महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Thursday, July 9, 2015

चार आलेख


ईमानदारी से तय हों काम----
ह स्‍पष्‍ट है कि कोई भी नीति, योजना तब ही सार्थक हो सकती है, जब उसका क्रियान्‍वयन उचित प्रशासनिक तंत्र के माध्‍यम से हो। और जब न्‍याय व्‍यवस्‍था, पुलिस व्‍यवस्‍था, शिक्षा-स्‍वास्‍थ्‍य और खाद्यान आदि सभी व्‍यवस्‍थाएं वर्षों पुरानी भ्रष्‍टाचार की मानसिकता से भरी हों, तो डिजिटल इंडिया जैसी योजनाएं बाहर से पार्टी विशेष के नेता विशिष्‍ट की महत्‍वाकांक्षा ही नजर आएंगी। हो सकता है प्रधानमंत्री स्‍मार्ट सिटी, स्‍वच्‍छ भारत, डिजिटल इंडिया योजनाओं और योगमय वातावरण के प्रसार की इच्‍छा इसलिए रखते हों कि इससे अंतत: सबका नैतिक और मौलिक विकास ही हो सके। लेकिन यह तब ही संभव हो सकेगा, जब उन्‍हें शासकीय और प्रशासकीय तंत्र का ईमानदार साथ मिलेगा।
मीडिया की मौलिकता हो जरूरी----
प्रा: देखने में आता है कि जरूरी मुद्दों पर जब राजनीतिक पार्टियों के परस्‍पर वाद-विवाद  होते हैं, तब ही जनसंचार माध्‍यम सक्रिय होते हैं। प्रश्‍न यह है कि क्‍या जनसंचार माध्‍यमों (समाचारपत्र या इलेक्‍ट्रानिक माध्‍यम) को राष्‍ट्र के लिए आवश्‍यक विषयों के बारे में स्‍वयं ही आवाज नहीं उठानी चाहिए? आजकल यह समझना आसान है कि समाचार कैसे धन की शक्ति से बदलने-बनने-बिगड़ने वाली स्थिति में पहुंच चुके हैं। तात्‍पर्य यह कि समाचारों को प्रभावशाली लोग अपने हित के अनुरूप छपवा या हटा सकते हैं। राष्‍ट्र, राष्‍ट्रीयता या मानव कल्‍याण की सत्‍य भावना का विकास क्‍या ऐसी पत्रकारिता के बलबूते कभी हो सकता है? क्‍या इस विषय पर गम्‍भीरता से नहीं सोचा जाना चाहिए? जब तक मीडिया और समाचारों की मौलिकता स्‍थापित नहीं होगी, पत्रकारिता के श्रेष्‍ठ मानदंड कैसे स्‍थापित हो सकेंगे? फलस्‍वरूप व्‍यक्ति, समाज और सरकार का उचित मार्गदर्शन भी ऐसे में कभी नहीं हो सकता।

व्‍यापम के बहाने----
व्‍यापम प्रकरण में उत्‍तरदायी जांच अभिकरणों की सक्रियता और कामकाज की प्रगति रिपोर्ट उस तीव्रता से नहीं आ रही, जितनी तेजी से कांग्रेसियों के नेतृत्‍व में केन्‍द्र सरकार के विरोधी राजनीतिक दल इसके लिए मध्‍यप्रदेश की राज्‍य सरकार को दोषी ठहराने पर तुले हुए हैं। इस प्रकरण में विरोधियों की सीबीआई की जांच कराने की मांग को शिवराज सिंह चौहान ने आखिर मान ही लिया। लेकिन क्‍या सीबीआई उन मौतों की सच्‍चाई तय समय-सीमा में जनता के सामने ला सकती है, जिनको व्‍यावसायिक परीक्षा मंडल के घपले से जोड़ कर देखा जा रहा है? फि‍र सीबीआई भी तो उसी भारतीय राजनीति और प्रशासनिक व्‍यवस्‍था का एक कार्यकारी अंग है, जिसके राजकीय और प्रशासनिक नियंत्रण में व्‍यापम पर संदेह उठ रहा है। यह प्रश्‍न उठना भी स्‍वाभाविक है कि तब सीबीआई को व्‍यापम के सारे राज सच-सच प्रकट करनेवाली संस्‍था के रूप में किस आधार पर देखा जा रहा है? और कल अगर सीबीआई ने मध्‍यप्रदेश सरकार को ससम्‍मान इस मामले से मुक्‍त कर निरपराधी घोषित कर दिया, तो क्‍या तब विरोधी दल ये कहेंगे कि सीबीआई भी केन्‍द्र और राज्‍य सरकार का तोता है?

यौनिक उच्‍छृंखलता की हानि
र्वोच्‍च न्‍यायालय ने केंद्र सरकार से फि‍र पूछा है कि वह पोर्न वेबसाइटों को रोकने के लिए क्‍या कर रही है? उल्‍लेखनीय है कि देश में पिछले दो दशक में यौनिक उच्‍छृंखलता बहुत ज्‍यादा बढ़ गई है। स्‍पष्‍ट है कि इसका सबसे बड़ा कारण पोर्न साइटों, मोबाइल फोनों, फि‍ल्‍मों, टेलीविजन कार्यक्रमों में दिखाया जानेवाला यौनिक खुलापन है। आज अबोध बच्‍चों का जीवन भी यौनिक बात-व्‍यवहार से सुरक्षित न रहा। ऐसे में हम सभ्‍यता की बात करेंगे तो वह कोरी और निरर्थक ही होगी। जो राष्‍ट्र अपने छोटे बच्‍चों के तन-मन को सुरक्षित करने के उपाय नहीं कर पा रहा हो, वहां विकास की बातें और सपने मात्र ढोंग ही होगा। उल्‍लेखनीय है कि दो जुलाई को किराये की कैब में साकेत से फरीदाबाद जा रही एक लड़की को विचित्र यौनिक आक्रमण का सामना करना पड़ा था। उक्‍त घटना में चालक चलती कैब में लड़की को देखकर हस्‍तमैथुन करता रहा। इससे उस लड़की के मन-मस्तिष्‍क को कितना आघात पहुंचा होगा, इसकी सिर्फ कल्‍पना ही की जा सकती है। लेकिन यह भी मननयोग्‍य बात है कि स्त्रियों में बात-व्‍यवहार, पहनावे आदि के रूप में आया खुलापन कहीं न कहीं उनके विरुद्ध हो रहे यौनिक आक्रमण का सबसे बड़ा कारण है।

Tuesday, July 7, 2015

पत्रकारिता क्‍यों न हो मिट्टी के पूत के लिए

प्रा: देखने में आता है कि जरूरी मुद्दों पर जब राजनीतिक पार्टियों के परस्‍पर वाद-विवाद  होते हैं, तब ही जनसंचार माध्‍यम सक्रिय होते हैं। प्रश्‍न यह है कि क्‍या जनसंचार माध्‍यमों (समाचारपत्र या इलेक्‍ट्रानिक माध्‍यम) को राष्‍ट्र के लिए आवश्‍यक विषयों के बारे में स्‍वयं ही आवाज नहीं उठानी चाहिए? आजकल यह समझना आसान है कि समाचार कैसे धन की शक्ति से बदलने-बनने-बिगड़ने वाली स्थिति में पहुंच चुके हैं। तात्‍पर्य यह कि समाचारों को प्रभावशाली लोग अपने हित के अनुरूप छपवा या हटा सकते हैं। राष्‍ट्र, राष्‍ट्रीयता या मानव कल्‍याण की सत्‍य भावना का विकास क्‍या ऐसी पत्रकारिता के बलबूते कभी हो सकता है? क्‍या इस विषय पर गम्‍भीरता से नहीं सोचा जाना चाहिए? जब तक मीडिया और समाचारों की मौलिकता स्‍थापित नहीं होगी, पत्रकारिता के श्रेष्‍ठ मानदंड कैसे स्‍थापित हो सकेंगे? फलस्‍वरूप व्‍यक्ति, समाज और सरकार का उचित मार्गदर्शन भी ऐसे में कभी नहीं हो सकता।
काश ऐसा होता कि मीडिया के विचार के केन्‍द्र में किसान और उनके कार्य होते। उनके बच्‍चों की पढ़ाई-लिखाई, स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाओं के बारे में सोचा-विचारा जाता जनसंचार माध्‍यमों में। पत्रकारिता कृषकों के बारे में क्‍यों नहीं सोचती, उनके बच्‍चों की निश्‍छल हंसी के परिशिष्‍ट क्‍यों नहीं निकालती! कृषकों के परिश्रम का वर्णन, कृषि-कार्य संबंधी उनकी दिनचर्या के समाचार क्‍यों नहीं दिए जाते नियमित रूप से! इन मिट्टी के दीवानों के कारण ही आधुनिकता की सारी शानो-शौकत, राजनीति, काम-धंधे, उद्योग-व्‍यापार, लड़के-लड़कियों की अकड़-ऐंठ, हुल्‍लड़बाजी, प्रेम-नफरत सब है। लेकिन कहां हैं वह संस्‍कार, जो सोचे कि मिट्टी के दीवाने भी पूजे और सराहे जाने चाहिए, पसंद किए जाने चाहिए, उनके ऑटोग्राफ लिए जाने चाहिए, उन पर लड़कियां मरी जानी चाहिए, लड़कों का उन जैसा बनने का स्‍वप्‍न हो। .....कहां हैं, किसी के भी तो नहीं हैं ऐसे संस्‍कार, जो कृषकों को सम्‍मान दे।
क्‍या पत्रकारिता को यहां से शुरुआत नहीं करनी चाहिए प्रत्‍येक दिवस की! यदि यह हो जाए तो व्‍यक्ति, समाज, सरकार सब के संस्‍कार बदल जाएं। दुनिया सहित अपना राष्‍ट्र जीवन की श्रेष्‍ठताओं के साथ रहने योग्‍य बन जाए!
विकेश कुमार बडोला