Tuesday, October 18, 2016

भाषाई समझौता केवल हिन्‍दी में ही क्‍यों हो

ल्‍पना करिए यदि हम अमेरिका या किसी दूसरे देश में होते और तब हिन्‍दी दिवस मनाते तो यह भारत और भारतीय राजभाषा हिन्‍दी के लिए महत्‍वपूर्ण होता। परंतु अपने ही देश में अपनी ही राजभाषा के लिए हिन्‍दी दिवस मनाना राजभाषा के लिए सम्‍मान है या उसका अपमान, इस पर भावपूर्ण विवेचन किए जाने की अति आवश्‍यकता है। हिन्‍दी भाषा तीन प्रमुख समस्‍याओं से अधिक जूझ रही है। पहली, हिन्‍दी के राजभाषायी स्‍वरूप का जन-जन में स्‍थान न बना पाना। राजभाषा की धारणा बनाने वालों द्वारा इसके व्‍यापक प्रसार के लिए देश के विद्यालयों में इसका समुचित भाषाई क्रियान्‍वयन नहीं कराया जाना। दूसरी समस्‍या राजभाषा हिन्‍दी को पचास वर्षों से भी अधिक समय तक न तो शासकीय और ना ही निजी प्रतिष्‍ठानों में पत्रकारिता की भाषा बनाया गया। तीसरी और सबसे बड़ी समस्‍या जो रही, वह थी हिन्‍दी भाषा का पत्रकारिता के रूप में स्‍वयंमेव मनचाहा प्रयोग होना। इसका दूरगामी दुष्‍परिणाम यह हुआ कि आज भारतीय राष्‍ट्र की राजभाषा हिन्‍दी को अपने साथ चाहे-अनचाहे उस मानवीय समाज, समूह और व्‍यापारियों की मुंहबोली व सर्वथा भावहीन तथा आडंबरपूर्ण शब्‍दों से युक्‍त कथ्‍य-भाषा का प्रयोग करना पड़ रहा है जो भारतीय धर्म-संस्‍कृति-सभ्‍यता की धारणाओं को कुचलने के लिए पृथ्‍वी पर हजारों वर्षों से आक्रांता बन घूम रहे हैं। ऐसे आक्रांता कभी तुर्कों, कभी मुगलों तथा कभी अंग्रेजों के वेश में रहे। आज भी हिन्‍दी भाषा जहां-जहां खटकती है तथा हिन्‍दी के संवेदनशील सृजक को भाषायी विरोधाभास कराती प्रतीत होती है, उसका कारण आक्रांताओं के आडंबरपूर्ण व भावहीन शब्‍दों का हिन्‍दी से मिल जाना ही रहा।  
       
        कुछ लोग उर्दू भाषा के हिन्‍दी में लिखे जानेवाले शब्‍दों को बड़ा महत्‍व देते हैं। वे कहते हैं कि समाज में यही शब्‍द आम बोलचाल में ज्‍यादा शामिल हैं तो लिखने के लिए भी इनका ही प्रयोग किया जाना जरूरी है। इस अभियान को भारतीय हिन्‍दी समाचारपत्रों और डेढ़ दशक पहले अस्तित्‍व में आए इलेक्‍ट्रानिक मीडिया ने समर्थन ही नहीं दिया, सराहा ही नहीं, बल्कि इसका अपने-अपने स्‍तर पर क्रियान्‍वयन भी खूब किया। समाचारपत्र वास्‍तव में आम बोलचाल के उर्दू शब्‍दों से भरे होते हैं। विशेषकर जिन पढ़े-लिखे लोगों पर वामपंथ का असर रहा, उन्‍होंने तो आम जीवन में बोले जानेवाले उन शब्‍दों का अपने लेखन में खूब इस्‍तेमाल किया, जिनके शब्‍द का शब्‍द से ही अर्थ नहीं समझा जा सकता। संस्‍कृत से निकली देवनागरी, हिन्‍दी, मैथिली, बिहारी, बंगला, तमिल, तेलुगू, उड़िया, गढ़वाली, कुमाउंनी आदि प्रादेशिक भाषाओं का भाषाई एकता के रूप में जो प्रयोग हिन्‍दी लेखन-सृजन में सर्वश्रेष्‍ठ तरीके से हो रहा था उसमें उर्दू, अरबी, फारसी, अंग्रेजी और अन्‍य यूरोपीय भाषाओं ने एक भाष्‍य-रुकावट उत्‍पन्‍न कर दी। इन भाषाओं के शब्‍दों का हिन्‍दी और संस्‍कृत से निकली प्रादेशिक भाषाओं के शब्‍दों के साथ जो विवशतापूर्ण मेल हुआ उसने हिन्‍दी की उपयोगिता, स्‍वच्‍छंदता, स्‍वाध्‍याय आधारित उसके शिक्षण और उसके प्रति भाषाई आकर्षण को सीमित कर दिया।
       
        जब कहा जाता है कि आम बोलचाल की भाषा में लिखना चाहिए, यह भाषा लोगों को आसानी से समझ आती है और इसी से आम लोगों को विद्वतजनों के सोचने-समझने के तौर-तरीके सीखने के लिए प्रेरित किया जा सकता है, तब मन में एक सहज जिज्ञासा प्रकट होती है कि क्‍या वास्‍तव में आम बोलचाल की भाषा लिखने योग्‍य है, क्‍या वास्‍तव में विद्वतजनों का सोचने-समझने का तरीका सीखने-सिखाने योग्‍य है और क्‍या आम लोगों के अनुसार भाषा निर्धारित करने के स्‍थान पर समाज के विद्वानों का यह कर्तव्‍य नहीं कि वह श्रेष्‍ठ भाषागत व्‍यवहार आम लोगों को सिखाएं?
       
        आम बोलचाल में तो अपशब्‍दों, अश्‍लील बोलियों-गालियों, निर्लज्‍ज बातों, असभ्‍य लोकोक्तियों और बिना किसी सशक्‍त भाषाई आधार के ऐसी मिश्रित भाषा बोली जाती है, जिसे सुनकर लगता है कि क्‍या भाषा के रूप में समाज में व्‍याप्‍त इन भाषाई विकारों के साथ समझौता कर लिया जाना चाहिए? आज जिस तरह लोग सामान्‍य भाषा व्‍यवहार करते हैं, उसका प्रयोग तो केवल उपन्‍यास, कथा-कहानियों में समाज के सच को व्‍यक्‍त करने के लिए किया जा सकता है। समाचारपत्रों और इलेक्‍ट्रानिक मीडिया वालों को तो ऐसी भाषा रचनी चाहिए जो सभ्‍य समाज का एक अंग बने। जिसका प्रयोग करते समय लोगों को अपने जीवन में भाषाई उत्‍कृष्‍टता का अनुभव हो।
       
        फि‍र जिस जेएनयू के पोषक वामपंथ के कारण (दरअसल, लिहाजा, बहरहाल, मसलन जैसे शब्‍द वास्‍तव में, इसलिए, जो भी है, जैसे के स्‍थान पर) हिन्‍दी की देवनागरी लिपि में बिना किसी विचार के लिप्‍त हो गए और निरंतर प्रयोग में बने हुए हैं, उनका उद्देश्‍य तो आम बोलचाल के रूप में केवल उर्दू और अंग्रेजी का मिश्रण परोसने से था। 'नाबालिग', 'हिरासत', 'गिरफ्तार', 'तनख्‍वाह' जैसे कई उर्दू-अरबी शब्‍दों को आम बोलचाल की भाषा के शब्‍दों के रूप में स्‍वीकार कर लिया जाता है लेकिन 'अवयस्‍क', 'कारावास', 'अभिरक्षा' 'वेतन' जैसे सहज-सरल-सुनियोजित हिन्‍दी शब्‍दों को मेरे जैसे लोगों द्वारा अपने आम जीवन में और भीतर हृदय में अनुभव किए जाने के उपरान्‍त भी आम बोलचाल की भाषा के रूप में अधिमान नहीं मिलता। मैं एक गंभीर व्‍यक्ति हूं। जो कुछ सोचता हूं और सोचने की प्रक्रिया में भाषा का जो प्रवाह होता है उसमें लिहाजा, दरअसल, बहरहाल जैसे शब्‍दों के लिए कोई स्‍थान नहीं होता। ऐसे में मैं अपने हृदय की भाषा के स्‍थान पर संवाद, लेखन के लिए बाहरी या मुझे अरुचिकर भाषा कैसे लिखूंगा या लिख सकता हूं?
       
        भाषा के विषय में उदारता अपनाने की बात होती है तो यह शर्त केवल समस्‍त भारतीय भाषाओं का सौंदर्यगत और शिल्‍पगत प्रतिनिधत्‍व करनेवाली भाषा हिन्‍दी के लिए ही क्‍यों हो? अंग्रेजी, उर्दू, अरबी, फारसी और अन्‍य यूरोपीय भाषाओं में तो हिन्‍दी के लिए उदारता नहीं दिखाई जाती। इन भाषाओं की लिपि में कहीं या कभी भी 'सूर्य', 'शशि', 'नभ', 'प्रकृति' आदि शब्‍दों का उल्‍लेख नहीं किया जाता। तब सारे भाषाई प्रयोग हिन्‍दी में ही क्‍यों हों? विशेषकर जब हिन्‍दी भाषा अपने आप में हर कोण से सशक्‍त हो तब तो इसमें कई कमजोर आधारों पर खड़ी भाषाएं सम्मिलित करके इसे सुदृढ़ नहीं शक्तिहीन ही किया जा सकता है।
       
        जब कोई लेखक साहित्‍य या पठन-पाठन की प्रवृत्ति में स्‍वानंद प्राप्‍त करने लगता है तो उसे मेरे द्वारा उठाई गई उपर्युक्‍त भाषाई आपत्तियां अवश्‍य दिखनी शुरू हो जाती हैं। अपने किसी जैव या जीवन-निर्वाह हित के कारण वह इन आपत्तियों का प्रत्‍यक्ष विरोध भले न करता हो, किंतु कहीं न कहीं उसके हृदय में खटास तो पड़ ही जाती है कि अन्‍य भाषाओं के विचित्र शब्‍दों को मिलाकर हिन्‍दी के साथ भाषाई दुराग्रह तो चल ही रहा है। 
       
        हिन्‍दी भाषा के शब्‍दों में शब्‍द के अर्थ उसके एक, दो, तीन, चार या कितने ही अक्षरों में छिपे होते हैं। भाषा विज्ञानी इनका सन्धिविच्‍छेद कर इनका समानार्थ सुगमता से जान सकता है। शब्‍दों के ये समानार्थ आवश्‍यक नहीं कि जीवन में इनकी व्‍यवहारगत घटनाओं के बाद ही दृष्टिगोचर हों। हिन्‍दी शब्‍दों के अंतर्निहित अर्थों में ही इनके मूल, गूढ़ और समाजोपयोगी अर्थ गुप्‍त रहते हैं। समझ, विवेक तथा बुद्धि शक्ति से इनकी जानकारी हो जाती है। जबकि इनके विपरीत अंग्रेजी, उर्दू, अरबी, फारसी और अन्‍य यूरोपीय भाषाओं के शब्‍दार्थ हम बचपन से ऐसे शब्‍दों के व्‍यवहारगत वाड.मय, इनसे संबंधित वस्‍तुओं के नामों और संबंधित परिघटनाओं के कारण ही जान पाते हैं। ऐसी भाषाओं में प्रयोग होनेवाले शब्‍द अपने भीतर कोई सहज, प्राकृतिक अर्थ नहीं रखते। इनके अर्थों को जीवन में घटनेवाली कृत्रिम घटनाओं के संकेतों या वास्‍तविक घटनाक्रमों के आधार पर ही समझा जा सकता है।

        आजकल हिन्‍दी प‍त्रकारिता में एक नई वाक्‍य रीति चल रही है। इसमें स्‍त्रीलिंग संज्ञा की प्रथम और द्वितीय दोनों क्रियाओं को पुल्लिंग क्रिया-शब्‍दों से जोड़ कर लिखा जा रहा है। निस्‍संदेह यह भाषा प्रयोग कुछ प्रदेशों में बोली के रूप में स्‍वीकार है, लेकिन जहां हिन्‍दी को लिखने की बात है तो उसे राजभाषा के अनुसार ही लिखा जाएगा। 'धारा बह रहा है', 'कीमत चुकाना पड़ा' जैसे वाक्‍य प्रादेशिक वाक्‍य प्रयोग हैं। किन्‍हीं अंचलों में ऐसा बोला जाता है। लेकिन राजभाषा के नियमानुसार लिखने के लिए इन्‍हें 'धारा बह रही है', 'कीमत चुकानी पड़ी' ही लिखा जाएगा। आंचलिक स्‍तर पर भाषा को इस तरह बोलने का गलत प्रचलन भी हिन्‍दी और इसकी प्रादेशिक भाषाओं में अंग्रेजी, उर्दू, अरबी, फारसी और अन्‍य यूरोपीय भाषाओं के आने के कारण ही हो रहा है। हिन्‍दी भाषा का इस प्रकार का भाषाई प्रयोग करने से हिन्‍दी का पारं‍परिक शिल्‍प-सौंदर्य तो बिखरता ही है, उसके प्रादेशिक भाषांश भी व्‍याकरण के स्‍तर पर गलत होने लगते हैं।

विकेश कुमार बडोला

Wednesday, October 12, 2016

सर्जिकल स्ट्राइक पर ओछी राजनीति असहनीय

भारत में घुसपैठ करने की कोशिश के चलते नियंत्रण रेखा के पार पीओके में एकत्रित आतंकियों को सेना की सर्जिकल स्ट्राइक (सीमित सैन् कार्रवाई) में मार गिराने के बाद पूरा देश जब उड़ी आतंकी हमले में शहीद 19 सैनिकों को सच्ची श्रद्धांजलि देने की स्थिति में हो, देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत हो और उसी दौरान कुछ विपक्षी दलों के नेताओं तथा फिल् उद्योग से जुड़े कलाकारों की देशविरोधी ओछी बयानबाजी सर्जिकल स्ट्राइक को तब तक फर्जी बताने के रूप में हो जब तक कि उन्हें इसके साक्ष् उपलब् करा दिए जाएं तो इसे क्या समझा जाए। क्या यही कि उन्हें देश में केंद्र सरकार, सेना तथा बहुसंख्यक सैनिकप्रिय जनता के लोकतांत्रिक अधिकार का अपमान अनादर ही करना है? क्या उनके लोकतांत्रिक रूप से राजनेता चुने जाने का कूटार्थ सर्जिकल स्ट्राइक के संदर्भ में उनके देशविरोधी वक्तव् को ध्यान में रख यही समझा जाए कि वे कहीं या किसी किसी रूप में राष्ट्रविरोध के लिए ही सत्तासीन हुए? जो भी है आज देश में इस संबंध में एक नई राजनीतिक चर्चा शुरू हो गई है, जो देश के सर्वांगीण विकास और विकास के आधार पर प्राप्त हो सकनेवाले राष्ट्रगौरव की भावना से कोसों दूर तथा सर्वथा निरर्थक है।   
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, कांग्रेसी नेता पी. चिदंबरम तथा संजय निरुपम के बाद राहुल गांधी और कपिल सिब्बल ने जिस तरह सेना की सर्जिकल स्ट्राइक पर संदेह व्यक् करते हुए अपनी बात कही, उससे साफ पता चलता है कि देश में कांग्रेस के नेतृत् में विपक्षी राजनीतिक दलों की येन-केन-प्रकारेण राजनीति में बने रहने की लिप्सा कितने खतरनाक स्तर तक जा पहुंची है! केजरीवाल सहित लगभग उन सभी राजनीतिक दलों के नेताओं, जो सर्जिकल सट्राइक के साक्ष् मांग रहे हैं, को भला ऐसे राष्ट्रविरोधी वक्तव्यों के बाद नैतिक आधार पर लोकतांत्रिक देश का जनप्रतिनिधि कैसे स्वीकार किया जा सकता है! क्या केंद्र सरकार तथा न्यायपालिका को संविधान की धाराओं को, इस परिस्थिति में राष्ट्रविरोधियों को दंडित करने के लिए, अत्यंत लचीला करने की आवश्यकता नहीं, जब कुछ राजनेता अपने राष्ट्र, इसकी सैन् शक्ति तथा इसके केंद्रीय राजनैतिक नेतृत् को लेकर एक प्रकार से दुश्मन देश पाकिस्तान के मिथ्या प्रचार का हिस्सा बनने को अति उत्सुक हैं।
जो पाकिस्तान दशकों से भारत पर छदम युद्ध थोपता रहा, भारत में आतंकवाद का प्रचार-प्रसार करने के साथ-साथ जब-तब निर्दोष भारतीय सैनिकों नागरिकों का रक् बहाता रहा वह भला कैसे दुनिया की दृष्टि में एक विश्वसनीय देश रह सकता था। अपनी आतंकी नीतियों तथा इनके क्रियान्वयन के लिए सदैव तत्पर पाक किसी किसी रूप में दुनिया के अधिकांश देशों को चुभता रहा है। लेकिन मोदी सरकार से पूर्व की केंद्र सरकारें हमेशा ही पाकिस्तान प्रायोजित आतंक को समझौतों तथा वार्ताओं के माध्यम से निपटाने की पक्षधर रहीं। हालांकि यह प्रयास मोदी सरकार ने भी किया। बल्कि इस सरकार ने तो पाक के साथ पूर्व की सरकारों से भी श्रेष् नवीन तरीकों से परस्पर सद्भावना बढ़ाने के अनेक प्रयास किए। परंतु जब पाक की नीयत में ही जन्मजात तथा धर्मांध खोट हो तो कहना चाहिए कि उसे साक्षात ईश्वर भी पड़ोसी राष्ट्र के साथ प्रेम शांति से रहने के लिए नहीं समझा जा सकता।
भारत पर पाक द्वारा किए जाते रहे आतंकी हमलों तथा इसके बाद भी भारत की दोस्ती के प्रस्तावों पर उसके द्वारा हमेशा किए गए विश्वासघात के कारण कांग्रेसी नेतृत् की सरकारें उसके खिलाफ विश्वभर में वैसा विरोधी वातावरण कभी नहीं बना पार्इं, जैसा भाजपा की मोदी सरकार ने बना दिया। पिछले दो-ढाई वर्षों में मोदी की विश् बिरादरी में जैसी राजनीतिक कूटनीतिक पकड़ रही आज उसके फलस्वरूप ही पाकिस्तान अपनी आतंकवाद संरक्षण की दुर्नीति के कारण विश् के लगभग सभी देशों की नजर में कुत्सित तथा नकारात्मक राष्ट्र बनकर उभरा है। बल्कि इस समय तो विश् के वह देश जो संयुक् राष्ट्र सुरक्षा परिषद से लेकर अनेक अन् वैश्विक मंचों का प्रतिनिधित् करते हैं तथा जिन मंचों की सदस्यता के लिए दूसरे देशों को अभी पता नहीं कितना परिश्रम करना पड़ेगा, उनकी दृष्टि को भी नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान के संदर्भ में उसी रूप में मांझ डाला, पाक को हर मोर्चे पर परास् करने के जिसकी आज भारत को अत्यंत आवश्यकता है।
आज जब अमेरिका, रूस, फ्रांस, जापान, ब्रिटेन जैसी वैश्विक महाशक्तियां भी भारत के साथ विकास की धारणाओं को ही नहीं अपितु जग कल्याण के प्रति उसके सामाजिक आध्यात्मिक दृष्टिकोण को भी सम्मानपूर्वक अंगीकार करने की स्थिति में हैं तथा ये महाशक्तियां किसी किसी रूप में भारत के चहुंमुखी ज्ञान योग्यता के गुणात्मक लाभों को अपने देशों में आयात कर रहे हैं यदि उस समय हमारे अपने देश के मोदी विरोधी विपक्षी राजनीतिक दलों के नेता पाकिस्तान के इस कथन का समर्थन करते हैं कि पीओक में भारतीय सेना की सर्जिकल स्ट्राइक फर्जी थी, तो इन परिस्थितियों में देश के सभ् देशभक् नागरिकों के सम्मुख ऐसे नेताओं को सबक सिखाने का तरीका केवल लोकतांत्रिक चुनावों में उनके विरुद्ध मतदान करने तक ही सीमित नहीं हो सकता। इन परिस्थ्ितियों में तो जनता कहीं ऐसे नेताओं इनके समर्थकों के प्रतिमारो-मारोका अभियान छेड़ दे। क्योंकि इन्होंने लोकतंत्र के अधीन सत्ता संचालन को इतना निम् स्तरीय अभ्यास बना दिया है कि एक समझदार विवेकवान व्यक्ति अब कम से कम लोकतांत्रिक मान्यताओं को मानते हुए तो ऐसे लोगों को बर्दाश् करने की स्थिति में कदापि नहीं है।
नेता ही नहीं बल्कि खुद को कलाकार कहने वाले चित्रपट के कुछ अभिनेता तथा वामपंथी बुद्धिजीवी से लेकर वामपंथी विद्यालयों विश्वविद्यालयों के छात्रों की दृष्टि में विद्वता की जो धारणाएं आज बनी हुई हैं वह अत्यंत विरोधाभासी तथा देश के लिए सर्वथा अनुपयोगी और घातक मंतव्यों पर आश्रित हैं। ऐसे में इनका नेता, अभिनेता, बुद्धिजीवी या कलाकार होना अपनेआप में ही व्यर्थ-निरर्थ हो जाता है। वास्तव में ढाई वर्ष पहले तक लोकतंत्र के नाम पर केंद्र शासन के साथ तमाम क्षेत्रों के अगुवा तथाकथित प्रतिष्ठित लोगों की भ्रष्टाचार अवैध मुद्रा लेन-देन के संबंध में एक गुप्तनीति चल रही थी। इस शीर्ष स्तरीय गुप् षडयंत्र के तहत भारत को हिन्दू धर्म-संस्कारों से विमुख करने का यह कुचक्र पिछले दशकों से सुगमता से चल रहा था। साथ ही भारत इसके धर्मविरोधी ऐसे षडयंत्रकारी बाह्य रूप से जनसाधारण के लिए महानता की प्रतिमूर्ति भी बने हुए थे। ऐसे लोगों के समस् कल-कपट धत्क्रर्मों पर मोदी सरकार के आने के बाद बहुत अधिक नियंत्रण होने लगा था। और जैसे-जैसे मोदी सरकार के निरंतर केंद्र में बने रहने के साथ-साथ राज्यों में भी शासन करने की संभावनाएं समाज में व्याप् हो रही हैं, ऐसे लोग बुरी तरह छटपटा रहे हैं। इसी के परिणामस्वरूप इन्होंने किसी किसी कारण मोदी सरकार को नीचा दिखाने की साजिश रची है। लेकिन ऐसे राजनेताओं और इनके साधारण तथा विशिष् कलाकार, बुद्धिजीवी रूपी समर्थकों को देश पर आसन् आतंकी युद्ध संकट के समय इस तरह का क्षुद्र राजनीतिक व्यवहार नहीं करना चाहिए। इससे दुश्मन देश की कूटनीतियां हमारे विरुद्ध एक नए ढंग से बढ़ जाती हैं।
केजरीवाल जैसे नेताओं को एक सामाजिक कार्यकर्ता तथा भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़नेवाले व्यक्ति के रूप में सम्मान देकर उनके साथ जुड़े लोगों को अब उस जुड़ाव प्रभाव से बाहर निकल आना चाहिए। नागरिकों को नागरिक के रूप में सर्वप्रथम उस देश के लिए एकजुट होने का विचार रखना चाहिए जिसके वे नागरिक होते हैं। और अगर इसमें उनका संदेहास्पद जननायक बाधा उत्पन् करता है या राष्ट्र विरोधी आचार-व्यवहार करता है तो उन्हें उसका मंतव् समझकर शीघ्र ही उससे किनारा भी कर लेना चाहिए। इस समय जब देश पर शत्रु का आतंक के रूप में प्रकट संकट प्रबल हो, समस् देशवासियों को विभिन् राजनीतिक दलों के साथ अपने हित जुड़े होने के कारण ही उनका अंधसमर्थन नहीं करना चाहिए। यदि केंद्र की मोदी सरकार उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक इच्छा पूर्ण नहीं करती तो कोई बात नहीं। उन्हें तो इस समय सिर्फ इतना देखना है कि यह सरकार देश के लिए शक्तिसंपन् होकर दुश्मन राष्ट्र के आतंकियों से लोहा ले रही है। इसी आधार पर सभी लोगों को मोदी सरकार का साथ निभाना चाहिए। इस समय देश के भीतर राजनीतिक भितरघात करनेवालों या देशविरोधी हरकतों के आधार पर अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश करनेवालों को लोकतांत्रिक नियमों से परे जाकर कठोरता से सबक सिखाए जाने की अत्यंत जरूरत है। इसी में देश लोकतंत्र की दीर्घकालीन भलाई निहित है।  
विकेश कुमार बडोला