महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Wednesday, January 27, 2016

लोकतंत्र में अनारक्षित आदमी

नारक्षित आदमी

आज लोकतंत्र में गुम है

उसे तंत्र की तरफ से

इतनी भी

सुविधा नहीं

कि वह अपना दुख प्रकट करे

अपने आंसू छलकाए

अपनी पीड़ा व्‍यक्‍त करे

वह देखता है

सारा तंत्र

सारी व्‍यवस्‍था

सारा लोकतांत्रिक बुद्धि-विवेक

केवल आरक्षित श्रेणी

में चढ़ने को है आतुर

जैसे वह आरक्षित श्रेणी की मदद

नहीं कर रहा हो

बल्कि उसे मदद से लाद रहा हो

आरक्षित श्रेणी के नखरे

आकाश के नितंब पर चिकोटी काट रहे हैं

आरक्षित श्रेणी के पुरखे

जिस विषमता से पीड़ित थे

वह आज तक कराह रही है

अपने वंशजों को

धन-वैभव, अधिकार सम्‍पन्‍न

देखने के बाद भी

उनका दलित विलाप

अब भी जारी है

वे लोकतंत्र के प्रमुख संस्‍थानों में

विराजकर भी

खुद को आरक्षित समझते हैं

खुद को दलित कहते हैं

अनारक्षित आज बुरी तरह

पिस रहा है

योग्‍य होकर भी आयोग्‍यता का

विरोध नहीं कर सकता

उससे उम्‍मीद है

आरक्षित लोकतंत्र को

कि वह चुपचाप

अपनी योग्‍यता पर

अयोग्‍यता को चढ़ने दे

निर्विरोध अयोग्‍यता की

स्‍थापना होने दे

चाहे अयोग्‍यता चालित

लोकतंत्र का यह चक्र

कालांतर में

आरक्षित-अनारक्षित सबको

एक ही वार से

काट क्‍यों न फेंके

Wednesday, January 6, 2016

साम्‍यवाद

साम्‍यवाद जानते हैं आप? शायद नहीं। मैं बताता हूँ। जब आप अपने मूल और इसके सभी तत्‍वों को भुलाकर दुनिया के व्‍यवसायियों की मेहनत से तैयार भौतिक जंजाल में फंस जाते हैं और इसमें से चाहकर भी निकलने की बजाय, उलटे अपने स्‍तर पर इसके गुणगान में रम जाते हैं, तो समझ लें आपने साम्‍यवाद स्‍वीकार कर लिया है।
यह वही कीड़ा है, जो आपको शराब-शबाब-कबाब की आदतों में फांसता है। इसके बाद आप कभी उन लोगों से दोस्‍ती करने लायक नहीं रह जाते, जो शराब-शबाब-कबाब के विरोधी होते हैं। जो आपको कहते हैं कि बेटा अपने मूल जीवन की ओर लौटो, तो आप उन्‍हें ऐसे देखते हैं, जैसे वे आपको विष पीकर जीवन जीने के लिए कह रहे हों। भले ही आप विष पीने-पिलाने की जिन्‍दगी में रमे हुए हैं और इसकी स्‍वीकारोक्ति के लिए अपने सिद्धांतों को संक्रमित कर चुके हैं, तब भी आपको अपने वह लोग दुश्‍मन ही दिखाई पड़ते हैं, जो आपको विषपान से छूटने को कहते हैं।
सरल शब्‍दों में साम्‍यवाद के बारे में बताता हूँ। अपने मूल, मौलिक जीवन को भूल जाओ। अपने धर्म की तिलांजलि दे दो। विशेषकर साम्‍यवाद को हिन्‍दू धर्म पर थोपा गया। अर्थात् साम्‍यवाद अपनाने के सारे प्रयास हिन्‍दुओं को उनके पथ से विपथ करने के लिए ही हुए। आप मांस नहीं खाते, तो आप पिछड़े हुए हैं, खाइए इसे। आप मदिरा और धूम्रपान नहीं करते तो करिए, नहीं तो आपको क्‍या पता चलेगा कि जिन्‍दगी क्‍या है। बीड़ी-सिगरेट के धुंए में अपनी कुण्‍ठाओं-भावनात्‍मक कुरूपताओं को उड़ते हुए देखिए जी, अरे आप बीड़ी-सिगरेट नहीं पीते, गजब करते हैं, पीजिए इसे। हम साम्‍यवादी कहते हैं, पीजिए। और जो लोग मादक पदार्थों के अपशिष्‍ट, धुंए आदि से स्‍वयं को बचाकर स्‍वस्‍थ रखना चाहते हैं, उनकी जिन्‍दगी के कष्‍ट के बारे में मत सोचिए। साम्‍यवाद को परिभाषित करना है भई। अपने शरीर को खोखला करिए और लोगों को भी उनके शरीर खोखले करने में मदद करिए। जनता सहित अपनी वैचारिकता को नष्‍ट करिए। आप इस साम्‍यवादी समाज में रहकर इतने सक्षम हो जाएंगे कि खुद को ही नहीं संभाल पाएंगे तो दूसरों को क्‍या खाक संभालेंगे। लेकिन हां, दूसरों के कल्‍याण के लिए फर्जी भाषण देते रहना है। खोखले संकल्‍प दिखाते रहना है।
साम्‍यवाद मतलब पूरी दुनिया दिखाने के लिए तो एक पर वास्‍तव में व्‍यक्ति-व्‍यक्ति का परस्‍पर विघटन। व्‍यक्ति का स्‍वयं से विघटन, अलगाव। ऐसी व्‍यवस्‍था थोप कर कई आक्रांता हमारी धमनियों में बहते रक्‍त को भी ठण्‍डा करके चले गए। अब आप लाख कहो कि भारतीय मूल जीवन सबसे अच्‍छा तरीका है मानव कल्‍याण का, पर आपको साम्‍प्रदायिक, असहिष्‍णु, धर्मसापेक्ष आदि ही कहा जाएगा। आप समुचित जीवन के उदाहरण हैं, आप के व्‍यक्तित्‍व से झलक रहा है कि आपका जीवन उपयोगी है और दूसरों के लिए यह प्रेरणा होना चाहिए, लेकिन नहीं साम्‍यवाद यहां आड़े आ जाएगा। मदिरा, धूम्रपान करते हुए लोग आपको अपनी साम्‍यवादी व्‍यवस्‍था में भ्रष्‍ट समझेंगे। वे आपसे कतराएंगे। आपकी एक नहीं सुनेंगे। उन्‍हें आप साक्षात उनके स्‍वास्‍थ्‍य से खिलवाड़ करनेवाले लगेंगे। बेशक उनका स्‍वास्‍थ्‍य अब रसातल में हो तब भी वे आपके स्‍वस्‍थ मुख की टिमटिमाहट से जीवन-ऊर्जा लेने की कोशिश नहीं करेंगे। उन्‍हें साम्‍यवाद का ऐसा विष पिला दिया गया है कि वे मरकर भी साम्‍यवादी रहेंगे और मारकर भी ।
इस देश में कांग्रेस ने राष्‍ट्रीय राजनीति में साम्‍यवाद का बीजारोपण किया था। जो कालांतर में देश के सत्‍ता प्रतिष्‍ठानों से होता हुआ इसके समाज और घर-घर में व्‍याप्‍त हो गया। आज कहने को तो कहा जाता है कि आधुनिक युग में मानव जीवन प्रगति कर रहा है, पर आप स्‍वयं सोचें कि प्रगति जनमानस की हुई है या जनसुविधाओं की। और जनसुविधाएं इस समय तक आकर जनदुविधाएं बन चुकी हैं। कहने को स्‍वामी विवेकानंद ने भी कहा था कि समाज की प्रगति के साथ कदमताल करनी चाहिए और तर्काधारित धार्मिक-आध्‍यात्मिक ज्ञान प्राप्‍त करना चाहिए।
लेकिन क्‍या सच में ऐसा हो सकता है? क्‍या धर्म-अध्‍यात्‍म से तर्क का कोई मेल हो सकता है? क्‍या साम्‍यवाद को तर्क-सशक्‍त बनाकर धर्म का नाश करने को छोड़ना चाहिए? इन प्रश्‍नों में इसलिए उलझा क्‍योंकि कल एक रिश्‍तेदार महाशय ने पठानकोट में मारे गए सैनिकों के बारे में जो टिप्‍पणी करी, उससे साम्‍यवाद ही मुझे वह कारण दिखा, जिससे कि उन्‍हें ऐसा कहने-सोचने की प्रेरणा मिली। उन्‍होंने कहा कि सैनिक मर गए हैं तो मरने दो, उनके हाथ में बन्‍दूक मरने-मारने के लिए ही तो दी है, ये उनकी ड्यूटी है।
मैं समझ गया कि ये भी पक्‍के साम्‍यवादी हैं। साम्‍यवाद के नाम पर इन्‍होंने भी अभी तक कई टन मदिरापान कर लिया होगा, कई तरह के धूम्रपान कर लिए होंगे और कई तरह के प्रगतिशील विचारों का विषपान भी कर लिया होगा। तन-मन से खोखले होकर ही इन्‍हें ऐसी टिप्‍पणियां सूझती होंगी शायद।
विकेश कुमार बडोला