Friday, December 2, 2016

ट्रंप विरोध का निरर्थक प्रलाप

मेरिकी राष्‍ट्रपति चुनाव में रिपब्लिकन उम्‍मीदवार डोनाल्‍ड ट्रंप के‍ विजयी होने का झटका यूरोपीय तथा शेष दुनिया के वामपं‍थियों को निरंतर बेचैन किए हुए है। विगत दिनों 45वें अमेरिकी राष्‍ट्रपति के रूप में ट्रंप की विजय-घोषणा से पूर्व तक येन-केन-प्रकारेण विश्‍व-बिरादरी की मीडिया उन्‍हें पराजित व चुका हुआ व्‍यक्ति मान चुका थी। इस बारे में अमेरिकी मीडिया सहित वामपंथियों का प्रतिनिधित्‍व करनेवाले संसारव्‍यापी मीडिया ने ट्रंप के विरोध में अथक प्रचार-प्रसार किया, उन्‍हें राष्‍ट्रपति के रूप में न चुने जाने के लिए भरसक कोशिश करी।

बड़े-बड़े समाचारपत्रों के लिए वर्षों से अंग्रेजी व हिंदी सहित अन्‍य भाषाओं में स्‍तंभ लिखनेवाले तथाकथित विद्वानों ने अनेक निरर्थक कारणों से डेमोक्रेटिक राष्‍ट्रपति उम्‍मीदवार हिलेरी क्लिंटन के बारे में पहले से ही धारणाएं बना ली थीं जिनका गुप्‍त मंतव्‍य किसी प्रकार हिलेरी को चुनाव में जिताना था। यदि मीडिया के बार में यह बात सत्‍य है तो फि‍र संसार का मीडिया अपने आप में एक घृणास्‍पद सूचना तंत्र बनकर ही रह गया है। इस परिस्थिति में तो लगता है कि दीर्घकालीन जनसरोकारों के बारे में सोच-समझ कर उन्‍हें प्रकाशित-प्रसारित करने की मीडिया की त‍टस्‍थ तथा निष्‍पक्ष दृष्टि बाधित हो चुकी है। वास्‍तव में अमेरिकी राष्‍ट्रपति चुनाव को लेकर इससे पूर्व इतना षड्यंत्रकारी पूर्वानुमान मीडिया ने कभी नहीं बनाया जितना कि इस बार। चुनावों के लिए उम्‍मीदवारी तय होने के उपरांत ही यह षड्यंत्र अमेरिका सहित पूरी दुनिया में वामपंथी विचारकों का संक्रमण रहा। इसकी मंशा डोनाल्‍ड ट्रंप को किसी तरह राष्‍ट्रपति के रूप में अयोग्‍य घोषित कर उनके विरुद्ध अमेरिकी मतदाताओं को हतोत्‍साहित करना था।

अमेरिका दुनिया में आधुनिकता के सर्वश्रेष्‍ठ मानदंडों पर चलनेवाले राष्‍ट्रों में सर्वोपरि है। वर्तमान जन-जीवन अनेक जैविक सुविधाओं तथा संसाधनों के रूप में जो कुछ प्राप्‍त कर रहा है उसका आभार अमेरिका को अधिक जाता है। आधुनिक जीवन को संभालने के लिए जो राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक-सामरिक तथा अन्‍य सार्वजनिक राष्‍ट्रीय मानदंड किसी राष्‍ट्र को अपने लिए चाहिए होते हैं उन्‍हें अपनाने, पालने-पोषने में भी अमेरिका विगत शताब्दियों से दुनिया के देशों के लिए अनुकरणीय रहा है। स्‍वाभाविक है इन परिस्थितियों में दुनिया के देशों के लिए अमेरिकी राष्‍ट्रपति चुनाव सदैव ही प्रमुख समाचार रहा। क्‍योंकि इस आधार पर ही उनके विश्‍व के सबसे शक्तिशाली देश व सबसे सामर्थ्‍यवान इसके राष्‍ट्रपति के साथ विभिन्‍न व्‍यापारिक लाभों, सामाजिक संबंधों तथा सामरिक आवश्‍यकताओं के लिए संबंध स्‍थापित हो सकते हैं।

परंतु विगत दिनों यह देखकर घोर आश्‍चर्य हुआ कि बहुमत से चुने गए सबसे शक्तिशाली व्‍यक्ति डोनाल्‍ड ट्रंप के विरुद्ध डेमोक्रेटिक राजनीतिक दल के समर्थक अमेरिकी लोग सड़कों पर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। उनकी घोषणा थी कि वे ट्रंप को अमेरिका का राष्‍ट्रपति मानने के लिए तैयार नहीं होंगे। एक सफ्ताह तक हजारों प्रदर्शनकारी न्‍यूयार्क, लॉस एंजिलिस और शिकागो में लोकतांत्रिक तरीके से बहुमत के आधार पर नवनिर्वाचित राष्‍ट्रपति ट्रंप के विरुद्ध नारे लगाते रहे। उनका कहना था कि वे ट्रंप की आश्‍चर्यजनक विजय के विरुद्ध हैं। न्‍यूयार्क में लोगों ने ट्रंप के आवास के निकट भी अपना विरोध प्रदर्शित किया।

ट्रंप का राष्‍ट्रपति के रूप में चुनाव बहुमत के आधार पर हुआ है। यह अमेरिका की लोकतांत्रिक प्रणाली के अंतर्गत ही संपन्‍न हुआ। तब भी आज अमेरिका के अनेक प्रांतों में यदि ट्रंप का विरोध हो रहा है तो उसका एकमात्र कारण यही है कि ऐसे लोगों को भड़कानेवाली वामपंथी विचारधारा बुरी तरह से खतरे में पड़ चुकी है, जो विश्‍व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के बहुमत को धता बताकर अपना बेकार शून्‍य प्रतिरोध प्रकट करने पर तुली हुई है।

जिन बहुसंख्‍यक लोगों ने रिपब्लिकन राजनीतिक दल के उम्‍मीदवार ट्रंप को अपना राष्‍ट्रपति चुना है क्‍या वे अमेरिकी सड़कों पर ट्रंप का विरोध कर रहे लोगों से कम लोकतांत्रिक अधिकार वाले नागरिक हैं? क्‍या ट्रंप समर्थक अधिसंख्‍य मूल अमेरिकी लोग, प्रवासियों के रूप में अमेरिका में बसे व कालांतर में वहां की नागरिकता ग्रहण करनेवालों से कम अधिकार संपन्‍न हैं जो वे अपने ही देश में अप्रवासी मुसलिमों, अश्‍वेतों, अफ्रीकियों, नाइजीरियायियों तथा विशेषकर अप्रवासी एशियाई मुसलिमों का विरोध झेलें? क्‍या इन परिस्थितियों में अमेरिका के अपने क्षेत्रीय और सीमांकन अधिकार आप्रवासन सिद्धांतों तथा अप्रवासियों की अति अधिकारपूर्ण मंशा के कारण खतरे में नहीं हैं? यह बात केवल अमेरिका ही नहीं बल्कि अन्‍य अनेक देशों पर भी लागू होती है। आखिर में इन आत्‍मघाती आप्रवासन अधिकारों पर चलने की परिस्थितियां किसी देश को अपने मूल स्‍वरूप में रहने भी दे सकती हैं या नहीं?

यह अति महत्‍वपूर्ण प्रश्‍न है जो अप्रवासियों के अधिकारों तथा इस संदर्भ में मानवाधिकार का व्‍यापार करनेवालों से अवश्‍य पूछा जाना चाहिए। यदि भारत में भी अप्रवासी भारतीय मोदी का इसलिए विरोध करने लगें कि वे मुसलिम आतंकवादियों पर प्रतिबंध लगाने को संकल्‍पबद्ध हैं तो यह विरोध अमेरिका सहित किसी भी दूसरे देश में मूल्‍यांकन योग्‍य नहीं हो सकता। विचार यह भी होना चाहिए कि आखिर उन परिस्थितियों में किसी राष्‍ट्र की अपनी राष्‍ट्रीय स्‍वायतत्‍ता क्‍या रह जाती है जब अप्रवासी नागरिक अपनी घातक मंशाओं को उस राष्‍ट्र के लोकतांत्रिक अस्तित्‍व पर थोपने पर उतारू हो जाएं।

ट्रंप यदि राष्‍ट्रपति के उम्‍मीदवार के रूप में चुनाव अभियानों में अमेरिका को आतंकवाद, भ्रष्‍टाचार सहित दूसरी बुराइयों से बचाने का संकल्‍प लेते हुए दिखे तथा इस उपक्रम में उन्‍होंने आतंक के केंद्र में विचाराधीन आत्‍मघाती मुसलिम विचारधारा को लक्ष्‍य कर उस पर नियंत्रण की बात करी तो इसमें गलत क्‍या हुआ। इसका मंतव्‍य यह तो नहीं कि वह सज्‍जन मुसलिमों को भी आतंकवादी समझेंगे। यदि उनके इस संकल्‍प से दुनिया में आतंकवाद समाप्‍त होता है या आतंकी समूहों में बौखलाहट होती है तो समझा जाना चाहिए कि वे आतंक को वास्‍तव में समाप्‍त करने के लिए कटिबद्ध होंगे। यह तो दुनिया के लिए अच्‍छा ही सिद्ध होगा। तब क्‍यों उनके विरोध को सड़क से लेकर विचारों तक में स्‍थान दिया जा रहा है। य‍ह बात समझकर ऐसी विरोधी विचारधारा को सड़क से लेकर मीडिया घरानों तक प्रतिबंध करने की आवश्‍यकता अब आन पड़ी है। ट्रंप का इस तरह का विरोध आइएस जैसे आतंकी समूहों का गुप्‍त समर्थन ही है, जो आदर्श विश्‍व के समर्थकों को कभी भी किसी स्थिति में सहन नहीं हो सकता।
विकेश कुमार बडोला

3 comments:

  1. अति गंभीरता से किया गया विश्लेषण गंभीर चिंतन की ओर अग्रसित कर रहा है ।

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  2. गंभीर चिंतन ... ख़ास कर क्योंकि भारतीय मीडिया भी इसी मानसिकता से ग्रस्त था ... कुछ वक्तव्य उसके अती जरूर थे पर जिस तरह उनका दुष्प्रचार किया गया है कहीं से उचित नहीं है ... बहुतमत का सामान होना जरूरी है ... ये मीडिया मोदी जी का भी ऐसे ही विरोध करते थे ...

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  3. बहुत ही अच्छा post है, share करने के लिए धन्यवाद। :) :)

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