महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Thursday, December 10, 2015

सहिष्‍णुता

जकल सहिष्‍णुता शब्‍द किन्‍हीं राजनीतिक हितों को साधने के लिए अत्यंत उपयोगी बना हुआ है। सहिष्‍णुता का अर्थ है अहिंसा के मानक की स्‍थापना के लिए एक शैक्षिक जागरूकता उत्‍पन्‍न करना। सहिष्‍णुता का अर्थ इस रूप में नहीं लिया जाना चाहिए कि किसी की धार्मिक-नागरिक-सामाजिक आस्‍था व उसके जीवित-निर्जीव प्रतीकों पर अत्‍याचार हो रहा हो और वह सहिष्‍णु बने रह कर कोई प्रतिक्रिया न करे। अपनी सामाजिक आस्‍था, धार्मिक मर्यादा की संरक्षा करते हुए अत्‍याचार का दमन करना असहिष्‍णुता नहीं कहलाएगी। और यदि असहिष्‍णुता की समस्‍या कुछ लोगों को महसूस हो भी रही है तो इसके पीछे जो भी कारण हैं, वह पूंजीवादी और आधुनिक हैं। अमीरी-गरीबी की विभाजन रेखा पर संपूर्ण समाज की जो विसंगतियां उत्‍पन्‍न होती हैं, वास्‍तव में वही समाज की असहिष्‍णुता है। लेकिन इसका कोई वैचारिक या बौद्धिक विरोध उस प्रकार नहीं होता, जिस प्रकार आजकल अवास्‍तविक असहिष्‍णुता को लेकर हो रहा है। इस पर कोई साहित्यिक आंदोलन नहीं होता। साहित्‍य जिस सामाजिक हानि अर्थात् गरीबी और इससे जुड़ी समस्‍याओं पर फलता है, उसी विशाल जन-समस्‍या को लेकर यह नहीं कहा जाता कि यह असहिष्‍णुता है। ऐसी समस्‍या पर सुविधाभोगी साहित्‍यकार-समूह चुप रहता है। ऐसी सार्वजनिक दुर्गति उसे सहिष्‍णु लगती है। किसी भी सभ्‍य समाज में सहिष्‍णुता मापने का पैमाना उस समाज की दैनिक गतिविधियों का नागरिक अनुशासन, मनुष्‍यता, मानवों का परस्‍पर मान-सम्‍मान और आधारभूत मौलिक-नागरिक अधिकारों की प्रत्‍येक व्‍यक्ति को उपलब्‍धता पर आधारित होना चाहिए। यदि इस आधार पर कोई राष्‍ट्र, समाज, संस्‍था, गांव, शहर या परिवार इकाई अपने दायित्‍वों का सर्वोत्‍तम निर्वाह करते हैं, तो सहिष्‍णुता की परिभाषा के लिए वैचारिक नापतोल या युद्ध नहीं होंगे। सहिष्‍णुता मानव जीवन के व्‍यवहार में सहज ही परिलक्षित होगी। यदि हम देखें तो भारत ही क्‍या, दुनिया का कोई भी देश कभी भी सहिष्‍णु नहीं रहा और ना रह सकता है। क्‍योंकि प्रगति की यात्रा में विश्‍व कितने ही औद्योगिक उत्‍पादनों, व्‍यापार और भौतिक वस्‍तुओं के क्रय-विक्रय सहित लाभ-हानि के उपक्रमों में इस तरह लिप्‍त है कि इस प्रतिस्‍पर्द्धा में सहिष्‍णुता जैसे शब्‍द सामाजिक रूप से ही अप्रासंगिक हो जाते हैं। हां, इतना अवश्‍य हो सकता है कि सहिष्‍णुता को आधुनिकता के अनुसार एक भौतिक सुख में बदलकर उसकी उपलब्‍धता को प्रत्येक व्‍यक्ति के लिए निश्चित कर लिया जाए।
विकेश कुमार बडोला

Tuesday, December 8, 2015

जिंदगी का मौसम


जिंदगी का मौसम

दैनिक ट्रिब्‍यून में  November - 25 - 2014 को प्रकाशित
कहानी
विकेश कुमार बडोला
चित्रांकन संदीप जोशी


हवा की लहरें कक्ष की एक-एक चीज को सजीव किए हुए थीं। हवा के मधुर स्‍पर्श से कक्ष में रखी हरेक वस्‍तु हिलती-डुलती और धीमे-धीमे उड़ती। हवा निर्जीव चीजों में भी जान भरती प्रतीत होती। प्रशान्‍त कक्ष की खिड़की से बाहर दूर स्थित पेड़ों को देखता रहा। हवा के वेग से हिलते पेड़ अद‍्भुत लगते। पक्षियों के दल गगन में उड़ रहे थे। नीला आकाश श्‍वेत बादलों के टुकड़ों से सजा हुआ था। प्राकृतिक अनुभव तन-मन को स्‍वस्‍थ और प्रसन्‍न कर रहे थे। प्रशान्‍त ने मौसम के प्रभाव में नीलिमा को प्रेमपूर्वक छेड़ा, ‘आज का दिन एकदम तुम्‍हारे मुखड़े की तरह दमक रहा है। पांच साल पहले जब हमारी शादी नहीं हुई थी, जब मैं तुम्‍हें देखने आया थायाद है! तुम्‍हारा चेहरा कितना कांतिमय था! तुम्‍हारे अंग-प्रत्‍यंग कितने दीप्‍त थे! आज के वातावरण को बहुत-बहुत धन्‍यवाद, जिसने हमारे स्‍वर्णिम अतीत को नए अहसासों और रंगों के साथ एक बार फिर सामने रख दिया है।
कुछ क्षण रुककर नीलिमा बोली, ‘तुम्‍हारे पास तो कुछ काम है नहीं। यूं ही खाली बैठे-बैठे बेकार की बातें सोचते रहते हो। कुछ मदद कर लिया करो काम में मेरी। मेरी कमर के दो टुकड़े हो रहे हैं।
प्रशान्‍त को पता था कि नीलिमा ने जो कुछ कहा, वह केवल बाहरी से मन से कहा। प्रभावित तो वह भी थी मौसम से। काम करते-करते वह रसोई की खिड़की से आसमान, पेड़-पौधों, पक्षियों को निहार रही थी। एक बार तो वह तेजी से आती ठंडी हवा की तरफ आंखें बन्‍द कर खड़ी हो गई। जैसे हवा को नथुनों से अपने अन्‍दर भर रही हो। प्रशान्‍त की बात का हृदय में समर्थन करके वह उसे चिढ़ाने के लिए मुंह बनाती और उसे ताने मारने लगती। प्रशान्‍त को उसकी यह आदत अच्‍छी लगती।
नीलिमा की इस आदत से और ज्‍यादा प्रसन्‍न होने के लिए उसने उसे उकसाया, ‘तुम तो मूर्ख हो। हमेशा बेकार की बातें करती हो। अरे देखो तो सही मौसम को। तुम्‍हें स्‍वर्ग में होने की अनुभूति न हो तो कहना।
प्रशान्‍त पर पानी के छींटे फेंकते हुए वह धीरे से बुदबुदाई, ‘मौसम को देखने के अलावा तुम्‍हें और कुछ सूझता है?’
 ‘सूझता है न, सुन्‍दर विचार, अच्‍छी-अच्‍छी बातें। जैसे आज मैं मौसम के असर से इतना भावुक हूं कि तुम से मेरा लगाव कई गुणा बढ़ गया है। तुम्‍हारी अनदेखी, डांट, कड़वी बातें भी मुझे अच्‍छी लगने लगी हैं।
नीलिमा प्रशान्‍त के पास आकर बैठ गई, ‘पता नहीं आज स्‍कूल में बच्‍ची क्‍या कर रही होगी! बहुत संकोची लड़की है। छोटी सी बात को भी दिल से लगा लेती है। सोनल को देखो, वह तो मेडम की डांट-पिटाई खाने के बाद भी मस्‍त रहती है। न रोती है, सोचती है। आज की दुनिया में यह लड़की कैसे खपेगी! हम अमीर होते तो मैं अपनी बिटिया को कभी भी ऐसे स्‍कूलों में नहीं भेजती। उसके पढ़ने की व्‍यवस्‍था घर पर ही करवाती। सरकार, स्‍कूल वाले सब के सब बस पैसे का हेर-फेर जानते हैं। बच्‍चों से तो इन्‍हें कोई मतलब है ही नहीं।
सुहावने मौसम में डूबा हुआ प्रशान्‍त पत्‍नी की बात से दुखी हो गया। उसने महसूस किया कि जब से बच्‍ची स्‍कूल जाने लगी है, नीलिमा का व्‍यवहार चिंतनीय हो गया है। वह हर समय तनाव व चिन्‍ता में घुलती रहती है। उसने कितनी बार उसे समझाया कि होनी पर जब हमारा वश नहीं है तो उसे लेकर दुखी होने का क्‍या मतलब। यह विकराल समय, कमजोर सरकारी व्‍यवस्‍था और इस कारण लुंजपुंज हुई स्‍कूली व्‍यवस्‍था और समाज का इन दुर्व्यवस्‍थाओं के प्रति उदासीन रवैयाइस पर नीलिमा और मेरे परेशान होने से क्‍या फर्क पड़ेगा। एक व्‍यक्ति के प्रयास से ये दिक्‍कतें कभी भी खत्‍म नहीं हो सकतीं। ऐसी दिक्‍कतों से शान्‍त व सन्‍तुलित तरीके से ही मुकाबला किया जा सकता है। और शान्ति व सन्‍तुलन प्रकृति से प्राप्‍त ऊर्जा से ही मिल पाएंगे। इसीलिए वह जब-तब प्रकृति की शरण में चला जाता है। और आज उसने नीलिमा को भी प्रकृति की महिमा के प्रति केंद्रित करने का प्रयास किया था। लेकिन वह तो गृहस्‍थ जीवन की समस्‍याओं में बुरी तरह फंसी हुई है। उसे प्राकृतिक उजाला नजर ही नहीं आता। उसकी अन्‍तर्दृष्टि प्रकृति प्रेमी हो ही नहीं पा रही। वह मौसम के प्रभाव में स्‍वच्‍छंद तो होती है, पर केवल कुछ क्षणों के लिए।
तुम कहां खो गए? वाकई आज का मौसम तो बहुत सुहावना है।
हां नीलिमा। प्रकृति की गोद में खुद को रखकर शान्ति तो मिलती है, पर तुम्‍हारी बातों को सुनकर मुझे भी हमारे जीवन के सम्‍बन्‍ध में कई बातें चुभने लगी हैं। जीवन में एक शान्तिमय ठहराव नहीं आ पा रहा है।
कैसी, कौन सी बातें?’
बहनों की शादी हो गई है। मां-पिताजी गांव में अकेले हैं। बुढ़ापा उन्‍हें अपने में समेटने लगा है। कितनी बार कहा उनसे चलो मेरे साथ। अपनी औकात के हिसाब से तुम्‍हें डॉक्‍टर से चैक करवा लेता हूं। एक टुकड़ा जमीन है। उसे बनवा लेते हैं। वहीं मिलकर रहेंगे सब। बुढ़ापे में उन्‍हें हमारी जरूरत है तो हमें भी अपनी बच्ची के लिए दादा-दादी की बहुत जरूरत है। वे ये भी तो नहीं कहते कि तुम गांव आकर रहो। क्‍या हम कभी उनकी सेवा नहीं कर पाएंगे? ऐसे तो समय निकला जा रहा है। मैं भी दो-एक साल में चालीस पार कर लूंगा। बुढ़ापे के लक्षण और कमजोरी शहर की जिन्‍दगी ने वक्‍त से पहले ही हमें दे दिए हैं। ऐसी हालत में हम अपने मां-बाप की सेवा करेंगे या खुद को दुरस्‍त रखेंगे?’
सास-ससुर जी आपस में भी तो कुछ बात नहीं करते परिवार के भविष्‍य की।
हां…! नीलिमा मुझे तो समझ नहीं आ रहा। क्‍या करूं।
तुम्‍हारा भाई प्रवेश भी तो कहीं नौकरी नहीं कर पा रहा है टिककर। उसकी चिंता भी उन्‍हें रहती है।
केवल यही चिन्‍ता तो नहीं है अपने जीवन में। किराए पर रहते-रहते पांच साल गुजर गए हैं। नौकरी से कोई खास अपेक्षा नहीं है। वेतन समय पर मिल रहा है, वही बहुत है।
बिटिया क्‍या अकेली रहेगी? भाई या बहन कोई एक तो उसके सा‍थ होना ही चाहिए।
पहले ही क्‍या कम परेशानियां हैं, जो तुम एक और जीवन को इस दुनिया में सताने के लिए लाने की इच्‍छा पाले हुई हो। फैमिली बैकअप कुछ नहीं है। प्राइवेट नौकरी है। ऐसे में कैसे नीलिमा…!’
प्रशान्‍त को लगा उन जैसे दम्‍पति को अब प्रकृति के सच्‍चे साथ के सहारे ही जीवन काटना है।
उसने प्रेम से पत्‍नी का माथा चूमा, ‘नीलिमा जीवन एक ही बार मिलता है। मरने के बाद कोई भी वापस यह बताने नहीं आया कि वह कहां गया। जब तक हममें एक-दूसरे को देखने की शक्ति है, हमें प्रेम से व निश्चिन्‍त होकर रहना चाहिए। गृहस्‍थ की समस्‍याओं का मिलकर हल ढ़ूंढ़ना चाहिए। देखो न आज प्रकृति कितनी मेहरबान है हम पर! भादो की गर्मी में ऐसा मौसम रोज थोड़े न होता है। आओ इस मौसम को अपने अन्‍दर कूट-कूट कर भर लें। ताकि आने वाली मौसमीय कठिनाइयों और सांसारिक समस्‍याओं से युद्ध करने के लिए यह हमें शक्तिशाली बना सके।
नीलिमा को अपने आप में एक विराट परिवर्तन महसूस हुआ और वह प्रशान्‍त के साथ प्रकृति को भी अपनी बांहों में भरने लगी।

Thursday, December 3, 2015

लोकहित तलाशने की प्रवृत्ति से भरपूर संस्‍मरण

जिंदगी खूबसूरत है, खुशनुमा है और रोमांचक है। यह मानने से ज्यादा महसूस करने की बातें हैं। क्‍योंकि जिंदगी मान्‍यताओं से नहीं, बल्कि जज्बे के सहारे जी जाती है। दरअसल मान्यताएं दिमागी और जज्बा दिली उपज है। इसलिए जज्बा कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी जीने की कूव्वत बरकरार रखता है, मगर मान्यताएं अक्सर नाजुक मौकों पर जिंदगी के प्रति अजब-सी ऊब पैदा कर देती हैं। जिंदगी में कदम-दर-कदम ऐसे मौके आते रहते हैं, जब जिंदा होने का एहसास भी खटकने लगता है। ऐसे मौके पर जरूरत होती है उस नजरिए की, जो जिंदगी में नया जज्बा भर सके। ''अन्‍धेरे उजालों के बीच'' एक हद तक यही कोशिश करती है। इस पुस्तक में सिमटे दर्जनों संस्मरण अपनी लघुता के बावजूद पाठकों की अंतर्दृष्टि को विस्तार देने का काम करते हैं।
          युवा लेखक विकेश कुमार बडोला की यह पहली पुस्तक है। इस कारण स्वाभाविक रूप से इसमें कई नवीनताएं हैं, मगर उनके उल्लेख से पहले पुस्तक की विषय-वस्तु पर चर्चा आवश्यक है। लेखक ने अपने परिवेश, समाज और व्यक्तिगत जीवन से उपजी अनुभूतियों को पुस्तक में संस्मरण की शक्ल में दर्ज किया है। यहां यह प्रश्न उठ सकता है कि क्या किसी आम व्यक्ति के संस्‍मरणों में व्यापक समाज के लिए कुछ उपयोगी हो सकता है? मगर पुस्तक को पढ़ते हुए कहीं भी इसकी उपयोगिता पर संदेह नहीं होता। एक नजर में सभी संस्मरण रोजमर्रा का सामान्य लेखा-जोखा प्रतीत होते हैं, मगर वास्तविकता में ऐसा नहीं है। संस्मरण-दर-संस्मरण जब लेखक की अंतदृष्टि से परिचय होता है, तो महसूस होता है कि हम दिन काटने की जद्दोजहद में जीना भूल गए हैं।
          हमें पेड़ों पर नई कोंपलों का आना, ऋतुओं का बदलना या साफ आसमान में चांद का चमकना किसी उमंग या उल्लास से नहीं भरता। मशीनों की तरह काम करने की विवशता ने हमारी संभावनाओं को भी जड़-सा कर दिया है। इस कारण लोग प्रकृति के सान्निध्य में निहित आनंद की कल्पना से भी दूर हो चुके हैं। विकेश जब संस्‍मरणों में संपन्न होते समाज की इस विपन्नता की ओर संकेत करते हैं, तो सहसा अपनी दुनियावी दृष्टि पर क्षोभ होने लगता है। ''आधुनिकता से लिपटा जीवन-भ्रम'' शीर्षक लिए संस्मरण के कुछ अंशों को इस संदर्भ में देखें, ''जीवन अंकुर फूटे हुए सदियां बीत चुकी हैं। तब से अब तक जीवन-स्तर कई चरणों से होता हुआ इस सदी के इस समय तक पहुंच चुका है। वैज्ञानिक आविष्‍कारों और अनुसंधानों से तैयार अनेक मानव सहायक मशीनों की उपलब्धता ने जहां आदमी को बड़ी राहत दी है, वहीं दूसरी ओर इससे जीवन का स्वाभाविक चलन भी खत्म हुआ है।...मुझे लगता है कि यदि मानवता की कीमत पर मशीनी उत्पादन ऐसे ही होता रहा तो आविष्कारक और उत्पादक ही दुनिया में नजर आएंगे। मनुष्य मिट जाएगा और यदि वह ही नहीं रहेगा तो मशीनी गठन-पुनर्गठन किसके लिए।...आधुनिकता से लिपटे जीवन-भ्रम को सच का दर्पण दिखाने की सख्त जरूरत है। इसके लिए हमें परंपरा से जुड़ना होगा। परंपरा को फिर से जीवन बनाना होगा। मशीन के बजाए मानवता से प्रेम करना होगा।''
पारिवारिक संबंधों में होते बिखराव और औपचारिकता बनते सामाजिक संबंधों की दशा भी कई संस्‍मरणों में गंभीरता से व्यक्त हुई है। ''आगे बढ़ने में पीछे छूटा जीवन'' की इन पंक्तियों में इसे महसूस किया जा सकता है, ''जो लोग पेट के लिए दो रोटी, तन ढंकने के लिए कपड़ा, एक छत और बीमार होने पर दवा के अलावा जीवन में और कोई आकांक्षा नहीं रखते, उनसे प्रेरणा लेकर राजकाज होता,तो पक्का था कि सब कुछ एकदम शांत बहते जल की तरह रहता। सौ बरस की जिंदगी में हजारों-लाखों की संख्या में सामान इकट्ठा करने-करवाने की होड़ आखिर किसने लगवाई। वह तो न जाने कौन से जीवाश्म में बदलकर कहीं निर्जीव पड़ा होगा, लेकिन उसने मानव जीवन का स्वाभाविक आनंद छीन लिया। ''आगे बढ़ना'' जैसे दो शब्द अभी न जाने कितने इतिहास बनाएंगे और उनको पूरा पढ़ने के लिए न जाने कब मानव जीवन अमर होगा।...कंप्यूटर के एचटीएमएल प्रोसेस पर नाचती आज की दुनिया शायद वह सब कुछ बनाए बिना नहीं रुकना चाहती, जो आने वाले सालों में मनुष्य को करना पड़े।...इतना भी क्या आगे बढ़ना कि हमारा आस-पास ही खत्म हो जाए, हमारा वर्तमान ही हम से कट जाए।''
          प्रस्तुति के स्तर पर यह रचना, संस्मरण विधा में नई लीक की मानिंद है। आमतौर पर संस्‍मरणों में कई दशकों का कालखंड देखने को मिलता है, जबकि इसमें बमुश्किल दो वर्षों का जीवन वृत्तांत है। लेखक ने रोज समाप्त होते दिन-रात के प्रहरों, साधारण लगने वाली घटनाओं और आम जिंदगी का सामान्य अनुभव समझी जाने वाली बातों के बीच जीवन-दर्शन के जो बीज तलाशें हैं, वह जिंदगी को नए सिरे से समझने और सहेजने को प्रेरित करते हैं। प्रस्तुति से इतर शैली के स्तर पर भी संस्‍मरणों में नवीनता है। शायद यही वजह है कि कुछ शुरुआती संस्‍मरणों को छोड़कर पुस्तक बोझिल नहीं करती।
          आमतौर पर संस्मरण विधा को नामचीन लोगों के अनुभवों की थाती माना जाता है। मगर ''अन्‍धेरे उजालों के बीच'' यह साबित करती है कि संस्मरण के लिए अनुभवों में लोकहित तलाशने की प्रवृत्ति मायने रखती है, सार्वजनिक जीवन में कद या पद नहीं।
--अभिषेक चतुर्वेदी
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पुस्तक: अन्‍धेरे उजालों के बीच
मूल्य: 300/- रुपए
लेखक: विकेश कुमार बडोला
प्रकाशक: ज्ञानोदय, 57-बी, पॉकेट-ए, फेज-।।,
अशोक विहार, दिल्ली-110052
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नोट: समीक्षा मूलरूप से रविवार 29 नवंबर 2015 को दैनिक राष्ट्रीय सहारा के मंथन पृष्ठ पर प्रकाशित हो चुकी है।