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Thursday, January 8, 2015

विज्ञान, विकास, जनसंख्‍या


मानव इस सृष्टि का सबसे ज्ञानी जीव है, ऐसा अब तक कहा जाता रहा है। लेकिन अब लगने लगा है कि मानव से ज्‍यादा ज्ञान व समझ तो पशु-पक्षियों के पास है। वो इसलिए क्‍योंकि मानव ने अपने ज्ञान का स्‍वभाव छोड़ दिया। समय के साथ स्‍वभाव के बिगड़ने के कारण आज मानव का ज्ञान मानवीय कम, मशीनी ज्‍यादा हो गया। जबकि पशु-पक्षियों ने अपने स्‍वाभाविक और प्राकृतिक ज्ञान में कमी नहीं आने दी। वे अपने जीवन को सदैव प्राकृतिक रूप से नियत करते आए हैं। अभी तक उनकी जीवनचर्या में परिवर्तन नहीं आया। उनकी नियत गतिविधियां समय में बदलाव के कारण पुनर्नियत नहीं हुईं। उनके जीवन, चाल, चलन और चरित्र में अब तक यदि कोई फर्क आया होगा, तो वह भी मानव के कारण ही है। 
मानव ने विज्ञान के बलबूते इतने उपकरण तैयार किए हैं कि उनका वैज्ञानिक प्रभाव (या दुष्‍प्रभाव) पृथ्‍वी सहित सभी ग्रहों पर पड़ता है। इससे पृथ्‍वी पर विद्यमान वन-वनस्‍पतियां और जीव-जन्‍तु भी प्रभावित होते हैं। वैज्ञानिक प्रयोगों के कारण मानव का जो कुछ भी विकास हुआ, पर वन्‍य-सम्‍पदा और वन्‍य-जीवों पर पड़ रहे विज्ञान के अत्‍यन्‍त दुष्‍प्रभावों ने विकास की अवधारणा को उलझा अवश्‍य दिया है। विकास सन्‍तुलित व समावेशी होना चाहिए। इस युग में नए लगनेवाले किसी वैज्ञानिक आविष्‍कार के फलस्‍वरूप इतना भी नहीं विचलित होना चाहिए कि उसके उचित प्रयोग का संकल्‍प ही भूल जाएं। वैज्ञानिकों और आविष्‍कृत वस्‍तुओं के आधिकारिक स्‍वामियों को जनसंख्‍या घनत्‍व के बीच इनके दुरुपयोग की आशंकाओं पर कई प्रकार से ध्‍यान देना होगा।
सन्‍तुलित विकास का प्रमुख आधार जनसंख्‍या पर नियन्‍त्रण है। जनसंख्‍या को यदि राजनीतिक कारणों से नियन्त्रित नहीं किया जा सकता है, तो उसका विकेन्‍द्रीकरण तो आवश्‍यक रूप से होना ही चाहिए। महानगरों और बड़े शहरों पर बढ़ता जनसंख्‍या भार बहुमुखी समस्‍याओं का मूल कारण है। लोगों को उनके मूल निवास स्‍थान पर रोजगार और उद्योग से जोड़ा जाना चाहिए। इस उपाय से ही जनसंख्‍या का केन्‍द्रीयकरण रुक सकेगा। अर्थात् जनसंख्‍या को उसके मूल निवास स्‍थान में बसा कर भौतिक एवं प्राकृतिक दोनों प्रकार की उन्‍नति सम्‍भव है।
शहरों में लोगों की मूल जीवन आवश्‍यकताओं के समानान्‍तर विलासिता आधारित आवश्‍यकताएं भी तीव्रता से बढ़ी हैं। मनन किया जाए तो इन आवश्‍यकताओं के आधार पर प्रचलित भौतिक वस्‍तुओं की मनुष्‍य को कोई जरूरत नहीं है। रोटी, कपड़ा और मकान की जैविक जरूरतों के बाद भी मनुष्‍य का अत्‍यधिक भौतिक विचरण और लालची व्‍यवहार समाज को अन्‍दर से खोखला कर चुका है। दुर्भाग्‍य यह है कि शासन-व्‍यवस्‍था ने भी सदैव से इस समस्‍या की ओर अपनी आंखें मूंद रखी हैं। यदि सरकारी नीतियां जनसंख्‍या के विकेन्‍द्रीकरण नियम पर संचालित होंगी, तो निश्चित रूप से देश में सुशासन का व्‍यवहार शुद्ध लोकतान्त्रिक रूप से महसूस हो सकेगा। 
देश के दूरस्‍थ क्षेत्र और वहां के कम-से-कम लोग जब मतदान के रूप में लोकतान्त्रिक और संसदीय प्रतिनिधित्‍व करते हुए आए हैं, तो वे जीवन की मूलभूत आवश्‍यकताओं और लोकतान्त्रिक अधिकारों के लिए हमेशा उपेक्षित क्‍यों पड़े रहें! जिस गति से जनसंख्‍या बढ़ रही है, उस गतिनुपात में मूलभूत आवश्‍यकताओं का वितरण नहीं हो पा रहा। और यदि शासकीय स्‍तर पर देश के दूरस्‍थ क्षेत्रों के लिए संसाधनों का आबंटन होता भी है, तो वे वास्‍तविक हकदारों तक पहुंच नहीं पाते।
अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सामाजिक सन्धियों का पालन करने की विवशता ने धर्मनिरपेक्षता और साम्‍प्रदायिकता के अनावश्‍यक खटकर्म पर देश की बहुत ज्‍यादा शासकीय ऊर्जा और शक्ति बर्बाद करवाई है। सीमान्‍त राष्‍ट्रों में समानान्‍तर शासन कर व्‍याप्‍त आतंकवाद ने भी समय-समय पर भारत के लिए अनेक चुनौतियां खड़ी की हैं। इनकी आड़ में देश के अन्‍दर अवैध जनप्रवास भी बड़ा है। दुखद यह है कि सरकार की इसके निराकरण के लिए अब तक कोई ठोस नीति नहीं है। बल्कि वर्ष-दर-वर्ष होनेवाले कई तरह के चुनावों के लिए अवैध प्रवासियों को भारतीय नागरिक होने का मताधिकार दिलवा दिया जाता है। 
आयातित जनसंख्‍या देश के संगठित निर्माण और सेवा क्षेत्र के लिए नियोजित नहीं है। इस तरह के लोग मलिन बस्तियों, झुग्‍गी-झोपड़ियों का विस्‍तार करते हैं। इनके दैनिक रोजगार संगठित राष्‍ट्रीय रोजगार क्षेत्र में नहीं गिने जाते। बावजूद इसके ये बहुत बड़े स्‍तर पर संगठित क्षेत्र के लिए आबंटित मुद्रा के लेन-देन में शामिल हैं। इसी कारण देश में कई समस्‍याएं उत्‍पन्‍न हो जाती हैं। विकास और विज्ञान के साथ जोश से चलने के लिए जनसंख्‍या पर भी तो नियन्‍त्रण करना होगा। तब ही विज्ञानाधारित विकास की सार्थकता सिद्ध होगी।

10 comments:

  1. सुन्दर एवं संतुलित विचार हैं आपके. इसकी वजह से जो आतंकी नेटवर्क देश में पाँव पसार रहा है, वह बेहद चिंताजनक हैं. खासकर वर्धमान मामले के खुलासे के बाद. उम्मीद हैं वर्तमान सरकार हर संभव कदम उठाएगी.

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  2. ये मुद्दा अब सिर्फ चुनावी घोषणापत्र में छपे वादों की तरह हो गया है। सुन्दर पोस्ट।

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  3. चिताजनक स्थिति पे पैनी दृष्टि दौड़ाई है आपने ...
    जनसँख्या पे नियंत्रण आज भारत जैसे देश में बहुत ही मुश्किल है जहां भावनाएं ही भड़काई जाती हैं बस और बोर्डर पे कोई नियंत्रण वोट बैंक के कारण नहीं हो पाता ... अनोखा है अपना देश और इसके कर्णधार .. हर बात पर स्वार्थ का चश्मा ओढ़े रहते हैं ...

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  4. एक ज़रूरी विषय है ये । इस विनिमय का असर हमारी पूरी आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों को प्रभावित करता है ।

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  5. "विज्ञान, विकास, जनसंख्‍या" पर सारगर्भित प्रस्तुति हेतु आभार!

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  6. प्रक्रति, विज्ञान और विकास में एक उचित संतुलन आवश्यक है. आज के समय की समस्याओं का बहुत सारगर्भित आंकलन...

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  7. समस्याओं के तवे पर ही राजनीति की रोटी सेकी जाती है , इसलिए उसे कभी भी जड़ से ख़त्म करने की कोशिश ही नहीं की जाती है . उलटे उसे और भी हवा दी जाती रहती है . फिर विश्लेषण करने के लिए भी तो कुछ होना चाहिए .

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  8. समस्या ही यही है कि आज हर कोई स्वार्थी हो गया है। फिर चाहे वह नेता हो या अभिनेता या फिर आम जनता सभी को केवल अपना उल्लू सीधा करने से मतलब होता है। फिर मुद्दा चाहे कोई भी हो।
    बस इसी बात का फायदा उठती है यह सभी राजनीतिक पार्टियां नतीजा वही है जो आपने लिखा।

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  9. अच्छी पोस्ट आपकी !
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है

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  10. अवैध निवासियों की समस्या वाकई गंभीर है.इन्हें मान्यता देने के दुष्परिणाम देर -सबेर अवश्य सामने आयेंगे.

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