महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Thursday, August 25, 2016

बुलंदशहर में हुई दुष्कर्म की घटना पर

ह दुर्भाग्‍यशाली ही कहा जाएगा कि देश में होनेवाली हर किस्‍म की दुर्घटनाएं राजनीतिक दलों को अपनी राजनीतिक मंशा पूरी करने का माध्‍यम ही नजर आती हैं। उन्‍हें पीड़ितों से सीधे-सीधे कोई सरोकार नहीं होता। जब सिर पर बन आती है या अपनी राजनीतिक जमीन खिसकने का भय उन्‍हें सताने लगता है तो उनका पुलिस-प्रशासन सचेत होता है। उत्‍तर प्रदेश के बुलंदशहर में हुई बलात्‍कार की घटना को इस संदर्भ में व्‍यापकता से देखा व समझा जा सकता है। नोएडा का एक परिवार अपनी कार में सवार होकर राष्‍ट्रीय राजमार्ग 91 से होते हुए पारिवारिक कार्यक्रम में शामिल होने शाहजहांपुर जा रहा था। रात डेढ़ बजे अपराधियों ने पहले उनकी चलती कार के आगे कुछ फेंका ताकि वे रुक जाएं। पहली बार में तो चालक ने गाड़ी नहीं रोकी। लेकिन दूसरी बार भी जब कार के आगे कोई चीज गिरने की आवाज सुनाई दी तो परिवार आशंकित हो गया और चालक ने कार रोक दी। इतने में पीछे से आई कार से छह-सात आदमी उतरे। परिवार की कार में तीन पुरुष और तीन महिलाएं बैठी थीं। अपराधी उन्‍हें बंदूक की नोक पर राजमार्ग पर‍ स्थित फ्लाईओवर के नीचे संपर्क मार्ग की तरफ ले गए। यहां उन्‍होंने तीनों पुरुषों को कार में बंधक बना लिया और तीन महिलाओं में से दो के साथ सामूहिक बलात्‍कार किया।
                हालांकि बलात्‍कार की यह अकेली घटना नहीं जो राजनीति से लेकर पुलिस-प्रशासन की अकर्मण्‍यता और कारगर व्‍यवस्‍था के अभाव की पोल खोलती हो। इससे पहले भी देशभर में इस तरह की अनेक घटनाएं हुईं और राष्‍ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्‍यूरो के अनुसार तो 2010 से 2014 तक देश में दुष्‍कर्म के मामलों में निरंतर वृद्धि हुई है। यहां सवाल मात्र दुष्‍कर्म का नहीं। दुष्‍कर्म जैसे अपराध तो घर की चाहरदीवार में भी होते हैं। विशेषकर दुष्‍कर्म पीड़ितों के नाते-रिश्तेदार या दोस्‍त ही इसमें लिप्‍त रहते हैं। इस पर पुलिस या प्रशासन प्रत्‍यक्ष रूप से कोई नियंत्रण नहीं कर सकता। ऐसे मामलों को सामाजिक माहौल में सांस्‍कृतिक विचारधाराओं का विकास कर नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन राष्‍ट्रीय, अंतर्राष्‍ट्रीय राजनीतिक और सामाजिक व्‍यवस्‍थाएं आज इस स्थिति में हैं कि विकास के अभिशाप के रूप में उभरी सामाजिक बुराइयां मिटाना उनकी कार्यसूची में है ही नहीं। परंतु इस स्थिति में जब आधुनिकता के बिगड़ते मिजाज से व्‍यक्ति-व्‍यक्ति में मानसिक विकार तेजी से बढ़ रहे हैं, सरकारों को अपनी पुलिसिंग व्‍यवस्‍था में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्‍यकता है। विधान-संविधान और नियम-कानूनों को देश के भीतर सुदूर सुनसान स्‍थानों में घटित होते अपराधों के अनुसार इतना लचीला होना चाहिए कि अपराधियों को तुरंत पकड़कर ऐसे दंड का प्रावधान हो कि अपराध करने से पहले कोई भी व्‍यक्ति दंड के भय के बाबत अवश्‍य विचार करे। यह विडंबना ही है कि जब अपराध की घटनाओं का मीडिया द्वारा व्‍याख्‍यान होना शुरू होता है और जब देश के एक बड़े जनसमूह तक ऐसी घटनाओं की सूचना प्रसारित हो जाती है, तब उस स्‍थान की राज्‍य-व्‍यवस्‍था अपराधियों की धरपकड़ के लिए सक्रिय होती है, जहां अपराध हुआ होता है।
                संविधान के अंतर्गत केंद्र व राज्‍य सरकारों के अधीन जैसी पुलिसिंग प्रणाली की कल्‍पना साठ-सत्‍तर साल पहले की गई थी, उसमें अब बहुत व्‍यापक सुधार की आवश्‍यकता आन पड़ी है। एक आम आदमी की नजर में आज पुलिसिंग कार्यप्रणाली हंसी-ठट्ठे का खेल बन कर रह गई है। खासकर उत्‍तर प्रदेश व बिहार जैसे राज्‍यों के पुलिस बल के सामाजिक और सरकारी कार्यों, दायित्‍वों और नागरिक सुरक्षा के उनके कर्त्‍तव्‍यों की अवधारणा इतनी खोखली हो चुकी है कि वे दिन के कुछ घंटों में बंधुआ श्रमिकों की तरह अपना ड्यूटी रोस्‍टर पूरा कर रहे होते हैं। आज देश में छोटे-बड़े कई तरह के अपराध तेजी से घट रहे हैं। इसके अलावा इंटरनेट और साइबर अपराधों में भी दिनोंदिन वृद्धि हो रही है। परंपरागत अपराधों में तो पुलिस सरकार के दबाव में अपराधियों को देर-सवेर पकड़ ही लेती है लेकिन साइबर अपराधों की जड़ तक पहुंचने और अपराधियों को दबोचने के लिए अभी तक देश का पु‍लिस बल इतना काबिल नहीं हो सका है।
सड़क से लेकर घरों में होनेवाले अपराधों के पीछे न जाने कितने किस्‍म के व्‍यक्तिगत मानसिक विकार होते हैं। इन परिस्थितियों में पुलिस बल को अपराधों की श्रेणियों के अनुसार प्रशिक्षण देकर उन्‍हें और उनके अधिकारों को विकसित करने की जरूरत  है। इतना ही नहीं उनके लिए पुलिसिंग से संबंधित समन्‍नुत साधन-संसाधन भी उपलब्‍ध होने चाहिए। यहां तक कि एक पुलिसवाले की ड्यूटी आठ-दस-बारह घंटे के बजाए चार-पांच घंटे की होनी चाहिए। कहने का तात्‍पर्य यह है कि हरेक पुलिसकर्मी चार घंटे ड्यूटी पर तैनात रहे और बाकी के चार घंटों में उसे शारीरिक व मानिसक रूप से स्‍वस्‍थ, सक्रिय, ऊर्जावान रखने तथा पुलिस कर्त्‍तवयों से संबंधित साहित्‍य पढ़ने को बाध्‍य किया जाए और श्रेष्‍ठ पुलिसिंग का प्रशिक्षण दिया जाए। इस तरह की पुलिसिंग कार्यशालाएं देशभर में अवश्‍य शुरू होनी चाहिए। इस उपक्रम से देश का पुलिस बल तो समन्‍नुत होगा ही होगा साथ में  बेरोजगारी भी दूर होगी, क्‍योंकि चार घंटे का ड्यूटी रोस्‍टर और चार घंटे पुलिसिंग प्रशिक्षण नियत होगा तो एक स्‍थान पर दो व्‍यक्तियों की तैनाती सुनिश्चित हो सकेगी।
अपराधों से बचने के लिए जनता को भी सरकार और पुलिस के साथ जागरूक बनना पड़ेगा। प्राय: देखा जाता है कि लोग स्‍वार्थवश और नागरिक दायित्वों के प्रति उदासीन होने के कारण अपराधों के घटने की पूर्व जानकारी या सूचना को पुलिस के साथ नहीं बांटते। पूर्व में इसके लिए पुलिस और प्रशासन के गलत बर्ताव को दोषी ठहराया जाता था, लेकिन अब जब पुलिस खुद विज्ञापन और सूचनाएं देकर नागरिकों से उनके नाक-कान बनने का आग्रह कर रही हो, तब तो जनता को उन्‍हें सहयोग देना ही चाहिए। इन्‍हीं उपायों को अपनाकर और नियम-अनुशासन बनाकर बढ़ते अपराधों पर नियंत्रण पाने की दिशा में कुछ कदम आगे बढ़ा जा सकता है। हालांकि देश, राज्‍य या समाज को पूर्णत: अपराधमुक्‍त करने के लिए सरकारों को आधुनिकता की विसंगतियों की ओर भी ध्‍यान लगाना होगा। भारत जैसे देश में तो आधुनिकता की विसंगतियां ही नहीं पारंपरिक राजनीति करने के मोहरे जैसे आरक्षण, जाति-धर्म आदि भी अपराधों के अहम कारक हैं। अपराधों पर नियंत्रण पाने में अगर अभी तक कामयाबी नहीं मिली तो इसके लिए भी पारंपरिक राजनीति करने के मोहरे ही जिम्‍मेदार हैं।
समाज में हो रहेे दुष्‍कर्मों, लूटपाट, हिंसा और यहां तक कि आत्‍महत्‍याओं की घटनाओं में भी अपराध घटित होने के प्रथम सूचना विवरण दर्ज करानेे से लेकर अपराधी को पकड़ने तक का समस्‍त कार्य तो पुलिस का है, लेकिन क्‍या अपराध घटित होने की प्रक्रिया में नागरिक, पुलिस, समाज और सरकार सभी की बेईमानी और अकर्मण्‍यता जिम्‍मेदार नहीं? इस बात पर अवश्‍य विचार हो और जितनी जल्‍दी हो सके देश के पुलिस बल को नई शक्तियों, अधिकारों और सुविधाओं से लैस करने की दिशा में काम किया जाए। ऐसा होगा तो हम उम्‍मीद कर सकते हैं कि देश में किसी के साथ कोई भी यूं ही राह चलते दुष्‍कर्म, लूटपाट और दुर्व्‍यवहार करने की जुर्रत नहीं कर सकता।
पूरे देश में लड़कियों और महिलाओं के विरुद्ध लैंगिक भेदभाव और अत्‍याचार भावना दिनोंदिन बढ़ रही है। आशंका है कि कहीं इसकी परिणति आनेवाले वर्षों में समाज के लिए आत्‍मघाती न हो जाए। इस बात का ध्‍यान देशभर के पुलिस-प्रशासन को अवश्‍य रखना होगा। दुष्‍कर्म की घटनाएं देश में एक सतत् अभ्‍यास बन चुकी हैं लेकिन इस पर पूर्ण प्रतिबंध के लिए सरकार, न्‍यायपालिका और पुलिस-प्रशासन की कार्यप्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव बिलकुल नहीं आया। जब तक न्‍याय की सर्वोच्‍च संस्‍था इस संबंध में दुष्‍कर्म पीड़ितों की पीड़ा को अपने विवेक के केंद्र में रख निर्णय नहीं करेगी तब तक इस समस्‍या से छुटकारा मिलना असंभव ही प्रतीत होता है। न्‍यायिक व्‍यवस्‍था भी कहीं न कहीं अपनी धारा की राजनीति के हित के अनुसार चल रही है। या तो न्‍याय व्‍यवस्‍था स्‍वावलंबी बने और पीड़ितों के पक्ष में त्‍वरित और क्रांतिकारी निर्णय ले या उस राजनीति को समाज और खासकर महिलाओं के प्रति सम्‍माननीय दृष्टिकोण अपनाने को विवश करे, जिस राजनीतिक विचारधारा के समर्थन में उसके निर्णय पीड़ितों के प्रतिकूल हो रहे हैं। अन्‍यथा जनजीवन में बलात्‍कार पीड़ित महिलाओं का दर्द अन्‍य सामाजिक अव्‍यवस्‍थाओं और उनसे निकली पीड़ाओं की तरह एक रूटीन बन जाएगा। और यदि किसी लोकतांत्रिक देश में ऐसा होता है तो लोकतंत्र अपने आप में विडंबनात्‍मक और अप्रासंगिक हो जाएगा। हमारे जनप्रतिनिधियों को इस विषय पर अपना न्‍यूनतम विचार तो करना ही चाहिए। माना कि वे बड़ी जिम्‍मेदारी के निर्वहन के लिए अयोग्‍य हैं, पर अपनी विचारशक्ति बढ़ाकर राजनीतिक रूप से योग्‍य हो सकते हैं। फलतउन्‍हें समस्‍याओं को सामान्‍य तरीके से सुलझाने का ही काम नहीं करना बल्कि समस्‍याओं के पैदा होने के कारणों की पड़ताल कर उन्‍हें समूल मिटाने के लिए भी कमर कस लेनी चाहिए।
बुलंदशहर में दुष्‍कर्म की घटना एक मामूली घटना नहीं रही। पूरे दो हफ्ते तक जनसंचार के केंद्र में ठहरी इस घटना के कई अन्‍य वीभत्‍स राजनीतिक और सामाजिक पहलू भी सामने आए। घटना के कुछ दिनों बाद ज्ञात हुआ कि अपराधियों ने दुष्‍कर्म का वीडियो भी बनाया तथा उसके आधार पर पीड़ित परिवार को धमकाने और चुप कराने की पूरी तैयारी उन्‍होंने कर रखी थी। पिछले दिनों केंद्र सरकार ने जब पोर्नोग्राफी पर प्रतिबंध के लिए कड़ा कानून बनाने की पहल की थी तो प्रगतिवाद के कई तथाकथित झंडाबरदारों ने इस पर आपत्ति प्रकट करी और इसे सभ्‍य और आधुनिक समाज के लिए बड़ा रोड़ा बता कर खूब विवाद उत्‍पन्‍न किया था। लेकिन बच्‍चों, युवतियों और यहां तक कि प्रौढ़-वृद्ध स्त्रियों के साथ आए दिन होनेवाली दुष्‍कर्मों की घटनाओं को ध्‍यान में रखते हुए उनकी दलील सरकार के विरोध में थोथी ही प्रतीत होती है। देखा जाए तो समाज के इस तरह के विघटन के लिए वास्‍तविक दुष्‍कर्मी यही लोग हैं। 

विकेश कुमार बडोला

Sunday, August 21, 2016

सोशल मीडिया की शक्ति से परिचित राजग

यह आलेख मूल रूप से दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में
रविवार 21 अगस्‍त 2016  को प्रकाशित हो चुका है।
रविवार 21 अगस्‍त 2016 को दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में
विगत दिनों वित्‍त मंत्री अरुण जेटली ने एक महत्‍त्‍वपूर्ण वक्‍तव्‍य दिया। इसमें उन्‍होंने मंत्रियों और प्रशासकों को सोशल मीडिया पर अपनी बात रखने की खुली छूट दिए जाने के पक्ष में अपने तर्क रखे। उन्‍होंने कहा अगर यह व्‍यवस्‍था शुरू होती है तो इससे शासन के कार्यों में पारदर्शिता आएगी, शासन-प्रशासन की समस्‍त कार्यप्रणाली सुचारू होगी और सर्वोपरि शासन-प्रशासन में कार्यरत् एक व्‍यक्ति को एक सामान्‍य नागरिक के रूप में अभिव्‍यक्ति की वास्‍तविक स्‍वतंत्रता प्राप्‍त हो सकेगी। माइगॉव.इन कम्‍प्‍यूटर एप्लिकेशन की दूसरी वर्षगांठ के अवसर पर वित्‍त मंत्री का ऐसा वक्‍तव्‍य राजग सरकार की स्वच्‍छ और साफ कार्यप्रणाली की ओर संकेत करता है। हाल ही में कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग ने अपनी सेवा शर्तों का नया मसौदा तैयार किया है। इसमें स्‍पष्‍टत: एक प्रस्‍ताव है, जिसमें उल्लिखित है कि शीर्ष सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को खुले तौर पर फेसबुक, ट्विटर और लिंक्‍डइन जैसी सोशल नेटवर्किंग साइटों पर खुद को अभिव्‍यक्‍त करने की छूट हो लेकिन इस मसौदे में सरकार की आलोचना पर प्रतिबंध अभी भी बना हुआ है। मसौदे के नियमानुसार अधिकारियों को टेलीविजन, सोशल मीडिया और किसी अन्‍य संचार माध्‍यम से यहां त‍क कि कार्टून के माध्‍यम से भी सरकार की आलोचना करने का अधिकार नहीं है। कुल मिलाकर इस मसौदे की शर्तों को देखकर सरकार का उद्देश्‍य इस रूप में दृष्टिगोचर होता है कि सरकारी कर्मचारी विभिन्‍न सोशल साइटों पर किसी खास सरकारी निर्णय के लागू होने या कानून बनने से पहले तो उस पर अपने विभिन्‍न मतों को प्रकट कर सकते हैं, सरकार भी जरूरी मतों पर ध्‍यान देते हुए उन्‍हें अपनी सरकारी नीति के नियमों का हिस्‍सा बना सकती है, लेकिन निर्णय हो जाने के उपरांत या कानून बन जाने के बाद सरकारी कर्मचारियों को उसमें मीन-मेख निकालने की अनुमति नहीं दी जाएगी। सरकार के अनुसार सोशल मीडिया‍ विभिन्‍न दृष्टिकोणों, आलोचनाओं, टिप्‍पणियों और सुझावों को सामने रखता है। इसलिए पारदर्शी सरकारी प्रणाली में सोशल मीडियाा पर मंत्रियों और अधिकारियों को अपनी राय रखने देने में कोई समस्‍या नहीं  होनी चाहिए। सरकार का मत है कि इससे परामर्श की प्रक्रिया को बढ़ावा मिलता है। वित्‍त मंत्री ने सोशल मीडिया के लाभ गिनाते हुए बताया कि पहले जनमत या सुझावों के लिए केवल बड़े महानगरों की ओर ही देखा जाता था, लेकिन अब सोशल मीडिया की सहायता से विद्यालयों, महाविद्यालयों, द्वितीय-तृतीय और यहां त‍क कि उससे भी छोटे स्‍तर के शहरों और गांवों से भी किसी सरकारी मत पर लोगों की स्‍वतंत्र राय मिल जाती है। उनका कहना है कि अब युवाओं के पास किसी भी विषय के संबंध में अधिकाधिक सूचनाएं हैं और सरकार का उद्देश्‍य इन के साथ अपनी मानव मशीनरी यानि अधिकारियों और कर्मचारियों का संवाद सुनिश्चित करना है, ताकि उसे जनता के लिए आवश्‍यक नीतियां बनाने में सहायता मिले।
          एक तरफ राजग सरकार सोशल मीडिया के लाभों से उल्‍लसित होकर इससे अपने अधिकारियों और कर्मचारियों को जोड़कर अपनी राजनीतिक दशा-दिशा को मांझना चाहती है और जितना अधिक हो सके जनहितैषी होने में उसे कोई समस्‍या नहीं है तथा दूसरी ओर संप्रग सरकार थी, जिसने अपने घपलों-घोटालों को मुख्‍यधारा के मीडिया में अपनी सांठगांठ के चलते बहुत दबाने की कोशिश की और जब सोशल मीडिया में उसके प्रति देश की जनता आग उगलने लगी, उसके घोटालों को उजागर करते हुए उसे सत्‍ताच्‍युत करने के संकल्‍प करने लगी तो उसने इस पर प्रतिबंध की तैयारी भी शुरू कर दी थी। उस काल में मुख्‍यधारा के मीडिया में जो संप्रग के घोटाले बाद में उजागर होने शुरू हुए, वे भी इस डर से हुए कि कहीं मुख्‍यधारा का मीडिया जनमानस की दृष्टि में हास्‍यास्‍पद और पूरी तरह अनदेखा न हो जाए। इसलिए मुख्‍यधारा के मीडिया ने भी सोशल मीडिया की ताकत को भांपकर अपनी विचारधारा तत्‍कालीन संप्रग सरकार के घोटालों और अवैध गतिविधियों को उजागर करने के रूप में बदलनी शुरू कर दी। इसमें भी वे मीडिया संस्‍थान सुस्‍त रहे जो पूरी तरह या किसी न किसी रूप में कांग्रेसियों, वामदलों और संप्रग के गठजोड़ से चल रहे थे। आज भी यही स्थि‍ति है। कुछ मीडिया संस्‍थान अब सोशल मीडिया के रुख से खुद को संचालित कर रहे हैं। इसी में उनकी भलाई भी है। लेकिन अभी भी कुछ संस्‍थान ऐसे हैं, जो जनता को बेवकूफ समझ कर भ्रम का आवरण फैलाने में लगे हुए हैं। उनकी यही चाल-ढाल रही तो आनेवाले एक या दो सालों में वे पूरी तरह खत्‍म हो जाएंगे।
इस संदर्भ में राजग ने सोशल मीडिया से जुड़ने के संबंध में जो विचार प्रकट किए हैं, वे उसकी स्‍वच्‍छ राजनीतिक छवि और उसके पारदर्शी सुशासन का स्‍पष्‍ट संकेत हैंं। जनमानस को इसे समझना चाहिए।
विकेश कुमार बडोला

Tuesday, August 16, 2016

राजनीति विकासपरक हो विवादास्पाद नहीं

विश्‍व गुरु बनने के लिए किसी भी देश के वासियों की जीवन के प्रति एक स्‍पष्‍ट और सुखद सोच होनी चाहिए। भारत में राजनीतिक मंशाएं नेताओं को यह भाषण देने के लिए तो जरूर प्रेरित करती हैं कि हम तरक्‍की और उन्‍नति करेंगे तथा विश्‍व गुरु बनेंगे परंतु तरक्‍की और उन्‍नति कैसे करेंगे या विश्‍व गुरु कैसे बनेंगे, इस बारे में हमारा सार्वजनिक रूप से कोई ठोस कार्यक्रम नहीं होता। यह आशा की गई थी कि संसद के दोनों सदनों में सांसद मानसून सत्र में देश और जनता के कल्‍याणार्थ आवश्‍यक विधेयकों पर विचार-विमर्श कर इन्‍हें पारित करेंगे। उनसे जनप्रतिनिधि के रूप में यह अपेक्षा है कि वैश्विक रूप से कृत्रिम व प्राकृतिक समस्‍याओं से घिरी दुनिया में वे अपने देश को हर तरह से सुरक्षित रखने की दिशा में काम करेंगे। लेकिन ओछी राजनीति के दम पर सत्‍ता हथियाने वाली क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों के लिए विषय राजकाज नहीं अपितु उन अनावश्‍यक और नगण्‍य मुद्दों पर संसद का ध्‍यानाकर्षण कराना है, जो कहीं भी विचारयोग्‍य नहीं होने चाहिए। विश्‍व में इस समय बड़ा मुद्दा आतंकवाद है। यूरोपीय संघ के कई देश प्रत्‍यक्ष आतंक की चपेट में हैं। अमेरिका, इंग्‍लैंड, फ्रांस, बेल्जियम, तुर्की जैसे विकसित देश और बांग्‍लादेश, पाकिस्‍तान के कारण भारत जैसे देशों में भी आतंकवाद तेजी से पैर पसार रहा है। इसके साथ ही वर्ष के बारह महीनों में विश्‍व के तमाम देशों के साथ भारत भी जलवायु विघटन का शिकार बन रहा है। भूकंप, अतिवृष्टि, तापमान वृद्धि और अप्रत्‍याशित प्राकृतिक असंतुलन से जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। इन परिस्थितियों में देश के जनप्रतिनिधियों को देश-दुनिया और इसके लोगों के प्रति एक समग्र कल्‍याण भावना और मानवीय दृष्टिकोण रखकर काम करने की अत्‍यंत जरूरत है। लेकिन नहीं उनका ध्‍यान अभी भी जातिवाद, नटखटपन से ग्रसित और एकदम नौसिखिया राजनीति करने पर लगा हुआ है।
पड़ोसी देश पाकिस्‍तान के कारण कश्‍मीर में भारत के सामने आतंकवाद से निपटने की बड़ी चुनौती है। इस बाबत भारत ने संयुक्‍त राष्‍ट्र जैसे मंच के माध्‍यम से पाकिस्‍तान को कठोर शब्‍दों में चेतावनी भी दे दी है कि वह भारत के अंदरूनी मामलों में हस्‍तक्षेप न करे और न इसके लिए अपनी आतंकवादी नीति का इस्‍तेमाल करे। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्‍वरूप ने स्‍पष्‍ट रूप से कह दिया कि पाकिस्‍तान गुलाम कश्‍मीर खाली करे। इस चेतावनी से पहले भारत ने भारत-चीन सीमा पर अपने 120 युद्धक टैंक तैनात कर दिए थे। इस क्रिया की प्रतिक्रिया में चीनी सैन्‍य गतिविधि भी सीमा पर बढ़ गई। चीन गुलाम कश्‍मीर के एक भाग और दक्षिण चीन सागर में प्राकृतिक रत्‍नों से पूर्ण समुद्री क्षेत्र को हथियाने के चक्‍कर में है। इसके लिए उसने अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर कई बार प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष रूप से पाकिस्‍तान की आतंकी नीति पर कभी कुछ नहीं बोला, बल्कि चुप्‍पी साध कर ही रखी। वह पाकिस्‍तान के माध्‍यम से भारत पर प्रत्‍यक्ष व परोक्ष युद्ध थोपना चाहता है। चूंकि पाकिस्‍तान और भारत की दुश्‍मनी कई दशक पुरानी है इसलिए चीन दोनों देशों के इस वैमनस्‍य का फायदा उठाकर गुलाम कश्‍मीर के एक  भाग पर अपना दबदबा बनाए रखना चाहता है। मुसलिम मत को सारी दुनिया पर थोपने की भ्रांति से ग्रस्‍त आइएस आतंकवाद का केंद्र बनकर यूरोप से  लेकर एशिया-अफ्रीका तक किसी न किसी रूप में आतंकवाद फैला रहा है। दुश्‍मन देशों के बीच युद्ध की आशंका के मद्देनजर आइएस अपनी आतंकवादी गतिविधियों का इस्‍तेमाल वैश्विक युद्ध भड़काने के रूप में भी कर सकता है।
कहने का तात्‍पर्य यही है कि जब किसी न किसी बहाने पूरी दुनिया तीसरे विश्‍व युद्ध के मुहाने पर खड़ी है और इस कारण विकसित और विकासशील देशों के अलग-अलग विकास संबंधी मानक भी आधुनिकता की उपयोगिता के नहीं बल्कि विसंगति के सूत्रधार बन गए हों, तो ऐसे में किसी देश के भीतर जाति, धर्म, आरक्षण और अनेक दूसरे अनुपयोगी वाद-विवाद में संसद से लेकर सड़क तक शोर होना क्‍या सिद्ध करता है। यह यही बताता है कि अभी हम ठीक से किसी लोकतांत्रिक देश के एक सामान्‍य नागरिक होने की योग्‍यता भी अर्जित नहीं कर पाए हैं।
अपने लिए वर्णसूचक शब्‍दों का इस्‍तेमाल किए जाने पर बौखलाई बसपा नेता मायावती और उनके दल के एक अन्‍य नेता का संसद में किया गया कथन बड़ा विचित्र था। उनके अनुसार अगर उन पर या उनकी राजनीतिक पार्टी पर की गई टिप्‍पणी से दलित लोग आंदोलन करते हैं और देश में बवाल होता है तो इसके जिम्‍मेदार वे नहीं होंगे, इसकी जिम्‍मेदारी केंद्र सरकार की होगी। एक तरह से उनके इस कथन ने उन लोगों को बवाल करने और विधि व्‍यवस्‍था को बिगाड़ने के लिए उकसाया ही है, जिनके वर्णगत प्रतिनिधित्‍व से ऐसे लोग संसद में विराजमान हैं। मायावती और उनकी राजनीति से जुड़े लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि विघटन की बातें करके उनका लोकतांत्रिक जनाधार बढ़ेगा नहीं अपितु घटेगा ही। वे अपनी जाति, विचारधारा और राजनीति से अगर निम्‍नस्‍तरीय सामाजिक वातावरण उत्‍पन्‍न करेंगी, तो दूसरी तरफ जिनसे उनका द्वेष है, वे क्‍या शांत बैठे रहेंगे। वे भी अपने स्‍तर पर अपने राजनीतिक अधिकारों के लिए इनसे उलझेंगे। तो ऐसे में भला लोकतंत्र का अर्थ क्‍या रह जाता है। मायावती जैसे नेताओं को सोचना होगा कि देश में राजनीतिक पद या कद उन्‍हें अधिकार नहीं देता कि वे इसके दायित्‍व, मर्यादा को भूलकर अपना राजनीतिक एकाधिकार स्‍थापित करने में ही लगे रहें। उन्‍हें राजनेता के पद की राजसेवा की अवधारणा को समझना होगा। इसी में उनकी और उनके राजनीतिक अस्तित्‍व की भलाई है।
राजनीति के कई ऐसे रूप देखने को मिल रहे हैं, जिससे लोकतंत्र और संविधान के प्रति अनास्‍था का भाव व्‍यापक होता है। आप पार्टी के सांसद भगवंत मान को ही लें। इन्‍होंने संसद भवन के भीतर का वीडिया बनाकर सोशल मीडिया साइट पर डाल दिया। यह सांसद यह तो जानता ही रहा होगा कि 2001 में भारतीय संसद पर आतंकी हमला हो चुका है। तब एक सांसद के रूप में मान की जिम्‍मेदारी क्‍या बनती थी और उन्‍होंने क्‍या किया, इस पर उन्‍हें अवश्‍य विचार करना चाहिए। इस घटना के बाद उन्‍हीं की ही पार्टी से निलंबित सांसद हरिंंदर सिंह खालसा ने तो मान के बारे में कह दिया कि वे संसद में मदिरापान करके आते हैं और उनसे मदिरा की दुर्गंध आती है। खालसा ने बताया कि उन्‍होंने लोकसभा अध्‍यक्ष को संसद में अपनी सीट मान से अलग करने के लिए आवेदन पत्र भी दिया हुआ  है। जनतंत्र में जहां हमसे संसद और संविधान के प्रति सम्‍मान और आदर करने को कहा जाता है, वहां यदि मान जैसे व्‍यक्ति जनप्रतिनिधि होंगे तो देश की दशा-दिशा कितनी खतरनाक होगी, यह कल्‍पना ही अपने आप में घिनौनी है। कहां तो मानसून सत्र में वस्‍तु एवं सेवा कर विधेयक सहित कई अन्‍य महत्‍वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा होनी थी और इसके बाद इनके पारित होने की कामना की जा रही थी और कहां मानसून सत्र के पहले कुछ दिन ही निरर्थक मुद्दों में घिसट गए।   
देश के नेताओं को समझना और सोचना होगा कि सांसद-विधायक बन जाना हर्षातिरेक, प्रफुल्‍लता और मनमानी का ही विषय नहीं है। जनप्रतिनिधित्‍व ग्रहण करने का अर्थ है जनता के दैनिक जीवन के लिए समय-काल-परिस्थिति के अनुसार काम करना। अगर सही जनप्रतिनिधि होगा तो भारत जैसी जीवन-परिस्थितियों में तो उसे राजनीति में विभिन्‍न प्रकार के जनकल्‍याणकारी कामों से मरने की फुर्सत नहीं होनी चाहिए। जनता के लिए काम करने के हिसाब से भारतीय भूभाग में सांसद-विधायक बनना अभी आराम का मामला तो किसी भी कोण से नहीं है। अगर कभी ऐसे जनप्रतिनिधियों को विवश होकर या कानून की बाध्‍यता से निर्धारित जनकल्‍याणकारी काम समय पर पूरा करने को कहा भी आएगा, तो वे इतने चिंताग्रस्‍त हो जाएंगे कि फौरन पदमुक्‍त होने का अनुरोध करने लगेंगे। क्‍योंकि कामकाजी और खासकर ईमानदारी से काम करनेवाले राजनेता के सामने इतने सार्वजनिक विकास कार्यक्रम हैं कि वह अपने एक कार्यकाल में तो इन्‍हें, कितना ही परिश्रम कर ले, पूरा नहीं कर सकता। अब जाति, धर्म, समुदाय आदि निरर्थक मानसिक विकारों में बंटी राजनीतिक धारा को तिलांजलि देने का समय आ गया है। हम सब सोचें तो सही कि विकास का वास्‍तविक तात्‍पर्य है क्‍या। विकास भवनों, सड़कों और भौतिक सुविधाओं तक ही सीमित न हो। उसे व्‍यक्तिगत भावनाओं तक ले जाना होगा और उस से बढ़कर राजनीतिक नीतियों में अंतर्निहित करना होगा। यह सब करने के लिए हमें और हमारे राजनेताओं को चमत्‍कार करने की आवश्‍यकता नहीं, बल्कि अपनी-अपनी मानवीय अंतदृष्टि में राजनीति को एक नवीन और सर्वथा इसके मौलिक स्‍वरूप में देखने की जरूरत है।  
इसलिए हमारे राजनेताओं को अब अपने वैचारिक और राजनीतिक दृष्टिकोण में तत्‍काल परिवर्तन करना चाहिए। यदि वे प्रतिपल जनता के प्रति दायित्‍व-भाव से बंधे रहेंगे तो निश्चित रूप से फि‍र कभी ऊल-जुलूल मुद्दों में नहीं उलझेंगे और ना ही इन पर वाद-विवाद करेंगे। उन्‍हें वैश्विक परिप्रेक्ष्‍य में अपने देश को आगे बढ़ाने और संतुलित विकास पथ पर अग्रसर करने के लिए ही प्रयासरत रहना चाहिए। तभी जनता में उनकी भावनात्‍मक स्‍वीकार्यता हो सकेगी। देश की मुख्‍यधारा की राजनीति में शामिल ऐसे तथाकथित नेताओं को यह विचार भी अवश्‍य करना चाहिए कि विश्‍व में व्‍याप्‍त प्राकृतिक और मानवजनित कृत्रिम समस्‍याएं इस सीमा तक बढ़ रही हैं कि उनके निराकरण पर ही ध्‍यान लगाकर लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था और इसके अंतर्गत निर्धारित सांसद-विधायक पदों को बचाए रखा जा सकता है। इसके अलावा उनके पास कोई चारा नहीं है। 
विकेश कुमार बडोला

Thursday, August 11, 2016

आतंक के कारण अफस्पा की जरूरत तो आए दिन बढ़ ही रही है इसे हटाने का तो प्रश्न ही नहीं उठना चाहिए

यह अालेख मूल रूप से 12 जुलाई 2016 को 
दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित हो चुका है। 
र्वोच्‍च न्‍यायालय के न्‍यायधीशों ने जोर देकर कहा है कि भारत के पूर्वोत्‍तर राज्‍य मणिपुर में कभी युद्ध जैसी स्थिति पैदा ही नहीं हुई। न्‍यायाधीशों की यह टिप्‍पणी किसी संगठन की तरफ से प्रस्‍तुत जनहित याचिका में मणिपुर में सन् 2000 से 2012 के बीच हुई 1528 मुठभेड़ों को फर्जी बताने के बाद आई। एमबी लोकुर और यूयू ललित की पीठ ने इन फर्जी मुठभेड़ों की गहनता से जांच करने के आदेश देते हुए अफस्‍पा कानून और इसके प्रयोग पर ऐसी टिप्‍पणियां कीं, जिनसे इन क्षेत्रों में होनेवाली देशविरोधी गतिविधियों को प्रत्‍यक्ष झेलनेवाले लोग कभी सहमत नहीं हो सकते। जजों ने सीमांत प्रदेशों और पूर्वोत्‍तर राज्‍यों में सशस्‍त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (अफस्‍पा) के अंतर्गत सशस्‍त्र बल या पुलिस द्वारा अतिवादियों पर ‘ज्‍यादा या जवाबी ताकत’ के इस्‍तेमाल को गलत बताया। कोर्ट के अनुसार, ‘‘राज्‍य में कानून व्‍यवस्‍था आंतरिक अव्‍यवस्‍था जैसी है। इससे देश की सुरक्षा को या देश को युद्ध होने या बाहरी आक्रमण या सशस्‍त्र विद्रोह का खतरा नहीं है। आतंरिक गड़बड़ी पर काबू पाने के लिए सशस्‍त्र बल को प्रशासनिक व्‍यवस्‍था की सहायता में तैनात किया जा सकता है। सशस्‍त्र बल ना‍गरिक प्रशासन का अधिकार अपने हाथ में नहीं ले सकता है, बल्कि उसकी मदद कर सकता है। इसका कारण यह है कि स्थिति सामान्‍य रूप से बहाल करने के लिए उसे तैनात किया जाता है। सच्‍चाई जानना अनिवार्य है ताकि कानून न्‍याय के साथ खड़ा दिखे। सच्‍चाई के लिए इसका पता लगाया जाएगा कि मुठभेड़ हुई या नहीं। और यदि हुई तो मानवाधिकार उल्‍लंघन किसने किया, पीड़ित के आश्रित के संग कैसी संवेदना जताई गई तथा इसके लिए क्‍या कदम उठाए गए। मणिपुर में आतंरिक गड़बड़ी 1958 से है। इसे करीब 60 वर्ष बीत चुके हैं।’’
मणिपुर में दशकों से लागू अफस्‍पा के संदर्भ में न्‍यायालय को अब सच्‍चाई जानने की जरूरत महसूस हुई तो यह बड़ा अजीब प्रतीत होता है। किसी भी राज्‍य की प्रशासनिक व्‍यवस्‍था अगर इतनी मजबूत होती तो केंद्र सरकार को इतने सुरक्षा बलों की इकाइयां खोलने की आवश्‍यकता ही क्‍या थी! मणिपुर राज्‍य के शासन-प्रशासन के सहयोग से जन-जन के लिए विकास कार्यक्रमों के क्रियान्‍वयन की अधिकता होती तो ऐसे बलों को विकास कामों में सहयोग देने के लिए निर्देशित किया जाता। लेकिन सब जानते हैं कि देश के राज्‍यों में शासन-प्रशासन की व्‍यवस्‍था की स्थिति क्‍या है। किसी भी राज्‍य की प्रशासनिक व्‍यवस्‍था उस राजनीतिक दल के हिसाब से तय होती है, जो वहां राज करता है। जैसे कांग्रेस, वाम और क्षेत्रीय राजनीतिक दल कभी नहीं चाहेंगे कि उनके राज्‍य में चिन्‍हित मु‍सलिम आतंकवादियों को पकड़ने के लिए वह अपने प्रशासन का इस्‍तेमाल करे, क्‍योंकि ऐसे राजनीतिक दल अधिकांशत: मुसलिम मतों से ही सत्‍ता प्राप्‍त करते रहे हैं। और मुसलिम बाहुल्‍य राज्‍यों में नियम-कानून और सामाजिक स्थितियां कैसी हैं, यह अब छुपी हुई बात नहीं रही। इसलिए अफस्‍पा की जरूरत इस देश में बहुत ज्‍यादा है। और यह जरूरत दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है। ना केवल सीमांत व पूर्वोत्‍तर राज्‍यों बल्कि हर उस राज्‍य में जहां मुसलिम वोट बैंक से राजनीतिक दल सत्‍ता हासिल कर रहे हैं, कर चुके हैं या करेंगे।
भले ही माननीय न्‍यायाधीशों सहित अन्‍य धन-साधन संपन्‍न लोगों को सुविधाओं के बीच जीवनयापन करते हुए कानून का शासन सुचारू दिखता हो, लेकिन वस्‍तुस्थिति उसे ही पता चलती है जो ऐसे क्षेत्रों में अपने दिन-रात गुजारता है। शीर्ष न्‍यायालय अफस्‍पा को निष्‍प्रभावी करने की मांग करनेवाली याचिका पर भी सुनवाई करते हुए क्‍या आए दिन जम्‍मू एवं कश्‍मीर में हो रही हिंसक झड़़पों और अतिवादियों के सुरक्षा बलों पर होनेवाले हमलों का संज्ञान नहीं ले रही? क्‍या मणिपुर के अतिवादियों का कश्‍मीर के अतिवादियों से अतिवाद फैलाने के लिए कोई संपर्क नहीं होता होगा? तो इन हालातों में मणिपुर में अफस्‍पा की जरूरत को खत्‍म करने की बात करना देशहित में कहां तक न्‍यायसंगत बैठता है?
न्‍यायाधीशों द्वारा इस विषय पर की गईं सारी टिप्‍पणियां राजनीतिक पूर्वाग्रह से ग्रस्‍त हैं। सर्वप्रथम गड़बड़ी वाले इलाका के स्‍थान पर न्‍यायाधीशों को सीधे टिप्‍पणी करनी चाहिए कि मुसलिम बहुल बस्‍ती। यदि मुसलिमों की स्‍थानीय जनसंख्‍या अधिक है तो जाहिर है उनके वोट से ही राजनीतिक दल सत्‍ता हासिल कर पाया। हमारे सामने प्रत्‍यक्ष उदाहरण है कि अवैध मुसलिम वोटरों की मेहरबानी से सत्‍तासीन होनेवाले राजनीतिक दल कालांतर में मुसलिम आतंकवादियों, नकली मुद्रा-मदिरा-मादक पदार्थों का कारोबार करनेवाले मुसलिम घुसपैठियां का खूब सहयोग करते हैं। इस क्रम में समस्‍त लोकतांत्रिक नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ती रही हैं।
आज पूरी दुनिया आतंकयुद्ध की चपेट में है। भारत जैसे देश तो आतंक की विभीषिका को झेलते हुए इसके मर्माहत भुक्‍तभोगी बन चुके हैं। आए दिन कोई न कोई देश आतंकवादियों की हिंसा में उलझता ही जा रहा है। ऊपर से विडंबना यह कि सैन्‍य शक्ति से पूर्ण देश इस अनुत्‍पादक विषय यानी आतंकी नौटंकी को सिर्फ इसलिए बर्दाश्‍त कर रहे हैं क्‍योंकि उन्‍हें धर्मनिरपेक्ष होने के सिद्धांत पर खरा उतरना है। चाहे इसके लिए उन्‍हें अपने राष्‍ट्रीय धर्म या अधिकांश व्‍यक्तियों की धार्मिक भावनाओं को ठेस क्‍यों न पहुंचानी पड़े। अधिकांश देश आतंक के संपूर्ण सफाए से इसलिए हिचक रहे हैं क्‍योंकि इसमें मुसलिम समुदाय के लोग लिप्‍त हैं और उन्‍हें डर है कि आतंकवादियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने से दुनियाभर के मुसलिमों में गलत संदेश जाएगा। मतलब दुनिया के देशों की सारी कवायद अब यही है कि मुसलिम धर्म के सार्वभौमिक प्रसार के लिए जो आतंकवाद फैल रहा है, उससे धर्म के नाम पर न निपटकर केवल आतंकवाद के आधार पर निपटा जाए। जबकि दुनिया के सशक्‍त राष्‍ट्रों को यह सोचना चाहिए कि आतंकवाद के सफाए के लिए जब तक इसके धार्मिक कारण को केंद्र में रखकर विचार नहीं किया जाएगा तब तक आतंकी हिंसा को बिलकुल नहीं रोका जा सकता। भारत सहित दुनिया के देशों का यह कोरा भ्रम ही है कि विकास की बातें और काम करके आतंकवाद सहित सभी वैश्विक दुश्‍वारियों पर नियंत्रण पाया जा सकता है।
अभी ज्‍यादा देर नहीं हुई। मानव व मानवीयता के अस्तित्‍व के लिए अब देश-दुनिया में यह धारणा स्‍पष्‍ट हो जानी चाहिए और स्‍वीकार भी होनी चाहिए कि ज्‍यादातर आतंकवादियों की धार्मिक एकाधिकार की लालसा कभी खत्‍म नहीं हो सकती। जब तक इस धार्मिक एकाधिकार लालसा पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जाएगा, कुंठित आतंकवादी विश्‍व को निरंतर आत्‍मघाती राह पर धकेलते रहेंगे।
            सीमा क्षेत्र के प्रदेशों और पूर्वोत्‍तर प्रदेशों के अलावा अब तो बिहार व उत्‍तर प्रदेश जैसे राज्‍यों में भी मुसलिम धार्मिक स्‍वीकार्यता को असभ्‍यता और अहंकार के बूते सारे समाज पर थोपने का कुचक्र साफ-साफ दिखाई देता है। जो काम पहले अप्रत्‍यक्ष तरीके से होता था तथा जिसे आम आदमी तत्‍काल समझ नहीं सकता था, वह अब खुले आम हो रहा है और इस तरह हो रहा है कि स्‍थानीय पुलिस, शासन-प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठे रह जाते हैं और मुसलिम गुंडागर्दी अपने मंसूबों को आराम से अंजाम तक पहुंचा देती है। कैराना और कांधला जैसे मामले अभी इस संदर्भ में ताजातरीन उदाहरण हैं।
ऐसी परिस्थितियों में सर्वोच्‍च न्‍यायालय की इस तरह की टिप्‍पणी दर्शाती है कि न्‍यायिक अवधारणाएं भारत के भौगोलिक वातावरण की वा‍स्‍तविकता से दूर मात्र सजावटी और जिल्‍दसजी पुस्‍तक में उद्धृत संवैधानिक धाराओं से ही संचालित हैं। संविधान एक काल विशेष की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार तैयार होना चाहिए। संविधान निर्माता अपने काल में कहीं भी यह उद्धृत करके नहीं गए कि कालांतर में अगर सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक-पर्यावरणीय स्थितियां आत्‍मघाती होने लगें तो संविधान में संशोधन मत करना। संविधान को कालखंड के हिसाब से लचीला होना चाहिए। और इसलिए इस समय संविधान को वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार तुरंत बदल दिया जाना चाहिए।
अफस्‍पा हटाने के बारे में न्‍यायालय जिस जनहित की बात कर रहा है, वह यहां आकर भी जुड़ता है कि इस दौरान कितने ही सैन्‍यकर्मी भी आंतकी मुठभेड़ों में शहीद हो गए। कोर्ट इस मामले में मुसलिम देशों के चंदों पर पल रहे ऐसे गैर-सरकारी संगठनों की जनहित याचिका पर क्‍यों त्‍वरित कार्रवाई करता है, जो भारत में कार्यपालिका के देशहितैषी निर्णय (अफस्‍पा लगाने) को न्‍यायपालिका में चुनौती देता है। और न्‍यायपालिका भी बहुलांश लोगों की देशभक्ति का संदर्भ भूलकर केवल आंतक व आतंकियों अथवा अप्रत्‍यक्ष रूप से उनके हितैषी स्‍थानीय लोगों के बचाव में ऐसी परिस्थिति में प्रभावी कानून को ही कठघरे में खड़ा कर देती है। ज्ञात होना चाहिए कि तीस्‍ता सीतलवाड़ जैसे समाज सेवियों के गैर-सरकारी संगठन को भी देशविरोधियों, आतंकवादियों और इनके समर्थकों का मुकदमा लड़ने के लिए भारी चंदा मुसलिम देशों से मिलता रहा है। राजग सरकार ने अब ऐसे संगठनों पर प्रतिबंध लगाना शुरू कर दिया है।
अफस्‍पा को मजबूती से लागू करने के मामले में यह तर्क सटीक है कि जब जाकिर नाईक से जैसे लोग धार्मिक कट्टरवाद पर प्रवचन देते हुए भारत में रहकर भारत की जड़ खोदने का काम कर रहे हैं और यदि किसी दिन इन्‍हें देशद्रोह के आरोप में पकड़कर कारागार में डाल दिया जाता है और तब इनके समर्थकों को सरकारी काम में बाधा उत्‍पन्‍न करने के लिए मुठभेड़ में मार गिराया जाता है तो यह फर्जी मुठभेड़ किस आधार पर होगी भला। और क्‍यों इस संदर्भ में अफस्‍पा हटाने की बात उठनी चाहिए। आखिर सर्वोच्‍च न्‍यायालय चाहता क्‍या है!
हिंसा होने की चिंता से अलगाववादियों को मारने पर रोक नहीं होनी चाहिए। दुनिया से जब एक से बढ़कर एक लोकोपकारी लोग चले गए और आज के लोग उन्‍हें भूलकर स्‍वार्थ सिद्धि में ही लगे हुए हैं तो आतंकवादियों के बारे में दया, सद्भावना, अहिंसा और विकास जैसे शब्‍दों के छलावे कर उन्‍हें क्षमादान देने की बात करना ही शासकों की मूर्खता है। अगर आतंकी किसी भी रूप में इस दुनिया में नहीं रहेंगे तो दुनिया के लिए यह वरदान ही होगा। जहां भारत सहित दुनिया के ज्‍यादातर देशों को जलवायु परिवर्तन से हो रही आपदाओं पर नियंत्रण के लिए चिंतन-मंथन कर अपना मौसमीय ज्ञान-विज्ञान बढ़ाना चाहिए था, अतिवृष्टियों-सूखा-बाढ़ आदि से संसार को मुक्‍त करने की चिंताओं से विचलित होना चाहिए था, वहां वैश्विक राष्‍ट्रनीतियों के केंद्र में पूरी तरह अनुत्‍पादक विषय आतंकवाद है।
सभी देश इतने संसाधन संपन्‍न हैं तब भी अपने-अपने देशों में वे आतंक को जड़मूल नष्‍ट नहीं कर पा रहे तो इसका एकमात्र कारण सत्‍ता के लिए मुसलिम ‘‘मत’’ को सुरक्षित रखकर सत्‍तासीन होने की आत्‍मघाती लिप्‍सा ही है। तो क्‍या ये समझा जाए कि जो मुसलमान नहीं हैं, उन्‍हें जीवनभर इनके आतंक और इनकी नौटंकियों पर ही अपना चिंतन केंद्रित करना पड़ेगा? क्‍या दुनिया में इसके अलावा गैर-मुसलमानों के पास कोई अन्‍य काम नहीं?
            दुनिया में हिंदू, सिख, ईसाई, आदि धर्म क्‍या व्‍यर्थ या निरर्थ हैं? यदि इन धर्मों को माननेवाले शांतिपूर्ण तरीके से जीवन जी रहे हैं, तो क्‍या मुसलिमों को इस एकमात्र आधार पर ही पूरी दुनिया को आतंक के दलदल में धकेलने की छूट दी जा सकती है? दुनिया में कायदा तो ये होता कि जो धर्म मानवता की जितनी सेवा करता या अपने युवाओं को आदर्श व सभ्‍य बनाने का जितना प्रयत्‍न करता उसे ही महिमामंडित किया जाता। लेकिन नहीं, यहां तो हिंसा के पोषक और उसमें प्रत्‍यक्ष भागीदारी करनेवाले धर्म के आतंकवादी नि‍तदिन खबरों में बने हुए हैं। दुनिया में जितने भी विद्वान हैं उन्‍हें मैं ठोक-बजाकर कहता हूं कि अगर आतंकवाद पर यूं ही अपूर्ण व आधी-अधूरी कार्रवाई की जाती है अथवा आतंकियों के उत्‍पात पर ऐसे ही चुप्‍पी बनाए रखी गई तो वह दिन दूर नहीं होगा जब आधुनिकता व विज्ञान की सभी अवधारणाओं के आधार पर संपन्‍न होने का दम भरती दुनिया के ऊपर इसलाम थोप दिया जाएगा। ऐसे में आतंक का विरोध करनेवाले सज्‍जन मुसलमानों के पास भी इसलाम थोपनेवालों के साथ जाने के अलावा कोई चारा नहीं होगा। इससे वे चिंतित नहीं होगें। उन पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। इससे एक तरह से उनके मन की मुराद ही पूरी होगी कि उनका धर्म गाहे-बगाहे पूरी दुनिया में कुबूल हो चुका है। और अगर ऐसा होगा तो फि‍र दुनिया को खत्‍म होने से कोई नहीं बचा जा सकता। प्राकृतिक आपदाओं से पहले ही दुनिया खत्‍म हो जाएगी।
आर्म्‍ड फोर्स स्‍पेशल प्रोटेक्‍शन एक्‍ट (अफस्‍पा) को हटाने की बात करनेवाले सर्वोच्‍च न्‍यायालय के न्‍यायाधीश शायद भूल रहे हैं कि हरियाणा में जाट आंदोलन, उत्‍तर प्रदेश के आगरा में रामवृक्ष यादव की गुंडई तथा कैराना-कांधला से हिंदुओं द्वारा बहुसंख्‍या में पलायन के पीछे अप्रत्‍यक्ष आतंकवाद ही है। इसके अलावा जम्‍मू एवं कश्‍मीर में पाकिस्‍तान के हिमायती मुसलिम समूहों व उनके नेताओं की हिमायत करनेवाले मुसलिम युवाओं द्वारा आए दिन सुरक्षा बलों पर परोक्ष युद्ध जैसे हमले करने की घटनाएं भी हमारे सामने हैं। क्‍या इन घटनाओं को स्‍थानीय पुलिस-प्रशासन नियंत्रित कर सकता है? नियंत्रण की बात छोड़ दीजिए, स्‍थानीय पुलिस या शासन-प्रशासन तो इन घटनाओं पर सिर्फ लीपापोती करता आया है। पुलिस-प्रशासन कहीं न कहीं ऐसे अतिवादियों का समर्थन ही करता है क्‍योंकि उसे उन राजनीतिज्ञों का आदेश मानना पड़ता है, जो ऐसे ही अतिवादियों के समर्थन से जीतकर सत्‍तासीन हुए होते हैं।
 इन स्थितियों में लगता है कि शीर्ष न्‍यायालय के न्‍यायाधीशों के निर्णय किन्‍हीं राजनीतिक प्रतिनिधियों की राज-प्रतिष्‍ठा करने और लोकतंत्र में उनके रसातल से ऊपर उठने की सीढ़ी के रूप में होते आए हैं। कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि शीर्ष न्‍यायालय के कुछ न्‍यायाधीश भी अपने निर्णय लोकतंत्र के सर्वोपरि लोकहित को धयान में रखकर नहीं अपितु अपनी न्‍यायाधीश के रूप में नियुक्ति के एहसान का बदला चुकाने की व्‍यक्तिगत स्थिति को ध्‍यान में रखकर करते हैं। इसीलिए वे अफस्‍पा के महत्‍त्‍वपूर्ण कानून को हटानेवाली तथाकथित जनहित याचिका पर इतना गंभीर हो जाते हैं कि अधिकांश भारतीयों के दृष्टिकोण में न्‍याय व्‍यवस्‍था को ही हास्‍यास्‍पद बनाकर छोड़ देते हैं।
विकेश कुमार बडोला

Tuesday, August 9, 2016

आतंकी हमलों में जान गंवाते जवानों का जीवन-मोल कब समझेंगे हम

यह आलेख लघु रूप में रविवार 3 जुलाई 2016 को दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित हुआ था। स्‍वतंत्रता दिवस के अवसर पर सैन्‍यकर्मियों को समर्पित करने हेतु इस समग्र आलेख को यहां डाल रहा हूँ।  
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ह फरवरी 2016 की बात है, जब पंपोर के उद्यमिता विकास संस्‍थान में घुस आए आतंकियों को मारने के लिए केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 5 जवान शहीद हो गए थे। उस समय तक एक-डेढ़ वर्ष के अंतराल में भारत पर पाकिस्‍तान की ओर से यह चौथा-पांचवा बड़ा आतंकी हमला था जिनमें हमने निरंतर अपने जवानों को खोया। लेकिन यह सिलसिला रुक नहीं रहा है। पंपोर एक बार फि‍र सैनिकों के रक्‍त से रंजित हुआ। एक बार फि‍र भारत सहमा हुआ है कि कब तक उसके सैनिकों के प्राण व्‍यर्थ ही जाते रहेंगे। विगत शनिवार को पंपोर पुन: 8 भारतीय जवानों की कीमती जिंदगी को आतंकवादियों के घात लगाकर किए गए हमले में लील गया। इस बार केरिपुब के सैनिक गश्‍त लगाकर अपने मुख्‍यालय लौट रहे थे। स्‍थानीय मसजिद में छुपे हुए आतंकवादियों ने सैनिक गश्‍ती दल पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाईं। इस हमले में जब तक सैनिक जवाबी हमला कर पाते, तब तक 8 जवान शहीद हो चुके थे। हमले में 21 जवान बुरी तरह से घायल हैं और जिंदगी व मौत के बीच झूल रहे हैं। सैनिकों के जवाबी आक्रमण में दो आंतकवादी भी मारे गए। लश्‍कर-ए-तैयबा के प्रवक्‍ता गजनवी ने फोन पर इस हमले की जिम्‍मेदारी लेते हुए आने वाले दिनों में आतंकी हमले तेज करने की धमकी दी है। उल्‍लेखनीय है कि दो जुलाई से श्री अमरनाथ यात्रा शुरू हो रही है। स्‍पष्‍ट है कि इस तरह के आतंकी हमलों से पाकिस्‍तानी आतंकवादी हिन्‍दू धार्मिक यात्रा को हतोत्‍साहित करने के लिए कश्‍मीर घाटी में डर का वातावरण बनाना चाहते हैं। इस माह आंतकवादियों का सुरक्षा बलों पर यह दूसरा हमला है। तीन जून को बिजबिहाड़ा में सीमा सुरक्षा बल के दल पर आतंकी हमले में तीन जवान शहीद हो गए थे। कुल मिलाकर बीते चार वर्ष के दौरान श्रीनगर के बाहरी क्षेत्र में राष्‍ट्रीय राजमार्ग पर सुरक्षाबलों के दल पर यह दूसरा बड़ा हमला है। इससे पहले 24 जून 2013 को तत्‍कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के घाटी आगमन से पूर्व हैदरपोरा में भी आतंकी हमले में 9 सैन्‍यकर्मी शहीद हो गए थे।
            यह सब लिखते हुए खुद सहित पूरे भारतीय शासन-प्रशासन पर बहुत अचरज हो रहा है, जो आंतकवादियों की ओर से लगातार घात लगाकर किए जा रहे हमलों में अपने सैनिकों के कीमती जीवन गंवाते हुए देखने के सिवा कुछ नहीं कर रहा। सैनिकों की मौत पर राजनीतिज्ञों और जनता को गहन दुख नहीं होता। आधुनिक, अधिकांश भारतीय जनमानस उनकी जीवन परिस्थितियों के बारे में गंभीरता से नहीं सोच पाता। यह इसलिए क्‍योंकि हमारे यहां सिविल सोसायटी में यह वैचारिक कुंठा जड़ जमाए हुए है कि यदि सैनिकों पर ज्‍यादा सरकारी खर्च हो रहा है तो उन्‍हें देश के लिए लड़ना और मरना ही पड़ेगा। लेकिन अभी तक यह नागरिक समाज सैनिकों, देश के लिए उनकी अहम जरूरतों और उनकी जीवन-परिस्थितियों के बारे में अपनी दूसरी दृष्टि विकसित नहीं कर पाया। इन्‍हें यह अवश्‍य सोचना-विचारना चाहिए कि ज्‍यादा सरकारी खर्च के बाद देश की सुरक्षा के लिए तैयार सैनिक का जीवन आए दिन होनेवाली आतंकवादियों मुठभेढ़ों में यूं ही व्‍यर्थ न जाए। बल्कि नागरिकों को यह समझ रखनी चाहिए कि आए दिन होनेवाली ऐसी आतंकी मुठभेढ़ों की चुनौतियों से हमारे सैन्‍यकर्मी घायल हुए बिना ही निपट सकें, उनके मूल्‍यवान प्राण बचें रहें और वे भारत व भारतीयों की सुरक्षा के लिए अत्‍यधिक समर्पण भावना के साथ सीमाओं पर डटे रहें। नागरिकों का इस तरह का अभिबोध सरकार और शीर्ष सैन्‍य तंत्र पर सैन्‍यकर्मियों के लिए ऐसी सुरक्षा व्‍यवस्‍था करने का दबाव अवश्‍य बना सकेगा, जिसमें वे दुश्‍मनों को मारने के बाद स्‍वयं को भी सुरक्षित रख सकें। अपने सैनिकों के लिए सरकार और जनता को ऐसी सोच रखनी चाहिए। इस सोच के साथ मजबूत होकर खड़ा रहना चाहिए। इसके बाद निश्चित रूप से खतरनाक से खतरनाक आतंकी हमलों या आसन्‍न युद्ध संकट के दौरान भी हमारे सैनिक शौर्य और पराक्रम का अभूतपूर्व प्रदर्शन कर सकेंगे। सैनिकों के लिए जनता के इस मूलभूत भावना-प्रदर्शन के बाद अवश्‍य ही केंद्र सरकार और शीर्ष सैन्‍य तंत्र को यह आभास होगा कि राष्‍ट्र की सीमाओं के प्रहरियों, हमारे वीर सैनिकों को हर प्रकार के आतंकी या दुश्‍मन के हमलों के दौरान ऐसे अस्‍त्र-शस्‍त्र, सैन्‍य वर्दी और अन्‍य सुरक्षात्‍मक उपकरण उपलब्‍ध कराए जाएं जो उन्‍हें किसी भी कीमत पर सुरक्षित, जीवित रख सकें।
            विडंबना ही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सद्भावना कूटनीति भी पाकिस्‍तान सरकार को भारत विरोधी आतंकी गतिविधियां रोकने के लिए प्रोत्‍साहित नहीं कर पा रही। मोदी अपनी सरकार के शपथ-ग्रहण समारोह में पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को बुलाते हैं। मोदी तीन-चार देशों की यात्रा के बाद वापसी के समय लाहौर जाते हैं। उनका उद्देश्‍य भारत सरकार की पुरानी राजनीतिक और कूटनीतिक विरासत से अलग दुश्‍मन देशों से नए तरीके से रिश्‍ते सुधारने का था। इतने प्रयासों के बाद भी पाकिस्‍तानी शासक भारतीय मंशा को गंभीरतापूर्वक नहीं लेता। पाकिस्‍तान में आतंकवादियों को शरण देकर उन्‍हें भारत के साथ युद्ध करने के लिए जो प्रशिक्षण मिलता है, उसमें पाकिस्‍तानी सरकार और जनता के साथ-साथ चीन का भी बड़ा सहयोग है। अब यह तो स्‍पष्‍ट हो ही चुका है कि चीन एशिया प्रशांत में भारत के आर्थिक-सामरिक रूप से बड़ी शक्ति बनने की राह में रोड़े अटकाने के लिए पाकिस्‍तानी आतंकवादियों और वहां की धरती का इस्‍तेमाल कर रहा है। कभी वह मुंबई और पठानकोट हमलों के पाकिस्‍तानी आतंकी मुखियाओं को भारत के साक्ष्‍य के बावजूद अंतर्राष्‍ट्रीय बिरादरी में अपने वीटो पॉवर का इस्‍तेमाल कर छुड़वा देता है तो कभी परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में भारत की सदस्‍यता का तीखा विरोध करता है। इतना ही नहीं, वह हिन्‍दू राष्‍ट्र नेपाल की राजनीति का रुख भी मोड़ता है और भावनात्‍मक रूप से पूरी तरह हिंदू एक राष्‍ट्र को जबरन संवैधानिक रूप से धर्मनिरपेक्ष बनाने में भी बड़ी भूमिका का निर्वहन करता है। नेपाल में कुछ दिनों पूर्व हुई सत्‍ता उठापटक को क्‍या संज्ञा दी जाएगी, यह समझने के लिए नेपाल की नहीं अपितु चीन की राजनीतिक दृष्टि भांपने की अत्‍यंत जरूरत है। यह उसी का षड्यंत्र था जो उसने नेपाल में भारतीय संस्‍कृति और धर्म के राजनीतिक प्रतिनिधियों को आर्थिक रूप से सुदृढ़ करने का लालच देकर धर्मनिरपेक्षता के संविधान को मानने पर विवश किया। और किसी भी देश में धर्मनिरपेक्षता के संविधान तले क्‍या होता है, यह हम सभी ने अच्‍छी तरह देख ही रखा है। भारत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।  
            इतना सब होने के बाद भारत को अब अच्‍छी तरह समझ, चेत जाना चाहिए कि वह पाकिस्‍तान व चीन के किसी भी झांसे में न आए। भारत शांति और समता के सिद्धांत पर अडिग रहते हुए उन्‍नति करना चाहता है। इसके लिए वह दुनिया के अधिकांश देशों के साथ-साथ अपने पुराने दुश्‍मन देशों चीन व पाकिस्‍तान के साथ भी मैत्रीपूर्ण संबंध रखना चाहता है। लेकिन उसे हर हाल में यह सुनिश्चित करना ही पड़ेगा कि मैत्रीपूर्ण संबंधों की आड़ में चीन-पाक का आतंकी गठजोड़ सीमाओं पर तैनात भारतीय सैन्‍यकर्मियों की जान से न खेले। वैश्विक विकास नीति की विवशताओं के कारण भारत आज पाकिस्‍तान के साथ सीधे युद्ध में नहीं उतर सकता और ना ही यह आज की जैविक जरूरत लगती है। लेकिन शीर्ष भारतीय शासकों को यह संकल्‍प अब प्राणपण से लेना ही होगा कि पाकिस्‍तान की ओर से तैयार होकर आनेवाले आतंकवादियों द्वारा हमारे सैनिकों पर घात लगाकर होनेवाले हमले बिलकुल न हों। और अगर ऐसे आतंकी हमलों को भारत सरकार जम्‍मू एवं कश्‍मीर के मुसलिम समुदाय के वोट बैंक, स्‍थानीय मुसलिम आबादी के पाकिस्‍तान प्रेम और अन्‍य किन्‍हीं निरर्थक कारणों से रोकने में विफल रहती है तो उसे यह व्‍यवस्‍था अवश्‍य ही करनी होगी कि कश्‍मीर और अन्‍य भारतीय सीमाओं पर तैनात सैन्‍यकर्मियों को इन आतंकी व ओछी राजनीतिक परिस्थितियों में जीवन-रक्षक सैन्‍य सुरक्षा-कवच उपलब्‍ध कराए जाएं। ये सुरक्षा-कवच ऐसे हों जो उन्‍हें आतंकवादियों के अप्रत्‍याशित हमलों से सुरक्षित रख सकें, उन्‍हें ऐसे हमलों का मुकाबला करने के दौरान जीवित रख सकें।
सैनिकों की मौत के बढ़ते आंकड़ों पर गौर करते हुए कश्‍मीर में लागू सशस्‍त्र सैन्‍य बल विशेषाधिकार अधिनियम को भी संशोधित किए जाने की अत्‍यंत जरूरत है। इसे सैनिकों के पक्ष में अत्‍यधिक लचीला बनाया जाना चाहिए। सैनिकों को यह अधिकार अधिक संवैधानिक शक्ति के साथ दिया जाना चाहिए कि वे आतंकवादी घटनाओं में अप्रत्‍यक्ष रूप से शामिल स्‍थानीय युवकों, निवासियों से भी सख्‍ती से पूछताछ कर उन्‍हें तत्‍काल कारागार में डाल सकें। जिस तरह पूरी दुनिया में आतंकवाद की घटनाएं हो रही हैं उनको ध्‍यान में रखते हुए आतंकवाद के प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष संरक्षकों और मददगारों को भी आतंकवादी के रूप में देखने की जरूरत है। दुनिया के आधे से अधिक देश इस दृष्टि के अभाव में ही अपने यहां आतंकवाद के फलने-फूलने की परिस्थितियों की अनदेखी करते रहे, जिसकी परिणति आईएस के रूप में आज सबके सामने है।
भारतीय लोगों को सैनिकों को भी वैसा ही प्‍यार, सम्‍मान देना चाहिए जैसा वे फि‍ल्‍मी अभिनेताओं और अभिनेत्रियों को देते हैं। जैसे किसी प्रसिद्ध बॉलीवुड अभिनेता या अभिनेत्री के निधन पर संपूर्ण भारतीय जनमानस बुरी तरह सहम कर भावनात्‍मक हो जाता है और कालांतर में इसकी परि‍णति फि‍ल्‍म उद्योग के चौतरफा विकास व सुख-समृद्धि के रूप में सामने आती है, ठीक उसी तरह की भावनाएं भारतीयों को सैनिकों की राष्‍ट्रीय सेवा, समर्पण, त्‍याग और बलिदान के प्रति भी रखनी चाहिए। इस जन भावनात्‍मक दबाव से सरकार येन-केन-प्रकारेण सैनिकों की जीवन-सुरक्षा के लिए सब कुछ करेगी। और यदि ऐसा होगा तो हम अपने सैनिकों के मूल्‍यवान जीवन कम से कम घात लगाकर किए गए आतंकी हमलों में तो नहीं खोएंगे। 
विकेश कुमार बडोला

Monday, August 1, 2016

प्राकृतिक आपदाओं से कराहता उत्तराखंड

उत्‍तराखंड प्राकृतिक आपदाओं से बुरी तरह कराह रहा है। पिछले एक दशक में यह लगभग हर वर्ष की त्रासदी बनती जा रही है कि वर्षा ॠतु के शुरू होते और खत्‍म होते-होते देवभूमि में बादल फटने, बिजली गिरने, अतिवृष्टि के बाद भूस्‍खलन होने से स्‍थानीय जनजीवन बुरी तरह उजड़ जाता है। पहली जुलाई को राज्‍य के पिथौरागढ़ और चमोली जिले में मानसून की शुरुआत कहर बन कर आई। इन दोनों जिलों में छह से अधिक स्‍थानों पर बादल फटने से जनजीवन त‍बाह हो गया। बादल फटने के बाद आए उफान के मलबे में 39 लोग दब गए। आपदा राहत कार्यों में लगे सरकारी और स्‍थानीय लोगों ने इस घटना के दो-तीन बाद 15 लोगों के शव मलबे में से निकाल लिए हैं। इस जलजले में 19 लोग अभी तक लापता हैं। आपदा से 60 से अधिक घर क्षतिग्रस्‍त हो गए और 100 से ज्‍यादा घरों के क्षतिग्रस्‍त होने की आशंका है। इस प्राकृतिक कोप में पिथौरागढ़ में ज्‍यादा नुकसान हुआ। यहां के बस्‍तड़ी गांव में एसडीआरएफ व असम रेजिमेंट के जवानों ने जब मलबे में दबे लोगों को खोजने का अभियान चलाया तब जाकर एक दर्जन से ज्‍यादा शव निकाले जा सके। इसी बीच अरुणाचल प्रदेश के पश्चिमी कामेंग जिले के भालुकपोंग में भी बारिश के कारण हुए भूस्‍खलन में 10 लोग मर गए।
अति‍वृष्टि के लिहाज से चमोली जिला हर वर्ष अतिसंवेदनशील होता जा रहा है। सन् 2013 की आपदा ने चमोली जिले के 84 गांवों पर कहर बरपाया था। मरनेवाले तो मर गए पर जीवित बचे लोगों का जीवन मौत से भी बद्दतर हो गया। सरकार ने बचे हुए लोगों को आपदा से जर्जर हुए इन क्षेत्रों से कहीं दूर सुरक्षित स्‍थानों पर बसाने का निर्णय तो ले लिया, लेकिन इस पर अभी तक ठोस काम कुछ नहीं हुआ। आपदाओं को देखते हुए सर्वेक्षण के लिए चमोली जिले में सरकार की तरफ से भू-वै‍ज्ञानिकों की टीम भेजी गई थी। लेकिन अब तक 84 में से केवल 17 गांवों का ही सर्वेक्षण हो पाया कि गांवों को विस्‍थापित किया जाए अथवा नहीं। तीन वर्ष पहले की आपदा के बाद हर वर्ष यहां का जनजीवन पर्यावरणीय दृष्टि से असुरक्षित होता जा रहा है। लेकिन अभी तक सरकार बचे हुए लोगों के पुनर्स्‍थापन के लिए केवल कागजों में ही हेर-फेर करने पर लगी हुई है। जबकि इस समय चमोली जिले के इन गांवों का हाल यह है कि बरसात आते ही लोग जान की खातिर रतजगा करने को विवश हैं। आपदा प्रभावित संघर्ष समिति के अध्‍यक्ष राकेश लाल खनेड़ा के अनुसार कई बार अनुरोध करने के बाद भी सरकार आपदा प्रभावित गांवों का सर्वेक्षण करने में रुचि नहीं ले रही। इससे लोगों के सामने जीवन का संकट खड़ा हो गया है। 2013 की आपदा में लापता लोगों का आंकडा 4035 तक पहुंच चुका है।
एक ओर प्रकृति के असंतुलन का सीधा असर स्‍थानीय उत्‍तराखंड निवासी भुगत रहे हैं तो दूसरी ओर केंद्र और राज्‍य सरकार केवल अपने-अपने राजनैतिक हित साधने में ही लगे हुए हैं। सरकारों को पर्वतमाला के विघटन के कारण पूरे देश में होनेवाली पर्यावरणीय अस्थिरता का भान गंभीरता से नहीं है। यदि होता तो वे इस दिशा में कुछ ठोस कार्य करते और उत्‍तराखंड सहित सभी पर्वतीय राज्‍यों के वनों, पर्यावरण और भूगोल को दृष्टिगत रखते हुए एक सर्वथा पृथक हिमालय मंत्रालय ही गठित कर चुके होते। अब जब वैज्ञानिक सर्वेक्षणों में निकलकर आया कि उत्‍तराखंड में जून 2013 में आई आपदा का कारण केदारनाथ के ऊपर स्थित एक ग्‍लेशियर झील का टूटना था और इसी कारण पूरी केदारघाटी में जमकर तबाही मची थी, तो सरकार को ग्‍लेशियरों के असंतुलन सहित अनेक प्राकृतिक असंतुलनों के लिए दोषी राज्‍य में चलायमान जल‍-विद्युत परियोजनाओं, विनिर्माण की विस्‍फोटक तकनीकों और खनन व खदान की अप्राकृतिक प्रक्रियाओं पर तत्‍काल प्रभाव से रोक लगा देनी चाहिए। पर्वतीय राज्‍य की सरकार के राजस्‍व के लिए पर्वतों का अस्तित्‍व मिटाना कुछ वैसा ही होगा जैसे जिस डाल पर बैठे हों उसी को आरी से काटना।
हाल ही में गंगोत्री नेशनल पार्क और पंडित गोविन्‍द बल्‍लभ पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्‍थान, अल्‍मोड़ा के वैज्ञानिकों ने गोमुख ग्‍लेशियर का एक हिस्‍सा टूटने की पुष्टि करते हुए आशंका प्रकट करी कि कहीं यह ग्‍लेशियर टूटने का असमय क्रम राज्‍य में 2013 की आपदा को न दोहरा दे। क्‍योंकि सामान्‍यत: गोमुख ग्‍लेशियर जुलाई आखिर या अगस्‍त के आरंभ में टूटते हैं। ग्‍लेशियर विज्ञानी कम बर्फबारी को इस सबका कारण मान रहे हैं। इसे लेकर वैज्ञानिक सचेत हैं क्‍योंकि सन 2012 में भी ग्‍लेशियर टूटा था। तब ग्‍लेशियर के टूटने के बाद आनेवाले जल उफान को रोकने के लिए वैज्ञानिकों ने एकाध स्‍थान पर बांध भी बनाया था, लेकिन अतिवृष्टि का उफान उस बांध को ही बहा ले गया। उन्‍हें यह भी अभी पता चला है कि गोमुख ग्‍लेशियर का एक हिस्‍सा टूटकर भागीरथी नदी में समा गया है। यह ग्‍लेशियर के बाईं तरफ का हिस्‍सा था। इसका तब पता चला जब ग्‍लेशियर के टुकड़े उत्‍तरकाशी से 18 किलोमीटर दूर गंगोत्री में भागीरथी के प्रवाह में देखे गए।
उत्‍तराखंड में आपदा की प्रमुख वजह बर रही अतिवृष्टि से बचने के लिए राज्‍य सरकार ने कृत्रिम बारिश कराने की मैग्‍नेटिक टेक्‍नोलॉजी के उपयोग पर विचार शुरू कर दिया है। इस कड़ी में यूएई की एक निजी कंपनी इंजियोसर्विस ने सचिव आपदा प्रबंधन के समक्ष इस तकनीक के प्रयोग पर प्रस्‍तुतीकरण दिया। राज्‍य आपदा न्‍यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र में कंपनी के विशेषज्ञ गैरी डी ला पोमेराय ने मैग्‍नेटिक तकनीक के जरिए अत्‍यधिक घनत्‍व वाले बादल को कृत्रिम बारिश कराकर कमजोर करने की तकनीक की विस्‍तृत जानकारी दी। उन्‍होंने बताया कि ऐसे बादल को चिन्हित कर अधिक घनत्‍व प्राप्‍त करने से पूर्व ही मैग्‍नेटिक तकनीक के माध्‍यम से न केवल कई छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ा व फैलाया जा सकता है बल्कि कृत्रिम बारिश कराकर कमजोर भी किया जा सकता है। यूएई, चीन जैसे देशों में इस तकनीक का प्रयोग हो चुका है। लेकिन यह सब करते हुए हमारे वैज्ञानिकों को यह भी ध्‍यान में रखना होगा कि चीन ने भी अपने यहां अतिवृष्टि को रोकने के लिए कई कृत्रिम प्रयोग किए थे, जिनका दो-तीन वर्ष बाद विपरीत असर हुआ और चीन भी लगभग हर वर्ष बरसात में अपने यहं की आपदा, बाढ़ को रोकने में नाकाम हो रहा है। अभी भी वहां बाढ़ की स्थिति बनी हुई है। दक्षिणी चीन के ग्‍वांगशी झुआंग स्‍वायत्‍तशासी क्षेत्र स्थित औद्योगिक शहर लियूझोऊ पूरी तरह बाढ़ के कारण जलमग्‍न है। चीन में इस बरसात की बाढ़ से 128 लोगों की मौत हो गई और 47 लाख एकड़ फसल नष्‍ट हो चुकी है। वहां अतिवृष्टि से 11 प्रांत प्रभावित हैं, 43 नदियां खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं और 41 हजार घर बाढ़ में बह गए हैं। इन सबसे वहां अब तक 384 अरब रुपए का नुकसान हो चुका है। इसलिए उत्‍तराखंड  सरकार को कृत्रिम बारिश के प्रतिरोध से अतिवृष्टि को रोकने के अपने फॉर्मूले पर फि‍र से विचार करना चाहिए। क्‍योंकि इस तरह की तकनीक बेचने वाली कंपनियां तो अपना मुनाफा बनाने के लिए अपनी तकनीक को कारगर बताएंगी ही, पर हमारे सामने चीन का प्रत्‍यक्ष उदाहरण है, जो अपने यहां इस तरह की तकनीक को अपनाने के बाद भी अतिवृष्टि की विभीषिका से बचने में असफल ही रहा।
पुरालेखों में गलत नहीं कहा गया कि जब दुनिया खत्‍म होगी तो कई तरह की आपदाएं एक साथ आएंगी। दुनिया के देश एक तरफ तो जलवायु परिवर्तन की समस्‍या का हल निकालने को निरंतर शिखर सम्‍मेलन कर रहे हैं, तो दूसरी ओर नाभिकीय व परमाण्विक शस्‍त्रों से लैस होने के लिए भीषण होड़ मचाए हुए हैं। इस तरह दो नावों पर पैर रखकर आधुनिकता के शिखर पर बैठने की आज के मनुष्‍य की कामना उसे आखिर में ले ही डूबेगी। कुछ भी हो पर मनुष्‍य जाति को प्रकृति से अपनी आत्‍मघाती प्रतिस्‍पर्द्धा बंद करनी ही पड़ेगी।
विकेश कुमार बडोला