Tuesday, April 11, 2017

आतंकवाद का वैचारिक संरक्षण बंद करे दुनिया

मेरिकी राष्‍ट्रपति ट्रंप द्वारा सात मुसलिम देशों पर लगाए गए अस्‍थायी आव्रजन संबंधी प्रतिबंधों के बाद दुनिया में नई राजनीतिक हलचल मची हुई है। किसी भी देश के जनजीवन को हर तरह से प्रभावित करने के लिए उस देश की राजनीतिक गतिविधियां सबसे बड़ा कारक होती हैं। जब से डोनाल्‍ड ट्रंप ने आतंकवाद पर कठोर प्रतिबंध की अपनी अभिव्‍यक्‍त मंशा को सुदृढ़ता प्रदान करने के लिए सात मुसलिम देशों के नागरिकों पर अमेरिका में प्रवेश को लेकर रोक संबंधी आदेश पारित किया, तब से अमेरिका ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में खलबली मची हुई है। चूंकि ट्रंप ने राष्‍ट्रपति चुनाव के लिए आयोजित अपनी सभी सभाओं में यही कहा था कि वे राष्‍ट्रपति चुने जाने पर किसी भी कीमत पर अमेरिकियों को आतंकवाद से मुक्‍त करेंगे इसीलिए वह अपना चुनावी वचन पूरा कर रहे हैं। अमेरिकी लोग उनके इस चुनावी संकल्‍प पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के साथ-साथ किसी भी दशा में इसको लागू हुआ देखना चाहते थे। साथ ही वहां के स्‍थानीय नागरिकों को इस बात का भी भलीभांति आभास हो चुका था कि डेमोक्रेट्स के दशकों के शासन में अमेरिका ने आतंकवाद के उन्‍मूलन के लिए कठोर प्रतिरोध नहीं किया और न ही आतंकवाद फैलने के मौलिक विषयों को समझने में रुचि ही दिखाई। ट्रंप के आने से पूर्व अमेरिका भी आतंक और आतंकियों के प्रति ठीक वैसा ही राजनीतिक दृष्टिकोण रखता आया है, जैसा भारत में कांग्रेस के शासन में कांग्रेसियों व इसके सहयोगी राजनीतिक दलों का होता था।
एक तरह से पूरा विश्‍व आतंकवाद को लेकर प्रारंभ से ही दो वैचारिक ध्रुवों में विभाजित रहा है। आतंकवाद और आतंकवादियों का परिरक्षण करनेवाले वैश्विक प्रगतिवादी नेताओं, पत्रकारों, न्‍यायविदों और इनके अनुगामी लोगों ने आतंक के संदर्भ में अपने अतार्किक सिद्धांत बलात संपूर्ण विश्‍व पर थोपने की कोशिश की। जिस कारण शनै: शनै: पूरी दुनिया में मानवजाति के लिए आवश्‍यक खाद्यान, पोषाहार, आवास, शिक्षा-स्‍वास्‍थ्‍य जैसे विषय राजनीति के कार्यक्रमों से अदृश्‍य हो गए तथा आतंकवाद राजनीतिक चिंता का प्राथमिक विषय बन गया। यह भी इसलिए हुआ क्‍योंकि विगत तीन दशकों में पूरे संसार में अधिकांश देशों का सत्‍ता परिचालन विद्रूपित विचारधारा के सहारे होने लगा था। जब ब्रिटेन में ब्रेक्जिट के अंतर्गत लोगों ने बहुमत के आधार पर यूरोपियन यूनियन से बाहर निकलने का विचार किया, भारत में पहली बार कोई दक्षिणपंथी सरकार सत्‍तारूढ़ हुई तथा अमेरिका में रिपब्लिकन राजनीतिक दल डोनाल्‍ड ट्रंप के नेतृत्‍व में सत्‍तासीन हुआ, तब जाकर विश्‍व में आतंकवाद के विरुद्ध निर्णायक लड़ाई की वैश्विक संभावना प्रकट हुई। संभावना ही नहीं बल्कि विश्‍व की इन तीन ऐतिहासिक, राजनीतिक-सामाजिक घटनाओं ने वैचारिक रूप से कुरीतियों पर आरूढ़ सांसारिक प्रगतिवाद के समर्थकों को यह सोचने के लिए विवश किया कि उनकी गरीबों, किसानों तथा मजदूरों के संबंध में की जानेवाली चिंताएं अत्‍यंत खोखली हो चुकी हैं। वास्‍तव में जीवन की आधारभूत आवश्‍यकताओं से वंचित तथा जैविक अधिकारों के लिए संघर्षशील लोगों के पक्ष में खड़े होने के बजाए ये तथाकथित प्रगतिवादी आतंकवाद तथा आतंकवाद की इसलामी विचारधारा का विश्‍व स्‍तर पर आधिकारिक समर्थन करने लगे।    
            अमेरिका के संघीय न्‍यायालय द्वारा ट्रंप के प्रतिबंध संबंधी शासकीय आदेश पर अस्थायी रूप से रोक लगा दी गई। इसे ट्रंप प्रशासन ने अपीलीय न्‍यायालय में चुनौती भले ही दी हो परंतु सत्‍तारूढ़ रिपब्लिकन के ट्रंप और स्‍थानीय न्‍यायविदों के बीच आतंकवाद की परिभाषा, विवेचना तथा आतंकवाद के प्रति लड़ाई को लेकर मतभेद उभर आए हैं। कहीं न कहीं अमेरिकी न्‍यायालयों का यह निर्णय आतंकवाद को लेकर शून्‍य सहनशक्ति अपनाने वाले ट्रंप प्रशासन को हतोत्‍साहित करेगा।  
दुनियाभर में हुई या हो रही आतंकी घटनाओं का गणित हजारों की संख्‍या तक पहुंच चुका है। परंतु इन घटनाओं के सिद्ध दोषी आज तक केवल और केवल मुसलमान ही रहे। इस बात को समझने के लिए भी अमेरिका सहित दुनिया के अधिकांश देशों के लोग दो वर्गों में विभाजित हैं। निर्दोष लोगों को वीभत्‍स तरीके से मारना आतंकवादियों के लिए इस आधुनिक युग में कोई गुप्‍त काम नहीं रहा। उनके आतंकी आक्रमण, मारकाट, हिंसा और विध्‍वंसकारी गतिविधियों के वीडियो की यहां-वहां भरमार है। दुर्भाग्‍य से आतंकियों का दुस्‍साहस इतना ज्‍यादा होता है कि वे अपने काम को सीधे-सीधे मुसलिम धर्म व धार्मिक धारणाओं की अपेक्षा पर चलनेवाला अभियान बताते हैं। उन्‍हें लोगों को मारने पर अंशमात्र का दुख या पछतावा नहीं होता। मध्‍य यूरोप से होते हुए पूर्वोत्‍तर एशिया के देशों तक पिछले दो दशकों में आतंकवाद पेशेवर तरीके से बढ़ा है। मुसलिम देशों के निकटवर्ती अन्‍य धर्मों के देशों से आतंकवादी निरंतर परोक्ष युद्ध करते रहे हैं। अतिवादियों ने आतंकी हमलों व अन्‍य हिंसात्‍मक कारनामों को सामूहिक योजना बनाकर अंजाम दिया। मुसलिम देशों की सरकारें, वहां का मीडिया भी किसी न किसी रूप में और विशेषकर वैचारिक रूप में आतंकवादियों के समर्थन में हमेशा खड़ा रहा।
दुर्भाग्‍य से दुनिया के अधिकांश देशों में सत्‍तारूढ़ शासकों की लापरवाही के कारण पिछले बीस-पच्‍चीस वर्षों में दुनिया में विकास की प्रतिस्‍पर्द्धा अति भौतिकवाद व उदारवाद के कारण उलझ गई। यह उलझाव इस प्रकार गहराया कि दुनिया में गरीबी, अशिक्षा, भेदभाव और लोगों की स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी नीतियों-रीतियों को लागू करने की आड़ में दुनिया के देश केवल और केवल सैद्धांतिक (धार्मिक) प्रतिस्‍पर्द्धा में कूद पड़े। और यह सैद्धांतिक प्रतिस्‍पर्द्धा कट्टर मुसलिमों के लिए सर्वाधिक प्रतिष्‍ठा का विषय बन गई। इसी प्रवाह में धीरे-धीरे आतंकवादियों की दुर्दांत हरकतों के बाद भी उनका परिरक्षण करनेवाली वैश्विक विचारधारा का जन्‍म हुआ। यदि मुसलिम विचारक या धर्माधिकारी आतंकवाद और आतंकवाद फैलानेवाले मुसलिम आतंकियों का पक्ष समर्थन करते तो बात समझ आती, लेकिन आतंकवादियों के समर्थन में अधिकांश देशों के तत्‍कालीन गैर-मुसलिम सत्‍तारूढ़ नेता और प्रगतिवादी विचारक व पत्रकार भी कूद पड़े। यह प्रगतिवादी गुट वर्षों तक आतंकवाद का दिखावटी प्रतिरोध करता रहा। दुर्भाग्‍य से आज भी स्थिति नहीं बदली है।
ये सामूहिक रूप से कहा करते कि आतंकवादी अशिक्षा व गरीबी के कारण ही आतंकवादी हैं, आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और आतंकवाद को किसी देश या उस देश की धार्मिक मान्‍यताओं के आधार पर चिहिन्‍त नहीं किया जा सकता। विशेषकर अमेरिका और विकसित यूरोपीय देशों के प्रगतिवादी राजनीतिज्ञों, विचारकों, पत्रकारों और विद्वानों का आतंकवाद को लेकर ऐसा दृष्टिकोण बना रहा। अफ्रीकी और एशियाई महाद्वीपों में जो गैर-इसलामिक देश थे, जैसे कि भारत, जो पाकिस्‍तान-अफगानिस्‍तान जैसे इसलामी देशों द्वारा पाले गए आतंकवाद से पीड़ित था, वहां के प्रगतिवादियों को भी आतंक व आतंकवाद के संदर्भ में देखादेखी यूरोपियन प्रगतिवादियों का दृष्टिकोण अपनाने में गर्वानुभूति होती थी। इन तथाकथित विद्वानों को अपने क्षेत्र में बारंबार होते आतंकी हमलों में शहीद सैनिकों, नागरिकों से सहानुभूति और घायल-पीड़ित लोगों से कोई सरोकार न था। आतंकवाद को लेकर यूरोपीय नजरिया अपनाना इनका फैशन बन चुका था। उस समय तक यूरोप के विकसित देशों को एशिया में भारत व श्रीलंका जैसे देशों में आतंकवाद फैलाने में अपना कारोबारी हित नजर आता था। क्‍योंकि उस दौरान उन देशों की कई कंपनियां हथियारों को बेचकर अपने देश का विकास कर रही थीं। हथियारों की सर्वाधिक बिक्री पूर्वोत्‍तर एशियाई देशों में हुई। इसमें भारत भी शामिल था। परंतु जब एक-डेढ़ दशक पूर्व अमेरिका सहित यूरोपीय व विकसित कहे जानेवाले देशों में भी आतंकवाद फैला तो यूरोपियन प्रगतिवादियों और दूसरी-तीसरी दुनिया के उनके अनुगामी प्रति-प्रगतिवादियों को समझ आ गया कि आतंक के मूल में गरीबी व अशिक्षा नहीं अपितु एक धर्म के सिद्धांत की बलात स्‍थापना करने का भयावह विचार है। लेकिन अभी भी इनकी यह समझ मुखर नहीं हो पा रही। अभी भी ये लोग दबी आवाज में कहीं न कहीं आतंकवादियों द्वारा किए जा रहे रक्‍तपात और अन्‍य अमानवीय हरकतों के लिए सीधे-सीधे उन्‍हें और उनके धार्मिक कारणों को दोषी मानने को राजी नहीं। पता नहीं इसलाम से इस प्रकार का भय ऐसे लोगों को क्‍यों रहता है। वैसे भी इसलाम में धर्म के नाम पर विकृतियों ने ही जोर पकड़ा और वह भी दूसरे धर्मों को धता बताने की कीमत पर। लेकिन दक्षिण एशिया के महत्‍वपूर्ण राष्‍ट्र भारत, सुदूर पूर्वी भूखंड में बसे वि‍कसित-अनुशासित जापान और इन दोनों से बहुत दूर उत्‍तरी भू-भाग में स्थित सर्वाधिक शक्तिशाली देश अमेरिका में विगत पांच वर्ष से आतंक तथा आतंकवादियों की विवशता को लेकर निराधार तर्क परोस रही राजनैतिक-पत्रकारीय बिरादरी को जनता का मुखर विरोध झेलना पड़ा है। इस परिप्रेक्ष्‍य में दुनिया के अब दो स्‍पष्‍ट वैचारिक विभाजन हो चुके हैं। एक, दक्षिणपंथ तो दूसरा वामपंथ। विगत तीन चार वर्षों में दुनिया के अधिकांश विकसित राष्‍ट्रों तथा अंतर्राष्‍ट्रीय सुरक्षा परिषद के सदस्‍यों देशों में भी आतंकवाद की अनेकों घटनाएं हुईं। घटनाओं की छानबीन के बाद ज्ञात हुआ कि सभी घटनाएं मुसलमान लोगों द्वारा ही इसलाम के प्रसार के नाम पर की गईं। ऐसे प्रमाण तथा तथ्‍य यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्‍त हैं कि इस समय विश्‍व के हथियार निर्माता देश जिन आतंकी समूहों तथा उनके संरक्षक देशों को आतंकवाद के प्रसार के लिए हथियार बेच कर लाभ कमा रहे थे, अब उसी आतंक की चपेट में किसी न किसी रूप में वे भी आ रहे हैं। अब भी समय है। विश्‍व में व्‍याप्‍त उस बौद्धिक सोच को यदि तत्‍काल नहीं बदला गया जिसमें आतंक व आतंकवादियों के लिए हमेशा वैचारिक संरक्षण रहा है, तो आगामी बीस-पच्‍चीस वर्षों में धरती पर मानवीय जीवन को किसी भी रूप में बचाए रखना असंभव हो जाएगा।
भारत सहित विश्‍वभर में हो रही आतंकी घटनाओं तथा आतंकी घटनाओं के कारण अराजक तंत्र में बदलते जा रहे विश्‍व में सर्वोच्‍च कर्ताधर्ताओं द्वारा अभी तक यह तय नहीं किया जा सका है कि आतंक क्‍यों हो रहा है। चीन, अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस जैसे देश तो आतंकी समूहों व इनके रक्षक देशों को शस्‍त्र बेचकर अपना कारोबार चलाते आए हैं। ये तो आतंक के लिए मुसलमानों तथा इनकी मुसलिम धार्मिक विचारधाराओं को प्रत्‍यक्ष दोषी कभी नहीं मानेंगे। पर भारत और इसके सरकारी व निजी प्रचार तंत्र को आतंक के इस मूल कारण को सम्‍मुख रख अपना आतंकरोधी कार्यक्रम अपनाने में समस्‍या क्‍यों हो रही है। कहीं भारत भी शस्‍त्र बेचकर लाभ कमाने का लालच तो नहीं पाल रहा। कहीं वह भी लाभ के लिए यह देखना ही भूल जाए कि वह शस्‍त्र किस को बेच रहा है। जैसे कि सुरक्षा परिषद के देश कर रहे हैं। आतंकियों व उनके रक्षक देशों को शस्‍त्र बेचकर लाभ कमाने की सोच ऐसे देशों में हो रही आतंकी घटनाओं के कारण उलटी पड़ चुकी है।
      विकेश कुमार बडोला

4 comments:

  1. अभी तो लगता है पूरा साम्राज्य डरा हुआ है ... कोई भी विरोध में बोल के अपने वोट नहीं खोना चाहता ...

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  2. गहन विमर्श ।

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