महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Friday, October 13, 2017

दुखदायी विमान दुर्घटनाएं

वायु सेना दिवस से पहले वायु सेना के ही एमआइ-17 हेलिकॉप्‍टर का दुर्घटनाग्रस्‍त हो जाना अत्‍यंत दुखदायी है। यह हेलिकॉप्‍टर अरुणाचल प्रदेश के तवांग के निकट किसी अज्ञात तकनीकी बाधा के कारण उड़ने में विफल हुआ और धरती पर गिरकर इसके टुकड़े-टुकड़े हो गए। इस दुर्घटना में हेलिकॉप्‍टर में बैठे सभी सात सैन्‍यकर्मियों की मृत्‍यु हो गई, जिनमें वायु सेना के दो पायलट और दो सैनिक भी शामिल हैं। यह हेलिकॉप्‍टर चीन सीमा पर सेना की किसी अग्रिम चौकी पर तैनात सैनिकों के लिए आवश्‍यक सामग्री लेकर उड़ा ही था कि कुछ देर में अनियंत्रित होकर नीचे आ गिरा। एमआइ-17 रूस में निर्मित सैन्‍य परिवहन हेलिकॉप्‍टर है। हालांकि दुर्घटना के कारणों की जांच हेतु कोर्ट ऑफ इन्‍क्‍वायरी का आदेश दे दिया गया है, पर शांतिकाल में हुई इस प्रकार की मानवीय क्षति अत्‍यंत चिंताजनक है। यह बात वायु सेना प्रमुख बीएस धनोआ ने भी स्‍वीकार की है। साथ ही दुर्घटना से व्‍याप्‍त दुख और असहजता को कम करने के लिए उन्‍होंने ऐसी दुर्घटनाओं को न्‍यूनतम करने और वायु सेना से संबंधित संपत्तियों के संरक्षण के लिए ठोस प्रयास किए जाने का संकल्‍प भी दोहराया।
विकेश कुमार बडोला 
जिस उत्‍साह से धनोआ ने वायु सेना दिवस से पूर्व एक प्रेस सभा को संबोधित कर वायु सेना के सशक्‍त और दृढ़ अस्तित्‍व पर गर्व करते हुए उसे युद्ध की परिस्थिति के लिए समुचित बताया तथा चीन व पाक से एक साथ युद्ध होने की स्थिति में वायु सेना को पूर्णत: समर्थ बताया था, वह उत्‍साह वायु सेना हेलिकॉप्‍टर के दुर्घटनाग्रस्‍त होने के बाद अवश्‍य ही कम हुआ होगा। अब इसे वायु सेना के अभियांत्रिकी विभाग की लापरवाही मानें या हेलिकॉप्‍टर परिचालन प्रभारी तंत्र की निष्क्रियता, जो विश्‍व की चौथी श्रेष्‍ठ वायु सेना होने के बाद भी इसके वायुयान तकनीकी कमियों के कारण दुर्घटनाग्रस्‍त हो रहे हैं। सैन्‍य‍कर्मियों, वायुयान, वायु यान संबंधी संसाधनों तथा अन्‍य वायु सेना आवश्‍यकताओं के स्‍तर पर यदि हमारी वायु सेना दुनिया की चौथी श्रेष्‍ठ सेना है भी, पर वायु यान से संबंधित परिचालन, क्रियान्‍वयन तथा अन्‍य तकनीकी दायित्‍वों के प्रति हमारे वायुसैनिकों की लगन व निष्‍ठा का स्‍तर क्‍या है, यह भी अत्‍यंत विचारणीय बिन्‍दु है। कहीं न कहीं अपने कर्तव्‍यों के प्रति यह हमारे वायुसैनिकों की निष्‍ठा की कमी ही थी, जो दुर्घटनाग्रस्‍त हेलिकॉप्‍टर की तकनीकी चूक को उड़ान से पहले पकड़ा नहीं जा सका। वायु सेना का सेवा क्षेत्र कोई सामान्‍य सेवा क्षेत्र नहीं कि यहां वायुयानों या इनसे सम्‍बद्ध उपकरणों के परिचालन, अनुरक्षण तथा नियमित निरीक्षण में की जानेवाली लापरवाही से होनेवाली हानि तत्‍काल बड़ी प्रतीत नहीं होगी। हेलिकॉप्‍टर हों या अन्‍य वायुयान, वे सतह से हवा में उड़ान भरने, हवा में उड़ने तथा हवा से सतह पर आने के दौरान तकनीकी रूप में पूरी तरह ठीक होने चाहिए। उनके कलपुर्जों में हुई या होनेवाली छोटी से भी कमी उन्‍हें बड़ी से बड़ी दुर्घटना में परिवर्तित कर सकती है।  
हालांकि स्‍वचालित तकनीक से चलने वाली मशीनों पर पूरा भरोसा भी नहीं‍ किया जा सकता। तकनीकी विफलताएं कितनी ही सावधानियां अपनाने के बाद भी उभर ही आती हैं। दुर्घटनाएं बहुधा बिना किसी तकनीकी गड़बड़ी या मशीनों के योग्‍य परिचालकों द्वारा परिचालन के दौरान निभाई गई उनकी पूर्ण निष्‍ठा, कार्य-योग्‍यता तथा तकनीकी विशेषज्ञता के बाद भी हो जाती हैं। फि‍र वायु सेना हेलिकॉप्‍टर के दुर्घटनाग्रस्‍त होने की यह पहली व एकमात्र घटना भी नहीं।
पिछले वर्ष 22 जुलाई को भी वायु सेना का मालवाहक एएन-32 विमान बंगाल की खाड़ी के ऊपर से गायब हो गया था। वह विमान चेन्‍न्‍ई के निकट से 29 लोगों को लेकर पोर्ट ब्‍लेयर के लिए चला था और उड़ान भरने के 13 मिनट बाद ही बंगाल की खाड़ी के ऊपर बाईं ओर झुककर लापता हो गया। विमान को ढूंढने के लिए महीनों तक उस समुद्री क्षेत्र को खंगाला गया था, जहां से वह अदृश्‍य हुआ था। वायु-थल-नौ सेना सहित तटरक्षक बलों और विदेशी विशेषज्ञों की सहायता से चले उस खोजी अभियान को अंतत: बिना किसी सफलता के बंद करना पड़ा। 
निस्‍संदेह यह भी एक दुर्घटना थी, परंतु यह तो ज्ञात होना ही चाहिए था कि आखिर विमान और उस में सवार 29 लोग गए तो गए कहां। उस दुखद घटना ने विज्ञान जनित प्रयोगों, आधुनिक दुनिया व इसके कट्टर समर्थकों हेतु यह विषादजनित कौतूहल तो उत्‍पन्‍न कर ही दिया कि संचार क्रांति, आधुनिकतम प्रौद्योगिकी और सामरिक क्षेत्र में अग्रणी होने की अभिपुष्टि करनेवाला भारत एक अदृश्‍य विमान को ढूंढने में पूरी तरह असफल क्‍यों रहा। भारत हो या कोई भी अन्‍य राष्‍ट्र, जो अपनी वैज्ञानिक व प्रौद्योगिकीय उपलब्धियों पर गर्व करता है, उसे लापता विमान और उसमें सवार लोगों का अनेक वैज्ञानिक अनुसंधानों के बाद भी कोई सूत्र नहीं मिलना यही दर्शाता है कि विज्ञानजनित उपलब्धियां ही अपने आप में पूर्ण नहीं हैं। विज्ञान को सचेत और समुचित संचालन के लिए अध्‍यात्‍म की भी आवश्‍यकता है। अन्‍यथा एकल रूप में विज्ञान अभिशाप के सिवाय कुछ भी प्रतीत नहीं होगा।  
हालांकि तवांग के निकट हुई हेलिकॉप्‍टर दुर्घटना में सात सैनिकों के क्षत-विक्षत शव मिल तो गए, पर यह हमारे लिए संतुष्टि का आधार नहीं हो सकता। इस संपूर्ण प्रकरण में महत्‍तवपूर्ण तथा विचारणीय प्रश्‍न यही है कि  ऐसी दुर्घटनाओं के लिए विडंबना और भाग्‍य को ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता। और न ही विज्ञान की विसंगतियों पर ही दोषारोपण कर हम अपने कार्यों व दायित्‍वों के समुचित निर्वहन की भावना से मुंह मोड़ सकते हैं। यह और इस जैसी अन्‍य दुर्घटनाएं कहीं न कहीं हमारे सैन्‍य बलों के तकनीकी परिचालन तंत्र की कार्यकुशलता पर संदेह तो उत्‍पन्‍न करती ही हैं और फि‍र हमें गहरे कचोटती हैं कि आखिर हम बिना युद्ध के ही विमान हादसों में अपने जवानों को क्‍यों खो रहे हैं।
      देश-विदेशी उच्‍च क्षमताधारी अनुसंधान उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने की सामर्थ्‍य-शक्ति रखनेवाला यह राष्‍ट्र अंततोगत्‍वा विगत वर्ष के लापता विमान में सवार अपने सैनिकों, लोगों को ढूंढने तथा इस वर्ष वायु सेना दिवस से ठीक पहले हेलिकॉप्‍टर दुर्घटना में मारे गए अपने सैनिकों को बचाने में असहाय ही दिखा है। विमान के साथ लापता लोगों व सैनिकों के परिजन हों या विमान दुर्घटना में मारे गए सैनिकों के निकट संबंधी, उनकी दृष्टि में राष्‍ट्र का तकनीकी विकास सार्थक कैसे हो सकता है।  

Sunday, October 8, 2017

बहुत हुआ, अब शीघ्र स्पष्ट हो आतंक की परिभाषा

तंकी घटनाओं की चपेट में आए लोगों की पीड़ा कितनी मर्माहत करनेवाली होती होगी, यह घटनास्‍थल से दूरस्‍थ लोगों के लिए समझना असंभव है। ऐसी घटनाओं में प्राण गंवानेवाले अपनी अंतिम सांसों के साथ दुनिया को किस रूप में देखते होंगे तथा प्राण गंवा चुके लोगों के संबंधी जीवनभर किस संताप से गुजर कर खुद को संभालते होंगे, लगता है दुनिया के कर्ताधर्ता यह समझने की शक्ति गंवा चुके हैं। यदि उनमें पीड़ितों का दर्द समझने की संवेदना होती, तो निश्चित रूप से अभी तक आतंक के जड़मूल सफाए के लिए एक वैश्विक समाधान खोज लिया जाता। लेकिन दुर्भाग्‍य से ऐसा हो नहीं पा रहा और मानवजाति का आतंकजनित दमनचक्र निरंतर चल रहा है, जिसके सम्‍मुख पूरी दुनिया असहाय सी प्रतीत होती है।
विकेश कुमार बडोला
विगत एक-दो दिन में एक नहीं बल्कि पूरे तीन देशों में आतंक के नाम पर वीभत्‍स खूनी खेल खेला गया। अमेरिका के लॉस वेगास स्थित एक कॅसीनो में म्‍यूजिक कंसर्ट के दौरान अज्ञात हमलावरों द्वारा की गई गोलीबारी में 58 लोगों की मौत हो गई व 515 से ज्‍यादा लोग हताहत हो गए। पुलिस द्वारा एक हमलावर को तो तुरंत मार गिराया गया पर दूसरा लोगों की भगदड़ का फायदा उठाकर भाग गया। मारे गए हमलावर की पहचान 64 वर्षीय स्टीफन पैडेक के रूप में हुई तो है, लेकिन उसके बारे में यह भी पता चला है कि उसने कुछ समय पूर्व इसलाम स्‍वीकार कर लिया था। वर्ल्‍ड ट्रेड सेंटर पर 2011 में हुए हमले के बाद यह अमेरिका में पहला बड़ा आतंकी हमला है। ट्रंप शासन के लिए यह विकट चुनौती का समय है।
विगत वर्ष नवंबर माह में राष्‍ट्रपति के रूप में सत्‍तारूढ़ रिपब्लिकन उम्‍मीदवार डोनाल्‍ड ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका में इस तरह की यह पहली घटना है। भले ही आइएस जैसे आतंकी समूह इस घटना के पीछे खुद की भूमिका बता रहे हैं, पर अमेरिकी सुरक्षा विशेषज्ञ इसे नकार रहे हैं। अभी तक हमलावरों का आतंकी जुड़ाव तो स्‍पष्‍ट नहीं हो सका है, लेकिन हो न हो यह घटना किसी न किसी रूप में आतंक से जुड़ी हुई ही प्रतीत होती है। क्‍योंकि जिस तरह ट्रंप ने आतंकियों के संरक्षक देशों के नागरिकों का अपने यहां आने पर प्रतिबंध लगाया था और आतंक पर प्रतिबंध के उद्देश्‍य हेतु मुसलिमों पर नजर रखने के लिए अनेक निगरानी तंत्र बनाए थे, उन परिस्थितियों में आतंकवादी निश्चित ही अमेरिका पर भी हमला करने का अवसर ढूंढ रहे होंगे।
अमेरिका में पूर्व में कई अवसरों पर मानसिक रूप से असंतुलित व कुंठित कुछ स्‍थानीय नागरिक भी ऐसे ही हमलों में प्रत्‍यक्ष लिप्‍त रहे हैं, जिनका आतंकी गिराहों से कोई जुड़ाव कभी नहीं रहा। वैसे सच्‍चाई तो घटना की विस्‍तृत जांच के बाद ही ज्ञात हो पाएगी कि यह आतंकी घटना आतंकी समूहों के मार्गदर्शन में हुई है या कुंठाग्रस्‍त व्‍यक्तियों के भावावेश के कारण।
इससे पूर्व फ्रांस स्थित मार्शेली शहर के मुख्‍य रेलवे स्‍टेशन पर दो स्त्रियों को चाकू मारकर उनकी हत्‍या कर दी गई। प्रत्‍यक्षदर्शियों के अनुसार हमला करनेवाले ने अल्‍लाह हो अकबर चिल्‍लाते हुए यह वीभत्‍स कांड किया। सैन्‍यकर्मियों ने हमलावर को तुरंत गोली मार दी। पिछले दो वर्षों में फ्रांस में कई आतंकी हमले होने के बाद हालांकि यह राष्‍ट्र आतंकवाद को देखते हुए पहले से ही सचेतक स्थित में था, परंतु तब भी आतंकी घटनाएं रोके से भी नहीं रुक रहीं। फ्रांस में आतंक की बड़ी घटना तब हुई थी जब जनवरी 2015 में साप्‍ताहिक पत्रिका शार्ली एब्‍दो के कार्यालय में आतंकियों ने 12 लोगों की हत्‍या कर दी थी। फ्रांस ही नहीं, इसी समयावधि में कनाडा में एक कार सवार ने पुलिस अधिकारी को टक्‍कर मारने के बाद उसे चाकू मार दिया। इस घटना के कुछ घंटे बाद एक वैन ने अनेक पथिकों को रौंद दिया, जिसमें चार लोग बुरी तरह घायल हो गए।
आतंक के नाम पर इस तरह की घटनाओं पर रोक के लिए पीड़ित देश शून्‍य सहनशीलता का मानदंड क्‍यों नहीं बना रहे और इस हेतु सैन्‍य व गुप्‍तचर सक्रियता क्‍यों नहीं बढ़ा रहे, यह समझ से परे है। अपने विकसित होने की गर्वानुभूति में ऐसे देश यह कदापि न भूलें कि वैश्विक आतंक का धर्म भले ही आधिकारिक रूप में परिभाषित न हो सका हो या इसे परिभाषित करने की राजनीतिक-सामरिक-कूटनीतिक विवशताएं हों, परंतु व्‍यावहारिक रूप में लगभग प्रत्‍येक आतंक पीड़ित देश यह मान चुका है कि आतंक का धर्म भी है और उद्देश्‍य भी है। इसलिए अब इन देशों को अपनी सभी विवशताओं को किनारे रख केवल और केवल आतंक का समूल नाश करने के लिए वैश्विक स्‍तर पर एकत्र होना आरंभ कर देना चाहिए।
यह लेखक आतंकी घटनाओं पर आधारित अपने अनेक लेखों में बारंबार आतंक के धार्मिक उद्देश्‍यों की ओर ध्‍यानाकर्षण करवाता रहा है। परंतु अभी तक आतंक के उद्देश्‍य और धर्म पर न तो राष्‍ट्रीय और न ही वैश्विक स्‍तर पर सर्वसम्‍मति से कोई आधिकारिक वक्‍तव्‍य निकाला जा सका है। यह अत्‍यंत दुर्भाग्‍यशाली और आतंक के सम्‍मुख घुटने टेकने जैसी मानसिकता है। जितनी जल्‍दी हो, विश्‍व को इस मानसिकता से उबरना होगा।
विश्‍व के वामपंथियों द्वारा गढ़ी गई धर्मनिरपेक्षता की धारणा आज मुसलिम आतंकवाद के रूप में अत्‍यंत आत्‍मघाती हो चुकी है। अमेरिका, चीन, रूस, ब्रिटेन और फ्रांस के प्रधान प्रतिनिधित्‍व में विगत पांच-छह दशक से संचालित संयुक्‍त राष्‍ट्र के अनेक संगठनों ने आतंकवाद के संबंध में आरंभ में जो द़ृष्टिकोण अपनाया, उनके निराधार तर्कों को विश्‍व के आतंक पीड़ित और आतंक से बचे दोनों तरह के देश आज भी ढो रहे हैं। इन तर्कों के आधार पर आतंक की परिभाषा किसी विशेष धर्म, संप्रदाय या देश के परिप्रेक्ष्‍य में निर्धारित नहीं हो सकती। आतंक का विध्‍वंशकारी वातावरण उत्‍पन्‍न करने के बाद भी धर्म के नाम पर मुसलिम और देश के नाम पर पाकिस्‍तान आज तक इसीलिए संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की दृष्टि से बचते रहे या उन्‍हें संयुक्‍त राष्‍ट्र के किन्‍हीं खास देशों की व्‍यापारिक व सामरिक महत्‍वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए बचाया जाता रहा। जो भी हो, पर आज संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ में प्रधान की पदवी के रूप में सम्मिलित कुछ देशों में भी आतंकवाद बुरी तरह व्‍याप्‍त हो चुका है। इन देशों को आतंक के संबंध में सर्वथा एक कठोर नीति बनानी होगी ताकि ये खुद को आतंक के दंश से मुक्‍त कर सकें।
भारत में दक्षिणपंथी सरकार के तीन वर्षों के कार्यकाल में आतंक के प्रति शून्‍य सहनशीलता का परिणाम अत्‍यंत सकारात्‍मक रहा। जिस समय पूरा विश्‍व आतंकवाद से बुरी तरह ग्रस्‍त हो, उसी समयावधि में भारत देश के भीतर आतंकी घटनाओं पर पूर्ण प्रतिबंध होना बहुत बड़ी उपलब्धि है। इस मामले में भारत निश्चित रूप में बाकी देशों के लिए अनुकरणीय बन चुका है। इसके अलावा विश्‍व में प्रभावशाली देशों की सरकारों में दक्षिणपंथी विचारकों के जनप्रतिनिधि के रूप में चुने जाने और अमेरिका में दक्षिणपंथी ट्रंप के राष्‍ट्रपति बनने के बाद दुनिया के सम्‍मुख धीरे-धीरे आतंक का धर्म व उद्देश्‍य दोनों स्‍पष्‍ट होने लगे। ब्रिटेन से लेकर हाल ही में जर्मनी तक के चुनावों में दक्षिणपंथी नेताओं का बढ़े हुए मत प्रतिशत सहित जनप्रतिनिधि के रूप में चुना जाना, आतंकवाद के प्रति ऐसे देशों की पूर्व की सरकारों के तटस्‍थ दृष्टिकोण के प्रति स्‍थानीय लोगों का आक्रोश ही है। लोग वामपंथ की आत्‍मघाती राजनीति से ऊबने लगे हैं। वामपंथियों ने राजनीति करने के लिए मुसलिमों की आतंकवादी घटनाओं, धर्म आधारित उनकी निकृष्‍ट गतिविधियों और शरणार्थियों के रूप में उनकी बढ़ती आबादी से देशों पर मंडरानेवाले खतरों की जिस तरह पूर्ण अनदेखी की है, स्‍थानीय निवासी उसके दुष्‍प्रभावों से उकता चुके थे। विभिन्‍न देशों में स्‍थानीय नागरिकों में बढ़ती ऐसी जागरूकता की प्रतिक्रिया में आतंकवाद अत्‍यधिक भड़क रहा है। इसी भड़ास व कुंठा में चाकूबाजी करने, वैन से लोगों को कुचलने, ट्रेनों में बम विस्‍फोटक रखने और अल्‍लाह हो अकबर चिल्‍लाकर लोगों पर खूनी हमले करने जैसी आतंकी घटनाएं नियिमत अंतराल पर हो रही हैं।
दुनिया के विकसित देशों से लेकर अविकसित देशों में 'अल्‍लाह हो अकबर' चिल्‍लाते हुए खूनी खेल के कई किस्‍से होने के बावजूद भी संयुक्‍त राष्‍ट्र के वैश्विक सरोकारों से जुड़े तथा मानवाधिकारों के संरक्षक संगठनों को अभी तक आतंकवाद का धर्म, परिभाषा और उद्देश्‍य समझ नहीं आया है, तो यह स्थिति अत्‍यंत असहज करती है। अब समय आ गया है कि आतंकवाद पीड़ित देशों को खुद को ऐसे संगठनों के संरक्षण से अलग कर लेना चाहिए तथा आतंकवाद से निपटने के लिए पृथक राष्‍ट्र के रूप में उनकी जो स्‍वायत्‍तताएं हैं, उन्‍हें उसी आधार पर अपने निर्णय लेने चाहिए। भारत जैसे देश ऐसा निर्णय ले भी रहे हैं। यह अच्‍छा संकेत है। लेकिन इस समय आतंकवाद की छोटी-बड़ी घटनाएं उन देशों में भी हो रही हैं, जिनके विशाल प्रतिनिधित्‍व से वैश्विक संस्‍था संयुक्‍त राष्‍ट्र खड़ी है। तो क्‍या अब भी संयुक्‍त राष्‍ट्र आतंक की परिभाषा, धर्म और उद्देश्‍य का वर्णन करने के लिए अपना मौन नहीं तोड़ेगा? या वह ऐसे ही अपने सदस्‍य देशों में आतंकी घटनाओं व गतिविधियों का नंगा नाच देखता रहेगा?

Saturday, October 7, 2017

आत्मदंश बन चुके हैं कश्मीर में आतंकी हमले

गातार दो वर्षों से कश्‍मीर पर शांति वार्ता करने का परिणाम आखिर क्‍या रहा। पिछले वर्ष की वार्ता के बाद उड़ी में सेना के शिविर पर आतंकी हमला हुआ, जिसमें हमारे 18 सैनिक शहीद हुए। इस बार की शांति वार्ता हुए अभी एक महीना भी नहीं बीता था कि उड़ी जैसा ही हमला करने की मंशा से आए तीन आतंकवादी श्रीनगर एयरपोर्ट के बाहरी द्वार से लगी सीमा सुरक्षा बल की 182वीं बटालियन के शिविर में घुस गए और अंधाधुंध गोलियां बरसाने लगे।
नौ घंटे तक चली मुठभेड़ में अंतत सुरक्षाबलों ने तीनों आतंकियों को ढेर कर दिया। आतंकियों ने जिस तरह बीएसएफ शिविर की चाहरदीवारी से सटी फ्रेंड्स कॉलोनी की दीवार से होते हुए शिविर के मुख्‍य द्वार तक आने की योजना बनाई और आखिर में जिस तरह वे द्वार से होकर शिविर के मेस व प्रशासनिक खंड तक पहुंचने में सफल हुए, उससे स्‍पष्‍ट होता है कि वे मुख्‍यालय के शस्‍त्रागार तक पहुंच कर बड़ा हादसा करना चाह रहे थे। सुरक्षाबलों की सक्रियता और परिस्थिति को संभालने की योग्‍यता के कारण, शुक्र है आतंकियों के मंसूबे पूरे न हो सके। एक आतंकी को तो सुरक्षा बलों ने मुख्‍य द्वार पर ही मार गिराया गया लेकिन दूसरे व तीसरे आतंकियों को ढेर करने में नौ घंटे लग गए। बीएसएफ के जिस शिविर में आत‍ंकी बड़ा हादसा करने के मकसद से घुसे थे, उसी में सुरक्षाबलों के परिवार भी एक आवासीय कॉलोनी में रह रहे थे। आतंकी हमले को देखते हुए आवासीय कॉलोनी खाली कराते समय और सैन्‍यकर्मियों के परिजनों को सुरक्षा कवर देने के दौरान सहायक उपनिरीक्षक बृज किशोर यादव आतंकी की गोलियों के चपेट में आ गए और शहीद हो गए।
नित होते आतंकी हमलों को देखकर लगता है कि कश्‍मीर के संदर्भ में केंद्र सरकार के सारे सकारात्‍मक प्रयास विफल ही रहेंगे। चाहे यह प्रयास पिछले वर्ष से शुरू हुई शांति वार्ताओं के नए दौर के रूप में हों या राष्‍ट्रीय-अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर आतंकवाद पालने के लिए पाक को अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय के बीच साक्ष्‍य सहित आरोपी राष्‍ट्र सिद्ध करने के रूप में। लगता नहीं कि भारत की इन कोशिशों से पाक या फि‍र अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय पर कोई फर्क पड़ा है या पड़ रहा है। यदि ऐसा होता तो निश्चित रूप से अभी तक पाक पर आतंक व कश्‍मीर के संबंध में अंतर्राष्‍ट्रीय बिरादरी कोई न कोई कठोर प्रतिबंध जरूर लगाती। अंतर्राष्‍ट्रीय बिरादरी में महत्‍वपूर्ण और बड़ा दखल रखनेवाले देश ही जब अपने यहां आतंक से जूझ रहे हों, तो वे आतंकग्रस्‍त भारत की पीड़ा को भला प्राथमिकता के आधार पर कैसे महसूस कर सकते हैं। कश्‍मीर में पाक प्रायोजित आतंक के पूर्ण निपटान के लिए जो भी करना है, भारत को ही करना होगा और दृढ़तापूर्वक करना होगा।
लेकिन हमारी सैनिक छावनियों पर निरंतर हो रहे आतंकी हमलों को ध्‍यान में रखकर अब तो यही लगने लगा है कि खुद भारत और भारतवासी कश्‍मीर में आतंक को अपनी एक कठोर नियति मान चुके हैं। अब देश में शहीदों की संख्‍या के आधार पर रोष व दुख का आवेग फूटता है। जितने ज्‍यादा सैनिक शहीद होंगे, जनता का रोष व पीड़ा उतनी ज्‍यादा होगी और परिणामस्‍वरूप सरकार पर भी कश्‍मीर के संदर्भ में कुछ त्‍वरित-तात्‍कालिक निर्णय लेने का ज्‍यादा दबाव पड़ेगा। लेकिन यदि आए दिन होनेवाले आतंकी हमलों में एक-दो सैनिक ही शहीद होंगे, तो न जनता ही आंदोलित होगी और ना ही सरकार आतंक का प्रतिरोध करने के लिए कोई विशेष कदम उठाएगी। यह कश्‍मीर को लेकर किसी भी संवेदनशील भारतीय नागरिक की एक उकताहट हो सकती है, जो कश्‍मीर के आतंक के संदर्भ में स्‍वाभाविक ही है।
कश्‍मीर में पाक पोषित आतंक को लेकर केवल जनता ही निराश नहीं हैं अपितु सरकारी  व सैन्‍य तंत्र भी इस विषय पर बुरी तरह खिन्‍न हैं। इन्‍हीं कारणों से कुछ अव्‍यक्‍त व सर्वथा अपरिभाषित सामाजिक, शासकीय और सैन्‍य समस्‍याएं भी उत्‍पन्‍न होती हैं, जिनकी आड़ में दशकों से व्‍याप्‍त आतंक सहजा से फलता-फूलता रहता है।
सामाजिक समस्‍या यह है कि, अंग्रेजों से आजादी के वक्‍त देश का विभाजन न रोके जा सकने की आत्‍मग्‍लानि से बचने के लिए तत्‍कालीन नेताओं ने इस देश के नागरिकों को जो धर्मनिरपेक्षता की घुट्टी पिलाई तथा जिस आधार पर हिन्‍दू-मुसलिम के बीच बनावटी एकता दिखाने का नाटक खेला गया, वह आज पाक प्रायोजित आतंक से अस्थिर कश्‍मीर समस्‍या के रूप में हमारे सामने एक वास्‍तविक नाटक बन कर उभरा है। यह भला कैसे हो सकता है कि दो विपरीत विचारोंवाले समुदाय अपनी भिन्‍न-भिन्‍न धार्मिक धारणाओं के आधार पर एक होकर रहें। और जिसने भी आरंभ में राजनीति के लिए ऐसे निरर्थक उपाय से अपना राजनीतिक भविष्‍य चमकाने का दुस्‍साहस किया होगा, वह कितना धूर्त व्‍यक्ति रहा होगा। इस देश के लिए वह कितना संघातक रहा।
शासकीय समस्‍या यह है कि, शासन करनेवालों को समाज की विसंगत विचारधाराओं, धार्मिक धारणाओं को विवशतापूर्वक इसलिए अनदेखा करना पड़ रहा है क्‍योंकि उन्‍हें केवल और केवल शासन करना है और खुद को जीवन के आखिर क्षण तक हर रूप में सुरक्षित रखना है। उनके लिए देश की सुरक्षा अपने बाद आती है। कम से कम तीन वर्ष पूर्व तक इस देश में यही राजनी‍तिक विचारधारा थी।
विकेश कुमार बडोला
सैन्‍य समस्‍या यह है कि, व्‍यवहार में सैनिक भी शहीद और देशभक्ति जैसे शब्‍दों की सच्‍चाई से उसी रूप में अवगत हैं, जिस तरह शहीद और देशभक्ति जैसे शब्‍द जेएनयू में पढ़नेवाले आतंक समर्थकों की नजरों में हैं। इसलिए वे आतंकी वातावरण में अपेक्षित सैन्‍य सक्रियता, योग्‍यता, विशिष्‍टता तथा पराक्रम के पैमानों को अपनी ही दृष्टि में कुंद कर चुके हैं। वे जानते हैं कि राजनेता कश्‍मीर समस्‍या का स्‍‍थायी हल केवल और केवल उनकी भलाई को ध्‍यान में रखकर कभी नहीं निकाल सकते। वे इस कटु सत्‍य से भी भलीभांति अवगत हैं कि वे एक निश्चित माहवार वेतन पर अपनी सैन्‍य सेवाएं देश को दे रहे हैं तथा भाग्‍यशाली रहे तो आतंकियों का प्रतिरोध करते हुए भी बचे रहेंगे और दुर्भाग्‍य हावी रहा तो अपने शिविरों में आराम करते हुए भी आतंकी हमलों में मारे जाएंगे। आतंक का राजनीतिक मंशाओं के अनुरूप प्रतिरोध करने के लिए सैनिक भी आखिर कब तक सैन्‍य पराक्रम व शिष्टिताओं से सुसज्जित होते रहेंगे। जब तक आतंकवाद के विनाश के लिए त्‍वरित स्‍थायी समाधान नहीं होगा, सैनिकों के बलिदान ऐसे ही व्‍यर्थ जाते रहेंगे। 

Friday, October 6, 2017

शरणार्थियों को झेलने की स्थिति में नहीं है भारत

विकेश कुमार बडोला 
जकल म्‍यांमार के रो‍हिंग्‍या मुसलमानों को भी बतौर शरणार्थी भारत में बसाने के लिए सरकार विरोधी एक वर्ग बहुत प्रयास कर रहा है। विरोधी नेताओं, अधिवक्‍ताओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों तथा इनके समर्थक आम लोगों की राय है कि भारत को रोंहिग्‍याओं को शरण देनी चाहिए। इस हेतु वे अंतर्राष्‍ट्रीय शरणार्थी संधि, मानवाधिकार सिद्धांत तथा उस भारतीय परंपरा का उदाहरण सम्‍मुख रख रहे हैं, जिसमें निर्वासितों को शरण देने की धर्मनीति प्रयुक्‍त है। लेकिन इस युग में जब भारत खुद अति जनसंख्‍या भार से दबकर जीवन हेतु अनिवार्य खाद्यान-आवास-स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाएं अपने स्‍वयं के लोगों को उनकी परिश्रमी जीवनचर्या के बाद भी उपलब्‍ध नहीं करा पा रहा, तो शरणार्थियों के रूप में लाखों-करोड़ों मुसलिमों को कैसे अपने देश में बसा सकता है।
शरणार्थी मात्र शरणार्थी हों, संख्‍या में कम हों तथा शरण देनेवाले राष्‍ट्र के नियम-कानून, समाज विज्ञान, धर्म-संस्‍कार और संस्‍कृति को आत्‍मसात कर उस देश के विकास में अपना व्‍यक्तिगत योगदान देने का दृष्टिकोण रखते हों, तो तब शरण देने के लिए विचार किया जा सकता है। परंतु यदि शरणार्थी आतंक और धर्मांध क्रूरता पर आधारित हिंसा, रक्‍तपात व एकाधिकारवादी मानसिकता से ग्रस्‍त हों, तो उन्‍हें शरण देने के लिए किसी भी राष्‍ट्रीय-अंतर्राष्‍ट्रीय दबाव में नहीं आना चाहिए। चाहे फि‍र यह दबाव अंतर्राष्‍ट्रीय संधि का पालन करने के रूप में हो या शरण देने की भारतीय वैदिक परंपरा के रूप में।
इतिहास साक्षी है कि यहां शरण पाए लोगों ने कालांतर से भारतवर्ष को एक कुंठित मिश्रित राष्‍ट्र के रूप में बदल कर रख दिया है। आज हमारे अपने ही देश में अपने सनातन धर्म-संस्‍कृति तथा समाज के लिए जो अन्‍य तरह-बेतरह के धर्म और अपसंस्‍कृतियां चुनौती बनी हुई हैं, वह शरणार्थी नीति को उदार बनाने की हमारे पूर्वजों की महान भूल ही थी। हमें इस भूल से अवश्‍य सीख लेनी चाहिए। भारत को शरणस्‍थल बनाने से पूर्व हमारे पूर्वजों ने यदि हमारे भविष्‍य का विचार नहीं किया, तो क्‍या हम भी उन्‍हीं की तरह तात्‍कालिक उदारता की भावोपलब्धि के मोह में अपनी भावी पीढ़ी का जीवन असुरक्षित कर दें। हमें ऐसा नहीं करना। सरकार को इस संबंध में बहुत ही कठोर दृष्टिकोण अपनाना होगा। रोहिंग्‍याओं को भारत में शरण दिलवाने के लिए संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद के देशों ने अच्‍छी कूटनीति अपनाई है। म्‍यांमार देश की सीमा से चीन बहुत नजदीक है, लेकिन घोर आश्‍चर्य कि अंतर्राष्‍ट्रीय शरणार्थी संधि का हवाला देनेवाले देश तथा मानवाधिकारवादी चीन पर म्‍यांमार से भगाए गए रोहिंग्‍याओं को शरण देने का दबाव नहीं बना पा रहे। आखिर रोहिंग्‍याओं को म्‍यांमार से इतनी दूर भारत में ही क्‍यों शरण लेनी है। क्‍या गजब स्थिति है।
भारत में वर्तमान सत्‍ता के विरोधियों और अंतर्राष्‍ट्रीय शरणार्थी व मानवाधिकार संधि का अनुपालन करवाने वालों के बीच यह कैसा मैत्रीपूर्ण सहयोग है कि वे रोहिंग्‍याओं को केवल और केवल भारत में ही घुसाना चाहते हैं। समझने में बिलकुल दिक्‍कत नहीं कि यह सब कुछ भारत में विरोधियों की राजनीति के लिए वोट बैंक का आधार बनाने हेतु किया जा रहा अंतर्राष्‍ट्रीय षड्यंत्र है।
कभी किसी समयकाल में यह उचित था कि कोई राष्‍ट्र अपने यहां दूसरे राष्‍ट्र से आए लोगों को शरण दे। लेकिन आज शरणार्थ के संबंध में कुछ प्रश्‍न स्‍वाभाविक रूप से पीड़ित करते हैं। प्रथम, क्‍या ऐसा कोई भी राष्‍ट्र जो प्रवासियों को अनुदान देने या आतंकी पृ‍ष्‍ठभूमि के मुसलमानों को अपने यहां बसाने की बात कर रहा हैपहले उसे अपने मूल नागरिकों का जीवन स्‍तर ऊंचा नहीं उठाना चाहिएद्वितीय, क्‍या उसे सर्वप्रथम अपने राष्‍ट्र के लोगों की निर्धनताअसहायता और आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक सुरक्षा के बारे में विचार नहीं करना चाहिए?
  सरकार को अपनी देशी-विदेशी विकास संबंधी नीतियां बनाते समय इस पहलू पर अवश्‍य ध्‍यान देना चाहिए। अपने करोड़ों-अरबों नागरिकों का जीवन-स्‍तर सुधारे बिना यदि कोई राष्‍ट्र किसी भी तरह के राष्‍ट्रीय-अंतर्राष्‍ट्रीय संघर्ष में किसी प्रतिष्‍ठामूलक विचार से ग्रस्‍त होता है और उसे लगता है कि इसमें उसकी कूटनीति उसे सफल बनाएगी, तो उसे ऐसी सफलताओं के दूरगामी परिणामों पर भी अनिवार्यत: विचार कर लेना चाहिए। क्‍योंकि बहुधा ऐसा देखा गया कि वर्तमान की सफलताओं के बहुत नीचे भावी कंटक भी दबे होते हैं।
देश में एक ओर दिनों तक भूखे रह दम तोड़नेवाले असंख्‍य भारतीय नागरिक हैंजिन्‍हें अपने मूल नागरिक अधिकारों से भी हाथ धोना पड़ता है और दूसरी ओर शरणार्थी। क्‍या इ‍स स्थिति में हमें अपने राष्‍ट्रीय नेताओं की अपने नागरिकों के प्रति एक ऐसी विरोधाभासी दृष्टि परिलक्षित नहीं होतीजिसमें हम गहराई तक यह सोचने को विवश होते हैं कि अभी भारत के वैकासिक मानदंडों में दूरदर्शितापरिपक्‍वता और न्‍यायिक चेतना की बहुत अधिक कमी है।
स्‍वाभाविक है कि पूर्ण रूप से विकसित होने के लिए कोई भी विकासशील या अर्द्धविकसित राष्‍ट्र विकसित देशों की नीतियों का ही अनुसरण करता है। भारत भी यदि विकसित देशों  जैसा बनना चाहता है तो उसके नीति-निर्धारकों को यह सोचना चाहिए कि वैज्ञानिक तथा आर्थिक सिद्धांतों व धारणाओं के आधार पर विकास के स्‍वप्‍न देखनेवाले विकसित देशों ने अपने यहां विकास की पहली शर्त के रूप में जनसंख्‍या नियंत्रण का उपाय अपनाया। किंतु भारत ने अपने यहां जनसंख्‍या नियंत्रण के लिए अपने लोकतांत्रिक अस्तित्‍व से लेकर आज तक कोई ठोस नीति नहीं बनाई। किसी राष्‍ट्र को विकास के शिखर पर पहुंचने के लिए जिन अति आवश्‍यक नीतियों को निरंतर ईमानदारी से लागू करना पड़ता हैउनमें जनसंख्‍या नियंत्रण नीति अग्रगामी होनी चाहिए। दुर्भाग्‍य से विकासशील राष्‍ट्रों की सरकारों को यह नीति फूटी आंख भी नहीं सुहाती। भारत में भी विसंगत और विद्रूप राजनीतिक धारणाओं के अंतर्गत अति जनसंख्‍या को सत्तारूढ़ होने का आधार मान लिया गया है।
यह भी अत्‍यंत विचारणीय है कि अत्‍यधिक विकसित होने या सर्वाधिक विकसित राष्‍ट्र बन जाने की महत्‍त्‍वाकांक्षाओं के कारण भले ही विकसित देशों को अपने वैज्ञानिक और भौतिक उत्‍पादन के उपभोग हेतु कालांतर में विशाल जनसंख्‍या वाले देशों की ओर ताकना पड़ापरंतु उन्‍होंने भी इन महत्‍त्‍वाकांक्षाओं के दूरगामी दुष्‍परिणामों पर कभी विचार नहीं किया। और आज इसकी परिणति कई तरह की प्राकृतिक आपदाओं, अतिवृष्टियोंनिरंतर बढ़ते आतंकतृतीय विश्‍वयुद्ध होने की प्रकट आशंकाओं और इनके परिणामस्‍वरूप अनंत अव्‍यवस्‍थाओं से घिरे विश्‍व के रूप में सामने है।
      सर्वप्रथम भारत को अपने देश के नागरिकों का जीवन-स्‍तर ऊंचा उठाना चाहिए। इसके बाद ही देश की नीतियों में शरणार्थियों को बसाने की बात होनी चाहिए। इस देश में न जाने कितने स्‍वाभिमानी लोग हैंजो कठोर परिश्रम के बावजूद अपना इतना आर्थिक मूल्‍यांकन होने का अधिकार भी नहीं रखते कि उनकी रोटी-कपड़ा-मकान-स्‍वास्‍थ्‍य की आधारभूत जरूरतें पूरी हो सकें और ऐसे में शरणार्थियों को बसाने को लेकर देश में हलचल होना अत्‍यंत कष्‍टदायी विचार है।   
अब वो समय नहीं कि किसी भी देश के हजारों-लाखों निर्वासितों, शरणार्थियों को अपने यहां बसाने पर परोपकार और जनकल्‍याण करने की प्रशंसा पाई जाए। यह सिद्धांत तब ही प्रशंसनीय हो सकता हैजब शरण देनेवाले की अपनी स्थिति दुरुस्‍त हो तथा उसके अपने नागरिक सुखी-संपन्‍न हों। अपने दीन-हीन, विपन्‍न और लोकतांत्रिक अधिकारों से पूरी तरह वंचित नागरिकों पर शरणार्थियों को अधिमान देने से समस्‍याग्रस्‍त राष्‍ट्र एक नए वर्ग-संघर्ष को ही जन्‍म देता है। इससे शरणार्थियों के बजाए अपने नागरिकों को कई तरह की दिक्‍कतें झेलनी पड़ती हैं।
इस संपूर्ण प्रकरण में लज्‍जाजनक निष्‍कर्ष यही है कि सत्‍ता विरोधी दल और उसके अधिवक्‍ता और समर्थक किसी तरह रोहिंग्‍याओं को शरणार्थी बनाकर उनकी निरंतर बढ़नेवाली जनसंख्‍या का अपने लिए वोट बैंक के रूप में इस्‍तेमाल करना चाहते हैं। जबकि नैतिक रूप में भारत ऐसी आबादी को शरण देने की स्थिति में कदापि नहीं है और न हो सकता है। इस हेतु भारत को चाहे अंतर्राष्‍ट्रीय शरणार्थी संधि का उल्‍लंघन ही क्‍यों न करना पड़े और उस एवज में प्रतिबंध या पक्षपात ही क्‍यों न झेलना पड़े, पर उसे रोहिंग्‍याओं को शरण देने के लिए केवल और केवल कठोरतापूर्वक न ही कहना चाहिए।
मनुष्‍य जीवन पृथ्‍वी पर प्राकृतिक रूप से व्‍यतीत हो रहा होता तो अत्‍यधिक जनसंख्‍या चिंता का कारण कभी न होती। क्‍योंकि प्रकृति में अपने अनेक जीवों (मनुष्‍य सहित) का पालन-पोषण करने की प्राकृतिक योग्‍यता हैजिसे मनुष्‍य कभी अर्जित नहीं कर सकता। लेकिन विलासिता आधारित मनुष्‍य-जीवन अति जनसंख्‍या के साथ कभी संतुलितसुखी नहीं रह सकता। यह बात देशी-विदेशी सत्‍ता-प्रतिष्‍ठानों पर आरूढ़ सत्‍ताधारियों और उनके विद्वान नीति-निर्माताओं को अवश्‍य गांठ बांध लेनी चाहिए।
यदि महासागरों ने यूरोपअफ्रीका और एशिया महाद्वीपों के बीच अपनी प्राकृतिक उपस्थिति दर्ज न कराई होती तो जनसंख्‍या का दबाव एशिया और अफ्रीका तक ही सीमित न रहता। यह यूरोप के विकसित देशों के लिए भी कष्‍टकारी होता। तब शायद यूरोप के विकसित राष्‍ट्र अपनी विकसित मानवीय सभ्‍यता के बावजूद भी जनसंख्‍या के अति दबाव से वैसे ही जूझते जैसे एशिया में भारतपाकिस्‍तानबांग्‍लादेशचीन तथा अफ्रीका में अनेक देश जूझ रहे हैं। देश के मूल नागरिकों की छोटी-छोटी सुख-सुविधाओं का तो स्‍थायी प्रबंध हो नहीं पा रहाऊपर से उन पर शरणार्थियों को आर्थिक सुरक्षा व अन्‍य सुविधाओं के साथ लादना, कहां की समझदारी है। यह कौन सा न्‍यायिक औचित्‍य है भला।  

Sunday, September 17, 2017

कब निकलेगा कश्मीर वार्ता का हल

विकेश कुमार बडोला
राजनीतिक परंपराओं के हिसाब से भाजपा भी कभी-कभी कांग्रेस और अन्य राजनीतिक पार्टियों की तरह ही प्रतीत होती है। यदि ऐसा न होता तो वह बारंबार कश्मीर पर बातचीत का राग न गाती। पिछले वर्ष इसी माह की बात है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह के नेतृत्व में 28 सदस्यीय सर्वदलीय प्रतिनिधमंडल 4 सितंबर को जम्मू कश्मीर में शांति व्यवस्था बनाने के उद्देश्य से वहां पहुंचा था। ज्ञात हो कि पिछले साल जुलाई और अगस्त माह में कश्मीर में आतंकियों, पत्थरबाजों के देशविरोधी कारनामों ने पूरे देश का ध्यान वहीं पर केंद्रित किया हुआ था। सैन्‍य बल सैन्य नियमों के अनुसार और आधिकारिक आदेश के अंतर्गत जैसी सैन्य-कार्रवाई स्थानीय उपद्रवियों के विरुद्ध कर रहा था, वह भी देशविरोधियों को बर्दाश्त नहीं थी।
स्थानीय मसजिदों से सैनिकों पर पत्थर फेंके जा रहे थे। सैनिकों के लिए कठमुल्लों का मारो-मारो का कर्कश स्वर सुनाई दे रहा था। आतंकियों को शरण देने के लिए स्थानीय उपद्रवी अपनी हरेक देश विरोधी गतिविधि को अपने आकाओं के संरक्षण में उचित मान रहे थे। सर्वोच्च न्यायालय भी जनहित याचिकाओं के नाम पर पत्थरबाजों के खिलाफ पैलेट गन के इस्तेमाल को अनुचित बता रहा था। देशी-विदेशी मानवाधिकार संगठन पत्थरबाजों के उपद्रव करते वीडियो देखकर भी उनके मानवाधिकार को लेकर चिंतित थे। अतः मोदी सरकार पर दबाव बना कि वह लोकतांत्रिक बहुमत को दरकिनार कर केवल अपने गृहमंत्री को कश्मीर न भेजे, बल्कि उनके साथ पक्ष-विपक्ष में मौजूद सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों (धर्मनिरपेक्षता के ध्वजवाहक) को भी भेजे। ऐसा ही हुआ।
कश्मीर में तत्कालीन विवाद, आतंक, उपद्रव और सभी अशांत कृत्यों पर वहां के राजनीतिक व गैर-राजनीतिक जन प्रतिनिधियों से वार्ता हुई। भाजपा के समर्थनवाली गठबंधन सरकार की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने अतिवादियों के समर्थक हुर्रियत आदि नेताओं को भी वार्ता में शामिल होने का निमंत्रण दिया था। लेकिन वे वार्ता के लिए नहीं आए।
यह एक उलझनभरा प्रश्न है कि वार्ता का यह राग आखिर किसके लिए, कब तक और क्यों। जब हजारों वर्षों का मुगल शासन पूरी दुनिया में प्रामाणिक रूप में एक कट्टर व शोषक-शासन बनकर रहा हो और इसकी मंशा दुनिया में अपने से इतर हरेक विचार को दबाने की रही हो तो इस युग में कौन-सा चमत्कार होगा, जो पुरातन मुगल शासन के कामों-कारनामों के हिमायती कश्मीरी अतिवादी और उनके संरक्षक नेता अपने में सुधार कर मोदी सरकार की शांति स्थापनार्थ की जानेवाली वार्ता को सहज लेंगे और उसका अनुपालन करेंगे।
पिछली वार्ता के बाद कश्मीर में शांति तो क्या स्थापित होनी थी, उलटा आतंकी गतिविधियां और ज्यादा बढ़ गई थीं। आतंक-स्‍थलों पर आतंकियों के लिए सुविधावाहक और उनके संरक्षक बने पत्थरबाजों-उपद्रवियों ने शांति वार्ता को धता बताते हुए अशांति, उपद्रव, अव्यवस्था और आतंकवाद को पहले से अत्यधिक व्यापक बना दिया। पिछले वर्ष सितंबर में पहले हफ्ते की शांति वार्ता के बाद तीसरे हफ्ते में ही उड़ी में आतंकवादी हमले में हमारे 18 जवान शहीद हो गए थे। इसकी पूरी देश में बहुत जोरदार प्रतिक्रिया हुई। केंद्र सरकार को कश्मीर के संदर्भ में उसकी शांति वार्ता के लिए कोसा गया। और उस पर कश्मीर में शहीद होते सैनिकों के बाबत अनेक लाछंन उसी बहुसंख्यक वर्ग ने लगाने शुरू कर दिए, जिसके मतों से उसे जीत मिली थी। परिणामस्वरूप माह के आखिर में भारतीय सैनिकों द्वारा सीमा पार पाक अधिकृत कश्मीर में जाकर सर्जिकल स्ट्राइक की गई। तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर और प्रधानमंत्री पर उड़ी आतंकी हमले का इतना जनदबाव था कि जो सर्जिकल स्ट्राइक बाद में कभी बड़े व्‍यापक पैमाने पर होनी होगी, वह उड़ी हमले के आठ-दस दिन बाद ही कर दी गई या कहें करनी पड़ी।
जम्‍मू कश्‍मीर राज्य में आतंकवाद फैलने का बड़ा कारण अवैध मुद्रा का चलन और पोषण है। इसी संदर्भ में हुई जांच में पता चला कि अतिवादियों को नकली भारतीय मुद्रा देने के बदले अतिवाद के लिए उकसाया जाता है। इस तरह की भारतीय नकली मुद्रा की छपाई पाकिस्‍तान स्थित धन-संसाधन संपन्‍न आतंकी समूहों द्वारा की जाती है। बाद में वहां से इसे सीमा से घुसपैठ के माध्‍यम से या भारत की सीमाक्षेत्र से लगे दूसरे देशों के रास्‍ते भारत में चलाया जाता है। इस विषय पर जो समग्र रिपोर्ट तैयार हुई उसमें ज्ञात हुआ कि भारत में आतंकवादियों, नक्सलियों और माफियाओं को पनपाने में भारी मात्रा में संग्रहीत नकली नोटों का बहुत बड़ा योगदान है। चिंतित करनेवाले यही कारण थे जिनसे मुक्ति के लिए आठ नवंबर 2016 को रात आठे बजे एक हजार व पांच सौ मूल्य के रुपयों को चलन से बाहर करने की आधिकारिक घोषणा स्‍वयं प्रधानमंत्री को करनी पड़ी।
आतंकवाद के प्रसार के लिए देशी-विदेशी शत्रुओं द्वारा अवैध भारतीय मुद्रा का सुनियोजित पोषण किया जा रहा था। विभिन्‍न प्रकार के अवैध लेन-देनों के माध्‍यम से नकली मुद्रा के वित्‍तपोषण को कांग्रेसी राज में राज-लिप्‍सा के कारण राजकीय स्‍वीकार्यता दिए जाने के नियम-कानून बनने लगे थे। अर्थव्‍यवस्‍था में माफियाओं द्वारा राजनेताओं, सांसदों, विधायकों और उद्योगपतियों के रूप में निभाई जानेवाली भूमिकाओं का संसद के द्वारा लोकतंत्रीकरण किया जाने लगा था। राज व्‍यवस्‍था का ऐसा दुरुपयोग किए जाने के कारण ही कांग्रेसी राज समाप्‍त हुआ था। जो कुछ मोदी ने अर्थव्‍यवस्‍था को ठीक करने के लिए किया, वही सब करवाने को तो जनता ने उन्‍हें कांग्रेस की जगह बैठाया था। और अगर वे जनता के हित का ध्‍यान कर अपने राजनीतिक निर्णय ले रहे हैं, तो इसमें विरोधियों द्वारा विरोधस्‍वरूप वाणी को इतना असंयमित बनाने का औचित्‍य व्‍यर्थ है।
इनके अलावा भी सरकार द्वारा अनेक कार्य आतंकी गतिविधियों पर नियंत्रण हेतु किए गए और किए जा रहे हैं, परंतु इतने के बाद भी आतंक का पूर्ण सफाया अभी दिवास्वप्न ही बना हुआ है। विगत स्वतंत्रता दिवस पर देश की जनता को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने यह क्या कह दिया- कि कश्मीर का हल न गोलियों से मिलेगा न गालियों से, कश्मीर का हल होगा गले लगाने से, तो इस बार भी गृहमंत्री राजनाथ सिंह 9 से 11 ग्यारह सितंबर तक कश्मीर में शांति वार्ता के उद्देश्य से पहुंच गए। वे भले ही कह रहे हैं कि अब कश्मीर में स्थिति नियंत्रण में है, वहां की समस्याओं को हल किया जा सकता है और वहां के प्रत्येक चेहरे पर मुस्कान लाना चाहते हैं परंतु वास्तविकता कुछ और है। विस्मयकारी है कि सरकारों का यह सच स्वीकार करने में दम क्यों फूल रहा है कि कश्‍मीर में आतंकवादियों और उनके समर्थकों का मकसद अपने लिए जैविक सुविधाओं की निःशुल्क या रियायती मांगें नहीं हैं। वे तो राज्य का पूर्णरूपेण इसलामीकरण चाहते हैं। भले ही ऐसी चाहत में वे पाकिस्तान, पाक प्रायोजित आतंक या किसी अन्य हितसाधक के हाथ की कठपुतली हों, परंतु सत्य यही है कि कश्मीर के संदर्भ में विकास या कल्याण की बातें करके कोई भी सरकार वहां के अतिवादियों को काबू में ला ही नहीं सकती। और अभी भी जो थोड़ा-बहुत नियंत्रण आतंकवाद के संबंध में वहां दिख रहा है, वह सेना की सक्रियता और सरकार द्वारा स्‍थानीय परिस्थितियों के कारण सेना को दिए गए विशेषाधिकार बल प्रयोग अधिनियमों के कारण ही है। जबकि कश्‍मीर को भारत का अभिन्‍न भौगोलिक अंग बनाए रखने के लिए सर्वाधिक त्‍याग व तपस्‍या तो हमारे सैनिक ही कर रहे हैं।  
          विगत समय में हम कश्मीर में ही मुसलिम आतंक का खतरनाक रूप देखते आए थे, जो तमाम सरकारी नियम-कानूनों को ताक पर रख केवल और केवल इसलाम स्थापना के मकसद से भरा हुआ था। लेकिन अब यही रूप न्यूनाधिक रूप में पश्चिम बंगाल, राजस्थान, कर्नाटक, हैदराबाद, केरल व दिल्ली-एनसीआर और देश की हर उस जगह पर देखा जा सकता है जहां-जहां अवैध रूप में घुसपैठ कर आए मुसलमानों ने अपनी बड़ी आबादी की बस्तियां बसा रखी हैं। ऊपर से दुर्भाग्य यह कि अधिकांश राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय राजनीतिक दलों के नेता उन्हें देश के लिए समस्या न मानकर मात्र वोटबैंक के लिए उनका संरक्षण कर रहे हैं। देशी-विदेशी मानवाधिकार संगठन तो उन्‍हें बसाने के लिए भारत जैसे देशों पर संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ के माध्‍यम से दबाव बना रहे हैं। रोहिंग्या मुसलमानों के बारे में भी आजकल देशभर में चर्चाएं हो रही हैं। देश का एक वर्ग उन्‍हें भारत में बसाने के लिए राष्ट्रीय-अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर पैरवी कर रहा है। क्या इस देश का यह दुर्भाग्य कम है कि वह कश्मीर में ही घुसपैठिए मुसलिम आतंकियों के प्रतिरोध में अपने कितने ही सैन्यकर्मियों की बलि दे चुका है, जो अब वह रोहिंग्याओं को देश में शरणार्थी बनने या न बनने देने के बाबत सर्वोच्च न्यायालय से लेकर गृह मंत्रालय तक बहस कर रहा है। यह बड़ी लज्जाजनक स्थिति है। मानवाधिकार की बातें कई स्‍तरों पर अन्‍याय का सामना कर रहे मूल भारतीयों के संदर्भ में क्‍यों नहीं होती। मानवाधिकार का सिद्धांत तो रोंहिग्‍याओं जैसे लोगों को यह समझाना भी होना चाहिए कि जब उनके पास रहने-खाने की व्‍यवस्‍था नहीं तो, वे इतने बच्‍चे पैदा क्‍यों कर रहे हैं।
यदि कश्‍मीर जैसी समस्‍याओं का त्‍वरित निराकरण नहीं होता, रोहिंग्‍या जैसों को भारत में बसाने की न्‍यायिक समीक्षाएं बंद नहीं होतीं तो निश्चित है भारत राष्‍ट्र का इसलामीकरण लाख चाहने पर भी रोका नहीं जा सकेगा। अत: मोदी सरकार को देर किए बिना कश्मीर के संदर्भ में अपनी वर्ष-प्रतिवर्ष चलनेवाली वार्ताओं पर विराम लगाना चाहिए और आतंक के पीछे मुसलमानों की असली मंशा क्या है, इस बात पर ध्यान देकर समस्या का ताबड़तोड़ समाधान ढूंढना चाहिए।
        एक ओर तो वर्तमान सरकार अमेरिका से लेकर चीन तक को वैश्विक आतंक के पूर्ण सफाए के संदर्भ में एकराय करने पर लगी हुई और इसमें सफल भी हुई है तथा दूसरी ओर अपने ही देश के सीमाक्षेत्र के राज्य कश्मीर में आतंकवादियों के संरक्षकों के साथ वार्ता करने का प्रयास कर रही है। यह स्थिति असहज करती है। आतंक के संदर्भ में वर्तमान सरकार को देशी-विदेशी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, उनके संगठनों व उनकी उन संस्तुतियों पर गंभीर होने की आवश्यकता नहीं, जो संयुक्त राष्ट्र के पक्षसमर्थन से जारी होती हैं। इस देश में पहले ही मौजूद विशाल जनसंख्‍या को सही से जीने-रहने-खाने के लाले पड़े हुए हैं, तिस पर सरकारें जनसंख्या नियंत्रण की बातें ही नहीं कर रहीं और हम हैं कि देश-विदेश में बढ़ती मुसलिम आबादी के हमलों को आतंक, घुसपैठ और शरणार्थी के रूप में झेल रहे हैं। ऐसा अधिक दिन तक नहीं चल सकता। सरकार को इस पर गंभीर होकर ठोस समाधान निकालना चाहिए और उसे तत्‍काल लागू करना चाहिए।

Tuesday, September 12, 2017

दुर्घटनाओं के बीच आशा-किरण

--विकेश कुमार बडोला

ये समय बड़ा कठिन है। मानवता एक अविश्वसनीय शब्द लगने लगा है। चारों ओर घात-प्रतिघात है। प्रतिदिन मानवजनित समस्याओं और प्राकृतिक आपदाओं के कारण मनुष्य सैकड़ों-हजारों की संख्या में मौत के मुंह में समा रहे हैं। प्राकृतिक आपदाएं हर ऋतु में कहर ढा रही हैं। क्या बरसात, क्या गरमी क्या सर्दी हर ऋतु में कभी बाढ़ तो कभी भूकंप और कभी मौसमीय रोगों से लोग त्रस्त हैं। कहीं नवजात शिशु मस्तिष्क ज्वर की समुचित चिकित्सा के अभाव में दम तोड़ रहे हैं तो कहीं वर्षाजनित बाढ़ के प्रकोप में लोग काल-कवलित हो रहे हैं। कहीं आतंकवादी हमलों में निर्दोष लोगों सैन्यकर्मियों की जानें जा रही हैं तो कहीं दुनिया के देशों के परमाणु परीक्षणों प्रतिस्पर्द्धाओं के कारण तृतीय विश्व युद्ध का खतरा सिर पर मंडरा रहा है। कहीं जर्जर आवासीय भवनों के नीचे दबकर लोग प्राण गंवा रहे हैं तो कहीं रेल दुर्घटनाओं में हंसते-खेलते मानवीय जीवन मौत से भिड़ रहे हैं। कहीं परस्पर द्वेष, ईर्ष्या, अधिकार धन लिप्सित होकर हत्याएं हो रही हैं तो कहीं वृद्धजन महीनों से मृत हो, कंकाल में परिवर्तित होकर अपने घर में पड़े हुए हैं। कहीं नौ वर्षीय अबोध बालिका के बलत्कृत होने के उपरांत उसके गर्भधारण प्रसूति की विस्मित करनेवाली घटना हो रही है तो कहीं जिलाधिकारी स्तर के व्यक्ति द्वारा आत्महत्या किए जाने की त्रासदी घट रही है।
अभिषेक पटेल
निश्चित रूप से ये सभी घटनाएं जीवन के प्रति मनुष्यों में निराशा, हताशा और मनोवैज्ञानिक विकार पैदा करती हैं। इन घटनाओं से अप्रत्यक्ष रूप से परिचित लोग भले ही इन घटनाओं पर उतने गहन बोध से निराश हों, जितने इन घटनाओं से प्रत्यक्ष जुड़े, पीड़ित लोग हो रहे हैं, परंतु फिर भी कहीं कहीं किसी किसी रूप में ये तमाम घटनाएं सभी जिंदा लोगों को जीवन के प्रति असुरक्षा से तो भर ही रही हैं। साथ ही साथ इन घटनाओं का एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी समाज पर पड़ता दिख रहा है, जिस कारण लोगों में सामाजिक भावना का क्षरण हो रहा है। लोग आत्मकेंद्रित होने की ओर अग्रसर हैं। यह स्थिति राष्ट्र, समाज, परिवार और व्यक्ति के लिए अत्यंत आत्मघाती है।
अभिषेक पटेल बम लेकर
स्‍कूल से दूर भागते हुए 
सरकार और समाज को इस दिशा में गहनतापूर्वक सोच-विचार कर कुछ ऐसे उपाय करने होंगे, जिससे लोगों में जीवन के प्रति आशा विश्वास बढ़े। वे सद्भावना, सदाचरण, परस्पर प्रेम-मैत्री की भावना से जुड़ें और इन सबसे बढ़कर जीवन के प्रति समुत्साही दृष्टिकोण रखें। इस हेतु सरकार को देश-समाज के परोपकारी, ईमानदारी से अपने कर्तव्य निर्वहन और विशिष्ट सेवा भाव से अपने दायित्वों में लगे हुए लोगों के बारे में संवाद सूचना तंत्र बनाना चाहिए ताकि अन्य लोग भी ऐसे महान व्यक्तित्वों से प्रेरणा ले सकें।
विगत 25 अगस्त को मध्य प्रदेश के सागर जिले के सुर्खी पुलिस स्टेशन में तैनात हवलदार अभिषेक पटेल ने जो काम किया है, उसके लिए वे महानता प्रेरणा के जीते-जागते उदाहरण बन गए हैं। अभिषेक जब अपने थाना क्षेत्रांतर्गत चितोरा ग्राम के विद्यालय के पीछे एक 10 किलोग्राम वजनी जिंदा बम पड़े होने की सूचना पर निरीक्षण के लिए पहुंचे तो उन्होंने तुरंत थैले सहित बम उठाकर अपने कंधे पर रखा, भागते हुए 1 किलो मीटर तक गए और बम को नाले में फेंक दिया। अभिषेक के साहस और संवेदना ने विद्यालय में उपस्थित 400 बच्चों के जीवन को सुरक्षित कर दिया। पुलिस जांच में ज्ञात हुआ कि एक गुमनाम व्यक्ति ने सौ नंबर डॉयल कर विद्यालय के पीछे बम पड़े होने की सूचना दी थी। सागर स्थित महार रेजिमेंट सेंटर के जवानों ने जिस तरह से बम को निष्क्रिय किया, उससे साफ पता चल रहा था कि बम जिंदा था और फटने पर बहुत विध्वंशकारी होता। हवलदार अभिषेक पटेल के इस महान कार्य के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें पचास हजार का नकद पुस्कार दिया।
यह घटना समाज में घट रही नकारात्मक घटनाओं के मध्य एक विश्वास पुंज के समान है। कल्पना करिए यदि वह बम फटता तो विद्यालय में बच्चों का क्या होता। दुर्घटना से हुए जान-माल के नुकसान पर मध्य प्रदेश राज्य सहित संपूर्ण भारत में राजनीतिक आरोपों-प्रत्यारोपों का एक लंबा दौर चलता, जिसका आखिरी हासिल कुछ होता। लेकिन यहां एक पुलिसकर्मी की दिलेरी ने ऐसा नहीं होने दिया। तो क्या अब ऐसे पुलिसकर्मी के गुण यशोगान और प्रशंसा-सम्मान पर राष्ट्रीय संवाद नहीं होना चाहिए? निश्चय ही होना चाहिए और निरंतर होना चाहिए तथा मानवता पर छाए अनेकों संकट के इस दौर में तो अभिषेक पटेल के लिए विरुदावलियां गाई जानी चाहिए, ताकि समाज में एक-एक व्यक्ति ऐसे ही साहसी संवेदनशील बनने के लिए आत्मप्रेरित हो।
        वह तो किसी जागरूक व्यक्ति ने अभिषेक पटेल का बम लेकर भागते समय का वीडियो बना कर सोशल साइट पर डाल दिया, तब जाकर उनके इस कार्य की पुष्टि हो सकी। सोशल मीडिया पर जिस तरह लोगों ने अभिषेक के इस कार्य की प्रशंसा की है उसे देखते हुए यह आशा की जा सकती है कि अभी समाज में अच्छे परोपकारी कार्यों की प्रतिक्रिया में सामाजिक मतभेद नहीं हैं। अपनी जान की चिंता नहीं करते हुए दूसरों की जान बचाने के लिए किया गया यह कार्य निश्चित रूप से हमारे देश समाज को अच्छाई, परोपकार के मार्ग पर ले जाने हेतु एक चिरस्थायी प्रेरणा बनेगा। हम सभी को भी सामाजिक जागरूकता दिखाते हुए अभिषेक जैसे अन्य लोगों को देश के सामने लाना होगा ताकि वे अपने परोपकारी कार्यों की ऊष्‍मा से दुर्घटनाओं, त्रासदियों तथा आपदाओं से उपजे देशवासियों के बीमार मनोविज्ञान को दुरुस्त कर सकें।