Monday, July 21, 2014

जीवन की भूमिका


जीवन की भूमिका ही ऐसी है कि धरती के एक कोने में लोग मरने पर लगे हुए हैं तो दूसरा कोना अपनी दिनचर्या में व्‍यस्‍त है। हथियारों से लड़ा जानेवाला युद्ध हो या मतभेदों का शीतयुद्ध, दोनों के दुष्‍परिणाम मानव व मानवीयता को खोखला करने पर लगे हुए हैं। मानवता की परिभाषा एक व्‍यक्ति, परिवार, समाज, शहर, देश के सरोकारों तक सीमित नहीं हो सकती। इसमें वैश्विक मानवीय सरोकार भी शामिल होने चाहिए। लेकिन सवाल है कि मानवीयता का व्‍यवहार दुनिया में किस तरह फैले? हथियारों को बनाने, इकट्ठा करने व चलाने की होड़ में मनुष्‍यता का भान दुनिया के एक-एक परिपक्‍व आदमी को आखिर कैसे हो? और अगर यह काम नहीं हो पा रहा है तो दुनिया का जीवन चलानेवालों को अपने अन्‍दर झांकना चाहिए। उन्‍हें संसार के बारे में कुछ नवनीतियां बनानी चाहिए। उन्‍हें वैश्विक व्‍यापारिक प्रयोजनों के पीछे छुपी हुई कुटिल मानसिकता के व्‍यवहार से बाहर निकलना होगा। अगर यह नहीं होता है तो आनेवाले दिनों में संसार की कुशलता के बारे में किसी वाद-विवाद की ही जरूरत नहीं पड़ेगी। मतलब दुनिया के देश आपस में लड़-मड़ कर खत्‍म हो जाएंगे।
तो विगत दो शताब्दियों में हुई वैज्ञानिक प्रगति का हासिल यही है? सांस्‍कृतिक जीवन के पतन की आशंका से आज के लोगों के पुरखे ऐसे ही नहीं रोते या परेशान होते थे। उन्‍हें आभास था कि इस तरह की जीवनशैली एक दिन लोगों की मानवीय सोच-विचार की शक्ति को ही खत्‍म कर देगी और वे पाश्विकता के व्‍यवहार की प्रतियोगिताएं करने लगेंगे। उनकी आशंका आज के हालातों में सही सिद्ध हो रही है। इस समय दुनिया में मनुष्‍य की जन्‍म दर से अकाल मृत्‍यु दर ज्‍यादा है। वैश्विक जनसंख्‍या को परिवार नियोजन से कम करके जो जीवन-सुख हासिल हो सकता है वह तो हो नहीं रहा, उलटे पल-बढ़ के बड़ी हुई जनसंख्‍या सैकड़ों-हजारों की संख्‍या में रोज मौत के मुंह में जा रही है। आदमी अगर परस्‍पर मतभेदों, विवादों पर नियन्‍त्रण नहीं कर पा रहा है तो यह उसके आदमी होने पर ही सबसे बड़ा प्रश्‍नचिन्‍ह है।
यह सब कुछ देख-सुन-समझ कर यही सामूहिक धारणा बनती है कि किसी भी किस्‍म के विनाश की चपेट में आनेवालों व मृत्‍यु प्राप्‍त करनेवालों से शेष दुनिया, खासकर नीति-नियन्‍ताओं का कोई इंसानियत का रिश्‍ता है ही नहीं। इस जगत में मतभेदों, युद्ध के निरन्‍तर ऐसे चलते रहने की स्थिति में भविष्‍य में दुनिया के बचे हुए लोगों के जीवन में भी विनाश अपने छींटे डालेगा। वे भी किसी न किसी प्रकार से विनाश की चपेट में आएंगे और उसके बाद बची हुई जनसंख्‍या उन्‍हें भी भुलावे की भेंट चढ़ा देगी। बर्बादी की आग में झुलसने से बचे हुए लोग ऐसे हालात में कब तक खैर मनाएंगे। हाथ पर हाथ रखकर अकाल मौत का ताण्‍डव देखते रहने की सजा स्‍वार्थी मनुष्‍य को हमेशा मिलती रही है और आगे भी इसमें कोई कमी नहीं होनेवाली। इतिहास देखें तो यह सब नई बात नहीं है, लेकिन भगवान को निर्दोषों की पुकार तो सुननी ही चाहिए। जिसने कोई गलत काम नहीं किया है, जो हिंसा में दूर-दूर तक भावना के स्‍तर पर भी शामिल नहीं है, उसकी सुरक्षा तो जगत-नियंता को करनी ही चाहिए। नहीं तो नए माता-पिता के पास बच्‍चा पैदा करने का कोई नैतिक अधिकार ही नहीं बचेगा।

Thursday, July 17, 2014

मन ही मन २

 पनी हालत अस्थिर है। सब कुछ अव्‍यवस्थित है। इसी कारण लेखन भी नहीं हो पा रहा। कल ज्‍यादा कुछ सोचे-विचारे बिना दो पंक्तियां ब्‍लॉग में डाल दीं। अब लग रहा है कि केवल इन पंक्तियों को डालने का कारण स्‍पष्‍ट करूं। 
वास्‍तव में पिछले दो महीने बहुत कष्‍टकारी रहे। दो पारिवारिक समारोह हुए। उनमें शामिल होने के बाद से लेकर अब तक लेखन पर जैसे मोटी जंग लग गई है और जैसे-जैसे दिन गुजर रहे हैं, लेखकीय क्षमता भी खत्‍म हो रही है। विचारों को प्रकट करने की शक्ति कम हो रही है। घर-परिवार, समाज-सम्‍बन्‍ध, नौकरी-पेशे और नितान्‍त व्‍यक्तिगत जीवन की समस्‍याओं में उलझा हुआ हूँ। 
भारतीय राजनीति, अर्थनीति, कूटनीति और वैश्विक नीति से आजकल उसी तरह अनजान हूँ जैसे कोई पांच-छह साल का बच्‍चा रहता है। इससे मानसिक शान्ति मिल रही है। जीवन की एक सीधी राह पर चलनेवाला जीवन की टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों से अनजान रहता है। वैचारिक प्रदूषण से भरी इन पग‍डंडियों से एक दिन सीधे इंसान को भी गुजरना पड़ता है। तब मालूम होता है कि लोगों की सोच कितनी टेढ़ी है! आसान दिखनेवाले जीवन के ये छोटे रास्‍ते मंजिल तक जल्‍दी पहुंचने के लिए चुने जाते हैं, पर इनमें मौजूद दुर्भावनाओं का जहर आदमी को मंजिल आने से पहले ही अचेत कर देता है। इन राहों को चुनकर मंजिल का मतलब भी क्‍या रह जाता है, कुछ नहीं। तब भी लोगों के विचार नासमझी के पूर्वाग्रह से जकड़े रहते हैं। देखादेखी वे सीधे रस्‍ते के बजाय आसान पर सब कुछ बर्बाद करनेवाले रस्‍तों को ही आगे बढ़ने (बर्बाद होने के लिए) के लिए स्‍वीकार करते हैं। 
      कभी जीवन के हिस्‍से में निराशा, घोर उदासीनता भी आती है। तब आशा, विश्‍वास, संकल्‍प, आत्‍मविश्‍वास के व्‍यक्तिगत सिद्धान्‍त चाहकर भी साथ नहीं रहते। कालकोठरी, अन्‍धेरा, एकान्‍त, और मानवीय अनुपस्थिति ही मन को भाती है। एक प्रकार से यह परिवार, सरकार और प्रकृति के कारण जन्‍मी उस दुखकारी क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, जिसे चाहकर भी रोकना सम्‍भव नहीं होता। 
इस सदी में कुछ भी अच्‍छा करो, वह राजनीति की सन्‍देहभरी दृष्टि से देखा जाता है। इस सम्‍बन्‍ध में बाहर के लोगों से इतनी शिकायत नहीं होती, लेकिन जब अपने घर के पढ़े-लिखे व स्‍थापित समझदार मेरे अच्‍छे कदम को कूटनीति, उपहास की नजर से देखने लगते हैं तो फिर खुद पर कोई नियन्‍त्रण नहीं हो पाता और अपने लिए आत्‍मपरीक्षण का एक क्षण जुटाना भी कठिन हो जाता है। ऐसी किंकर्त्‍तव्‍यविमूढ़ स्थिति में गम्‍भीर स्‍वभाव अगर गुस्‍से में बदलता है तो अपने-पराए सभी मेरे पक्ष में नहीं रहते। वे तुरन्‍त बेगाने हो जाते हैं। गुस्‍सैल स्‍वभाव के पीछे छिपी व्‍यक्ति की नैतिकता की इच्‍छा से अनभिज्ञ होते हैं।
अपनों को आदर्श स्थिति में जीवन गुजारने की सलाह देना उलटा असर दिखा रहा है। मिलकर रहने की बात पर वे इस सन्‍देह से भर उठते हैं कि कहीं इसकी नजर हमारे आर्थिक हितों पर तो नहीं। अच्‍छी जिन्‍दगी के लिए की जानेवाली मेरी अच्‍छी पहल से कोई भी सहमत नहीं होता। घरवालों की सोच के अनुसार कुछ नया मत करो। बस नौकरी करो। सम्‍बन्‍धों को स्‍नेह से रिक्‍त रहने दो। स्‍वार्थ की भावना को बढ़ाओ। समस्‍याओं के दलदल से बाहर मत निकलो। इसमें फंसे रहो। यथास्थिति बनाए रखो।
उनके मन का यह हाल उनके चेहरों व व्‍यवहार से आसानी से समझा जा सकता है। और इस जीव को इस वातावरण में घुट-घुट के रह जाने के अलावा फिलहाल कोई रास्‍ता नहीं नजर आता। निराशा की संकरी गली में मन ही मन बुदबुदा रहा हूँ..................        
................वफा का चलन हमेशावाला मैंने नहीं अपनाया
खामोशी से मन ही मन में मैंने तुमको चाहा....................

Wednesday, July 16, 2014

मन ही मन


वफा का चलन हमेशावाला मैंने नहीं अपनाया
खामोशी से मन ही मन में मैंने तुमको चाहा....................

Thursday, July 10, 2014

धरतीपुत्र खड़ा चौराहे पर

हवा तेरा स्‍पर्श तो हरेक पाता है
मतभेदों से तपते शरीरों तक भी
तो तेरा रास्‍ता जाता है
इनके मस्तिष्‍कों तक भी
अपनी शीतलता पहुंचा
आज धरतीपुत्र 
खड़ा चौराहे पर
भ्रमित और संशकित
अंतर्दृष्टि उसकी अज्ञात 
देखे वही जो बाहर अंकित
वह राष्‍ट्रीय अस्मिता की 
चुनौतियों से लड़े या
क्रिकेट, कोला, बॉलीवुड
शासकीय तंत्रों से भिड़े
या पाश्‍चात्‍य जीवन
के चक्‍कर में पड़े
अज्ञानी वह सोच न पाए
धर्मप्राण उसके सूखते जाएं
धर्मभाइयों को 
हताश, निराश और
विरोध में मातृभूमि के 
अलग-थलग खड़े देख
राष्‍ट्रीय एकता रो रही है
ऐसे ही चलता रहा
तो धूर्तता जीत जाएगी
पुनीत भारतीय पृथ्‍वी 
रसातल हो रहस्‍यलोक 
बन जाएगी