Saturday, July 29, 2017

जीवन जैसे जीवन की ढूंढ

से लगता
जैसे रचनात्मक जीवन
समाप्त हुआ
जगव्यापी सभ्य समाज की
असहनीय असभ्यता से
मैं रक्तिम
विद्रोही हुआ
कुछ रचने को
मन नहीं
बस जीवन-निर्वाह में
रत-विरत
क्षत-विक्षत
स्वयं की
प्राकृतिक पहचान
क्षीण हुई
जो हूं जैसा हूं
उसमें दुनिया के
अनेकानेक अंतर्विरोध
परस्पर टकरा रहे हैं
मुझे अत्यंत
विचलित बना रहे हैं
जीवन की आशा
सकारात्मकता के लिए
वास्तव में
इस कृत्रिम जीवन में
कुछ नहीं बचा
तब भी ढूंढ रहा
भीतर बाहर
किसी को
जीवन जैसे
जीवन के लिए
उसमें संवेदन मग्न हो
आनंद गमन के लिए

Thursday, July 20, 2017

हिंदू राष्ट्र के विरुद्ध न्यायालयी निर्णय

विगत दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने दो निर्णय लिए। ग्यारह जुलाई को मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली पीठ ने पशु क्रय-विक्रय के पुराने कानून को मान्य लागू कर दिया। ज्ञातव्य है कि केंद्र सरकार ने देशभर में गौवंश के संरक्षण के उद्देश्य से नवीन पशु क्रय-विक्रय कानून बनाया था। इस कानून की अधिसूचना को किसी मुसलिम ने मद्रास उच्च न्यायालय में चुनौती दी, जिसे मद्रास उच्च न्यायालय से सही माना और केंद्र की अधिसूचना को निरस्त करने का आदेश पारित कर दिया। केंद्र सरकार की ओर से इस बारे में सर्वोच्च न्यायालय में याचिका प्रस्तुत कर अपना पक्ष रखा गया और पूर्व में पारित अपनी अधिसूचना के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय से समुचित सहयोग की आशा की गई थी। परंतु केंद्र सरकार की अधिसूचना को मद्रास उच्च न्यायालय की तरह ही सर्वोच्च न्यायालय ने भी निरस्त कर दिया और इस प्रकार पशुओं के क्रय-विक्रय के संबंध में कांग्रेसी कार्यकाल का कानून ही मान्य हो गया। मद्रास उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय ने बहुसंख्यक हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं के साथ-साथ गौवंश के जीवन की भी अनदेखी की है। निश्चित रूप से इस निर्णय के बाद न्यायालयों की कार्यप्रणाली संदेह के घेरे में जाती है। कहीं कहीं बहुसंख्यक हिंदुओं को यह विचार कचोटने लगता है कि चाहे-अनचाहे सभी न्यायालयी निर्णय मुसलिमों की अमानवीय तथा विसंगतियों से पूर्ण इच्छाओं को पूर्ण करने के पक्ष में ही दिए जा रहे हैं।
          अपने दूसरे निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने मणिपुर में सेना, असम रायफल्स और मणिपुर पुलिस द्वारा मुठभेड़ में हुई 90 से अधिक लोगों की मौतों की सीबीआइ जांच का आदेश दिया है। न्यायाधीश मदन बी लोकुर और यूयू ललित की खंडपीठ ने इसके लिए सीबीआइ निदेशक को अधिकारियों का एक दल गठित करने को कहा है। न्यायाधीशों ने कहा सीबीआई को निर्देश दिया है कि वह जनवरी 2018 के दूसरे सप्ताह में इन मामलों को सुनवाई के लिए लगाने को कहा है। जबकि वर्तमान केंद्र सरकार और सेना इन मौतों की किसी भी तरह की जांच का विरोध कर रही थी। न्यायालय ने यह निर्देश मणिपुर में 2000 से 2012 के बीच 1528 अन्यायिक हत्याओं की जांच और क्षतिपूर्ति मांगने संबंधी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। इसी विषय में सेना ने सर्वोच्च न्यायालय में बताया कि जम्मू-कश्मीर और मणिपुर जैसे आतंक उग्रवाद प्रभावित राज्यों में चलाए गए सैन्य अभियानों में प्राथमिकी दर्ज नहीं की जा सकती।
          ज्ञात हो कि उक्त मामले में पिछले वर्ष जुलाई के प्रथम सप्ताह में भी उपरोक्त पीठ के न्यायाधीशों ने मणिपुर में कथित 1528 हत्याओं के संदर्भ में भारतीय सेना की राष्ट्रीय कार्रवाई को संदेहास्पद माना था। उनका कहना था कि सीमांत प्रदेशों और पूर्वोत्तर राज्यों में सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (अफस्पा) के अंतर्गत सशस्त्र बल या पुलिस द्वारा अतिवादियों पर ज्यादा या जवाबी ताकतका इस्तेमाल गलत है।
          इन परिस्थितियों में एक विचार बहुत तेजी से घूर्णन करता है कि उच्च या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को जम्मू-कश्मीर में स्थानीय और आयातित मुसलमानों, मुसलिम बांग्लादेशियों, बंगाल के मुसलिमों, केरल-बैंगलोर के मुसलिमों और न्यूनाधिक रूप में बांग्लादेशियों की करोड़ों की जनसंख्या से भर चुके भारत के हर प्रदेश में रह रहे मुसलमानों की घृणित गतिविधियां क्यों नहीं दिखाई देतीं। न्यायालयी सुरक्षा और महानगरों के सुविधा संपन्न स्थानों पर बैठकर देश विरोधी एनजीओ की जनहित याचिका को बहुसंख्यक भारतीयों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर अधिमान देकर भारत की राष्ट्रीयता अपने मूल स्वरूप में नहीं रह पाएगी। पशु क्रय-विक्रय के नवीन जनानुकूल कानून को मुसलिमों की इच्छानुसार पहले जैसे रहने का आदेश देना हो या जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों के आतंकवादियों की मौतों पर आतंकी समूहों की ही कारगुजारियों और समर्थन से चल रहे एनजीओ की जनहित याचिकाओं को गंभीरतापूर्वक लेकर अपनी ही सेना को कठघरे में खड़ा करना, इन परिस्थितियों में लोकतंत्र का न्यायिक पक्ष अत्यंत हास्यास्पद नजर आने लगता है।
          किसी भी राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था यदि इतनी सशक्त होती तो केंद्र सरकारक अतिरिक्त सुरक्षा बलों की इकाइयां खोलने की आवश्यकता ही क्या थी। मणिपुर राज्य के शासन-प्रशासन के सहयोग से जन-मन के लिए विकास कार्यक्रमों के क्रियान्वयन की अधिकता होती तो ऐसे बलों को विकास कार्यों में सहयोग देने के लिए निर्देशित किया जाता। लेकिन यह भलीभांति विचारणीय है कि राज्यों में पिछले तीन-चार वर्षों पूर्व शासन-प्रशासन की व्यवस्था की स्थिति क्या थी। और अब भी उसमें अपेक्षित परिवर्तन नहीं हुआ है। किसी भी राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था उस राजनीतिक दल के अनुसार तय होती है, जो वहां राज करता है। जैसे कांग्रेस, वाम और क्षेत्रीय राजनीतिक दल कभी नहीं चाहेंगे कि उनके राज्य में चिह्नित मुसलिम आतंकवादियों को पकड़ने के लिए वह अपने प्रशासन का इस्तेमाल करे, क्योंकि ये दल अधिकांशतः मुसलिम मतों से ही सत्तारूढ़ होते हैं। और मुसलिम बाहुल्य के राज्यों में नियम-कानून, सामाजिक स्थितियां कैसी हैं या होती हैं, यह गुप्त बात नहीं रही। जब तक देश और विश्व से आतंकवाद की बीमारी खत्म नहीं हो जाती भारत में अफस्पा की जरूरत तब तक रहेगी। आतंकवाद को जड़ से मिटाने के लिए तो अफस्पा जैसे कानून को और भी अधिकारसंपन्न बनाना होगा। केवल सीमांत पूर्वोत्तर राज्यों में ही नहीं बल्कि हर उस राज्य में जहां मुसलिम वोट बैंक से राजनीतिक दल सत्ता हासिल कर रहे हैं, अफस्पा कानून तत्काल प्रभाव से लागू होना चाहिए।
          सत्ता प्राप्त करने के लिए राजनीतिक दल अनेक प्रकार के षड्यंत्र रच रहे हैं। लेकिन ये षड्यंत्र यदि हिंदू बहुसंख्यक नागरिकों के प्रतिकूल और मुसलिमों के अनुकूल होते रहेंगे तो तय है कि लोकतांत्रितक अवधारणाओं को दरकने में देर नहीं लगेगी। भाजपा सरकार लाख विकास की बातें कर ले या सबका साथ सबका विकास के सिद्धांत पर चलने को महत्व दे, परंतु निश्चित है कि हिंदुओं को पीड़ित करने की कीमत पर भाजपा के विरोधी उसे कभी अमरनाथ कांड जैसे डंक मारेंगे तो कभी गोरक्षकों को बदनाम करने के लिए उनके क़ृत्रिम अत्याचारों को बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करेंगे। यह सब होते हुए भी भाजपा की कमी यही है कि वह अनावश्यक रूप से महान बनने का प्रयास करती है। भाजपा को याद रखना चाहिए कि वाजपेयी सरकार को दूसरा कार्यकाल इसलिए नहीं मिल सका था क्योंकि उसकी महानता बहुसंख्यक हिंदुओं पर ही भारी पड़ने लगी थी। यह समय बड़ा कठिन है। वर्तमान केंद्र सरकार के पास कई माध्यम हैं, जिनसे उसे भारतीय ही नहीं अपितु वैश्विक समाज में बढ़ते, बर्बर-विध्वंशक होते मुसलिम आतंक के साक्ष्य मिल रहे हैं। मोदी सरकार को कोरी धर्मनिरपेक्षता, संप्रभुता का राग अलापने वालों की ओर कान बंद कर बहुसंख्यक भारतीयों के हितों के अनुरूप शासन करना चाहिए। अत्यंत विचारणीय है कि इसी में सभी की भलाई निहित है।
विकेश कुमार बडोला