Saturday, June 10, 2017

ज्‍येष्‍ठ पूर्णिमा की चांदनी

ज्‍येष्‍ठ पूर्णिमा का चन्‍द्रमा कितनी भव्‍यता से चमक रहा है! पहाड़ों पर वर्षा के बाद आज का खुला नभ स्‍थल कितनी नीलिमा के साथ दमक रहा है! तारों का अस्तित् पहले कई बार देखे गए उनके अस्तित् से आज कितना अलग लगता है! पश्चिम आकाश पर स्वर्णिम रंग के मेघांश जैसे अपने में समेट लेने को व्‍याकुल करते रहे। चारों ओर व्‍याप्‍त चांद के अद्भुत प्रकाश का सौंदर्य मुझे भौतिक दुनिया से दूर ले गया।
पहाड़ों की घाटी पर बसा ये शहर इस समय चांदनी में कितना आत्‍ममोह उत्‍पन्‍न कर रहा है। शहर के सबसे निचले तल से दूर ऊपर वर्षा धुली घाटियों पर कहीं-कहीं रोशनियां टिम-टिम कर रही हैं। इस शशि उज्‍ज्‍वला रात्रि में दूर दिखती ये रोशनी की टिमटिमाहटें जैसे प्रेमपूर्वक कह रही हैं कि आ जाओ हमारे आलिंगन में। जानता हूं कि ये टिम-टिम करते रोशनी के अंश घरों के बाहर लगे बिजली के बल्ब हैं। पर शशि के ओज में वे पारलौकिक आकर्षण लगते हैं! गहरे लगता है कि उनके पास जा कर इस चांदनी रात को सबसे अच्छे तरीके से जिया जा सकता है। सूर्य प्रकाश में हरीतिमा बिखेरते वृक्ष इस समय नील नभ पर चमकते इंदु की रोशनी में काले दिखाई देते हैं। इनकी शांत झूम अपने काले सायों के साथ कितनी मनहर है! इन विशाल वृक्षों के पीछे नील नभ का असीमित विस्तार और उस पर सुशोभित चन्द्रमा जैसे मुझे प्रेम में हवा का अंश बना रहा है। मैं अपने शरीर के भौतिक भार सहित कहीं दब जाता हूं।
मैं चांदनी के उजाले के एक कण के रूप में उभरता हूं। अपना नव रूप देख आश्‍चर्य नहीं होता। लगता जैसे संसार में मेरी नियति यही होने के लिए है। मैं इसी प्राकृतिक योग्‍यता से किसी को निस्‍वार्थ प्रेम कर सकता हूँ। किसी को अधिकार के बिना अनभुव कर सकता हूँ। किसी की दुखी भावनाओं को संभालने का उत्‍तरदायित्‍व ले सकता हूँ। इस चन्‍द्र निशा में घर की छत पर देर तक घूमते-घूमते मेरी टांगों की अकड़ ने मुझे सचेत किया। तब पता चला मैं भौतिक दुनिया की प्रयोगशाला में खपने वाला एक स्‍वार्थी मानव हूँ। जिसे अपने उस मित्र की दुखी भावनाओं की चिंता कभी नहीं रही, जो अपने दुखों को सहने के दौरान मुझ से सांत्‍वना की उम्‍मीद लगाए बैठा था। पर मैं उसके लिए कुछ नहीं कर पाया
जब आज मित्र के मुख से उसकी वर्षों पुरानी दुखपूर्ण कहानी सुनी तो लगा कि दुनिया में दुर्भाग्‍य फूलों जैसे सुंदर प्राणियों के लिए नहीं होना चाहिए था। उनका प्रारब्‍ध अच्‍छा ही होना चाहिए था। लेकिन मशीन बनती दुनिया के समाज और इसके लोगों में यह समझने की योग्‍यता नहीं कि किस मनुष्‍य का मूल्‍य क्‍या है। मेरे इतने सुंदर, सुशील और मन के स्‍वच्‍छ मित्र के साथ ऐसी दुर्घटना नहीं होनी चाहिए थी। चांद की तरफ देख कर मित्र के अशांत मन को सर्वशांत करने के उपाय ढूंढता हूँ। पर मित्र का दर्द मेरी सहानुभूतियों से भी बढ़ा है। इसलिए वह मेरी सद्भावनाओं और प्रेमपूर्ण शब्‍दों को सुन कर आज के लिए उन्‍हें भूल गया। मेरे साथ अपना दुख बांट कर फि‍र से तनाव में घिर गया। क्‍योंकि रात को पता चला कि उसका सिरदर्द कर रहा है।
 वह सुदूर किसी नगर में है। उसके दर्द को यहां से अनुभव कर प्राकृतिक चांदनी का अदृश्‍य लेप अपनी उंगलियों में लगा उसके माथे पर लगाता हूँ। भले ही यह काल्‍पनिक लगे पर मुझे विश्‍वास है सुबह उसका सिर शांत-प्रशांत होगा। वह ज्‍येष्‍ठ पूर्णिमा की चांदनी रात का मेरे शहर से मेरे द्वारा भेजा गया अमृत पीकर स्‍वस्‍थ हो उठेगा। ईश्‍वर करे नया सवेरा उसके जीवन को नए मार्ग पर ले जाए। वह अपने पीड़ाजनक समय को भूले। उन प्रेमिल भावनाओं को महसूस करे, जो किसी ने बड़े प्रयास से उसके लिए संजोई हैं।
अगर मैं रातभर ज्‍येष्‍ठ पूर्णिमा की चांदनी में घर से बाहर रहा तो निश्चित है मैं प्रेम बन कर प्रकृति कणों में अदृश्‍य हो जाऊंगा। इतना संप्रभाव है चांदनी रात का! लेकिन मैं अभी भौतिक शरीर के साथ ही अपने मित्र का प्रेम सहायक बनना चाहता हूँ। मित्र से हाथ जोड़कर प्रार्थना है कि मुझे मेरे गंभीर मुख की मुद्राओं से नहीं बल्कि मेरे हृदय के वात्‍सल्‍य से पहचाने। सच में मेरा हृदय इस कठोर मशीनी युग में भी गुप्‍त स्रोत से निकलते जल के समान है। शीतल, निर्मल, निश्‍छल, प्रेमिल और प्राकृतिक।
विकेश कुमार बडोला 

Friday, April 14, 2017

राजनीतिक विरोधाभास हैं र्इवीएम में गड़बड़ी के आरोप

वीएम में छेड़छाड़ की आशंका को लेकर विपक्ष बुरी तरह बौखलाया हुआ है। यूपी और उत्‍तराखंड में भाजपा प्रचंड बहुमत से सत्‍तासीन क्‍या हुई विपक्षियों ने अपनी पराजय का सारा दोष ईवीएम मशीनों की गड़बड़ियों पर डाल दिया। सबसे पहले बसपा की मायावती ने ईवीएम से छेड़छाड़ की बात उठाई। उल्‍लेखनीय है कि बसपा सहित तमाम अन्‍य राजनीतिक दल यूपी में बुरी तरह परास्‍त हुए हैं। इसकी खीझ वे ईवीएम मशीनों पर निकाल रहे हैं।
इसके बाद दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री केजरीवाल ने ईवीएम मशीनों में खराबी होने का आरोप लगाया। वे तो राज्‍य निर्वाचन आयोग से दिल्‍ली में आगामी नगर निगम चुनावों में ईवीएम मशीनों के स्‍थान पर बैलेट पेपर का इस्‍तेमाल करने की सिफारिश तक कर चुके हैं। अब कांग्रेस सहित सारा विपक्ष ईवीएम मशीनों की गड़बड़ी को लेकर मुखर है तथा उसका तेरह सदस्‍यीय प्रतिनिधिमंडल इस संबंध में राष्‍ट्रपति से भी अपनी शिकायत कर चुका है।
यूपी और उत्‍तराखंड में यदि भाजपा ने सत्‍ता प्राप्‍त की तो पंजाब में कांग्रेस सत्‍तारूढ़ हुई। इसी तरह गोवा और मणिपुर में कांग्रेस को ज्‍यादा विधानसभा सीटें मिलीं। पंजाब, गोवा व मणिपुर के संदर्भ में तो विपक्षियों को ईवीएम का दोष दिखाई नहीं देता। देखा जाए तो ईवीएम मशीनों पर अपनी राजनीतिक पराजय का ठीकरा फोड़ना अलग-अलग राजनीतिक दलों की निजी कुंठा ही प्रदर्शित करता है क्‍योंकि विपक्ष ने किसी उचित कारणवश एक होकर ईवीएम मशीनों में समस्‍या की शिकायत नहीं की।
पंजाब में आम आदमी पार्टी ने चुनाव से पूर्व ही अपनी सरकार बनाने के दावे कर दिए थे। हारने पर उसके मुखिया केजरीवाल को ईवीएम में खराबी दिखने लगी। इसी प्रकार यूपी में चुनाव पूर्व केवल राजनीतिक अवसर झपटने के लिए बना सपा-कांग्रेस गठबंधन तथा बसपा की करारी हार से इनके नेताओं को किसी न किसी रूप में अपनी भड़ास निकालनी थी। इसलिए इन्‍होंने ईवीएम मशीनों की खराबी के जरिए अपनी भड़ास निकाली। ज‍बकि पंजाब के नवनिर्वाचित कांग्रेसी मुख्‍यमंत्री अमरिंदर जीत सिंह ने ईवीएम मशीनों में खराबी के आरोप के बाबत कहा कि यदि मशीनों में खराबी होती तो वे बहुमत कैसे प्राप्‍त करते। कहने का तात्‍पर्य यही है कि ईवीएम में दोष का विपक्षी एजेंडा भी राजनीतिक विरोधाभासों से भरा हुआ है, जो जनता को केवल हास्‍यास्‍पद ही नजर आता है।
विगत संसद सत्र में विपक्षियों ने गैर-भाजपाई राज्‍यों के मुख्‍यमंत्रियों और नेताओं के विरुद्ध सीबीआई तथा ईडी द्वारा प्रस्‍तुत आरोप पत्रों को लेकर जमकर हंगामा खड़ा किया। चूंकि भारत में केंद्र की मोदी सरकार का आगमन कांग्रेसजनित भ्रष्‍टाचार से ऊब का ही परिणाम था इसलिए सरकार की जनता के प्रति अहम जिम्‍मेदारी थी कि वह कांग्रेसियों के भ्रष्‍टाचार व घोटालों के सिद्ध दोषियों को कानूनी ढंग से सजा दिलवाए। परंतु मोदी सरकार के तीन वर्ष व्‍यतीत होने के उपरांत भी अभी तक किसी घोटालेबाज को कोई सजा नहीं दी जा सकी है।
सीबीआई व प्रवर्तन निदेशालय ने कांग्रेसी सरकार में हुए अवैध लेन-देन, घपलों-घोटालों के संबंध में अनेक मामलों में आरोप पत्र तो कई बार प्रस्‍तुत किए पर अभी तक किसी बड़े राजनेता या उसके करीबी कारोबारी को कठोर कानूनी दंड के दायरे में नहीं लाया जा सका है। मोदी सरकार पर इस बात की बड़ी जवाबदेही है। इसलिए उसने केंद्रीय जांच एजेंसियों को अपराधियों की धरपकड़ के  लिए विशेषाधिकार और समन्‍वयक सुविधाएं प्रदान की हैं। इसी के परिणामस्‍वरूप कांग्रेसी राज्‍यों के वर्तमान व पूर्व मुख्‍यमंत्रियों, नेताओं व इनके करीबी कारोबारियों पर जांच एजेंसियों का शिंकजा गहराता जा रहा है। चूंकि विपक्ष को पूरी आशंका है कि उनके घपले-घोटाले व भ्रष्‍टाचार को मोदी सरकार एक न एक दिन साबित कर देगी इसलिए उन्‍होंने सरकार का ध्‍यान बांटने के लिए संसद व संसद से बाहर ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी का नया शिगूफा उछाला है।
इस मामले में उन्‍हें न्‍यायालयों में दाखिल इस आशय की जनहित याचिकाओं का सहारा भी मिला। जिनमें न्‍यायाधीशों ने टिप्‍पणी करी कि जब ईवीएम में दोष की आशंका इतने बड़े पैमाने पर उभरी है तो चुनाव आयोग उनकी आशंका का समाधान करे। चुनाव आयोग पर पिछले एक माह से ईवीएम मशीनों को त्रुटिहीन सिद्ध करने का दबाव पड़ रहा था। अंतत: आयोग ने राजनीतिक दलों और मशीनों की गड़बड़ी पकड़ सकनेवाले विशेषज्ञों को ईवीएम मशीनों के परीक्षण-निरीक्षण करने का मौका उपलब्‍ध करा ही दिया है।
इलेक्‍ट्रॉनिक वोटिंग मशीन ठीक न होने का प्रश्‍न उठानेवाले राजनेताओं और मशीन विशेषज्ञों को आयोग ने खुली चुनौती दे दी है। आयोग ने कहा है कि मई के प्रथम सप्‍ताह में ऐसे लोग मशीन को हैक करके या उसमें किसी किस्‍म की गड़बड़ी करके दिखाएं। आयोग इसके लिए एक हफ्ते या दस दिन का समय देगा। संभवत: उत्‍तर प्रदेश चुनाव में इस्‍तेमाल की गई मशीनों से ही राजनीतिक दलों व इनके विशेषज्ञों से छेड़छाड़ अथवा हैक करने को कहा जाए। वैसे नियम यह है कि ईवीएम मशीनों को चुनाव परिणाम के बाद 40 दिन से पूर्व स्ट्रांग रूम से बाहर नहीं ले जाया जा सकता। यह अवधि माह के आखिर में खत्‍म हो रही है। नियम का अनुपालन सुनिश्चित हो सके इसीलिए मशीनों के निरीक्षण के लिए मई का पहला सप्‍ताह नियत किया गया है।
ईवीएम मशीनों में छेड़खानी का आरोप लगानेवाले नेता कितने जमीनी हैं अथवा वे जनता के कितने सेवक हैं यह उनके निराधार आरोपों से तय हो चुका है। इतने वर्षों से सत्‍तासीन इन नेताओं में जनता का राजनीतिक दृष्टिकोण परखने की योग्‍यता नहीं। देश का जनमानस कैसी राजनीति चाहता है, इस दिशा में सोचकर खुद को नए सिरे से नई सकारात्‍मक राजनीति के लिए तैयार करने के बजाय वे जनता के बहुमत की अवहेलना कर रहे हैं। क्‍या इस संबंध में संविधान या लोकतांत्रिक मर्यादाओं का हनन करने का दोषारोपण ऐसे नेताओं पर नहीं लगना चाहिए। क्‍या किसी के द्वारा इस प्रकरण में जनहित याचिकाएं दाखिल नहीं की जानी चाहिए। न्‍यायालयों का स्‍वयं संज्ञान क्‍या इस संदर्भ में नहीं जागना चाहिए।
इस तरह तो लोकतांत्रिक अवधारणा विरोधाभासों से घिरती जाएगी। ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी के आरोपों को लेकर भाजपा की केंद्र सरकार की ओर से मजबूत प्रत्‍यारोप नहीं आना भी उचित नहीं कहा जा सकता। वह कम से कम अपने संसाधनों का उपयोग कर न्‍यायालयों में इस बाबत एक जनहित याचिका तो डाल ही सकती है। बेशक उसे अपनी राजनीतिक मंशा साफ, पारदर्शी लगे परंतु उसे जनता के उस बहुमत का आदर तो करना ही चाहिए, जिसके बलबूते वह सत्‍तारूढ़ हुई है। इसी आधार पर वह चुनाव आयोग या न्‍यायालयों के समक्ष जनता के बहुमत का हवाला देकर ईवीएम मशीनों की गड़बड़ी के आरोपों को निराधार सिद्ध कर सकती है।
विकेश कुमार बडोला

Tuesday, April 11, 2017

पत्थर फेंकनेवालों से निपटने का तरीका केवल कठोर हो

पिछले वर्ष सितंबर में ही राजग की केंद्र सरकार ने एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल कश्‍मीर भेजा था, जिसकी अध्‍यक्षता गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने की थी। हालांकि यह नौबत भी तब आई जब स्‍थानीय अतिवादियों पर पैलेट गन के इस्‍तेमाल को लेकर विपक्ष ने सुरक्षा बलों को मानवाधिकारों के उल्‍लंघन करनेवाला बताया। परंतु केंद्र सरकार ने विपक्ष से आग्रह किया कि वह स्‍वयं कश्‍मीर में पत्‍थर फेंकनेवालों की वास्‍तविक स्थिति का अनुमान ले ले ताकि सुरक्षा बलों द्वारा आत्‍मरक्षा में चलाई जानेवाली पैलेट गन की सच्‍चाई सामने आ सके। लेकिन कश्‍मीर में सुरक्षाकर्मियों पर स्‍थानीय युवकों द्वारा आतंकवादियों के उकसावे पर पत्‍थर फेंकने के आलोक में चुभता हुआ प्रश्‍न यह उभर रहा है कि आखिर इतने बड़े राष्ट्र को अपने सैन्‍य बलों की तुलना में भाड़े के अतिवादियों के बारे में इतना सोचने-विचारने की क्‍या आवश्‍यकता है। कश्‍मीर समस्‍या का सच अब किसी भी रूप में गुप्‍त नहीं रहा। केंद्र सहित स्‍थानीय विपक्ष, मुसलिम राजनीतिक दल और पाक-प्रशासित आतंकी समूह सभी भलीभांति अवगत हैं कि कश्‍मीर में पत्‍थर फेंकने का कार्यक्रम कोई रीतिगत कार्यक्रम नहीं है। इस काम के लिए किसी भारतीय हित अथवा राष्‍ट्रीय उत्‍पादन की दिशा निर्धारित नहीं होती। आधिकारिक रूप से भारत के हिस्‍से कश्‍मीर में भारतीय रक्षा बलों पर पत्‍थर फेंकना हर कोण से अवैध है। तब भी इस समस्‍या को देखने का दृष्टिकोण भारत में ही दो तरह का है। एक वे राजनेता, बुद्धिजीवी, पत्रकार तथा इनके समर्थक लोग हैं जो किसी भी प्रत्‍यक्ष भारत विरोधी गतिविधि में शामिल मुसलिमों को कभी भी दोषी या आरोपी नहीं समझते। यह वर्ग उलटा ऐसे राष्‍ट्र विराधियों की हरकतों को हास्‍यास्‍पद तथ्‍यों व तर्कों के आधार पर सही ठहराने को जुटा रहता है। दुर्भाग्‍य से इसमें भारतीय न्‍यायिक व्‍यवस्‍था के व्‍यवस्‍थापक तथा न्‍यायाधीश भी शामिल हैं।
सितंबर16 में कश्‍मीर का दौरा करने से पूर्व केंद्रीय प्रतिनिधिमंडल वहां जाने के लिए इसीलिए तैयार हुआ था क्‍योंकि केंद्र सरकार के सम्‍मुख न्‍यायालय का आदेश मानने की राजनीतिक विवशता थी। उल्‍लेखनीय है कि कश्‍मीर और पूर्वोत्‍तर राज्‍यों में सशस्‍त्र बल विशेष सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत अतिरिक्‍त सेना तैनात है। विगत वर्षों में सीमावर्ती इन राज्‍यों से भारत में निरंतर घुसपैठ होती थी। घुसपैठियों का उद्देश्‍य भारत में घुस कर इसकी संप्रभुता को कई प्रकार से नुकसान पहुंचाना होता था। नकली मुद्रा, नकली सामान, प्रतिबंधित मद्य व मदिरा पदार्थों की तस्‍करी से लेकर मानव तस्‍करी तथा आतंकवाद के प्रसार के लिए आवश्‍यक विस्‍फोटक आदि का आवागमन इन्‍हीं राज्‍यों की सीमाओं से होता रहा है।
पाकिस्‍तान, बांग्‍लादेश, म्‍यांमार जैसे देशों से भारत में होनेवाली घुसपैठ का मकसद अनेक प्रकार के अवैध कारोबारों से केवल पैसा कमाना ही नहीं था बल्कि इन मुसलिम देशों के कट्टर मुसलिम आतंकी समूहों ने भारत में इसलाम के प्रसार के लिए भी हर वह काम किया जो भ्रष्‍ट भारतीय सरकारी तंत्र की मिलीभगत से हो सकता था। आज इसी का परिणाम है कि भारत में मुसलिमों की जनसंख्‍या तेजी से बढ़ती जा रही है। वर्तमान की केंद्र सरकार भी पिछली सरकारों की तरह इस विषय में मुंह सिल कर बैठी हुई है। सरकार को गलत अंदाजा है कि वह विकास की बातों व कार्यों के दम पर इसलामी आतंकी समूहों की भारत को इसलामिक देश बनाने की गुप्‍त कारगुजारियों को खत्‍म कर देगी।
सरकार को ध्‍यान रखना चाहिए कि दुनिया में सदियों से जितने भी युद्ध लड़े गए हैं, उनके मूल में अपने-अपने मतों व सिद्धांतों की स्‍थापना ही होती है। इस समय भी विश्‍वभर में व्‍याप्‍त आतंक का गुप्‍त लक्ष्‍य इसलाम का अधिरोपण करना ही है। यदि ऐसा न होता तो आज अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस, स्‍वीडन, बेल्जियम जैसे विकसित देशों में आतंकी घटनाएं देखने को न मिलतीं। कश्‍मीर में पत्‍थरबाजी भी बहुत प्राय: भारत में इसलाम को थोपने का ही एक हथकंडा है। इसे हलके में आंकना सरकार को दो तरह से भारी पड़ेगा। एक, आनेवाले समय में वह सत्‍तासीन नहीं हो सकेगी। दूसरे, पत्‍थरबाजों से समझौते की बात पर आखिर में वह मुंह की ही खाएगी और राष्‍ट्र की राष्‍ट्रीयता खतरे में पड़ेगी। यहां इस लेखक को बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि विश्‍व के धर्मनिरपेक्ष विद्वानों को आतंक का यह रूप विचलित नहीं करता। क्‍योंकि विगत दिनों ब्रिटेन,रूस और स्‍वीडन में हुई आतंकी घटनाओं की प्रतिक्रिया में ऐसे विद्वानों ने अपना पत्रकारीय रोष प्रकट नहीं किया।
भारत में कश्‍मीर वह क्षेत्र है, जो विगत साढ़ तीन दशकों से प्रतिक्षण आतंकी कारनामों के लिए कुख्‍यात रहा है। पाकिस्‍तान में स्‍थापित आतंकी समूह कोई न कोई बहाना बनाकर कश्‍मीर में भारतीय लोकतंत्र के लिए चुनौती बने हुए हैं। यदि किसी गुप्‍त सैन्‍य अभियान कार्रवाई के तहत किसी आतंकी समूह के आतंकियों को पकड़ने के लिए सेना आगे बढ़ती है तो स्‍थानीय मुसलिम युवक और जनता आतंकियों का सुरक्षा कवच बनकर सामने आ खड़ी होती है। सेनाकर्मी यदि थोड़ी बहुत सख्‍ती करते हैं तो मुसलिम युवक उन पर पत्‍थरों की बौछार करने लगते हैं। पिछले साल तक सेना को अनुमति थी कि वह ऐसे उपद्रवियों पर पैलेट गन चला सकती है। लेकिन विपक्ष और स्‍थानीय मुसलिम नेताओं ने पैलेट गन के इस्‍तेमाल पर रोक के लिए राज्‍य उच्‍च न्‍यायालय तथा सर्वोच्‍च न्‍यायालय में अपील कर दी। धर्मनिरपेक्ष तथा तटस्‍थ बनने का नाटक कर नेताओं, विद्वानों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और इनके समर्थकों की आवाज पर सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने भी केंद्र सरकार को पैलेट गन के स्‍थान पर कोई दूसरा विकल्‍प अपनाने का निर्देश दिया। लेकिन इस संपूर्ण कश्‍मीर चिंतन के दौरान न्‍यायाधीशों ने यह नहीं सोचा कि सैनिकों को पत्‍थर फेंकनेवालों के हमलों का प्रतिरोध न करने पर कितनी जान-माल की हानि उठानी पड़ रही है। क्‍योंकि पत्‍थरबाज तो बिना किसी कारण सैन्‍यकर्मियों को देखते ही उन पर हमला करने लगते हैं। अब त‍क पत्‍थरबाजों के हमलों में अनेक सैनिक शहीद हो चुके हैं तथा कई बुरी तरह घायल पड़े हैं।
यह देख कर बहुत दुख होता है कि स्‍थानीय अतिवादियों को इतना अतिवाद फैलाने तथा भारतीय गणतांत्रिक संप्रभुता को खुलेआम धता बताने के बाद भी सुधरने और मुख्‍यधारा में लौट आने के अनेक अवसर दिए जा रहे हैं। परंतु सैन्‍यकर्मियों तथा भारतीय जन-गण-मन की अस्मिता की रक्षा करने को आतुर आम भारतीयों को मुख्‍यधारा में भी भेदभाव झेलना पड़ रहा है। देश में अनेक युवक ऐसे हैं जो भारत भूमि के लिए अपना सर्वस्‍व झोंकने को सदैव तत्‍पर हैं, पर उनकी खोज-खबर के लिए न तो कांग्रेसियों के पास ही समय था और न ही भाजपा की केंद्र सरकार ही उनके बारे में कुछ कर पा रही है। पत्‍थरबाजों को मुख्‍यधारा में लाने की अपील प्रधानमंत्री व्‍यर्थ ही कर रहे हैं क्‍योंकि ये ऐसे अतिवादी तत्‍व हैं जो धार्मिक कट्टरता के आत्‍मदंश से पीड़ित हैं। इनसे छुटकारा पाने के लिए इन्‍हें आतंकवादियों की तरह ही निपटाना पड़ेगा। अन्‍यथा देश का महत्‍वपूर्ण समय तथा धन-संसाधन यूं ही ऐसे गुंडातत्‍वों पर व्‍यर्थ होता रहेगा।
विकेश कुमार बडोला

Monday, April 10, 2017

आतंकवाद का वैचारिक संरक्षण बंद करे दुनिया

मेरिकी राष्‍ट्रपति ट्रंप द्वारा सात मुसलिम देशों पर लगाए गए अस्‍थायी आव्रजन संबंधी प्रतिबंधों के बाद दुनिया में नई राजनीतिक हलचल मची हुई है। किसी भी देश के जनजीवन को हर तरह से प्रभावित करने के लिए उस देश की राजनीतिक गतिविधियां सबसे बड़ा कारक होती हैं। जब से डोनाल्‍ड ट्रंप ने आतंकवाद पर कठोर प्रतिबंध की अपनी अभिव्‍यक्‍त मंशा को सुदृढ़ता प्रदान करने के लिए सात मुसलिम देशों के नागरिकों पर अमेरिका में प्रवेश को लेकर रोक संबंधी आदेश पारित किया, तब से अमेरिका ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में खलबली मची हुई है। चूंकि ट्रंप ने राष्‍ट्रपति चुनाव के लिए आयोजित अपनी सभी सभाओं में यही कहा था कि वे राष्‍ट्रपति चुने जाने पर किसी भी कीमत पर अमेरिकियों को आतंकवाद से मुक्‍त करेंगे इसीलिए वह अपना चुनावी वचन पूरा कर रहे हैं। अमेरिकी लोग उनके इस चुनावी संकल्‍प पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के साथ-साथ किसी भी दशा में इसको लागू हुआ देखना चाहते थे। साथ ही वहां के स्‍थानीय नागरिकों को इस बात का भी भलीभांति आभास हो चुका था कि डेमोक्रेट्स के दशकों के शासन में अमेरिका ने आतंकवाद के उन्‍मूलन के लिए कठोर प्रतिरोध नहीं किया और न ही आतंकवाद फैलने के मौलिक विषयों को समझने में रुचि ही दिखाई। ट्रंप के आने से पूर्व अमेरिका भी आतंक और आतंकियों के प्रति ठीक वैसा ही राजनीतिक दृष्टिकोण रखता आया है, जैसा भारत में कांग्रेस के शासन में कांग्रेसियों व इसके सहयोगी राजनीतिक दलों का होता था।
एक तरह से पूरा विश्‍व आतंकवाद को लेकर प्रारंभ से ही दो वैचारिक ध्रुवों में विभाजित रहा है। आतंकवाद और आतंकवादियों का परिरक्षण करनेवाले वैश्विक प्रगतिवादी नेताओं, पत्रकारों, न्‍यायविदों और इनके अनुगामी लोगों ने आतंक के संदर्भ में अपने अतार्किक सिद्धांत बलात संपूर्ण विश्‍व पर थोपने की कोशिश की। जिस कारण शनै: शनै: पूरी दुनिया में मानवजाति के लिए आवश्‍यक खाद्यान, पोषाहार, आवास, शिक्षा-स्‍वास्‍थ्‍य जैसे विषय राजनीति के कार्यक्रमों से अदृश्‍य हो गए तथा आतंकवाद राजनीतिक चिंता का प्राथमिक विषय बन गया। यह भी इसलिए हुआ क्‍योंकि विगत तीन दशकों में पूरे संसार में अधिकांश देशों का सत्‍ता परिचालन विद्रूपित विचारधारा के सहारे होने लगा था। जब ब्रिटेन में ब्रेक्जिट के अंतर्गत लोगों ने बहुमत के आधार पर यूरोपियन यूनियन से बाहर निकलने का विचार किया, भारत में पहली बार कोई दक्षिणपंथी सरकार सत्‍तारूढ़ हुई तथा अमेरिका में रिपब्लिकन राजनीतिक दल डोनाल्‍ड ट्रंप के नेतृत्‍व में सत्‍तासीन हुआ, तब जाकर विश्‍व में आतंकवाद के विरुद्ध निर्णायक लड़ाई की वैश्विक संभावना प्रकट हुई। संभावना ही नहीं बल्कि विश्‍व की इन तीन ऐतिहासिक, राजनीतिक-सामाजिक घटनाओं ने वैचारिक रूप से कुरीतियों पर आरूढ़ सांसारिक प्रगतिवाद के समर्थकों को यह सोचने के लिए विवश किया कि उनकी गरीबों, किसानों तथा मजदूरों के संबंध में की जानेवाली चिंताएं अत्‍यंत खोखली हो चुकी हैं। वास्‍तव में जीवन की आधारभूत आवश्‍यकताओं से वंचित तथा जैविक अधिकारों के लिए संघर्षशील लोगों के पक्ष में खड़े होने के बजाए ये तथाकथित प्रगतिवादी आतंकवाद तथा आतंकवाद की इसलामी विचारधारा का विश्‍व स्‍तर पर आधिकारिक समर्थन करने लगे।    
            अमेरिका के संघीय न्‍यायालय द्वारा ट्रंप के प्रतिबंध संबंधी शासकीय आदेश पर अस्थायी रूप से रोक लगा दी गई। इसे ट्रंप प्रशासन ने अपीलीय न्‍यायालय में चुनौती भले ही दी हो परंतु सत्‍तारूढ़ रिपब्लिकन के ट्रंप और स्‍थानीय न्‍यायविदों के बीच आतंकवाद की परिभाषा, विवेचना तथा आतंकवाद के प्रति लड़ाई को लेकर मतभेद उभर आए हैं। कहीं न कहीं अमेरिकी न्‍यायालयों का यह निर्णय आतंकवाद को लेकर शून्‍य सहनशक्ति अपनाने वाले ट्रंप प्रशासन को हतोत्‍साहित करेगा।  
दुनियाभर में हुई या हो रही आतंकी घटनाओं का गणित हजारों की संख्‍या तक पहुंच चुका है। परंतु इन घटनाओं के सिद्ध दोषी आज तक केवल और केवल मुसलमान ही रहे। इस बात को समझने के लिए भी अमेरिका सहित दुनिया के अधिकांश देशों के लोग दो वर्गों में विभाजित हैं। निर्दोष लोगों को वीभत्‍स तरीके से मारना आतंकवादियों के लिए इस आधुनिक युग में कोई गुप्‍त काम नहीं रहा। उनके आतंकी आक्रमण, मारकाट, हिंसा और विध्‍वंसकारी गतिविधियों के वीडियो की यहां-वहां भरमार है। दुर्भाग्‍य से आतंकियों का दुस्‍साहस इतना ज्‍यादा होता है कि वे अपने काम को सीधे-सीधे मुसलिम धर्म व धार्मिक धारणाओं की अपेक्षा पर चलनेवाला अभियान बताते हैं। उन्‍हें लोगों को मारने पर अंशमात्र का दुख या पछतावा नहीं होता। मध्‍य यूरोप से होते हुए पूर्वोत्‍तर एशिया के देशों तक पिछले दो दशकों में आतंकवाद पेशेवर तरीके से बढ़ा है। मुसलिम देशों के निकटवर्ती अन्‍य धर्मों के देशों से आतंकवादी निरंतर परोक्ष युद्ध करते रहे हैं। अतिवादियों ने आतंकी हमलों व अन्‍य हिंसात्‍मक कारनामों को सामूहिक योजना बनाकर अंजाम दिया। मुसलिम देशों की सरकारें, वहां का मीडिया भी किसी न किसी रूप में और विशेषकर वैचारिक रूप में आतंकवादियों के समर्थन में हमेशा खड़ा रहा।
दुर्भाग्‍य से दुनिया के अधिकांश देशों में सत्‍तारूढ़ शासकों की लापरवाही के कारण पिछले बीस-पच्‍चीस वर्षों में दुनिया में विकास की प्रतिस्‍पर्द्धा अति भौतिकवाद व उदारवाद के कारण उलझ गई। यह उलझाव इस प्रकार गहराया कि दुनिया में गरीबी, अशिक्षा, भेदभाव और लोगों की स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी नीतियों-रीतियों को लागू करने की आड़ में दुनिया के देश केवल और केवल सैद्धांतिक (धार्मिक) प्रतिस्‍पर्द्धा में कूद पड़े। और यह सैद्धांतिक प्रतिस्‍पर्द्धा कट्टर मुसलिमों के लिए सर्वाधिक प्रतिष्‍ठा का विषय बन गई। इसी प्रवाह में धीरे-धीरे आतंकवादियों की दुर्दांत हरकतों के बाद भी उनका परिरक्षण करनेवाली वैश्विक विचारधारा का जन्‍म हुआ। यदि मुसलिम विचारक या धर्माधिकारी आतंकवाद और आतंकवाद फैलानेवाले मुसलिम आतंकियों का पक्ष समर्थन करते तो बात समझ आती, लेकिन आतंकवादियों के समर्थन में अधिकांश देशों के तत्‍कालीन गैर-मुसलिम सत्‍तारूढ़ नेता और प्रगतिवादी विचारक व पत्रकार भी कूद पड़े। यह प्रगतिवादी गुट वर्षों तक आतंकवाद का दिखावटी प्रतिरोध करता रहा। दुर्भाग्‍य से आज भी स्थिति नहीं बदली है।
ये सामूहिक रूप से कहा करते कि आतंकवादी अशिक्षा व गरीबी के कारण ही आतंकवादी हैं, आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और आतंकवाद को किसी देश या उस देश की धार्मिक मान्‍यताओं के आधार पर चिहिन्‍त नहीं किया जा सकता। विशेषकर अमेरिका और विकसित यूरोपीय देशों के प्रगतिवादी राजनीतिज्ञों, विचारकों, पत्रकारों और विद्वानों का आतंकवाद को लेकर ऐसा दृष्टिकोण बना रहा। अफ्रीकी और एशियाई महाद्वीपों में जो गैर-इसलामिक देश थे, जैसे कि भारत, जो पाकिस्‍तान-अफगानिस्‍तान जैसे इसलामी देशों द्वारा पाले गए आतंकवाद से पीड़ित था, वहां के प्रगतिवादियों को भी आतंक व आतंकवाद के संदर्भ में देखादेखी यूरोपियन प्रगतिवादियों का दृष्टिकोण अपनाने में गर्वानुभूति होती थी। इन तथाकथित विद्वानों को अपने क्षेत्र में बारंबार होते आतंकी हमलों में शहीद सैनिकों, नागरिकों से सहानुभूति और घायल-पीड़ित लोगों से कोई सरोकार न था। आतंकवाद को लेकर यूरोपीय नजरिया अपनाना इनका फैशन बन चुका था। उस समय तक यूरोप के विकसित देशों को एशिया में भारत व श्रीलंका जैसे देशों में आतंकवाद फैलाने में अपना कारोबारी हित नजर आता था। क्‍योंकि उस दौरान उन देशों की कई कंपनियां हथियारों को बेचकर अपने देश का विकास कर रही थीं। हथियारों की सर्वाधिक बिक्री पूर्वोत्‍तर एशियाई देशों में हुई। इसमें भारत भी शामिल था। परंतु जब एक-डेढ़ दशक पूर्व अमेरिका सहित यूरोपीय व विकसित कहे जानेवाले देशों में भी आतंकवाद फैला तो यूरोपियन प्रगतिवादियों और दूसरी-तीसरी दुनिया के उनके अनुगामी प्रति-प्रगतिवादियों को समझ आ गया कि आतंक के मूल में गरीबी व अशिक्षा नहीं अपितु एक धर्म के सिद्धांत की बलात स्‍थापना करने का भयावह विचार है। लेकिन अभी भी इनकी यह समझ मुखर नहीं हो पा रही। अभी भी ये लोग दबी आवाज में कहीं न कहीं आतंकवादियों द्वारा किए जा रहे रक्‍तपात और अन्‍य अमानवीय हरकतों के लिए सीधे-सीधे उन्‍हें और उनके धार्मिक कारणों को दोषी मानने को राजी नहीं। पता नहीं इसलाम से इस प्रकार का भय ऐसे लोगों को क्‍यों रहता है। वैसे भी इसलाम में धर्म के नाम पर विकृतियों ने ही जोर पकड़ा और वह भी दूसरे धर्मों को धता बताने की कीमत पर। लेकिन दक्षिण एशिया के महत्‍वपूर्ण राष्‍ट्र भारत, सुदूर पूर्वी भूखंड में बसे वि‍कसित-अनुशासित जापान और इन दोनों से बहुत दूर उत्‍तरी भू-भाग में स्थित सर्वाधिक शक्तिशाली देश अमेरिका में विगत पांच वर्ष से आतंक तथा आतंकवादियों की विवशता को लेकर निराधार तर्क परोस रही राजनैतिक-पत्रकारीय बिरादरी को जनता का मुखर विरोध झेलना पड़ा है। इस परिप्रेक्ष्‍य में दुनिया के अब दो स्‍पष्‍ट वैचारिक विभाजन हो चुके हैं। एक, दक्षिणपंथ तो दूसरा वामपंथ। विगत तीन चार वर्षों में दुनिया के अधिकांश विकसित राष्‍ट्रों तथा अंतर्राष्‍ट्रीय सुरक्षा परिषद के सदस्‍यों देशों में भी आतंकवाद की अनेकों घटनाएं हुईं। घटनाओं की छानबीन के बाद ज्ञात हुआ कि सभी घटनाएं मुसलमान लोगों द्वारा ही इसलाम के प्रसार के नाम पर की गईं। ऐसे प्रमाण तथा तथ्‍य यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्‍त हैं कि इस समय विश्‍व के हथियार निर्माता देश जिन आतंकी समूहों तथा उनके संरक्षक देशों को आतंकवाद के प्रसार के लिए हथियार बेच कर लाभ कमा रहे थे, अब उसी आतंक की चपेट में किसी न किसी रूप में वे भी आ रहे हैं। अब भी समय है। विश्‍व में व्‍याप्‍त उस बौद्धिक सोच को यदि तत्‍काल नहीं बदला गया जिसमें आतंक व आतंकवादियों के लिए हमेशा वैचारिक संरक्षण रहा है, तो आगामी बीस-पच्‍चीस वर्षों में धरती पर मानवीय जीवन को किसी भी रूप में बचाए रखना असंभव हो जाएगा।
भारत सहित विश्‍वभर में हो रही आतंकी घटनाओं तथा आतंकी घटनाओं के कारण अराजक तंत्र में बदलते जा रहे विश्‍व में सर्वोच्‍च कर्ताधर्ताओं द्वारा अभी तक यह तय नहीं किया जा सका है कि आतंक क्‍यों हो रहा है। चीन, अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस जैसे देश तो आतंकी समूहों व इनके रक्षक देशों को शस्‍त्र बेचकर अपना कारोबार चलाते आए हैं। ये तो आतंक के लिए मुसलमानों तथा इनकी मुसलिम धार्मिक विचारधाराओं को प्रत्‍यक्ष दोषी कभी नहीं मानेंगे। पर भारत और इसके सरकारी व निजी प्रचार तंत्र को आतंक के इस मूल कारण को सम्‍मुख रख अपना आतंकरोधी कार्यक्रम अपनाने में समस्‍या क्‍यों हो रही है। कहीं भारत भी शस्‍त्र बेचकर लाभ कमाने का लालच तो नहीं पाल रहा। कहीं वह भी लाभ के लिए यह देखना ही भूल जाए कि वह शस्‍त्र किस को बेच रहा है। जैसे कि सुरक्षा परिषद के देश कर रहे हैं। आतंकियों व उनके रक्षक देशों को शस्‍त्र बेचकर लाभ कमाने की सोच ऐसे देशों में हो रही आतंकी घटनाओं के कारण उलटी पड़ चुकी है।
      विकेश कुमार बडोला

Friday, March 10, 2017

नीली-रंगीली-चमकीली होली

फाल्‍गुन माह होली की धुरड्डी में कितना मनोहर लगता है। यह दो वर्ष पूर्व की धुरड्डी थी। सुबह जब तक आकाश बादलों से भरा था भारतीय जनमानस उदास रहा। लोग संशकित थे कि कहीं वर्षा न आ जाए, कहीं होली के त्‍योहार में वर्षाजनित ठंड न बढ़ जाए। मैं भी उदास हो उठा था। जब पत्‍नी ने बताया कि बाहर तो बादलों का झुरमुट लगा हुआ है और बारिश आने को है तो मैं बिस्‍तर पर पसरे-पसरे ही उस होली-दिवस के प्रति सहानुभूति से भर उठा।
          कक्ष से बाहर आकर देखा तो मेघभरे नभ की प्रतिछाया धरती पर बिखरी हुई थी। सूर्य का अस्तित्‍व कहीं नहीं था। सूर्यप्रकाश की लालसा में जनभावनाएं अत्‍यंत बेचैन थीं। बच्‍चे अपने-अपने घर के बाहर उदास-हताश मुख लिए हुए मौसम से खिन्‍न थे। मैं भी सोच रहा था कि धुरड्डी के दिन वर्षा की ऐसी संभावना मैंने, जितना याद कर पा रहा हूँ, पहले कभी नहीं महसूस की थी।
          लेकिन घर के भीतर कुछ क्षण व्‍यतीत करने के बाद जैसे ही मैं बाहर आया तो देखा सूर्यप्रकाश का अमृत धरती पर चमकने लगा था। यह सूर्योपस्थिति अद्भुत थी। इससे सभी को आत्‍मसंतोष हुआ। वासंती होली में यदि नभ काले मेघों से भरा हो और वर्षा की आशंकाएं उभर आएं तो मन केवल इसलिए उदासीन नहीं होता कि वसंत माह की शोभा नहीं रही, बल्कि इसलिए भी होता है कि जीवन में सबसे विशेष मौसम ही सबसे अनाकर्षक बन गया। भावनात्‍मक रूप से यह स्थिति मानव को छिन्‍न-भिन्‍न कर देती है। लगने लगता है कि जीवन शून्‍य है और इससे कुछ भी प्रोत्‍साहन नहीं मिलने वाला। लेकिन उस दिन मौसम शून्‍य-स्थिति से उबर चुका था। इसलिए होली का आनंद प्राप्‍त करने का विशेष अवसर भारतीय जनमानस को मिल ही गया।
          सवेरे दस-ग्‍यारह बजे तक सूर्य प्रताप धरती के कण-कण तक फैल चुका था। सूर्य किरणों से निकलने वाली ऊर्जा, ताप ने लोगों को एक-दूसरे पर रंग लगाने के लिए प्रेरित किया। ध्‍यानपूर्वक महसूस करने पर वह होली-दिवस अति मनभावन था। घर की खिड़की से दूर दिखता सेमल का पेड़ अपने ललंगे पुष्‍पों सहित कितना सुंदर लगता था। उसके गाढ़े लाल रंगी पुष्‍प जैसे नील नभ, पृथ्‍वी की हरियाली पर अपना रंग उड़ेल रहे थे। आकाश नीला अमृत बन व्‍याप्‍त था। दूर-सुदूर तक धरती के कोने गगन के सुनील क्षितिज की चमक से सुहावने बन लहरा रहे थे। नभ तले धरती से कुछ ऊपर वायुमंडल पर काले पक्षियों का प्राकृतिक विचरण कितना प्रभावी था। मंद रिमकती हवा का संस्‍पर्श माधुर्य से परिपूर्ण था।
          वास्‍तव में उस दिन गगन पथ विशेष रूप से सुसज्जित था। इसीलिए पक्षियों का आवागमन अधिक हो रहा था। रंगों का वह आयोजन प्रकृति के स्‍तर पर कितना रंगपूर्ण, भावनाप्रण था। एक प्रकार से तो फाल्गुन का संपूर्ण समय प्राकृतिक रूप से अतिप्रिय, सर्वसुंदर होता ही है परंतु होली की धुरड्डी में दिवस का कांति प्रभाव जीवन की अन्‍य किसी सुखापेक्षा पर प्रतिबंध लगा देता है। इस संप्रभाव में जीवन का पूर्वावलोकन, संभावी विश्‍लेषण सब समाविष्‍ट हो जाते हैं। प्रकृति प्रदत्‍त यह अवस्‍था एक प्रकार से जीव-जीवन का श्रेष्‍ठ संसाधन बन जाती है।
          सूर्य प्रकाश में शरीर को जीवन-ऊर्जा मिलती रही। सीमेंट निर्मित भवनों से भरा मेरा जीवन परिवेश हरियाली के बिना भी वसंत में आशा-जिज्ञासा से परिपूर्ण करता रहा। यदि हरी-भरी वनस्‍पति से भरे भूभाग में मेरा यह फाल्‍गुन समय व्‍यतीत हो तो मैं यथार्थ संसार से सदैव के लिए संबंधविच्‍छेद कर लूं। मैं आधुनिक विवशता का बोझ ढोते हुए भी प्रकृति के रहस्‍यों में रुचि लेता हूँ। इतना तन्‍मय होकर प्राकृतिक रहस्‍यों के प्रति एकस्‍थ होता हूँ कि आधुनिकता का अनुभव प्रकृति और अपने बीच बाधा लगने लगता।
          संध्‍या समय, जब होली का हुड़दंग थम गया, मैं एक मित्र से मिलने चल पड़ा। मदिरापान कर होली में अपने मन की अश्‍लील कुंठा प्रदर्शित कर चुके नर-नारी, बाल-बच्‍चे, बड़े-बूढ़े और छोटे-बड़े उस समय नहीं दिखे। सभी धुरड्डी की थकावट मिटाने घरों में बंद थे। रास्‍ते में दो-एक व्‍यक्ति दिखे, जो होली के रंगों से रंगे वस्‍त्र पहने खड़े, झूम-झूम कर बातें करते थे। उनका मदिरा प्रभाव अभी तक बना हुआ था। एकाध स्‍त्री भी दिखी। एक कुत्‍ता भी दिखा। उस पर भी हरा रंग लगा हुआ था। सोचा, मदिरा के मद में किसी ने अपशब्‍द कहते हुए उसे भी रंग दिया होगा। इतना संवेदनशील कोई मानव कम से कम इस शहर में तो नहीं रहा होगा, जो कुत्‍ते को भी होली की रंगकामनाएं प्रेषित कर उस पर रंग लगाता।
संध्‍या होने को थी। चारों दिशाओं के क्षितिज अनेक रंगों को छींटते हुए सूर्यास्‍त की तैयारी करने लगे थे। ढलते सूर्य किरणों की झिलमिल-झिलमिल मुख पर पड़ी। संध्‍या समय के हलके शीत प्रभाव में यह ग्रीष्‍म ताप अच्‍छा लगा। रात्रि में मित्र से विदा लेकर मैं घर आ गया। सुबह जिस तरह की रंगों की फुलवारी प्रकृति में व्‍याप्‍त थी, रात भी उसी के अनुप्रभाव में खिलती-बढ़ती जा रही थी। भोजन करने के बाद छत पर टहलते हुए अपनी मन-भावनाओं में मैं सभी को होली की रंगकामनाएं प्रेषित कर रहा था।
होली की रात के चन्‍द्रप्रकाश में घर-आंगन, द्वार-रोशनदान सभी अतिविचित्र रंगानुभव में चमक रहे थे। स्‍वयं से पूछा कि चांद के बड़े गोले व बीस-पच्‍चीस सितारों के साथ नभ का वास्‍तविक रंग क्‍या है। उत्‍तर मिला, नीला-रंगीला। मंथर, शीतल पवन सरसराहट में शीत पीड़ा का अंदेशा हुआ तो स्‍वयं को होली के अनुभव से अलग कर घर के अंदर भेजने को तैयार करने लगा। मन तो होली की रात वाली चन्‍द्रमयी निशा को देखते रहने का था पर तन विवश था घर में दुबक निद्रालीन होने को।
विकेश कुमार बडोला

Tuesday, February 7, 2017

मोदी के नेतृत्व में निरंतर बढ़ती भाजपा की प्रासंगिकता

जैसे-जैसे भारतीय जनता पार्टी नरेंद्र मोदी के नेतृत्‍व में भारतवर्ष में अपना लोकतांत्रिक विस्‍तार कर रही है, उतनी तीव्रता से कांग्रेसजनित मीडिया का मोदी विरोधी दुष्‍प्रचार पांव पसार रहा है। इस हड़बड़ाहट में तथाकथित पत्रकार, बुद्धिजीवी और विभिन्‍न क्षेत्रों की जानकारी रखनेवाले विशेषज्ञ यह भी भूल चुके हैं कि कृत्रिम विद्वता ओढ़कर लोगों को अपनी मनपसंद सरकार या राजनीतिक दल के अनुसार बातों, चर्चाओं व भाषणों से मूर्ख बनाए रखने का जमाना गया।
पिछले बीस वर्षों में मध्‍यम वर्गीय भारतीय लोगों की जो पीढ़ी तैयार हुई वह केवल कहे-सुने पर विश्‍वास करने की स्थिति में बिलकुल नहीं है। उसकी आदत है कि वह हर बात व चीज को अपने स्‍तर पर नाप-तौल और ठोक-बजा कर स्‍वीकार करती है। इसलिए कांग्रेस रूपी राजनीतिक दल के उकसावे में क्षेत्रीय राजनीतिक दल और इन सभी के अवैध धंधों की कमाई से उपजे पत्रकारिता संस्‍थानों को अब इस भ्रांति में बिलकुल नहीं रहना चाहिए कि लोगों को मोदी के विरोध में असत्‍य भाषण करके दुष्‍प्रेरित किया जा सकता है। लोग कम से कम इस देश के दो प्रमुख राजनीतिक दलों तथा उनकी कार्यप्रणालियों को तो ढंग से पहचान ही गए हैं। इतना ही नहीं उन्‍हें क्षेत्रीय दलों के राजनीतिक स्‍तर का भी भलीभांति ज्ञान हो चुका है। इसलिए उनके लिए संवैधानिक रूप से भाजपा के अतिरिक्‍त कोई दूसरा बेहतर राजनीतिक विकल्‍प अभी इस देश में है भी नहीं तथा मोदी की अपूर्व राजनीतिक दूरदर्शिता, ईमानदारी व सबका साथ सबका विकास अवधारणा के पीछे छुपी सत्‍यनिष्‍ठा के होते हुए भविष्‍य में भी देश की राजनीति में किसी अन्‍य राजनीतिक दल के टिकने की कोई संभावना नहीं बची।
प्राय: इस देश के लोगों को वर्षों से राजनीतिक भ्रष्‍टाचार, दुराचार तथा अत्‍याचार झेलते रहने के कारण सब कुछ भूलने की आदत रही है। इस दुखांत त्रासदी में लोगों ने इतने वर्षों से भ्रष्‍टाचार के दलदल में फंसी राष्‍ट्रीय राजनीति के कर्ताधर्ताओं से उनकी राजनीतिक गंदगी का हिसाब पूछना ही बंद कर दिया था। वह हिसाब भी क्‍या पूछती! वर्षों की राजनीतिक अवैध गतिविधियां यदि उंगलियों में गिने जाने योग्‍य होतीं या घपलों-घोटालों का हिसाब आम आदमी को याद रहने लायक गिनती के इर्द-गिर्द ठहरता तो लोग नेताओं से कुछ पूछते न। लेकिन लोगों की नजर में सन 2014 से पहले तक का राष्‍ट्रीय शासन-तंत्र लोगों पर लोकतंत्र की धारणा के नाम पर एकाधिकार के घिनौने स्‍तर तक जा पहुंचा था।
2014 में इस तरह के राजनीतिक शासन को उखाड़ लोगों ने अभूतपूर्व कार्य किया। परंतु दुखद है कि देश में मीडिया ने इस अभूतपूर्व घटनाक्रम की प्रशंसा नहीं करी। प्रशंसा इसलिए नहीं हुई क्‍योंकि विजयी राजनीतिक दल दक्षिणपंथ का पैरोकार था तथा वैचारिक कुंठाओं से आक्रांत वामपंथ मीडिया को यह कैसे रास आ सकता था।   यदि मीडिया को भ्रष्‍ट बनाने वाले कांग्रेस जैसे राजनीतिक दल ऐसे ऐतिहासिक बहुमत से विजयी होते तो निस्‍संदेह यही मीडिया उनके पांच वर्षीय कार्यकाल तक उनकी इस उपलब्धि को विशेष रूप से प्रसारित करता रहता। परंतु दशकों के सत्‍ता तंत्र के तले जो मीडिया इस देश में पनपा वास्‍तव में उसका अधिकांश वामपंथ का विद्रूप था। इस पत्रकारीय विद्रूप ने केवल पत्रकारिता को ही नहीं अपितु अखिल भारतीय शिक्षण-व्यवस्‍था, कला-साहित्‍य-संगीत की पुरातन भारतीय स्‍थापनाओं, सांस्‍कृतिक-सामाजिक विरासतों तथा राजनीति की मौलिक लोकतांत्रिक दृष्टि को भी कलंकित किया। इसका भ्रष्‍ट हस्‍तक्षेप जीवन के प्रत्‍येक क्षेत्र में इस सीमा तक बढ़ा कि जन-जन के विचारों में लोकतंत्र की धारणा कलुषित हो गई। लोग मात्र भय और जीविका के लिए लोकतंत्र को बाहरी मन से स्‍वीकार करने लगे।
आज नरेंद्र मोदी के नेतृत्‍व में भाजपा सरकार विगत साढ़े छह दशकों की राजनीतिक पंगुता, लोकतांत्रिक असभ्‍यता को मिटाने का प्रशंसनीय कार्य कर रही है। परंतु खेद कि इस बारे में मीडिया निष्‍पक्ष रूप से विस्‍तार से कुछ नहीं कहता। विकास के रूप में यदि वर्तमान शासन-तंत्र ने कुछ अतिशयोक्तिपूर्ण कार्य नहीं भी किए लेकिन पिछली सरकारों की तुलना में ये कार्य अत्‍यंत सराहनीय हैं। फि‍र वर्तमान सरकार के दो वर्षों के विकास कार्यों को देखकर विरोधियों द्वारा यह अपेक्षा कर लेना कि यह जनता की हर समस्‍या का समाधान हो, तो ऐसा तो कम से कम इस भौतिक युग में बिना किसी चमत्‍कार के हो नहीं सकता।
यदि पहले की सरकारों ने वर्ष दर वर्ष सत्‍तारूढ़ होने के दौरान विकास की योजनाओं का समुचित क्रमिक क्रियान्‍वयन किया होता तो निश्चित रूप से उनके पास वर्तमान सरकार से अपनी विकास छवि के बाबत तुलना करने का कोई नैतिक आधार होता। परंतु वास्‍तविकता यही है कि केंद्रीय स्‍तर पर विगत सरकारों ने राष्‍ट्रीय महत्‍व का कोई विशेष कार्य नहीं किया। जो कुछ भी इन्‍होंने किया वह पूर्णरूपेण अनियोजित, अवैध लाभार्जन के लालच से परिचालित तथा सर्वथा अयोग्‍य राजनेताओं की दिमागी उपज था।
आज वर्तमान सरकार के पास जनता के विकास के लिए अनेक योजनाएं हैं। योजनाओं के क्रियान्‍वयन के प्रामाणिक अभिलेख हैं। विकास कार्यों को संचालित करने में किसी तरह के भ्रष्‍टाचार, घपले-घोटाले या अवैध मुद्रा लेन-देन की कोई आशंका नहीं। प्रत्‍येक कार्य निष्‍पादन प्रणाली पूर्णत: पारदर्शी है। कृषकों, सैन्‍यकर्मियों, श्रमिकों, निर्धनों, स्त्रियों, विकलांगों, भूतपूर्व सैन्‍यकर्मियों, युवाओं तथा आम जनता के लिए वर्तमान सरकार ने अनेक ऐसी कल्‍याणकारी योजनाएं बनाई व संचालित की हैं, जिनसे लोग बिना किसी जटिलता के सहज लाभान्वित हो रहे हैं। मोदी के रूप में इस देश को ऐसा जननायक उपलब्‍ध हुआ जो अपनी शासकीय नीतियों को मानवीय संवेदना के आधार पर निर्धारित करता है। यदि वर्तमान केंद्र सरकार राजनीतिक शुचिता के साथ ऐसे ही कार्य करती रही तो भारत में विकास जनभागीदारी के साथ शीघ्र ही व्‍यावहारिक स्‍वरूप ग्रहण करने लगेगा। बहुत संभव है कि इसके बाद मोदी के विरोधियों के पास उनके राजनीतिक विरोध का कोई तरीका नहीं बचे।
इतना कुछ होने के बाद भी अपनी सरकार की विभिन्‍न योजनाओं, योजनाओं के लाभों के संवितरण तथा इनके पारदर्शी क्रियान्‍वयन के बारे में प्रधानमंत्री को अपने भाषणों में स्‍वयं बताना पड़ता है, बारंबार जनता को याद दिलाना पड़ता है। इससे ज्ञात होता है कि देश का मीडिया कितना पक्षपाती हो गया। सरकारी कामकाज के पारदर्शी संचालन तथा ठोस क्रियान्‍वयन से देश की गरीब जनता को होनेवाले फायदे मीडिया को नहीं दिखाई देते। चूंकि देश में मीडिया को वामपंथी विचार की स्‍थापना करनी है और इस हेतु उसे स्‍वयं का ढंग से इस्‍तेमाल करने के लिए शासकीय छत्रछाया की भी जरूरत है, जो उसे दक्षिणपंथी कही जानेवाली मोदी सरकार से मिल नहीं रही। इसलिए मीडिया लाइन सरकार की अनेक लोक-कल्‍याणकारी, मानवीय संवेदनाओं पर आधारित योजनाओं के बारे में तटस्‍थ होकर बताने को राजी नहीं। केंद्र की अनेक विकास योजनाओं का लाभ गैर-भाजपाई राज्‍यों की जनता तक इसलिए भी नहीं पहुंच पाता, क्‍योंकि गैर-भाजपाई सरकारें केवल भाजपा विरोध की राजनीति करने पर ही उतारू हैं। ऐसी सरकारें परंपरागत राजनीतिक द्वेष व प्रतिस्‍पर्धा की गंदी आदत के कारण भाजपा से केवल वोट हथियाने की प्रतिस्‍पर्द्धा तक ही सीमित रहना चाहती हैं। इन परिस्थितियों में जैसे-जैसे लोग देश-समाज के बाबत स्‍वाध्‍ययन कर अपने स्‍वतंत्र विचार बनाएंगे वैसे-वैसे भाजपा अपने सुशासन व विकास मंत्र के बूते उनके लिए प्रासंगिक होती जाएगी और कांग्रेस सहित अन्‍य राजनीतिक दल संभवत: अस्तित्‍व के संघर्ष के लिए भी न बचें।
विकेश कुमार बडोला

Friday, February 3, 2017

आतंकवाद उन्मूलन के लिए अमेरिकी तरीका ही सर्वश्रेष्ठ

संपूर्ण जगत के कल्‍याणकारी दृष्टिकोण्‍ा के साथ जो लोग भावी सं‍ततियों के बारे में चिंतित थे, उन लोगों के लिए अमेरिकी राष्‍ट्रपति के दो शासकीय नवनिर्णय निश्चित रूप से आनंद प्रदान करनेवाले सिद्ध होंगे। आशा के अनुरूप डोनाल्‍ड ट्रंप ने विश्‍वव्‍यापी आतंकवाद की प्रामाणिक सूत्रधारणा इसलामी विचारधारा को पालनेवाले सात मुसलिम बाहुल्‍य देशों के नागरिकों के अमेरिका में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया। यह रोक अभी नब्‍बे दिनों के लिए लगाई गई है, जिसे परिस्थितियों के आधार पर बढ़ाया भी जा सकता है। इसके अतिरिक्‍त पाकिस्‍तान, अफगानिस्‍तान और सऊदी अरब जैसे मुसलिम बहुल देशों को आतंकवाद नियंत्रण व निरोधक प्रस्‍ताव के अंतर्गत निगरानी सूची में रखा गया है। ईरान, इराक, सीरिया, लीबिया, यमन, सूडान और सोमालिया प्रतिबंधित देशों की सूची में हैं। अपने दूसरे शासकीय निर्णय में डोनाल्‍ड ट्रंप ने अमेरिका के शरणार्थी पुनर्वास कार्यक्रम पर भी चार महीनों के लिए प्रतिबंध घोषित कर दिया है। इस निर्णय के बाद अमेरिका में किसी भी देश के शरणार्थी प्रवेश नहीं कर सकेंगे।
उल्‍लेखनीय है कि रिपब्लिकन पार्टी के प्रत्‍याशी के रूप में ट्रंप ने चुनाव अभियान के दौरान ही कह दिया था कि यदि वे राष्‍ट्रपति बनेंगे तो अमेरिका में कट्टरपंथी मुसलिमों के प्रवेश पर रोक लगाएंगे। इसके बाद 20 जनवरी को राष्‍ट्रपति के रूप में शपथ ग्रहण करने के बाद उन्‍होंने स्‍पष्‍ट किया था कि वह अपनी चुनावी घोषणाओं पर काम करेंगे तथा कट्टरपंथी इसलामी आतंकवाद समाप्‍त करके रहेंगे। ‘प्रोटेक्‍शन ऑफ द नेशन फ्रॉम टेररिस्‍ट एंट्री इन टू दे यूनाइटेड स्‍टेट्स’ शीर्षक से जारी आदेश में स्‍पष्‍ट है कि अमेरिकी वर्ल्‍ड ट्रेड टॉवर पर सितंबर 2011 के आतंकी हमले के बाद अमेरिकी प्रशासन द्वारा आतंकनिरोध के लिए किए गए उपाय अपर्याप्‍त थे तथा इनसे अमेरिका आतंकवाद को मिटा नहीं सका। इस आदेश के जारी होने के बाद अमेरिकी दक्षिणपंथी जनता की इस धारणा को संबल मिला कि जिन विदेशियों ने वर्ल्‍ड ट्रेड टॉवर व अमेरिका के दूसरे स्‍थानों पर आतंक फैलाया वे सभी वहां पर्यटन, शिक्षण तथा नौकरी का वीजा लेकर आए थे और इनमें से कुछ उग्रवादी तो अमेरिका में चलनेवाले शरणार्थी सहायता कार्यक्रम का लाभ लेकर वहां पहुंचे। साथ ही ट्रंप के इन दो शासकीय निर्णयों के बाद अमेरिका के बारे में उसके विरोधी देशों की यह भ्रांति भी गलत सिद्ध हुई कि उसने नब्‍बे के दशक के उपरांत अमेरिका में आई मंदी से उबरने के लिए खुद ही वर्ल्‍ड ट्रेड टॉवर पर हमले करवाए। ताकि विश्‍व को आतंक से भयग्रस्‍त कर वह अपने हथियार निर्माताओं के‍ हथियारों को दु‍नियाभर में बेचने का प्रबंध कर सके।
ट्रंप के इन आदेशों का अमेरिकी विपक्षी राजनीतिक दल डेमोक्रेटिक पार्टी तथा दुनिया के कई धर्मनिरपेक्षवादी तीखा विरोध कर रहे हैं। आशंका है कि दुनिया के सभी कट्टरपंथी मुसलिम बहुल देश ट्रंप के इस निर्णय के खिलाफ विध्‍वंशक एकता न दिखाने लग जाएं। ऐसी स्थिति में दुनिया के दक्षिणपंथियों को भी इनका मुकाबला करने के लिए एकजुट होने की आवश्‍यकता होगी। विरोधी राजनीतिक दल, इनके लोग और इनका मीडिया, ये सभी ट्रंप के इस आदेश के बाद बुरी तरह घबराए हुए हैं। ये वही विरोधी हैं जिन्‍होंने राष्‍ट्रपति चुनाव प्रचार के दौरान डोनाल्‍ड ट्रंप को सदैव हिलेरी क्लिंटन से कमतर आंका। इन्‍होंने स्‍थानीय अमेरिकी जनता के उस मतपक्ष की भी जानबूझकर अनदेखी करी, जिसमें स्‍पष्‍ट रूप से लोकतंत्र का बहुमत डोनाल्‍ड ट्रंप को मिलने जा रहा था। चुनाव परिणाम आने के कुछ समय पूर्व तक अमेरिका सहित दुनियाभर के मीडिया सर्वेक्षणों में हिलेरी‍ क्लिंटन को विजयी बताया जा रहा था। परिणामों के बारे में असत्‍य भविष्‍यवाणी करके विरोधियों ने दुनियाभर के दक्षिणपंथियों का रक्‍तचाप बढ़ा दिया था। जिस प्रकार परिणाम पूर्व सर्वेक्षणों और कल्‍पनाओं में ट्रंप को पराजित आंका जा रहा था, उससे तो अब यही सिद्ध हो रहा है कि अमेरिकी चुनाव परिणामों को प्रभावित करने का षड्यंत्र रिपब्लिकन ट्रंप का नहीं अपितु डेमोक्रेटिक हिलेरी की ओर से किया गया था। और जब अमेरिकी लोकतंत्र का बहुमत हिलेरी की पराजय के रूप में आया तो डेमोक्रेट्स ने अपने अपराध को छुपाने के लिए चुनाव परिणाम प्रभावित करने का आरोप उल्‍टा ट्रंप पर मड़ दिया ताकि उनकी विजय को अप्रत्‍याशित जता कर दुनिया में उन्‍हें चुनाव परिणामों को प्रभावित करने का अपराधी बना दिया जाए।
रक्षा मंत्रालय पेंटागन के दौरे के दौरान डोनाल्‍ड ट्रंप द्वारा हस्‍ताक्षरित उपरोक्‍त आदेशों का आशय स्‍पष्‍ट करते हुए ट्रंप ने कहा कि ये निर्णय अमेरिकी नागरिकों को इस्‍लामिक आतंकवादियों के हमलों से बचाने के लिए किए गए हैं। उन्‍होंने साफ कहा कि वे अब कट्टरपंथियों को किसी भी कीमत पर अमेरिका में नहीं देखना चाहते। सात मुसलिम बहुल देशों के नागरिकों के अमेरिका में प्रवेश करने पर रोक, तीन मुसलिम बहुल देशों को निगरानी में रखने के अलावा अन्‍य देशों से अमेरिका जानेवाले व्‍यक्तियों की भी कड़ी जांच की जाएगी। शासकीय आदेश में उल्लिखित है कि दुनिया के किसी भी देश से अमेरिका आने वाले व्‍यक्ति का उद्देश्‍य अवश्‍य स्‍पष्‍ट किया जाना चाहिए। इस आदेश के पूर्व कुछ देशों विशेष वर्ग के लोगों को वीजा साक्षात्‍कार में छूट मिली हुई थी। अब उसे भी समाप्‍त कर दिया गया है। भाविष्‍य में अमेरिका जाने के इच्‍छुक सभी लोगों का साक्षात्‍कार होगा।
जहां सात मुसलिम देशों पर प्रतिबंध को देखते हुए दुनियाभर में अमेरिका की आलोचना वाली खबरें ज्‍यादा चल रही थीं, वहीं कुवैत जैसे देश ने पाकिस्‍तान सहित पांच मुसलिम देशों पर अमेरिका की तरह ही अपने यहां आने पर प्रतिबंध लगा दिया है। इस बीच पाकिस्‍तान ने भी अमेरिका की नजर में खुद को आतंकवाद फैलानेवाले देशों में से एक मानने के बाद मुंबई बम धमाकों के मुख्‍य षडयंत्रकारी हाफि‍ज सईद को नजरबंद कर उस पर कार्रवाई करने का दिखावा भी शुरू कर दिया। इस बीच भारत के एच1 वीजा पर अमेरिका की सख्‍ती के बाद भारत में अमेरिका का विरोध शुरू हुआ तो अमेरिका ने भारत को वीजा देने या न देने के संबंध में अपनी संसद को इस विषय पर अंतिम निर्णयाक बनाने की पहल की। अमेरिका जानेवाले भारतीय नागरिकों के लिए यह राहत की बात होगी।
जिस तरह पिछले एक दशक में मुसलिम आतंकवाद ने इसलाम की धार्मिक धारणा के वशीभूत हो दुनिया के विभिन्‍न विकसित, अर्द्ध-विकसित और विकासशील देशों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई उसे दुनियाभर के तथाकथित उदारवादी विद्वानों, वामपंथी विचारकों और इनके बलबूते शासन करनेवाले वैश्विक नेताओं ने गंभीर नहीं माना। प्रत्‍येक आतंकी घटना में अनेक निर्दोष लोगों के मारे जाने के बाद ऐसे वैश्विक नेताओं का स्थायी वक्‍तव्‍य आता था कि गरीबी व अशिक्षा के कारण कुछ मुसलमान नौजवान राह भटक गए हैं इसलिए यह सब हो रहा है। लेकिन जब सीरिया, पाकिस्‍तान, सोमालिया जैसे देशों में कुछ आतंकी समूहों ने विश्‍व के लगभग सभी स्‍थानों पर बकायदा पेशेवर तौर पर निरंतर आतंकी घटनाएं कराईं तो चेतना रखनेवाले कुछ वैश्विक विद्वानों का माथा ठनका। उन्‍होंने अमेरिका सहित दुनिया के सभी विकसित देशों के शासनाधीशों का ध्‍यान इस ओर इंगित कराया। भारत आतंकवाद से सर्वाधिक पीड़ित रहा। परंतु यहां के धर्मनिरपेक्ष शासन-तंत्र ने मात्र मुसलिम वोटों के लालच में कभी भी अपने को मुसलिम आतंकवाद से पीड़ित राष्‍ट्र घोषित नहीं किया। यहां आतंक को ‘आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता’ कहकर संबोधित किया जाता रहा। भारतीय लोकतंत्र के सभी संस्‍थान पता नहीं क्‍या सोचकर मुसलिम कट्टरवाद को हमेशा से प्रश्रय देते रहे। इसका परिणाम आज यह है कि अल्‍पसंख्‍यक कही जानेवाली भारतीय मुसलिम जनता अहिंसा, कट्टरता और धार्मिक उन्‍माद दुर्भावना से दुष्‍प्रेरित हो भारतीय संविधान के समानांतर अपनी अनावश्‍यक धार्मिक कानूनी धारणाएं मजबूत कर रही है। दुर्भाग्‍यपूर्ण ढंग से यहां का संविधान और संवैधानिक तंत्र वर्षों से ऐसी कानूनी धारणाओं की सुनवाई करने में लगा हुआ है।
 मोदी सरकार ने भारत व इसके पड़ोसी भूभाग पर व्‍याप्‍त आतंकवाद की जड़ों को सीधे तौर पर तो नहीं पर अप्रत्‍यक्ष रूप से काटने के प्रयास किए हैं। इस अभियान में नोटबंदी सबसे बड़ा आधिकारिक प्रयास रहा। लेकिन लगता नहीं कि मात्र नोटबंदी से ही आतंक की‍ विषैली जड़ों को काटा जा सकता है। मुसलिम आतंक से सर्वाधिक त्रस्‍त भारत देश से भी आतंकवाद की समाप्ति हेतु यहां की सरकार को अमेरिकी सरकार जैसे ही सशक्‍त और सीधे शासकीय निर्णय लेने की आवश्‍यकता है। 

Saturday, January 28, 2017

उसे न जाने क्या हो गया

स समय उसे यह तक याद नहीं कि वह एक जीव है। दो या तीन वर्ष से उसे अपने मनुष्‍य होने पर भी संदेह हो आया। पिछले दस महीने तो उसके जीवन को पत्‍थर बनाने में लगे रहे। अब भी यही स्थिति है। वह मनुष्‍य होने की सामान्‍य भावनाओं से भी अलग हो गया। उसके भीतर प्रेम, संवेदना और जिज्ञासाओं के तंतु सूख चुके हैं। जो कुछ भी उसके सोच-विचार में बचा हुआ है वह केवल इतना भर कि उसे यह याद आ जाता कि वह भी कैसे वैसा ही बन चुका है, जैसे दुनिया के अधिकांश लोग उसे दिखाई देते थे।
वह सोचता था कि उसके हृदय में ममत्‍व का ताप है। वह अपनी लोक कल्‍याणकारी और प्रेमिल संभावनाओं के बल पर स्‍वयं से लगाव रखता था। पर अब उसके हृदय में ऐसी संभावनाएं नहीं रहीं। वह अज्ञानतावश कठोर भावनाओं के मार्ग पर बढ़ चला है। वह अपने व्‍यक्तित्‍व के इस विघ्‍नकारी परिवर्तन से स्‍वयं के लिए चिंतित नहीं है। बल्कि उसे चिंता है कि परिवार, समाज और मित्रों के होते हुए वह ऐसे बन गया।
यदि वह किसी एकांत स्‍थान में होता और तब उसके व्‍यक्तित्‍व में ऐसा बदलाव होता तो उसे अपने इस नैसर्गिक प्रत्‍यावर्तन से निराशा न होती। लेकिन उसके जैसे अयोग्‍य, अपरिश्रमी, अकर्मण्‍य और निराश व्‍यक्ति को जब उसकी पत्‍नी जीवन की विशाल अभिलाषाओं के लिए देखती है तो उसकी खिन्‍नता उसे अंधेरा कोना पकड़ने को उकसाती। उसकी बिटिया रानी जब ऐसे पिता से बाल्‍य-कल्‍पनाओं के अनुसार खेल-खिलौनों और दूसरी सुख-सुविधाओं की आशा रखती तो उसकी आत्‍मलज्‍जा उसे उन परिस्थितियों में और धकेल ले जाती, जिनके कारण वह अकर्मण्‍य और निराश है।
माता-पिता की अनेक सांसारिक-भौतिक इच्‍छाओं को पूरा न कर पाने के कारण भी उसकी शारीरिक-मानसिक स्थिति अत्‍यंत वैरागी हो चुकी है। उसे लगता है कि उसके परिश्रम में खोट नहीं। शायद यह उन प्रबंधकों की अयोग्‍ता थी, जो उसके परिश्रम को पहचान न पाए। संभवत: उसे इस कपटी दु‍निया में केवल परिश्रम करना ही आता है। जबकि प्रबंधकों को तो उसके परिश्रम के साथ-साथ अपने हर अच्‍छे-बुरे प्रबंधकीय निर्णय के लिए उसकी सहमति भी चाहिए।
 इन दिनों लगता है वह एक ऐसे भू-स्‍थल पर रह रहा है, जो मनुष्‍यों में केवल हत्‍यारी महत्‍वाकांक्षाओं को पाल रहा है। कोई भी नहीं दिखता जो अपने मनुष्‍य स्‍वरूप में रहते हुए सही सोच-विचार करता हो। चारों ओर भौतिक इच्‍छाओं की विषैली लताएं फैल रही हैं। हरेक मनुष्‍य के विचारों में कुंठा की विषबेलें गहरी जड़ें जमा चुकी हैं। मनुष्‍य केवल दुर्भावनाओं के आधुनिक प्रतीक के रूप में उपस्थित है। मनुष्‍य जीवन की सहजता-सरलता समाप्‍त हो चुकी है। अच्‍छाई और गुणों का ज्ञान मात्र शब्‍दों, परिभाषाओं, भाषणों और पुस्‍तकों तक सिमट गया।    
पिछले दस महीनों में उसने प्रकृति से भी संबंध विच्‍छेद कर लिया। क्‍योंकि सूरज, चांद-सितारे, पेड़-पौधे, धरती-आकाश जैसे प्राकृतिक उत्‍स भी उसकी दृष्टि में नहीं ठहरते। दृष्टि में तो तब ठहरेंगे जब वे उसे स्‍मरण होंगे। वे तो उसकी संस्‍मृतियों में भी नहीं हैं। अब इन प्रकृतियों के प्रति वह आकर्षित नहीं होता। इनसे स्‍वाभाविक अपनत्‍व नहीं बना पाता। उसके विचारों में भी इनके लिए स्‍थान शेष न रहा। उसे न जाने क्‍या हो गया है।
जो व्‍यक्ति ऐसा हो जाएगा भला उसके मुख के भावों को पढ़ना भी कैसे संभव हो सकता है। इसीलिए कोई उसकी दुखी अवस्‍था देखकर भी आश्‍वस्‍त नहीं होता कि वह मानव है और दुखी है। अपने-पराए सभी लोगों की दृष्टि में उसका विचार होता भी होगा या नहीं, इस बात की भी सुध उसे नहीं रहती। वह स्‍वयं में स्‍वयं के लिए जो भी हो परंतु सामान्‍य सोच रखनेवाला कोई भी व्‍यक्ति उसे देख यही सोचेगा कि उसकी अपनी बुद्धि, विवेक और मस्‍तिष्‍क सब खो चुका है।

उसकी स्थिति के बारे में सोचकर लगता कि यदि वह वन में अकेला होता तो अपनी इस स्थिति पर प्रसन्‍न हो रहता। उसे सांत्‍वना के लिए दूसरों से कोई अपेक्षा तो नहीं होती। साथ के लिए किसी मनुष्‍य की इच्‍छा तो न होती। परंतु वह अकेला नहीं। वह जनसागर में डूब रहा है। लोगों की भीड़ और चल-अचल वस्‍तुओं से पटे पड़े संसार, इसकी कठोरता-खोखलाहट के बारे में विचार कर वह त्रस्‍त है। इस स्थिति में उसे अपनी बुद्धि-विवेक-मानस खोने का आनंद नहीं मिलता बल्कि निरंतर घड़घड़ाहट करता भय सताता है। उसका अपने बारे में आजकल संपूर्ण आकलन यही है कि वह एक अवसादग्रस्‍त जीवन के कारा में बंद बुरी तरह छटपटा रहा है।