ऐसी ईश्वरीय अंश भक्ति ने सोमवार 14 अगस्त 2017 को इंदौर स्थित अपने घर पर अन्तिम सांस ली और हम सभी को आश्चर्यमिश्रित विषाद के साथ छोड़ गईं।
उपरोक्त दोनों घटनाओं के संदर्भ में यदि हम गोरखपुर के मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों की तुलना डाक्टर भक्ति यादव से करें तो नैतिकता के अनुरूप भक्ति यादव का कार्य मानवता के महान मानदंड पर कितना अनुकरणीय प्रतीत होता है। अपने चिकित्सकीय जीवनकाल में एक लाख गरीब स्त्रियों की निःशुल्क प्रसूति का कार्य उन्हें महानता की सर्वोच्च श्रेणी में खड़ा करता है।
तो क्या इस सब के बाद उनके बारे में मध्य प्रदेश राज्य से बाहर पूरे भारत और विदेशों में निरंतर सकारात्मक चर्चा नहीं होनी चाहिए! हमारे देश-समाज में जीवन की चहुंमुखी हानि होने पर हानि के लिए उत्तरदायी दोषी लोगों पर ही नकारात्मक, नैराश्यप्रद, अनावश्यक आरोप-प्रत्यारोप पर आधारित विवाद ही क्यों होता है! डाक्टर भक्ति यादव सरीखे जीवन बचाने वालों, जीवन संवारने वालों और जीवन के लिए आशा विश्वास का ईश्वरीय वाहक बनने वाले लोगों पर उपयोगी संवाद क्यों नहीं होता! ऐसे संवाद में मीडिया जगत की गहन पड़ताल हिस्सेदारी क्यों नहीं होती?
ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं, जिनसे हमें स्वयं के बारे में यह कड़वा सत्य जानने का अवसर मिलेगा कि अभी हमें मानसिक रूप से विकसित होने में बहुत समय लगेगा। घटनाओं पर व्यक्तिगत विश्लेषण करने वाले सभी भारतीय लोगों को इस विरोधाभासी स्थिति से तत्काल बाहर आना चाहिए, अन्यथा जीवन मूल्यों को बचाए रखना कठिन हो जाएगा।
(डॉ भक्ति यादव की दोनों फोटुयें गूगल से साभार 
विकेश कुमार बडोला