Sunday, December 28, 2014

पूष की रात और दिन

पूष की रात और दिन एक समान बने हुए हैं। रात को तो थोड़ी देर उठ कर जीवन का रोजनामचा लिख लेता हूं, पर सुबह मैं विकट आलस्‍य की चपेट में होता हूं। जीविका का आसन्‍न सं‍कट आने पर भी सुबह देर तक सोया हूं, ये सोच कर आज साढ़े सात बजे उठ गया। बिटिया को स्‍कूल छोड़ा। सुबह-सुबह धुन्‍ध का अन्‍धेरा फैला हुआ था। सड़क पर बीस मीटर के बाद कुछ नजर नहीं आता था। वाहन प्रकाश जला कर धीमे-धीमे खिसक रहे थे।
तेज गति में वाहन चलानेवालों की आज खैर नहीं, सोच कर मन को शान्ति मिली। कम-से-कम धुन्‍ध के सफेद अन्‍धेरे में तो इन अनावश्‍यक गतिशील वाहनों और इनके चालकों पर धीरज का प्रतिबन्‍ध लग सका है। नहीं तो ये वाहन को सड़क सहित उड़ा ले जाने को आतुर रहते हैं और इस आतुरता में इन्‍हें यह ध्‍यान भी नहीं रहता कि मेरे जैसे पथिक भी सड़क पर चलते हैं। सम्‍भवत: वे वाहनों पर बैठ कर भागते हुए मुझ जैसों को कीड़ा ही समझते हैं। तब ही तो कभी भी मुझ जैसों की जीवन-सुरक्षा के भाव से वे अपने वाहनों को संयम और सहजता से नहीं चलाते। हम जैसे तो उन्‍हें सड़क के दाएं-बाएं कहीं नजर आ जाएं, तो उनकी गतिकी के लिए व्‍यवधान बन कर ही उपस्थित होते हैं। लेकिन आज अभी धुन्‍ध के प्रतिबन्‍ध ने इनकी सारी अकड़ ठिकाने लगा दी है। यह देख व महसूस कर मन को बड़ा सुकून मिलता है।
          बिटिया को विद्यालय के द्वार से अन्‍दर जाते हुए देखता रहता। विद्यालय भवन में प्रवेश करते ही वह शीतमिश्रित अन्‍धेरी धुन्‍ध और बच्‍चों की भीड़ में खो गई। उसकी सुरक्षा और भलाई के लिए ईश्‍वर से प्रार्थना करता हूं और विद्यालय भवन के अन्‍दर अदृश्‍य हो चुकी बिटिया को याद करते हुए वापस घर की ओर चल देता हूं।
          वापसी में रास्‍ते पर देखता हूं कई छोटे बच्‍चे अपने अभिभावकों के साथ विद्यालय जा रहे हैं। शीत लहर का झोंका शरीर में कंपकंपी करता है और मैं घर पहुंचने तक बिटिया और विद्यालय सम्‍बन्‍धी भावनाएं भूल चुका होता हूं।
          घर शीताधिकता में अनाकर्षित करता है। घर के द्वार और खिड़कियों सहित सभी वस्‍तुएं शीत की नमी से सिमटी हुई प्रतीत होती हैं। ठण्‍ड में सूर्यप्रकाश के बिना जीवन सिकुड़ जाता है। सभी जीव इस मौसम में एक भावनात्‍मक अवसाद से पीड़ित हो जाते हैं। और मेरा तो इस मौसम में बहुत बुरा हाल है। व्‍यायाम, अध्‍ययन, लेखन-मनन सभी मनपसंद रुचियों-गतियों पर शीत की नमी बिछी हुई है।
          अलसायी दिन-दोपहरी भी जल्‍दी आ गई। कार्यालय जाते समय बल्‍लभ डोभाल जी के घर पर रुका। वे ठण्‍ड से बचने के लिए सारे गर्म वस्‍त्र पहन बिस्‍तर पर पालथी मारे बैठे थे। प्रणाम अभिवादन के बाद कहने लगे, ‘‘बड़ी ठण्‍ड है!! बुड्ढों के लिए यह ठण्‍डी खतरनाक है। दो-तीन दिन से ठण्‍ड लगने के कारण सिर चकरा रहा है। तबियत ठीक नहीं है।’’ उनकी बात सुन चिन्‍तातुर होकर बोला, ‘‘कपड़े पहने रखिए। लकड़ी जलाइए और गर्माहट लीजिए। हीटर है ही आपके पास जलाइए उसे।’’ उन्‍होंने मुझे कुछ निजी कार्य सौंपे और मैं कार्यालय की ओर चल दिया।  
          गलनयुक्‍त पौष जैसे मेरे लिए तन-मन से नर्क बन कर प्रस्‍तुत है। रात को घर पहुंचते-पहुंचते देखता हूं शीत प्रकोप में जन-जीवन घरों में दुबका हुआ है। असहनीय शीत में कोई दूकानदार या पैदल या‍त्री दीख पड़ता है, तो वह बड़ा उद्यमी लगता है।
इतनी रात बीते सड़कों पर जीवन बेशक अनुपस्थित लगे, पर घरों के अन्‍दर तरह-तरह के टेलीविजन चैनलों के समक्ष आधुनिक और प्रगतिशील जीवन आंखें गड़ाए विकास के भ्रम में झूल रहा है, मनोरंजन कर रहा है। विकास की आधुनिक सीढ़ी पर चढ़ता आदमी आज धरती की ओर देखने को राजी नहीं है। विकास का भ्रम उसे जीवन की क्षणभन्‍गुरता के प्रति क्षणांश को भी एकाग्र नहीं कर पा रहा। उसके सिर पर भविष्‍य सवार है और पैरों के नीचे वाहनों के गति-यन्‍त्र लगे हुए हैं। वह भागे जा रहा है। ये जाने बिना कि अन्तिम पड़ाव क्‍या होगा और उसे प्राप्‍त करने के बाद क्‍या करना है!!
     घर पहुंचा तो देखा बिटिया सोई नहीं थी। उसके बचपन पर डाका डाल रहा आधुनिक जीवन का विचार मुझे क्रोध से भर देता है। और मैं रोज ही उसे जल्‍दी नहीं सोने के लिए डांट देता हूं। उसकी खांसी अभी भी बनी हुई है। और मेरी विवशता भी मेरे सिर पर तनी हुई है।
विकेश कुमार बडोला

Saturday, December 20, 2014

आतंक की भेंट

ब तक पाकिस्‍तान के नाम पर थू-थू करता रहा भारत आज उसके प्रति अचानक श्रद्धान्‍‍जलिमय हो गया है। वहां के सेना विद्यालय पर हुए आतंकी आक्रमण में मृत विद्यार्थियों के प्रति भारतीय सम्‍वेदनाएं यहां-वहां सब जगह से टपक रही हैं। ‘----नहीं! नहीं! इसे पाकिस्‍तानी दुर्घटना के रूप में मत लीजिए। बच्‍चे तो सबके समान ही हैं। अरे उनके प्रति हुई ऐसी क्रूरता को भारत-पाक से जोड़ कर मत देखिए। जहां-जहां मैं भटकता हूं, मुझे यही वाक्‍य सुनाई दे रहे हैं।
          मैंने विचार किया, अरे यह तो कुछ-कुछ वैसा ही भावना-प्रदर्शन है, जैसा गुटखा-बीड़ी और मदिरा-चाय का पान करनेवाले कहते हैं कि मदिरा-धूम्र-चायपान स्‍वास्‍थ्‍य के लिए हानिकारक है। लेकिन इनके उत्‍पादन, विज्ञापन, प्रचार-प्रसार के लिए उनमें रोजगार और अधिकार के आधार पर गलाकाट प्रतियोगिता भी साथ-साथ होती है। पाकिस्‍तानी विद्यालय की घटना पर मेरा स्‍वाभाविक विचार पाकिस्‍तान के लिए सम्‍वेदना, सहायता, प्रार्थना के रूप में बिलकुल नहीं उभरा। और मेरा ही क्‍या किसी भी सम्‍वेदनशील भारतीय का स्‍वाभाविक विचार ऐसे देश के प्रति सम्‍वेदन-सहाय-प्रार्थी कैसे हो सकता है!
जो देश आतंक के तीन विकृत ध्रुवों में बंटा हुआ हो, वहां के किस ध्रुव पर विश्‍वास किया जा सकता है। वहां की सरकार, सेना और इन दोनों के कुत्सित गठन से तैयार आतंकवाद कोई पृथक सत्‍ता नहीं है। बल्कि वहां सरकार, सेना और आतंकवादियों को अलग करके देखने का कोई सामाजिक आधार है ही नहीं। ये तीनों चाहे-अनचाहे या मानें चाहकर ही आतंकी कामों में परस्‍पर सहयोग करते रहे हैं। भारत विरोधी पाकिस्‍तानी सैन्‍याक्रमण हो या आतंकाक्रमण, इन्‍हें भौतिक एवं भाविक रूप से वहां की सरकार ही प्रायोजित करती है और सरकार सामाजिक मताधिकार की ही वाहक होती है।
          जब पूरे विश्‍व में अधिकांश परिवारों के लोग भी आपस में प्रेमपूर्वक नहीं रह रहे हों, तब दो कट्टर दुश्‍मन देशों का एक आतंकी घटना के बहाने गाया जानेवाला आतंकविरोधी राग किसी को कितना और कब तक सुहाएगा, ये तो समय ही बताएगा। ईर्ष्‍या, द्वेष, वैर और मतभेद मनुष्‍य के स्‍वयं के साथ भी होते हैं। आत्‍महत्‍या करनेवाले इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। मतभेदों का विस्‍तार बहुत दूर तक हो गया है। भाई का भाई से, बहन का बहन से, पिता का पुत्र से, मां का बेटी से, मित्र का मित्र से, पड़ोसियों का पड़ोसियों से, सरकार का निजी कंपनियों से, कंपनियों का कर्मचारियों से, बड़े पदाधिकारियों का छोटे कर्मचारियों से। जब मनुष्‍य जीवन में मतभेदों की पैठ रिश्‍तों-सम्‍बन्‍धों तक में हो गई हो, तो धर्माधार पर विभाजित दो देशों के बीच पनपे मतभेदों को किसी कीमत पर कभी भी पाटा नहीं जा सकता।
          अनेक विषयों से सम्‍बन्धित मतभेद समाप्‍त किए जा सकते हैं, पर धर्म सम्‍बन्‍धी मतभेद कभी खत्‍म नहीं हो सकते। जब तक पूरे संसार का धर्म एक नहीं होगा, तब तक धर्म प्रणालियों के मतभेदों के कारण उभरनेवाला घरेलू और विदेशी आतंक तो दुनिया को झेलना ही होगा।
          निस्‍संदेह आतंक के कारण आज आधुनिक हो गए हों, लेकिन कारणों की मूल प्रेरणा धर्म से ही उपजती है। आतंक का वास्‍तविक स्‍वभाव, प्रवृत्ति वह नहीं है, जो हमें हथियारों से लैस आंतकवादियों के रूप में नजर आता है। बल्कि इसकी सहज स्‍वाभाविक प्रवृत्ति का निर्धारण तो संसार की लोकतान्त्रिक छतों के नीचे के चार खम्‍भे करते हैं। जो अधिकांश लोकतान्त्रिक देशों में कार्यपालिका, विधायिका, न्‍यायपालिका और प्रेस के रूप में विद्यमान हैं। यह चार स्‍तम्‍भ बौदि्धक चालाकी और चंचलता से भरे हुए हैं। बाकी देशों में तो नहीं, लेकिन इस देश में इनकी भूमिका अब तक अपने सबसे संस्‍कारिक धर्म के विरुद्ध कुतर्क, विवाद परोसने की ही रही है। ऐसी स्थि‍ति में दुर्घटनाएं ही हो सकती हैं।
          बच्‍चों के मरने पर आतंक के प्रतिरोध में बोलने व आंसू बहानेवालों को सबसे पहले अपने भीतर झांकने की जरूरत है। यदि वे भीतर ह्रदय में भी बच्‍चों के कल्‍याण के प्रति अंशमात्र भी चिंतित हैं या होंगे, तो निश्चित रूप से उनके राग में मैं भी शामिल हूं और रहूंगा। और अगर वे छल से व अपने घर-परिवार या राज-परिवार की राजनीति से दुष्‍प्रेरित हो ऐसा व्‍यवहार कर रहे हैं, तो बच्‍चों का मरना जीने से बेहतर होगा।

Friday, December 5, 2014

भाग्‍य के हाथ जीवन की बागडोर

जो कहते हैं कि भाग्‍य कुछ नहीं होता, उनके लिए एक उदाहरण है। एक ओर आ‍स्‍ट्रेलियन क्रिकेट खिलाड़ी की मृत्‍यु का संस्‍कार एक हफ्ते से चल रहा है। दूसरी ओर सुकमा के घने जंगल में नक्‍सलियों द्वारा मारे गए केरिपुब कर्मियों की मौत का दुख एकाध दिन में ही सुस्‍ता गया है। मृतकों के पीड़ित परिवार को अड़तीस लाख देने की घोषणा के साथ राजनीति से लेकर सड़क तक का भारतीय लोकतन्‍त्र अपनी खती हुई दिनचर्या में उलझ गया है।
क्रिकेट खेलते हुए दुर्घटना में मृत फिलिप ह्यूज के लिए आस्‍ट्रेलियन महाद्वीप पूरे 168 घंटों तक शोक-संतप्‍त रहा। उनसे सम्‍बन्धित सभी वस्‍तुओं, भावनाओं, आचरणों, आचार-व्‍यवहार, पसंद-नापसंद का सामूहिक संवेदनाई प्रदर्शन-प्रवचन हुआ। बत्‍तीस वर्ष का उनका छोटा जीवन अचानक बहुत बड़ा हो गया। उनका अन्तिम संस्‍कार भी एक यादगार मेला बन गया। यहां-वहां सब जगह उनके लिए पीड़ा प्रवाहित वक्‍तव्‍य-हस्‍ताक्षर हुए। समाचारपत्रों के खेल पृष्‍ठों में उनकी मृत्‍युपरांत छवि से क्रिकेटप्रेमी भीतर तक भीगे। यह केवल भाग्‍य नहीं बल्कि अहोभाग्‍य है।
सुकमा में देश के लिए मरे केरिपुब कर्मियों के प्रति देशज शोक में वेदना कम औपचारिकता ज्‍यादा है। सुरक्षाकर्मियों की जीवन-सुरक्षा का सच्‍चा विचार उनकी मौत पर बंटनेवाले मुआवजे के नीचे दबा रह जाता है। यदि सरकारी मंशा होती, तो अड़तीस लाख गुणा चौदहका हिसाब पहले लगाती। पांच करोड़ बत्‍तीस लाख की धनराशि से यदि नक्‍सलियों से भिड़ने के लिए नवोन्‍नत युद्ध सामग्री खरीद कर केरिपुब जवानों को दी जाती, तो उनके जीवन बच सकते थे। सीरिया जैसे मुसलिम देशों में इस्‍लामिक स्‍टेट के विरुद्ध अमेरिका ने सबसे उन्‍नत हथियारों से सम्‍पन्‍न होने के बाद भी अभी तक अपनी थलसेना नहीं उतारी। इसका मतलब उसे अपने सैनिकों के जीवन महत्‍वपूर्ण लगते हैं।
कीड़ों की तरह भटकनेवाली जनसंख्‍या में से कई और आएंगे रोजगार के नाम पर सेना में भर्ती होने। जनसंख्‍या की इस देश में कोई कमी नहीं है। इसलिए यहां अमेरिका और आस्‍ट्रेलिया की तरह एक-एक मनुष्‍य का जीवन कभी महत्‍वपूर्ण नहीं हो सकता। यहां तो देश के गौरव-गरिमा के लिए अपना बलिदान देनेवालों के सैन्‍य-वस्‍त्र उनके अंतिम संस्‍कार से पहले ही कूड़े के ढेर में मिल रहे हैं। यह है भाग्‍य-भाग्‍य की बात। जीवन की बागडोर भाग्‍य के हाथ में ही तो है।
फिलिप ह्यूज, चौदह शहीद केरिपुब कर्मियों और सांसारिक भावनाओं की पृष्‍ठभूमि में जाने-अनजाने मर चुके व मर रहे लोगों को भुला-बिसराकर भारतीय गणतन्‍त्र बहस कर रहा है, रामजादों और हरामजादों की परिभाषा में उलझा हुआ है।
उपरोक्‍त का ध्‍यान करते-करते मेरी गम्‍भीर मुद्रा एक वृद्ध को रुष्‍ट कर गई। वह समझा कि मैं अपेक्षित भौतिक सुख न मिलने पर परेशान हूं और बोला, ‘‘बेटे हिम्‍मत रखो। परेशानियों में जीने से ही आदमी निखरता है। सहज भाव से मेरे मुख से निकल गया, ‘‘दद्दू, जी कर क्‍या होगा? जीने के बाद मुझे अवश्‍य बताना कि इससे क्‍या मिला।’’ इस संवाद के बाद मेरे और दद्दू के बीच एक लम्‍बी चुप्‍पी पसर गई। उन्‍होंने मुस्‍कुराते हुए सोचना शुरु किया और धीरे-धीरे डरावनी गम्‍भीरता ओढ़ ली।
इस आलेख को ब्‍लॉग में डालते हुए भारतीय दुर्भाग्‍य फिर से जागा। कल रा‍त तीन बजे के आसपास कश्‍मीर में हमारे दस-ग्‍यारह सैनिक आंतकियों से लड़ते हुए मृत्‍यु को प्राप्‍त हुए।
विकेश कुमार बडोला