महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Friday, November 27, 2015

पुरस्‍कार लौटाने और देश छोड़ने के पीछे

कुछ दिनों से सुन रहा हूँ कि पुरस्‍कार लौटाए जा रहे हैं। यह भी सुन रहा हूँ आजकल कि देश छोड़ने जैसा भी कुछ जनसंचार में चल रहा है। क्‍या समाचारों में ये अनावश्‍यक विषय ही बने रहेंगे, यह भी सोचने को विवश हूँ। खूब खाते-कमाते हुए कह देना ये हैं पुरस्‍कार, लो हम इन्‍हें लौटा रहे हैं और घोषित करना कि मैं देश छोड़ जाऊंगा तो इसमें कोई दूसरा क्‍या कर सकता है। इन्‍हें लौटाने दो पुरस्‍कार, छोड़ जाने दो देश, क्‍या फर्क पड़ता है। यदि जनसंचार ये समाचार न दिखाए तो आम जनता की सेहत पर इन अति सामान्‍य गतिविधियों से क्‍या अन्‍तर पड़नेवाला है। निस्‍संदेह कुछ भी नहीं। पुरस्‍कार लौटानेवाले और देश छोड़नेवाले धनी लोग हैं। ये पुरस्‍कार लौटाएं या देश छोड़ दें, इन्‍हें भूखा नहीं रहना पड़ेगा और ना ही सड़क पर आना पड़ेगा, इस बात की तो तसल्‍ली है, तो क्‍यों इनके लिए कुछ नौसिखिए पत्रकार व लेखक अपनी मति खराब कर रहे हैं।
            इन घटनाओं और इन पर होनेवाली निरर्थक क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं से यह बात पूरी तरह सिद्ध हो गई कि बौद्धिक होने का दंभ पाले हुए कुछ लोग वास्‍तव में वैचारिक कुण्‍ठा से ग्रस्‍त हैं। इन्‍हें जीवन में सार्थकता और जन-कल्‍याण जैसे कार्यों से कोई सरोकार नहीं है। ये कहीं न कहीं अपनी निरर्थक बौद्धिकता के बूते सीधी-सच्‍ची पुरातन भारतीय व्‍यवस्‍था में छिद्रान्‍वेषण कर रहे हैं। जो व्‍यक्ति सच में जन-कल्‍याण कार्यों को करते हुए मर-खप गए या गई-गुजरी जीवन-स्थितियों में हैं, क्‍या जनसंचार को उनका पता है। पता हो या न हो, पर क्‍या कभी वे जनसंचार में इस तरह छाए रहते हैं जैसे अपने लिए धनार्जन कर आज के लेखक-साहित्‍यकार-नेता-अभिनेता छाए हुए हैं।
            मैं तो मन से इस तथाकथित बौद्धिक जगत से बहुत दूर हूं। मुझे इनके होने या न होने से कोई सरोकार नहीं। शायद इनको भी मेरे होने या न होने से कोई सरोकार न हो। लेकिन इन्‍हें इसका ध्‍यान तो रखना ही पड़ेगा कि प्राकृतिक रूप से इस दुनिया में वही विचार-बुद्धि या विवेक प्रस्‍थापित हो सकता है, जिसके मूल में सत्‍य-मानवीयता-धर्म-मर्यादा हो। ये लोग जिस सोच या विचार को लादे हुए चल रहे हैं, उसका कोई मूल ही नहीं है। और जब सोच-विचार का मूल ही नहीं तो यह सत्‍य-मानवीयता-धर्म-मर्यादा के सर्वश्रेष्‍ठ सांसारिक गुणों के साथ हो ही नहीं सकते। ऐसे विचारकों को अपनी व्‍यक्तिगत वैचारिकी बढ़ानी होगी। इन्‍हें दुनिया-समाज और इनके अंदर घटनेवाली घटनाओं को खुद के निजी नजरिए से देखना होगा। ऐसा होगा तो निश्चित रूप से इनकी सोच में सकारात्‍मक परिवर्तन होगा। तब इन्‍हें साहित्‍य-बौद्धिकता-विचार-लेखन के लिए उस धारा पर चलने की कभी आवश्‍यकता नहीं पड़ेगी, जिसकी मनुष्‍यता को कोई जरूरत नहीं।
            मुझे यह मानने में भी कोई हिचक नहीं कि आज का अधिकांश लेखन-साहित्‍य सुविधाओं का लेखन और साहित्‍य है। सभी जैविक सुविधाओं से सम्‍पन्‍न आज के लेखकों-साहित्‍यकारों की भीड़ को कोई भी सिरफि‍रा नामवर लेखक या साहित्‍यकार यदि अपनी पतित विचारधारा में बहाए लिए जा रहा है, तो यह सिर्फ साहित्‍य की कमी है। यदि सच में साहित्‍य लिखा जा रहा होता और अधिकांश लेखक-साहित्‍यकार शुद्ध-सच्‍चे साहित्‍य को ग्रहण करते, तो यह स्थिति कभी नहीं उत्‍पन्‍न होती, जो आज इस देश में पुरस्‍कार लौटाने और देश छोड़कर जाने के नाम पर हो रही है। सैद्धान्तिक बात यह है कि पुरस्‍कार लौटाने और देश छोड़ने के पीछे के निर्णय और इन पर होनेवाला हल्‍ला निकृष्‍ट है। इसका देशव्‍यापी उल्‍लेख करना ही निरर्थक है।
विकेश कुमार बडोला

Saturday, November 7, 2015

जीवन जैसा चेहरा

जकल एक चेहरा बहुत बेचैन करता है। कभी जीवन की, कार्यालय की सामान्‍य स्थितियों में इस चेहरे को बड़ी शुभकामना से आते-जाते देखा करता था। इस चेहरे पर अपनी दृष्टि टिकती थी तो लगता कितना सुन्‍दर, प्‍यारा चेहरा है! लेकिन इस चेहरे ने कभी भी मुझे उस दृष्टि से देखा ही नहीं, जिसमें उसे अनुभव हो सके कि उसके समीप से आते-जाते कोई उसके सौन्‍दर्य में उड़ता-बहता अवाक, हतप्रभ है।
            आजकल यह चेहरा मुझे पहचानने लगा है। इसकी मुस्‍कुराहट मुझे सपनों के फूलों सी लगती है। इसके स्‍नेह-संकेत (जो वास्‍तव में हैं नहीं, केवल मुझे लगते हैं) मुझे शुष्‍क जीवन में शीतलता के झरने लगते हैं। लगता है जीवन की रूखी-सूखी नदी में पावन जलधारें रेंगने लगी हैं।
            लेकिन अपनी पारिवारिक, सामाजिक सीमाएं इस चेहरे की दूर की सौन्‍दर्य अनुभूति को ही अनुभव करने को कहती हैं। कितना आकर्षण है इस चेहरे में! ऐसा लगता है जैसे यह सुन्‍दरता अपने व्‍यक्तित्‍व के साथ सिंहासन पर विराजमान होती तो इसका कितना व्‍यापक प्रभाव होता। यह सुन्‍दरता रोजगार से न जुड़ी होती तो क्‍या बात होती! इस व्‍यक्तित्‍व के रथ का घोड़ा बनने से किसी को भी आपत्ति नहीं होती। विशेषकर मुझे। मैं चाहता हूँ यह कंचन-विभूति घमण्‍ड में रहे। इस कामिनी की मुस्‍कुराहट वर्ष में एक बार दीपावली की तरह उभरे और इसके लिए मेरे जैसे लोग वर्षभर बेचैन, व्‍याकुल, व्‍यग्र रहें कि दीपावली यानी मुस्‍कुराहट कब आएगी। जो भी हो मैं हतप्रभ हूँ, आत्‍मविभोर हूँ।
            इन दिनों-रातों जीवन बुरी तरह से व्‍यतीत हो रहा है। आज सुबह शीघ्र उठ तो गया पर चाय पीकर फि‍र सो गया। जब दोबारा उठा तो दस बजने को थे। सुबह से ही वातावरण धुन्‍धीला हो गया। रात भी आजकल जल्‍दी ही धुन्‍ध में लिपट जाती है। प्राकृतिक जीवन समाप्‍त हुआ पड़ा है। जो मेरे जीवन का आधार है, वह प्रकृति विरुद्ध है। न पावन नील नभ है, न वनस्‍पतियों की चमचम हरियाली है, न वृक्ष-लताओं का आकर्षण बचा और ना ही चन्‍द्रमा-सितारों का ही अस्तित्‍व रहा। सूरज भी धूल-धुन्‍ध में रल-मिल कर अपने प्रकाश को भारी कर चुका है।
            किसी अनजान व्‍यक्ति की मुस्‍कान से स्‍वयं को प्रसन्‍न करना कितनी शान्ति देता है। आजकल तिपहिया चालक मुझ पर मोहित लगते हैं। एक तिपहिया चालक बहुत सधे ढंग से, यातायात नियमों के अनुसार अपना तिपहिया चला रहा था। यह दो दिन पहले की घटना है। मैं घर के समीप जब उससे उतरा तो उसे अच्‍छे चालन के लिए सराहा। वह प्रसन्‍न था। आज भी एक निजी तिपहियावाला मुझे कार्यालय तक केवल पांच रुपए लेकर छोड़ गया। उसे भी मैंने मेरी यात्रा सुगम व मितव्‍ययी बनाने के लिए धन्‍यवाद दिया। वह भी जिस मुस्‍कुराहट को बिखेर रहा था, उसने मुझे जीने का नया आधार दिया।
            लेकिन आज कार्यालय के समीप मैं अपने दोगुले व्‍यवहार से मन के भीतर परेशान रहा। हे साधु बाबा मुझे क्षमा करना। आप मुझसे कुछ दान मांग रहे थे। मैंने यह तो सत्‍य कहा कि मुझे आठ माह से वेतन नहीं मिला। लेकिन झूठ भी बोला कि मेरे पास आपको देने के लिए खुले पैसे नहीं हैं। तभी वहां अपनी मोटरसाइकिल में सुरेश कुमार शर्मा आया। सुरेश एक सक्रिय, सन्‍तुलित व शिष्‍ट नौजवान है। उसे देखकर अच्‍छा लगता है। उसने मेरे अनुरोध पर साधु बाबा को दस रुपए दे दिए। तभी हमारी कंपनी की एक और लड़की आयी। उसने भी प्रकरण समझकर बाबा को कुछ धनराशि भेंट की, लेकिन मैं आत्‍मलज्‍जा से स्‍वयं को घृणित मानने लगा। मन ही मन साधु बाबा, सुरेश व उस लड़की से क्षमा याचना की और सुरेश के प्रति श्रद्धानत हो गया, उस लड़की के प्रति सम्‍मान अभिवादन करने लगा। मेरे पास पांच सौ बीस रुपए थे, लेकिन मैं दस रुपए साधु बाबा को नहीं दे पाया। मैं अब तक इस गलती, असत्‍य के लिए ह्रदय में पीड़ा महसूस कर रहा हूँ।
            रात बारह बजे तक छत पर टहलता रहा। अपने होने का मूल अनुभव ऐसे एकांत में ही होता है। देर तक कई यादें, अभिलाषाएं विचलित करती रहीं। घर से पिताजी का फोन आया तो माता जी व भाई सुबोध से भी देर तक बातें हुईं। अनुभूतियों के स्‍तर पर आज की सन्‍ध्‍या के बाद का जीवन अच्‍छा लगा। देर रात तक अच्‍छी-सच्‍ची अनुभूतियां गुदगुदाती रहीं।
एक चेहरे की याद में
बुधवार 03.11.2015 का आत्मिक संस्‍मरण