Tuesday, January 17, 2017

विरोधियों की राजनीति पर भारी केंद्र की राजनीतिक शुचिता

पनी अनेक अवैध गतिविधियों के माध्‍यम से अर्थव्‍यवस्‍था को अवैध मुद्रा संभावित क्षेत्र यानी भ्रष्‍टाचार में तब्‍दील कर कांग्रेस ने देश को आर्थिक ही नहीं सामाजिक-राजनीतिक-सामरिक रूप से भी खोखला कर दिया था। लगातार दस वर्षों तक गठबंधन सरकार की सर्वेसर्वा होने के नाते उसने केंद्र में खुद के और राज्‍यों में क्षेत्रीय दलों के घपलों-घोटालों-अवैध कारोबार को एक तरह से वैध स्‍वरूप प्रदान करना शुरू कर दिया था।
आज पश्चिम बंगाल में रोजवैली और शारदा चिटफंड घोटाले में यदि त्रृणमूल कांग्रेस के संसदीय दल के नेता पकड़े जा रहे हैं, तथाकथित सबसे ईमानदार राजनीतिक पार्टी का तबका धारण करने को अतिआतुर आप के स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री के हवाला कारोबार के गणित साक्ष्‍य सहित उद्घाटित हो रहे हैं तथा कांग्रेस सहित अनेक क्षेत्रीय दलों के राजनेताओं द्वारा की गई अवैध लेन-देन की गतिविधियों के बारे में जांच एजेंसियां आए दिन कोई न कोई खुलासा कर रही हों, ऐसे में केंद्र सरकार के मुद्राबंदी कार्यक्रम के प्रति सजग भारतीय नागरिक अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकता।
मुद्राबंदी से क्‍या लाभ होंगे या हो सकते हैं इसके लिए क्षेत्रीय दलों की घटिया राजनीतिक सोच-समझ से मुद्राबंदी को नहीं देखा जा सकता है। किसी भी देश में अर्थव्‍यवस्‍था एक ऐसा विषय है, जो अर्थव्‍यवस्‍था के प्रकट व गुप्‍त घटकों का संपूर्ण फ्लोचार्ट बनाए बिना कदापि नहीं समझा जा सकता। और भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था में इसके सामान्‍य व्‍यवहार के समानांतर जो अवैध आर्थिक व्‍यवहार वर्षों से देश में हो रहा था उसको समझने के लिए तो फ्लोचार्ट को और भी व्‍यापक बनाने की जरूरत है।
ऐसी परिस्थितियों में बड़े मूल्‍य की मुद्रा को बंद करके ही देशभर में फैले अवैध कारोबार को नियंत्रित किया जा सकता था। यदि इस प्रक्रिया में बैंक अधिकारियों ने अवैध धन को वैध बनाने का दुष्‍प्रयास किया तो इस बारे में मुद्राबंदी कार्यक्रम को विफल बताना अनुचित है। वास्‍तव में बैंक अधिकारियों के सहयोग से कालाधन का वैधीकरण भी उन राजनीतिक विरोधियों के कारण ही हो सका है, जो मुद्राबंदी नहीं होने देना चाहते थे। दिल्‍ली में आप, पश्चिम बंगाल में त्रृणमूल, यूपी में सपा जैसे राजनीतिक दलों का अस्तित्‍व जिस कांग्रेस की बदौलत है, उसने इनको केंद्र सरकार के मुद्राबंदी कार्यक्रम के प्रति इस शर्त पर एक करने की कोशिश करी कि शायद भविष्‍य में सत्‍तारूढ़ होने में अगर कभी गठबंधन के सहारे की जरूरत हो तो क्‍यों न अभी से मामला फि‍ट कर लिया जाए। इसके अलावा मुद्राबंदी का विरोध करनेवाले राजनीतिक दलों का मकसद और कुछ भी नहीं था।
अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी को बड़े मूल्‍य की मुद्रा बंद होने पर इसलिए तकलीफ हो रही है क्‍योंकि इनका वोटबैंक का सारा तंत्र अवैध नकदीकरण के आधार पर ही तय होता रहा है। रोकड़रहित लेन-देन के बारे में भले ही साइबर सुर‍क्षा की कमी का हवाला मुद्राबंदी के समर्थकों को भी सोचने पर विवश करता हो परंतु इतना तो है कि देश में जो राजनीतिक दल चुनावों में अवैध मतों से लेकर अवैध मुद्रा और अन्‍य अवैधानिक कामों में बुरी तरह लिप्‍त थे, अब उनका काल उनके सिर पर नाच रहा है। उनके अवैध कारनामों के दिन लदने वाले हैं।
अनेक राज्‍यों में स्‍थानीय निकाय चुनावों में भाजपा को मिला बहुमत पूरे राजनीतिक परिवेश को समझने के लिए पर्याप्‍त है। और आनेवाले दिनों में इस संभावना को नकारा नहीं जा सकता कि पांच राज्‍यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी पंजाब व मणिपुर में गठबंधन के रूप में तथा यूपी, उत्‍तराखंड और गोवा में पूर्ण ही नहीं अपितु प्रचंड बहुमत से सरकार बनाने जा रही है। गठबंधन की स्थिति में भी भाजपा का मत प्रतिशत पंजाब व मणिपुर में बढ़ेगा ही बढ़ेगा।
कुछ मीडिया संस्‍थान अपने पत्रों और दूरदर्शनीय प्रसारण माध्‍यमों में पांच राज्‍यों के चुनाव परिणामों का सर्वेक्षण दिखा रहे हैं। उनका सर्वेक्षण कुछ उसी तरह का है जैसे कोई थलचर जीव चारों ओर से दूसरे हिंसक जीवों से घिर जाने के बाद जमीन में अपना सिर यह सोच कर गाड़ लेता है कि किसी ने उसको नहीं देखा इसलिए उसकी जान बच जाएगी। मीडिया संस्‍थानों के तथाकथित सर्वेक्षण भी भाजपा के बढ़ते जनाधार की अनदेखी कर रहे हैं। सर्वेक्षणों के अनुसार भाजपा पूर्ण बहुमत नहीं प्राप्‍त करेगी। जबकि वस्‍तुस्थिति इससे बिलकुल विपरीत है। जैसे कि वे कह रहे हैं कि उत्‍तर प्रदेश में किसी भी राजनीतिक दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने जा रहा। जबकि यह लेखक ठोक-बजा कर यह बात रेखांकित करता है कि यदि उप्र में चुनाव साफ-सुथरे संपन्‍न हुए तो बहुमत पाने के लिए भाजपा की आंधी लोकसभा 2014 से भी अधिक तीव्र होगी। पांच राज्‍यों का यह चुनाव इस कोण से भी बड़ा उदाहरण बनने जा रहा है कि कांग्रेस सहित क्षेत्रीय दल केवल इसी बार नहीं बल्कि सदैव के लिए राजनीति की पृ‍ष्‍ठभूमि में पहुंचने वाले हैं। विशेषकर उत्‍तर प्रदेश, गोवा और उत्‍तराखंड में।  
आज देश का केंद्रीय शासन देश पर शासन करने के लिए यदि कुछ पीड़ादायक निर्णय ले भी रहा है तो वह शासन-व्‍यवस्‍था की विवशता है, जिसकी जड़ बहुत गहरे पिछली सरकारों के कार्यकलापों के कारण जमी हुई है। भाजपा नेतृत्‍व वाली ढाई वर्षीय केंद्र सरकार के बारे में छोटे-मोटे कितने भी लांछन भले ही लग रहे हों किंतु दो बातें इस सरकार के बारे में विरोधियों और उनके अंध-समर्थकों को अवश्‍य याद होनी चाहिए। एक, घोटालों की सरकार का रिकार्ड बना चुकी संप्रग सरकार की तुलना में राजग में अब तक एक भी घोटाला नहीं हुआ। और दो, देश के भीतर पिछले ढाई वर्ष में एक भी आतंकी दुर्घटना नहीं हुई। और यह सब उपलब्धि उस दौर में और उन परिस्थितियों में मिली जब यूरोप के विकसित देश तक आतंक के दंश से मुक्‍त नहीं रहे। इसके अलावा जन-गण-मन के लिए वर्तमान सरकार द्वारा एक अल्‍पाव‍धि में ही कम से कम उतनी योजनाएं तो लागू कर ही दी गई हैं, जितने कि कांग्रेसी राज में घोटाले भी नहीं हुए। और सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसी योजनाओं का सुचारू क्रियान्‍वयन भी सुनिश्चित हो रहा है।
मोदी सरकार के बेहतर होने के पक्ष में इतने तार्किक आधार हैं कि वर्तमान सरकार चाहे तो विशाल जन भावनाओं का प्रतिनिधित्‍व करते हुए उन्‍हें चुनावी लाभ के लिए सीधे-सीधे अपने पक्ष में मोड़ सकती है। परंतु इन लाभकारी राजनीतिक परिस्थितियों में भी मोदी सरकार ने राजनीतिक मर्यादा और शासकीय शुचिता के आदर्श स्‍थापित किए हैं। यदि ऐसा न होता तो सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह की श्रृंखला में अनेक कांग्रसियों सहित क्षेत्रीय दलों के न जाने कितने नेता राजनीनिक प्रतिद्वंदिता का शिकार हो कारागार में पड़े रहते। घपलों-घोटालों के आरोप में फंसे नेता और अफसर यदि अभी तक कठोर दंड नहीं पा सके हैं और इसके लिए वर्तमान सरकार को कोसा जा रहा है तो कोसने वालों को इतना तो याद रखना ही पड़ेगा कि दंड का निर्धारण न्‍यायपालिका करेगी न कि कार्यपालिका। और कार्यपालिका व विधायिका को लोकसभा व राज्‍यसभा के माध्‍यम से बीते संसद सत्र में निरंतर कुंद ही किया जाता रहा।
विकेश कुमार बडोला

5 comments:

  1. सही कहा विकेश जी .विरोधियों व सत्ता पाने किसी हद तक उतरने वाले षड़यंत्रकारियों के चलते राह मुश्किल तो है पर सही गलत का भेद समझने वालों की भी कमी नहीं है इसलिये सफलता की उम्मीद तो है .

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  2. हम जो भी देखते सुनते हाँ वो मीडिया द्वारा ही होता है और मीडिया का सबको पता है इसलिए कई बार वस्तुस्थिति से परिचित नहीं रह पते ... आशा है आपका आंकलन सही हो ...

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  3. Thanks for sharing such a nice article .... Really amazing post!! :) :)

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  4. Ek survey me bat samne ayi hai..jisme janta se pucha gya k modi yadi apne faislo ke liye apatakal lga den to kya aap unka samrthan karenge...is par 67% logo ne unka samrthan karne ki bat kahi.

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  5. बहुत सटीक आंकलन....

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