Friday, April 14, 2017

राजनीतिक विरोधाभास हैं र्इवीएम में गड़बड़ी के आरोप

वीएम में छेड़छाड़ की आशंका को लेकर विपक्ष बुरी तरह बौखलाया हुआ है। यूपी और उत्‍तराखंड में भाजपा प्रचंड बहुमत से सत्‍तासीन क्‍या हुई विपक्षियों ने अपनी पराजय का सारा दोष ईवीएम मशीनों की गड़बड़ियों पर डाल दिया। सबसे पहले बसपा की मायावती ने ईवीएम से छेड़छाड़ की बात उठाई। उल्‍लेखनीय है कि बसपा सहित तमाम अन्‍य राजनीतिक दल यूपी में बुरी तरह परास्‍त हुए हैं। इसकी खीझ वे ईवीएम मशीनों पर निकाल रहे हैं।
इसके बाद दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री केजरीवाल ने ईवीएम मशीनों में खराबी होने का आरोप लगाया। वे तो राज्‍य निर्वाचन आयोग से दिल्‍ली में आगामी नगर निगम चुनावों में ईवीएम मशीनों के स्‍थान पर बैलेट पेपर का इस्‍तेमाल करने की सिफारिश तक कर चुके हैं। अब कांग्रेस सहित सारा विपक्ष ईवीएम मशीनों की गड़बड़ी को लेकर मुखर है तथा उसका तेरह सदस्‍यीय प्रतिनिधिमंडल इस संबंध में राष्‍ट्रपति से भी अपनी शिकायत कर चुका है।
यूपी और उत्‍तराखंड में यदि भाजपा ने सत्‍ता प्राप्‍त की तो पंजाब में कांग्रेस सत्‍तारूढ़ हुई। इसी तरह गोवा और मणिपुर में कांग्रेस को ज्‍यादा विधानसभा सीटें मिलीं। पंजाब, गोवा व मणिपुर के संदर्भ में तो विपक्षियों को ईवीएम का दोष दिखाई नहीं देता। देखा जाए तो ईवीएम मशीनों पर अपनी राजनीतिक पराजय का ठीकरा फोड़ना अलग-अलग राजनीतिक दलों की निजी कुंठा ही प्रदर्शित करता है क्‍योंकि विपक्ष ने किसी उचित कारणवश एक होकर ईवीएम मशीनों में समस्‍या की शिकायत नहीं की।
पंजाब में आम आदमी पार्टी ने चुनाव से पूर्व ही अपनी सरकार बनाने के दावे कर दिए थे। हारने पर उसके मुखिया केजरीवाल को ईवीएम में खराबी दिखने लगी। इसी प्रकार यूपी में चुनाव पूर्व केवल राजनीतिक अवसर झपटने के लिए बना सपा-कांग्रेस गठबंधन तथा बसपा की करारी हार से इनके नेताओं को किसी न किसी रूप में अपनी भड़ास निकालनी थी। इसलिए इन्‍होंने ईवीएम मशीनों की खराबी के जरिए अपनी भड़ास निकाली। ज‍बकि पंजाब के नवनिर्वाचित कांग्रेसी मुख्‍यमंत्री अमरिंदर जीत सिंह ने ईवीएम मशीनों में खराबी के आरोप के बाबत कहा कि यदि मशीनों में खराबी होती तो वे बहुमत कैसे प्राप्‍त करते। कहने का तात्‍पर्य यही है कि ईवीएम में दोष का विपक्षी एजेंडा भी राजनीतिक विरोधाभासों से भरा हुआ है, जो जनता को केवल हास्‍यास्‍पद ही नजर आता है।
विगत संसद सत्र में विपक्षियों ने गैर-भाजपाई राज्‍यों के मुख्‍यमंत्रियों और नेताओं के विरुद्ध सीबीआई तथा ईडी द्वारा प्रस्‍तुत आरोप पत्रों को लेकर जमकर हंगामा खड़ा किया। चूंकि भारत में केंद्र की मोदी सरकार का आगमन कांग्रेसजनित भ्रष्‍टाचार से ऊब का ही परिणाम था इसलिए सरकार की जनता के प्रति अहम जिम्‍मेदारी थी कि वह कांग्रेसियों के भ्रष्‍टाचार व घोटालों के सिद्ध दोषियों को कानूनी ढंग से सजा दिलवाए। परंतु मोदी सरकार के तीन वर्ष व्‍यतीत होने के उपरांत भी अभी तक किसी घोटालेबाज को कोई सजा नहीं दी जा सकी है।
सीबीआई व प्रवर्तन निदेशालय ने कांग्रेसी सरकार में हुए अवैध लेन-देन, घपलों-घोटालों के संबंध में अनेक मामलों में आरोप पत्र तो कई बार प्रस्‍तुत किए पर अभी तक किसी बड़े राजनेता या उसके करीबी कारोबारी को कठोर कानूनी दंड के दायरे में नहीं लाया जा सका है। मोदी सरकार पर इस बात की बड़ी जवाबदेही है। इसलिए उसने केंद्रीय जांच एजेंसियों को अपराधियों की धरपकड़ के  लिए विशेषाधिकार और समन्‍वयक सुविधाएं प्रदान की हैं। इसी के परिणामस्‍वरूप कांग्रेसी राज्‍यों के वर्तमान व पूर्व मुख्‍यमंत्रियों, नेताओं व इनके करीबी कारोबारियों पर जांच एजेंसियों का शिंकजा गहराता जा रहा है। चूंकि विपक्ष को पूरी आशंका है कि उनके घपले-घोटाले व भ्रष्‍टाचार को मोदी सरकार एक न एक दिन साबित कर देगी इसलिए उन्‍होंने सरकार का ध्‍यान बांटने के लिए संसद व संसद से बाहर ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी का नया शिगूफा उछाला है।
इस मामले में उन्‍हें न्‍यायालयों में दाखिल इस आशय की जनहित याचिकाओं का सहारा भी मिला। जिनमें न्‍यायाधीशों ने टिप्‍पणी करी कि जब ईवीएम में दोष की आशंका इतने बड़े पैमाने पर उभरी है तो चुनाव आयोग उनकी आशंका का समाधान करे। चुनाव आयोग पर पिछले एक माह से ईवीएम मशीनों को त्रुटिहीन सिद्ध करने का दबाव पड़ रहा था। अंतत: आयोग ने राजनीतिक दलों और मशीनों की गड़बड़ी पकड़ सकनेवाले विशेषज्ञों को ईवीएम मशीनों के परीक्षण-निरीक्षण करने का मौका उपलब्‍ध करा ही दिया है।
इलेक्‍ट्रॉनिक वोटिंग मशीन ठीक न होने का प्रश्‍न उठानेवाले राजनेताओं और मशीन विशेषज्ञों को आयोग ने खुली चुनौती दे दी है। आयोग ने कहा है कि मई के प्रथम सप्‍ताह में ऐसे लोग मशीन को हैक करके या उसमें किसी किस्‍म की गड़बड़ी करके दिखाएं। आयोग इसके लिए एक हफ्ते या दस दिन का समय देगा। संभवत: उत्‍तर प्रदेश चुनाव में इस्‍तेमाल की गई मशीनों से ही राजनीतिक दलों व इनके विशेषज्ञों से छेड़छाड़ अथवा हैक करने को कहा जाए। वैसे नियम यह है कि ईवीएम मशीनों को चुनाव परिणाम के बाद 40 दिन से पूर्व स्ट्रांग रूम से बाहर नहीं ले जाया जा सकता। यह अवधि माह के आखिर में खत्‍म हो रही है। नियम का अनुपालन सुनिश्चित हो सके इसीलिए मशीनों के निरीक्षण के लिए मई का पहला सप्‍ताह नियत किया गया है।
ईवीएम मशीनों में छेड़खानी का आरोप लगानेवाले नेता कितने जमीनी हैं अथवा वे जनता के कितने सेवक हैं यह उनके निराधार आरोपों से तय हो चुका है। इतने वर्षों से सत्‍तासीन इन नेताओं में जनता का राजनीतिक दृष्टिकोण परखने की योग्‍यता नहीं। देश का जनमानस कैसी राजनीति चाहता है, इस दिशा में सोचकर खुद को नए सिरे से नई सकारात्‍मक राजनीति के लिए तैयार करने के बजाय वे जनता के बहुमत की अवहेलना कर रहे हैं। क्‍या इस संबंध में संविधान या लोकतांत्रिक मर्यादाओं का हनन करने का दोषारोपण ऐसे नेताओं पर नहीं लगना चाहिए। क्‍या किसी के द्वारा इस प्रकरण में जनहित याचिकाएं दाखिल नहीं की जानी चाहिए। न्‍यायालयों का स्‍वयं संज्ञान क्‍या इस संदर्भ में नहीं जागना चाहिए।
इस तरह तो लोकतांत्रिक अवधारणा विरोधाभासों से घिरती जाएगी। ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी के आरोपों को लेकर भाजपा की केंद्र सरकार की ओर से मजबूत प्रत्‍यारोप नहीं आना भी उचित नहीं कहा जा सकता। वह कम से कम अपने संसाधनों का उपयोग कर न्‍यायालयों में इस बाबत एक जनहित याचिका तो डाल ही सकती है। बेशक उसे अपनी राजनीतिक मंशा साफ, पारदर्शी लगे परंतु उसे जनता के उस बहुमत का आदर तो करना ही चाहिए, जिसके बलबूते वह सत्‍तारूढ़ हुई है। इसी आधार पर वह चुनाव आयोग या न्‍यायालयों के समक्ष जनता के बहुमत का हवाला देकर ईवीएम मशीनों की गड़बड़ी के आरोपों को निराधार सिद्ध कर सकती है।
विकेश कुमार बडोला

Tuesday, April 11, 2017

पत्थर फेंकनेवालों से निपटने का तरीका केवल कठोर हो

पिछले वर्ष सितंबर में ही राजग की केंद्र सरकार ने एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल कश्‍मीर भेजा था, जिसकी अध्‍यक्षता गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने की थी। हालांकि यह नौबत भी तब आई जब स्‍थानीय अतिवादियों पर पैलेट गन के इस्‍तेमाल को लेकर विपक्ष ने सुरक्षा बलों को मानवाधिकारों के उल्‍लंघन करनेवाला बताया। परंतु केंद्र सरकार ने विपक्ष से आग्रह किया कि वह स्‍वयं कश्‍मीर में पत्‍थर फेंकनेवालों की वास्‍तविक स्थिति का अनुमान ले ले ताकि सुरक्षा बलों द्वारा आत्‍मरक्षा में चलाई जानेवाली पैलेट गन की सच्‍चाई सामने आ सके। लेकिन कश्‍मीर में सुरक्षाकर्मियों पर स्‍थानीय युवकों द्वारा आतंकवादियों के उकसावे पर पत्‍थर फेंकने के आलोक में चुभता हुआ प्रश्‍न यह उभर रहा है कि आखिर इतने बड़े राष्ट्र को अपने सैन्‍य बलों की तुलना में भाड़े के अतिवादियों के बारे में इतना सोचने-विचारने की क्‍या आवश्‍यकता है। कश्‍मीर समस्‍या का सच अब किसी भी रूप में गुप्‍त नहीं रहा। केंद्र सहित स्‍थानीय विपक्ष, मुसलिम राजनीतिक दल और पाक-प्रशासित आतंकी समूह सभी भलीभांति अवगत हैं कि कश्‍मीर में पत्‍थर फेंकने का कार्यक्रम कोई रीतिगत कार्यक्रम नहीं है। इस काम के लिए किसी भारतीय हित अथवा राष्‍ट्रीय उत्‍पादन की दिशा निर्धारित नहीं होती। आधिकारिक रूप से भारत के हिस्‍से कश्‍मीर में भारतीय रक्षा बलों पर पत्‍थर फेंकना हर कोण से अवैध है। तब भी इस समस्‍या को देखने का दृष्टिकोण भारत में ही दो तरह का है। एक वे राजनेता, बुद्धिजीवी, पत्रकार तथा इनके समर्थक लोग हैं जो किसी भी प्रत्‍यक्ष भारत विरोधी गतिविधि में शामिल मुसलिमों को कभी भी दोषी या आरोपी नहीं समझते। यह वर्ग उलटा ऐसे राष्‍ट्र विराधियों की हरकतों को हास्‍यास्‍पद तथ्‍यों व तर्कों के आधार पर सही ठहराने को जुटा रहता है। दुर्भाग्‍य से इसमें भारतीय न्‍यायिक व्‍यवस्‍था के व्‍यवस्‍थापक तथा न्‍यायाधीश भी शामिल हैं।
सितंबर16 में कश्‍मीर का दौरा करने से पूर्व केंद्रीय प्रतिनिधिमंडल वहां जाने के लिए इसीलिए तैयार हुआ था क्‍योंकि केंद्र सरकार के सम्‍मुख न्‍यायालय का आदेश मानने की राजनीतिक विवशता थी। उल्‍लेखनीय है कि कश्‍मीर और पूर्वोत्‍तर राज्‍यों में सशस्‍त्र बल विशेष सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत अतिरिक्‍त सेना तैनात है। विगत वर्षों में सीमावर्ती इन राज्‍यों से भारत में निरंतर घुसपैठ होती थी। घुसपैठियों का उद्देश्‍य भारत में घुस कर इसकी संप्रभुता को कई प्रकार से नुकसान पहुंचाना होता था। नकली मुद्रा, नकली सामान, प्रतिबंधित मद्य व मदिरा पदार्थों की तस्‍करी से लेकर मानव तस्‍करी तथा आतंकवाद के प्रसार के लिए आवश्‍यक विस्‍फोटक आदि का आवागमन इन्‍हीं राज्‍यों की सीमाओं से होता रहा है।
पाकिस्‍तान, बांग्‍लादेश, म्‍यांमार जैसे देशों से भारत में होनेवाली घुसपैठ का मकसद अनेक प्रकार के अवैध कारोबारों से केवल पैसा कमाना ही नहीं था बल्कि इन मुसलिम देशों के कट्टर मुसलिम आतंकी समूहों ने भारत में इसलाम के प्रसार के लिए भी हर वह काम किया जो भ्रष्‍ट भारतीय सरकारी तंत्र की मिलीभगत से हो सकता था। आज इसी का परिणाम है कि भारत में मुसलिमों की जनसंख्‍या तेजी से बढ़ती जा रही है। वर्तमान की केंद्र सरकार भी पिछली सरकारों की तरह इस विषय में मुंह सिल कर बैठी हुई है। सरकार को गलत अंदाजा है कि वह विकास की बातों व कार्यों के दम पर इसलामी आतंकी समूहों की भारत को इसलामिक देश बनाने की गुप्‍त कारगुजारियों को खत्‍म कर देगी।
सरकार को ध्‍यान रखना चाहिए कि दुनिया में सदियों से जितने भी युद्ध लड़े गए हैं, उनके मूल में अपने-अपने मतों व सिद्धांतों की स्‍थापना ही होती है। इस समय भी विश्‍वभर में व्‍याप्‍त आतंक का गुप्‍त लक्ष्‍य इसलाम का अधिरोपण करना ही है। यदि ऐसा न होता तो आज अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस, स्‍वीडन, बेल्जियम जैसे विकसित देशों में आतंकी घटनाएं देखने को न मिलतीं। कश्‍मीर में पत्‍थरबाजी भी बहुत प्राय: भारत में इसलाम को थोपने का ही एक हथकंडा है। इसे हलके में आंकना सरकार को दो तरह से भारी पड़ेगा। एक, आनेवाले समय में वह सत्‍तासीन नहीं हो सकेगी। दूसरे, पत्‍थरबाजों से समझौते की बात पर आखिर में वह मुंह की ही खाएगी और राष्‍ट्र की राष्‍ट्रीयता खतरे में पड़ेगी। यहां इस लेखक को बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि विश्‍व के धर्मनिरपेक्ष विद्वानों को आतंक का यह रूप विचलित नहीं करता। क्‍योंकि विगत दिनों ब्रिटेन,रूस और स्‍वीडन में हुई आतंकी घटनाओं की प्रतिक्रिया में ऐसे विद्वानों ने अपना पत्रकारीय रोष प्रकट नहीं किया।
भारत में कश्‍मीर वह क्षेत्र है, जो विगत साढ़ तीन दशकों से प्रतिक्षण आतंकी कारनामों के लिए कुख्‍यात रहा है। पाकिस्‍तान में स्‍थापित आतंकी समूह कोई न कोई बहाना बनाकर कश्‍मीर में भारतीय लोकतंत्र के लिए चुनौती बने हुए हैं। यदि किसी गुप्‍त सैन्‍य अभियान कार्रवाई के तहत किसी आतंकी समूह के आतंकियों को पकड़ने के लिए सेना आगे बढ़ती है तो स्‍थानीय मुसलिम युवक और जनता आतंकियों का सुरक्षा कवच बनकर सामने आ खड़ी होती है। सेनाकर्मी यदि थोड़ी बहुत सख्‍ती करते हैं तो मुसलिम युवक उन पर पत्‍थरों की बौछार करने लगते हैं। पिछले साल तक सेना को अनुमति थी कि वह ऐसे उपद्रवियों पर पैलेट गन चला सकती है। लेकिन विपक्ष और स्‍थानीय मुसलिम नेताओं ने पैलेट गन के इस्‍तेमाल पर रोक के लिए राज्‍य उच्‍च न्‍यायालय तथा सर्वोच्‍च न्‍यायालय में अपील कर दी। धर्मनिरपेक्ष तथा तटस्‍थ बनने का नाटक कर नेताओं, विद्वानों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और इनके समर्थकों की आवाज पर सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने भी केंद्र सरकार को पैलेट गन के स्‍थान पर कोई दूसरा विकल्‍प अपनाने का निर्देश दिया। लेकिन इस संपूर्ण कश्‍मीर चिंतन के दौरान न्‍यायाधीशों ने यह नहीं सोचा कि सैनिकों को पत्‍थर फेंकनेवालों के हमलों का प्रतिरोध न करने पर कितनी जान-माल की हानि उठानी पड़ रही है। क्‍योंकि पत्‍थरबाज तो बिना किसी कारण सैन्‍यकर्मियों को देखते ही उन पर हमला करने लगते हैं। अब त‍क पत्‍थरबाजों के हमलों में अनेक सैनिक शहीद हो चुके हैं तथा कई बुरी तरह घायल पड़े हैं।
यह देख कर बहुत दुख होता है कि स्‍थानीय अतिवादियों को इतना अतिवाद फैलाने तथा भारतीय गणतांत्रिक संप्रभुता को खुलेआम धता बताने के बाद भी सुधरने और मुख्‍यधारा में लौट आने के अनेक अवसर दिए जा रहे हैं। परंतु सैन्‍यकर्मियों तथा भारतीय जन-गण-मन की अस्मिता की रक्षा करने को आतुर आम भारतीयों को मुख्‍यधारा में भी भेदभाव झेलना पड़ रहा है। देश में अनेक युवक ऐसे हैं जो भारत भूमि के लिए अपना सर्वस्‍व झोंकने को सदैव तत्‍पर हैं, पर उनकी खोज-खबर के लिए न तो कांग्रेसियों के पास ही समय था और न ही भाजपा की केंद्र सरकार ही उनके बारे में कुछ कर पा रही है। पत्‍थरबाजों को मुख्‍यधारा में लाने की अपील प्रधानमंत्री व्‍यर्थ ही कर रहे हैं क्‍योंकि ये ऐसे अतिवादी तत्‍व हैं जो धार्मिक कट्टरता के आत्‍मदंश से पीड़ित हैं। इनसे छुटकारा पाने के लिए इन्‍हें आतंकवादियों की तरह ही निपटाना पड़ेगा। अन्‍यथा देश का महत्‍वपूर्ण समय तथा धन-संसाधन यूं ही ऐसे गुंडातत्‍वों पर व्‍यर्थ होता रहेगा।
विकेश कुमार बडोला

Monday, April 10, 2017

आतंकवाद का वैचारिक संरक्षण बंद करे दुनिया

मेरिकी राष्‍ट्रपति ट्रंप द्वारा सात मुसलिम देशों पर लगाए गए अस्‍थायी आव्रजन संबंधी प्रतिबंधों के बाद दुनिया में नई राजनीतिक हलचल मची हुई है। किसी भी देश के जनजीवन को हर तरह से प्रभावित करने के लिए उस देश की राजनीतिक गतिविधियां सबसे बड़ा कारक होती हैं। जब से डोनाल्‍ड ट्रंप ने आतंकवाद पर कठोर प्रतिबंध की अपनी अभिव्‍यक्‍त मंशा को सुदृढ़ता प्रदान करने के लिए सात मुसलिम देशों के नागरिकों पर अमेरिका में प्रवेश को लेकर रोक संबंधी आदेश पारित किया, तब से अमेरिका ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में खलबली मची हुई है। चूंकि ट्रंप ने राष्‍ट्रपति चुनाव के लिए आयोजित अपनी सभी सभाओं में यही कहा था कि वे राष्‍ट्रपति चुने जाने पर किसी भी कीमत पर अमेरिकियों को आतंकवाद से मुक्‍त करेंगे इसीलिए वह अपना चुनावी वचन पूरा कर रहे हैं। अमेरिकी लोग उनके इस चुनावी संकल्‍प पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के साथ-साथ किसी भी दशा में इसको लागू हुआ देखना चाहते थे। साथ ही वहां के स्‍थानीय नागरिकों को इस बात का भी भलीभांति आभास हो चुका था कि डेमोक्रेट्स के दशकों के शासन में अमेरिका ने आतंकवाद के उन्‍मूलन के लिए कठोर प्रतिरोध नहीं किया और न ही आतंकवाद फैलने के मौलिक विषयों को समझने में रुचि ही दिखाई। ट्रंप के आने से पूर्व अमेरिका भी आतंक और आतंकियों के प्रति ठीक वैसा ही राजनीतिक दृष्टिकोण रखता आया है, जैसा भारत में कांग्रेस के शासन में कांग्रेसियों व इसके सहयोगी राजनीतिक दलों का होता था।
एक तरह से पूरा विश्‍व आतंकवाद को लेकर प्रारंभ से ही दो वैचारिक ध्रुवों में विभाजित रहा है। आतंकवाद और आतंकवादियों का परिरक्षण करनेवाले वैश्विक प्रगतिवादी नेताओं, पत्रकारों, न्‍यायविदों और इनके अनुगामी लोगों ने आतंक के संदर्भ में अपने अतार्किक सिद्धांत बलात संपूर्ण विश्‍व पर थोपने की कोशिश की। जिस कारण शनै: शनै: पूरी दुनिया में मानवजाति के लिए आवश्‍यक खाद्यान, पोषाहार, आवास, शिक्षा-स्‍वास्‍थ्‍य जैसे विषय राजनीति के कार्यक्रमों से अदृश्‍य हो गए तथा आतंकवाद राजनीतिक चिंता का प्राथमिक विषय बन गया। यह भी इसलिए हुआ क्‍योंकि विगत तीन दशकों में पूरे संसार में अधिकांश देशों का सत्‍ता परिचालन विद्रूपित विचारधारा के सहारे होने लगा था। जब ब्रिटेन में ब्रेक्जिट के अंतर्गत लोगों ने बहुमत के आधार पर यूरोपियन यूनियन से बाहर निकलने का विचार किया, भारत में पहली बार कोई दक्षिणपंथी सरकार सत्‍तारूढ़ हुई तथा अमेरिका में रिपब्लिकन राजनीतिक दल डोनाल्‍ड ट्रंप के नेतृत्‍व में सत्‍तासीन हुआ, तब जाकर विश्‍व में आतंकवाद के विरुद्ध निर्णायक लड़ाई की वैश्विक संभावना प्रकट हुई। संभावना ही नहीं बल्कि विश्‍व की इन तीन ऐतिहासिक, राजनीतिक-सामाजिक घटनाओं ने वैचारिक रूप से कुरीतियों पर आरूढ़ सांसारिक प्रगतिवाद के समर्थकों को यह सोचने के लिए विवश किया कि उनकी गरीबों, किसानों तथा मजदूरों के संबंध में की जानेवाली चिंताएं अत्‍यंत खोखली हो चुकी हैं। वास्‍तव में जीवन की आधारभूत आवश्‍यकताओं से वंचित तथा जैविक अधिकारों के लिए संघर्षशील लोगों के पक्ष में खड़े होने के बजाए ये तथाकथित प्रगतिवादी आतंकवाद तथा आतंकवाद की इसलामी विचारधारा का विश्‍व स्‍तर पर आधिकारिक समर्थन करने लगे।    
            अमेरिका के संघीय न्‍यायालय द्वारा ट्रंप के प्रतिबंध संबंधी शासकीय आदेश पर अस्थायी रूप से रोक लगा दी गई। इसे ट्रंप प्रशासन ने अपीलीय न्‍यायालय में चुनौती भले ही दी हो परंतु सत्‍तारूढ़ रिपब्लिकन के ट्रंप और स्‍थानीय न्‍यायविदों के बीच आतंकवाद की परिभाषा, विवेचना तथा आतंकवाद के प्रति लड़ाई को लेकर मतभेद उभर आए हैं। कहीं न कहीं अमेरिकी न्‍यायालयों का यह निर्णय आतंकवाद को लेकर शून्‍य सहनशक्ति अपनाने वाले ट्रंप प्रशासन को हतोत्‍साहित करेगा।  
दुनियाभर में हुई या हो रही आतंकी घटनाओं का गणित हजारों की संख्‍या तक पहुंच चुका है। परंतु इन घटनाओं के सिद्ध दोषी आज तक केवल और केवल मुसलमान ही रहे। इस बात को समझने के लिए भी अमेरिका सहित दुनिया के अधिकांश देशों के लोग दो वर्गों में विभाजित हैं। निर्दोष लोगों को वीभत्‍स तरीके से मारना आतंकवादियों के लिए इस आधुनिक युग में कोई गुप्‍त काम नहीं रहा। उनके आतंकी आक्रमण, मारकाट, हिंसा और विध्‍वंसकारी गतिविधियों के वीडियो की यहां-वहां भरमार है। दुर्भाग्‍य से आतंकियों का दुस्‍साहस इतना ज्‍यादा होता है कि वे अपने काम को सीधे-सीधे मुसलिम धर्म व धार्मिक धारणाओं की अपेक्षा पर चलनेवाला अभियान बताते हैं। उन्‍हें लोगों को मारने पर अंशमात्र का दुख या पछतावा नहीं होता। मध्‍य यूरोप से होते हुए पूर्वोत्‍तर एशिया के देशों तक पिछले दो दशकों में आतंकवाद पेशेवर तरीके से बढ़ा है। मुसलिम देशों के निकटवर्ती अन्‍य धर्मों के देशों से आतंकवादी निरंतर परोक्ष युद्ध करते रहे हैं। अतिवादियों ने आतंकी हमलों व अन्‍य हिंसात्‍मक कारनामों को सामूहिक योजना बनाकर अंजाम दिया। मुसलिम देशों की सरकारें, वहां का मीडिया भी किसी न किसी रूप में और विशेषकर वैचारिक रूप में आतंकवादियों के समर्थन में हमेशा खड़ा रहा।
दुर्भाग्‍य से दुनिया के अधिकांश देशों में सत्‍तारूढ़ शासकों की लापरवाही के कारण पिछले बीस-पच्‍चीस वर्षों में दुनिया में विकास की प्रतिस्‍पर्द्धा अति भौतिकवाद व उदारवाद के कारण उलझ गई। यह उलझाव इस प्रकार गहराया कि दुनिया में गरीबी, अशिक्षा, भेदभाव और लोगों की स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी नीतियों-रीतियों को लागू करने की आड़ में दुनिया के देश केवल और केवल सैद्धांतिक (धार्मिक) प्रतिस्‍पर्द्धा में कूद पड़े। और यह सैद्धांतिक प्रतिस्‍पर्द्धा कट्टर मुसलिमों के लिए सर्वाधिक प्रतिष्‍ठा का विषय बन गई। इसी प्रवाह में धीरे-धीरे आतंकवादियों की दुर्दांत हरकतों के बाद भी उनका परिरक्षण करनेवाली वैश्विक विचारधारा का जन्‍म हुआ। यदि मुसलिम विचारक या धर्माधिकारी आतंकवाद और आतंकवाद फैलानेवाले मुसलिम आतंकियों का पक्ष समर्थन करते तो बात समझ आती, लेकिन आतंकवादियों के समर्थन में अधिकांश देशों के तत्‍कालीन गैर-मुसलिम सत्‍तारूढ़ नेता और प्रगतिवादी विचारक व पत्रकार भी कूद पड़े। यह प्रगतिवादी गुट वर्षों तक आतंकवाद का दिखावटी प्रतिरोध करता रहा। दुर्भाग्‍य से आज भी स्थिति नहीं बदली है।
ये सामूहिक रूप से कहा करते कि आतंकवादी अशिक्षा व गरीबी के कारण ही आतंकवादी हैं, आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और आतंकवाद को किसी देश या उस देश की धार्मिक मान्‍यताओं के आधार पर चिहिन्‍त नहीं किया जा सकता। विशेषकर अमेरिका और विकसित यूरोपीय देशों के प्रगतिवादी राजनीतिज्ञों, विचारकों, पत्रकारों और विद्वानों का आतंकवाद को लेकर ऐसा दृष्टिकोण बना रहा। अफ्रीकी और एशियाई महाद्वीपों में जो गैर-इसलामिक देश थे, जैसे कि भारत, जो पाकिस्‍तान-अफगानिस्‍तान जैसे इसलामी देशों द्वारा पाले गए आतंकवाद से पीड़ित था, वहां के प्रगतिवादियों को भी आतंक व आतंकवाद के संदर्भ में देखादेखी यूरोपियन प्रगतिवादियों का दृष्टिकोण अपनाने में गर्वानुभूति होती थी। इन तथाकथित विद्वानों को अपने क्षेत्र में बारंबार होते आतंकी हमलों में शहीद सैनिकों, नागरिकों से सहानुभूति और घायल-पीड़ित लोगों से कोई सरोकार न था। आतंकवाद को लेकर यूरोपीय नजरिया अपनाना इनका फैशन बन चुका था। उस समय तक यूरोप के विकसित देशों को एशिया में भारत व श्रीलंका जैसे देशों में आतंकवाद फैलाने में अपना कारोबारी हित नजर आता था। क्‍योंकि उस दौरान उन देशों की कई कंपनियां हथियारों को बेचकर अपने देश का विकास कर रही थीं। हथियारों की सर्वाधिक बिक्री पूर्वोत्‍तर एशियाई देशों में हुई। इसमें भारत भी शामिल था। परंतु जब एक-डेढ़ दशक पूर्व अमेरिका सहित यूरोपीय व विकसित कहे जानेवाले देशों में भी आतंकवाद फैला तो यूरोपियन प्रगतिवादियों और दूसरी-तीसरी दुनिया के उनके अनुगामी प्रति-प्रगतिवादियों को समझ आ गया कि आतंक के मूल में गरीबी व अशिक्षा नहीं अपितु एक धर्म के सिद्धांत की बलात स्‍थापना करने का भयावह विचार है। लेकिन अभी भी इनकी यह समझ मुखर नहीं हो पा रही। अभी भी ये लोग दबी आवाज में कहीं न कहीं आतंकवादियों द्वारा किए जा रहे रक्‍तपात और अन्‍य अमानवीय हरकतों के लिए सीधे-सीधे उन्‍हें और उनके धार्मिक कारणों को दोषी मानने को राजी नहीं। पता नहीं इसलाम से इस प्रकार का भय ऐसे लोगों को क्‍यों रहता है। वैसे भी इसलाम में धर्म के नाम पर विकृतियों ने ही जोर पकड़ा और वह भी दूसरे धर्मों को धता बताने की कीमत पर। लेकिन दक्षिण एशिया के महत्‍वपूर्ण राष्‍ट्र भारत, सुदूर पूर्वी भूखंड में बसे वि‍कसित-अनुशासित जापान और इन दोनों से बहुत दूर उत्‍तरी भू-भाग में स्थित सर्वाधिक शक्तिशाली देश अमेरिका में विगत पांच वर्ष से आतंक तथा आतंकवादियों की विवशता को लेकर निराधार तर्क परोस रही राजनैतिक-पत्रकारीय बिरादरी को जनता का मुखर विरोध झेलना पड़ा है। इस परिप्रेक्ष्‍य में दुनिया के अब दो स्‍पष्‍ट वैचारिक विभाजन हो चुके हैं। एक, दक्षिणपंथ तो दूसरा वामपंथ। विगत तीन चार वर्षों में दुनिया के अधिकांश विकसित राष्‍ट्रों तथा अंतर्राष्‍ट्रीय सुरक्षा परिषद के सदस्‍यों देशों में भी आतंकवाद की अनेकों घटनाएं हुईं। घटनाओं की छानबीन के बाद ज्ञात हुआ कि सभी घटनाएं मुसलमान लोगों द्वारा ही इसलाम के प्रसार के नाम पर की गईं। ऐसे प्रमाण तथा तथ्‍य यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्‍त हैं कि इस समय विश्‍व के हथियार निर्माता देश जिन आतंकी समूहों तथा उनके संरक्षक देशों को आतंकवाद के प्रसार के लिए हथियार बेच कर लाभ कमा रहे थे, अब उसी आतंक की चपेट में किसी न किसी रूप में वे भी आ रहे हैं। अब भी समय है। विश्‍व में व्‍याप्‍त उस बौद्धिक सोच को यदि तत्‍काल नहीं बदला गया जिसमें आतंक व आतंकवादियों के लिए हमेशा वैचारिक संरक्षण रहा है, तो आगामी बीस-पच्‍चीस वर्षों में धरती पर मानवीय जीवन को किसी भी रूप में बचाए रखना असंभव हो जाएगा।
भारत सहित विश्‍वभर में हो रही आतंकी घटनाओं तथा आतंकी घटनाओं के कारण अराजक तंत्र में बदलते जा रहे विश्‍व में सर्वोच्‍च कर्ताधर्ताओं द्वारा अभी तक यह तय नहीं किया जा सका है कि आतंक क्‍यों हो रहा है। चीन, अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस जैसे देश तो आतंकी समूहों व इनके रक्षक देशों को शस्‍त्र बेचकर अपना कारोबार चलाते आए हैं। ये तो आतंक के लिए मुसलमानों तथा इनकी मुसलिम धार्मिक विचारधाराओं को प्रत्‍यक्ष दोषी कभी नहीं मानेंगे। पर भारत और इसके सरकारी व निजी प्रचार तंत्र को आतंक के इस मूल कारण को सम्‍मुख रख अपना आतंकरोधी कार्यक्रम अपनाने में समस्‍या क्‍यों हो रही है। कहीं भारत भी शस्‍त्र बेचकर लाभ कमाने का लालच तो नहीं पाल रहा। कहीं वह भी लाभ के लिए यह देखना ही भूल जाए कि वह शस्‍त्र किस को बेच रहा है। जैसे कि सुरक्षा परिषद के देश कर रहे हैं। आतंकियों व उनके रक्षक देशों को शस्‍त्र बेचकर लाभ कमाने की सोच ऐसे देशों में हो रही आतंकी घटनाओं के कारण उलटी पड़ चुकी है।
      विकेश कुमार बडोला