महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Friday, March 28, 2014

आजकल मेरे साथ

जीवन में कितना कुछ है! कितना कुछ प्राकृतिक और कितना आधुनिक है, इसकी सही गणना करने के लिए हमारा जीवन बहुत छोटा है। प्रकृति से प्रभावित रहूं या भौतिक जगत की तेज गति में शामिल होऊं? इसका उत्‍तर मुझे स्‍वयं से ही मिल जाता है। मैं तो प्रकृति प्रेमी हूं। इससे कैसे विमुख हो सकता हूं! भौतिक जीवन की कठोरता जब कभी बहुत ज्‍यादा विचलित करती है तो अपनी अन्‍तर्चेतना में स्थिर हो जाता हूं। तब धूमिल विचार और भावनाएं स्‍पष्‍ट दिखने लगती हैं। मैं इनको पकड़कर इन्‍हें नहीं छोड़ने के संकल्‍प लेता हूं। लेकिन यह सब समय की एक छोटी अवधि में ही घटित होता है। जैसे ही यह समयकाल व्‍यतीत होता है मेरी वैचारिक चंचलता मुझ पर हावी हो जाती है। अंतत: मैं विचारों की निरर्थक यात्रा करता हूं। इससे मेरी झोली में कोई विशेष व्‍यक्तित्‍व उपलब्धि नहीं गिरती। मैं निराशा के पथ पर अन्‍धयात्रा करता रहता हूं।
     आजकल मेरे साथ यही हो रहा है। चैत्र माह में भी वर्षा की बूंदें आसमान से गिर रही हैं। स्‍वास्‍थ्‍य के मामले में उत्‍तर भारत बुरी तरह खांस रहा है। लोगों की सर्दी-जुखाम, कफ-बलगम खत्‍म नहीं हो रहे। तरह-बेतरह की बीमारियां बहुतायत में फैल रही हैं। अपनी बुद्धि और विवेक को किसी की मजबूत पकड़ में पाता हूं। कुछ भी नवविचार नहीं कर पाता हूं। बस लगता है अपना रूपान्‍तरण एक मशीन में हो गया है, जिसका रिमोट किसी राक्षसी शक्ति के हाथ में है। यहां-वहां जाते हुए सिर्फ अपने शरीर के दर्द याद रहते हैं। कहीं आराम से बैठने पर भी अपने बेहोश होकर गिरने का ही अहसास होता है। मृत्‍यु की बांहों में लगभग समाते-समाते कोई ऊर्जांश रोक देता है। एक जीवन-दीवाल बाहों और मेरे बीच में बना देता है और मैं दबा-कुचला-पिटा-कुटा किसी तरह हारी हुई सांसों के साथ खड़ा रहता हूं। बहुत कुछ करने का विचार बार-बार दीए की तरह बुझने से पहले तेजी से जलता है और दपsss से बुझ जाता है……एक निराश-हताश-उदास भाव का धुंआ छोड़ते हुए।
            मैं बहुत आशावान भी हूं। विशेषकर प्रकृति को देखकर मैं विशेष ऊर्जा से भर जाता हूं। लेकिन भौतिक-आधुनिक-धात्विक उपक्रमों से प्रायोजित सांसारिक भावनाएं जबरन ठेलकर मुझे भी अपने में घसीट लाती हैं। इस घटने के दौरान याद आता है कि कुछ दिन पहले यात्रियों से भरा एक विमान आसमान से गायब हो गया था। मनुष्‍यों को यात्रियों कहना मानवीयता का कितना बड़ा अपमान है! कम से कम दिवंगतों की अन्तिम भावनाओं का ध्‍यान तो रखा होता संसार के शेष बचे हुए जीवन ने। संसार की उन्‍नत प्रौद्योगिकी के सहारे गायब विमान को कई दिनों तक ढूंढा गया। लेकिन उसका पता अब चला, जब विमान और उसमें सवार लोगों के जीवाश्म ढूंढना भी चुनौती बना हुआ है। विज्ञान अभिशाप है। यह धारणा इस दुर्घटना से अभिपुष्‍ट हो चुकी है।
समाचारपत्र के एक कोने पर खबर थी कि गुजरे जमाने की मशहूर अभिनेत्री नन्‍दा
एक थी बुलबुल
नहीं रहीं। नन्‍दा जी क्षमा चाहता हूं। जब सुबह उठकर आलस्‍य में अखबार उठाया तो आपके निधन की खबर को पहले-पहल उड़ते-उड़ते ही पढ़ा। आराम से चाय पी और आपको राजनीति की खबरों को देखने की लालसा के चलते भुला बैठा। जब
जब-जब फूल खिले का ये समां, समां है ये प्‍यार का किसी के इंतजार का गाना याद आया, आप पर चलचित्रित यह गाना और आप की युवावस्‍था की मासूम तसवीर याद आई तो वापस आप के निधन के समाचार पर आकर रुक गया। पिचहत्‍तर साल आपने जीवन में बिताए। कम्‍बख्‍त किसी समाचार चैनल या पत्र-पत्रिका ने आप के युवावस्‍था के बाद के जीवन की कोई झलकी दिखाई ही नहीं कभी। कि आप कहां हैं, क्‍या कर रहे हैं, आराम से हैं या कष्‍ट में हैं? कैसी मतलबी दुनिया है! एक था गुल और एक थी बुलबुल गाने में आप घोड़े की सवारी करते हुए कश्‍मीर की वादियों में कितनी मासूम सुन्‍दरता से घूम रही थीं! आप के चाहनेवाले आपके साथ-साथ चल रहे थे। लेकिन आपकी वो दुनिया और आज का यह मोबाइल संसार कहीं से भी एकसमान नहीं बचा। विशेषकर मानवीय भावनाओं के मामले में। इस समय आप जैसी सादगी और सद्भावी व्‍यक्तित्‍ववाले जन्‍म लेते ही वापस अन्‍धेरे की राह पकड़ लेते हैं। वे जीवन के इस काल में पग ही नहीं रखना चाहते। उन्‍हें यह कलिकालिक समय दमघोंटू लगता है। जो लोग आपको आपके जीवन के उत्‍कर्ष सहित याद कर रहे होंगे वे बहुत धन्‍य होंगे! और जो आपको, आपके दुखों को अनुभव करते हुए याद करते होंगे तो आप कितनी धन्‍य हुईं! भगवान आपकी आत्‍मा को शान्‍तप्रशान्‍त करें। इस प्रार्थना के साथ मैं आपकी यादों से अलग हो रहा हूं।

Sunday, March 16, 2014

बच्‍चों की होली


ये दृष्टिबाधित बच्‍चे होली खेलते हुए कितने निर्मल लग रहे हैं! इनकी भावनाएं कितनी रंग-रंगीली हैं! इनके आत्‍मविश्‍वास को मानना पड़ेगा कि ये वसंत के चरम को आंखों से देख नहीं पा रहे हैं फिर भी उसे आंखोंवालों से भी ज्‍यादा अनुभव कर पा रहे हैं। इनकी प्रसन्‍नता होली के रंगों के साथ मिलकर कितनी रंगीली हो गई है!









Friday, March 14, 2014

राज व्‍यवस्‍था या नक्‍सली, दोषी कौन?

मानव ने अपने जीवन को जब से अपने वश में किया है तब से वह बहुत ज्‍यादा उलझ गया। जब तक वह प्रकृति के साथ अपने जीवन को जोड़े हुए था तब तक जीवन-जगत एक महान अभ्‍यास था। प्रत्‍येक व्‍यक्ति कर्म-धर्म-मर्म से परिचित था। इनका परिचय प्राप्‍त कर लेना मनुष्‍य के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी। आज यदि मनुष्‍य इनसे विमुख है तो यह त्‍वरित नहीं हुआ। जीवन को ऊंचे स्‍तर पर समझने में जो उक्‍त कारक सहज ही पहले के मानवीय-जीवन में सम्मिलित थे, आज उनसे जुड़ने के लिए अल्‍पायु जीवन में कई बार सोचना-विचारना पड़ता है। ऐसी स्थिति में जीवन के वास्‍तविक कर्म पूरे नहीं हो पा रहे हैं। मनुष्‍य का एक ही प्राथमिक एवं अन्तिम कर्म रह गया है। यह है जीविकोपार्जन। समाज के स्‍वभाव को आदर्श तरीके से स्‍थापित करने के बारे में सोचने के लिए हम स्‍वप्रेरित नहीं हैं। इस ओर यदि हममें से कुछ लोग अग्रसर हैं भी तो यह संस्‍थागत रूप में होता है। कोई भी मनुष्‍य कल्‍याण-कार्य सामाजिक कम और व्‍यापारिक अधिक प्रतीत होता है।
     एक तन्‍त्र विशेषकर लोकतन्‍त्र क्‍यों बनता है? इसके अन्‍तर्गत शासन प्रणाली और विधिक व्‍यवस्‍था क्‍यों स्‍थापित होती है? इसीलिए कि निर्धारित भूखण्‍ड जो किसी राष्‍ट्र की पहचान है, उसके सभी व्‍यक्ति शासकीय और विधिक व्‍यवस्‍था की सुरक्षा में अपनी मूलभूत जीवन आवश्‍यकताओं को सुगमता से प्राप्‍त करें। सबकी मूलभूत आवश्‍यकताएं पूरी हों। योग्‍य व्‍यक्ति शासन पद्वति और विधि व्‍यवस्‍था से जुड़ें ताकि शासकीय स्‍तर पर प्रतिपादित नियमों को समाज हित में समुचित तरीके से लागू किया जा सके।
लेकिन यदि इन सब शासकीय मूल-मान्‍यताओं और उद्देश्‍यों से भटककर शासक निजी बातों, विचारों और सिद्धान्‍तों को शासकीय प्रणाली और विधिक व्‍यवस्‍था के नाम पर लोगों पर थोपेंगे तो कैसे कोई लोकतान्त्रिक अवधारणा स्‍वयंसिद्ध हो सकती है! लोकतन्‍त्र सुचारू रूप से तभी चल सकता है जब इसकी भावना को शासन के स्‍तर पर प्रतिदिन सुदृढ़ बनाया जाएगा। और ऐसा भी तभी सम्‍भव हो सकता है जब लोक और इसका तन्‍त्र एक दूसरे की आवश्‍यकताओं एवं इच्‍छाओं को ढंग से जाने। जब लोक समाज अपने जैविक मूल्‍यों को व्‍यावहारिक बनाए और जब राज व्‍यवस्‍था लोकोपकार के लिए उनके जैविक मूल्‍यों का हनन करने के बजाय उनका संरक्षण करे।  
लोक की भावना यदि अपनी परम्‍परा से जीवनयापन करने की है और तन्‍त्र उसे आधुनिक बनने को विवश करे तो यह स्थिति संघर्ष को जन्‍म देगी। इसी का परिणाम है नक्‍सली, उनका केरिपुब के सुरक्षाकर्मियों से युद्ध। जो लोग शहरों में हैं सरकार से वे भी नाराज हैं। वे भी अपने जीवन पर शासकीय पहाड़ से गिरते उस विचारधारा के झरने को विवशता से सह रहे हैं, जिसमें शामिल होकर अधिक से अधिक बार उन्‍हें लगता है कि वे ठगे गए। शहर में रहकर उनकी मूल जीवन आवश्‍यकताओं की पूर्ति के बहाने उनके जीवन को ऐसे मशीनीकरण से लपेट दिया गया है, जिसमें उनकी मुख्‍य जरुरतों (रोटी, कपड़ा, मकान, दवाइयां), जिनके लिए वे शहर पर आश्रित हुए थे, की गुणवत्‍ता इतनी भी नहीं रही कि ये उन्‍हें जीवन के कुछ वर्षों तक स्‍वस्‍थ, सहज, नीरोग रख सकें। तो ऐसे शहरीकरण, शहरीकरण को पोषित करनेवाले ऐसे लोकतन्‍त्र की क्‍या जरूरत है? प्रश्‍न यह भी है कि जब शासकीय परिधि के अन्‍दर तमाम व्‍यापारिक और जीवन से जुड़ी गतिविधियां नैतिकता-मौलिकता-सामाजिकता से विमुख हैं, तो इन्‍हें संचालित, व्‍यवस्थित, शासित करनेवाले तन्‍त्र की लोक को क्‍या जरूरत है? नक्‍सलियों का अभियान कहीं इसी सोच से तो नहीं जन्‍मा? और यदि यहीं से जन्‍मा है तो इसमें गलत कौन है नक्‍सली या राज व्‍यवस्‍था

Friday, March 7, 2014

मानव नहीं हम रोबोट कहलाएंगे

जकल हालात बहुत उथल-पुथल वाले हैं। राजनीति की गरमी। चुनावी लहर। मौसमीय गर्मी और ठण्‍ड। सब कुछ तेजी से बदल रहा है। एक व्‍यक्ति का सोचने का नजरिया ही बदल गया है। इक्‍कसवीं सदी की व्‍यवस्‍था में कितना कुछ हो रहा है। सामान्‍य आदमी के पास किसी घटना के घटने का सही कारण नहीं होता। उसे जानकारी नहीं होती कि कोई घटना किस एवज में घट रही है। सामान्‍य व्‍यक्ति से दूर घटित होती शासकीय कुटिलता सब कुछ निगलने वाली है। घटनाओं, गतिविधियों, भाषणों, वार्ताओं, उद्घाटनों, अधिसूचनाओं में समाज का सच कहीं गहरे दबा हुआ है। उजाले की महिमा को अंधेरों ने मजबूती से रोका हुआ है। देश में जो नहीं होना चाहिए वो फटाफट हो जाना चाहता है। जिनको नहीं होना चाहिए वे जबरन खुद को स्‍थापित करने पर लगे हुए हैं। आखिर इस सबसे क्‍या हासिल होगा। मनुष्‍य की भागदौड़ का लक्ष्‍य क्‍या है। इस तक पहुंचने के बाद क्‍या करेगा वह। आराम और शान्ति जैसे शब्‍द अप्रासंगिक हो चले हैं। एकान्‍त खतरे में है। हमें अपनी दिनचर्या में दिल में क्‍या याद रहता है। हम अपनी स्‍वयं की जान-पहचान के लिए एक पूरे दिन में कितने प्रयास करते हैं।
अकेले में स्‍वयं को पहचान, बाकी तो सब है व्‍यवधान
क्‍या हम सब खुद को जान चुके हैं। अगर नहीं तो इधर-उधर की भटकन क्‍यों परेशान किए हुए है सबको। हम जैसे ही शरीर और सोच-विचार वाले पहले भी इस दुनिया में आए। वे भी अपने समय की हलचलों में विचलित हुए। पर अब वे नहीं हैं। हलचलें लेकिन अब भी हैं। तो उनका अपने समय की उथल-पुथल से चिंतित होने का क्‍या कारण था। क्‍या यह नहीं कि वे स्‍वयं को नहीं पहचान पाए। हां बिलकुल यही। जो कुछ हो रहा है वह सब प्रारब्धित है। उसमें हमारा मन-विचलन-चिन्‍तन कोई अन्‍तर नहीं डाल सकता। तब भी हम जैसों को यानि कि आकाश से उपग्रह से कीड़े-मकोड़े नजर आनेवालों को अपने भावनात्‍मक अधिकार की चिन्‍ता रहती है। हम डरे हुए रहते हैं कि हम हर जगह, हर बात, प्रत्‍येक घटना, छोटी-बड़ी घटनाओं से प्रत्‍यक्ष क्‍यों नहीं जुड़े हुए हैं। सबकी जानकारी प्राप्‍त कर अप्रत्‍यक्ष रूप से भी क्‍यों नहीं उनसे जुड़े हुए हैं। दिमाग को कबाड़-भण्‍डार बना दिया है। क्‍या भरा है इसके अन्‍दर। सब कबाड़ ही तो है। एक बार इसे खाली कर देखिए। कितना मजा आएगा। थोड़ी देर के लिए भूल जाइए कि हम सांसारिक उथल-पुथल में शामिल हैं। मान लीजिए कि आप मरे हुए लोगों की तरह हैं, जो सांसारिक घटनाओं के उबाल से अंशमात्र भी परिचित नहीं हैं। हमारे दुख का यही कारण है। हम हर जगह शरीर या भाव-विचार रूप में उपस्थित रहना चाहते हैं। इससे मुक्ति पाइए। स्‍वयं को जानिए। अपनी पहचान करिए। मैं तो ऐसा ही करनेवाला हूं। नहीं तो बाईसवीं सदी में उछल कर पहुंचने को आतुर दुनिया में हम निश्चित मशीन बन जाएंगे। मानव नहीं हम रोबोट कहलाएंगे। तब भावनाएं कहा से लाएंगे। और यह नहीं होंगी तो समझिए जीवन समाप्‍तप्राय हुआ। तेजी से व्‍यतीत हो रहे जीवन में मानव को पता नहीं कितनी वस्‍तुओं की लालसा है। क्‍या हमें स्‍वयं की स्‍वयं के लिए उपलब्‍धता नहीं चाहिए। अपने साथ गुजारा हुआ ऐसा समय नहीं चाहिए, जिसमें हमें अपने होने न होने का कारण ज्ञात हो सके। मैं उम्‍मीद करता हूं कि समय का छल लोगों को और अधिक नहीं भाएगा। वे भौतिक भ्रम से निकलकर सार्थक जीवन तत्‍व को पहचानेंगे।

Saturday, March 1, 2014

सौ% मतदान के लिए

लोकतन्‍त्र शब्‍द सही मायनों में सिद्ध हो, इसकी व्‍यावहारिकता एक-एक नागरिक के व्‍यक्तित्‍व में सुख-शान्ति-समृद्धि के रूप में दिखाई दे, ऐसी शुभकामना है। अगर शुभकामना से ही काम चल जाता तो कितना अच्‍छा होता। लेकिन हम जानते हैं कि लोकतन्‍त्र को मजबूत करने का कर्त्‍तव्‍य सभी का है। इसके लिए सभी को अपने-अपने स्‍तर पर प्रयास करने चाहिए। भारतीय निर्वाचन आयोग हरेक नागरिक से अपना मत प्रयोग करने का अनुरोध करता है। अनुरोध कार्यान्वित हो इसके लिए उसे चुनाव से कम से कम एक साल पहले तक सभी चुनावी केन्‍द्रों में ठोस चुनाव-व्‍यवस्‍था बनानी होगी।
इस प्रकार एकत्रित जनसमूह मतदान भी कर सके तो बात बने
सामान्‍यत: लम्‍बी कतार में लग कर मतदान करने में एक व्‍यक्ति को एक डेढ़ घण्‍टे तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। ज्‍यादातर लोग तो देर तक पंक्ति में लगने और प्रतीक्षा करने की कठिनाई के कारण मतदान करते ही नहीं हैं। अमीर लोग भी लोकतन्‍त्र के इस मेले में शामिल होना अपनी निन्‍दा समझते हैं। यदि एक दो करोड़ इस तरह के लोग कतार में लगने के कारण मतदान नहीं करते हैं तो इससे भी चुनावी परिणाम प्रभावित होते हैं। एक या दो करोड़ मत बहुत होते हैं। मतदान-असुविधा के कारण ज्‍यादातर मतदाता मतदान से वंचित रहते हैं। ऐसे में संभावी लोकतान्त्रिक व्‍यवस्‍था में वे अपने लोकतान्त्रिक अधिकार को किस प्रकार महसूस करेंगे? इस उदासीनता को दूर किया जाना चाहिए। ऐसे सम्‍पूर्ण वोटिंग का उद्देश्‍य कभी पूरा नहीं हो सकता। निर्वाचन आयोग को लोकतन्‍त्र को महत्‍वपूर्ण बनाने के क्रम में अपने चुनाव सुधार कार्यक्रम में बहुत से नए प्रयोगों को जोड़ना होगा।
 यह भी देखने में आता है कि नाम, पते, आदि की गलतियों के कारण मतदातागण मतदाता पहचान-पत्र होते हुए भी मतदान नहीं कर पाते हैं। या मतदाता-सूची में कई मतदाताओं के नाम चढ़े ही नहीं होते या व्‍यक्ति विशेष को अपने मतदाता-पत्र में मुद्रित व्‍यक्ति-विवरण मतदाता सूची में नहीं मिलते। इस कारण वह मतदान से वंचित ही रहता है। जब चुनाव प्रचार-प्रसार की साल छह माह पहले से ही तैयारी हो सकती है तो मतदान के लिए एक ही दिन क्‍यों निश्चित है! अगर समयाभाव से सभी मतदाता अपने मत का प्रयोग नहीं कर पाते तो निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली और उपयोगिता पर संदेह होना स्‍वाभाविक है। उसे अपनी चुनावी तैयारियों पर पुनर्दृष्टि डालने की सख्‍त जरूरत है। 
इक्‍कीसवीं सदी में जबकि प्रौद्योगिकी कई स्‍तरों पर कई महत्‍वपूर्ण दैनिक कार्य निपटाने में मनुष्‍य की सहायता कर रही है। और इससे समय की बचत और कार्य-निष्‍पादन समुचित व पारदर्शी बन रहा है तो मतदान के लिए भी ऐसी ही किसी प्रौद्योगिकी का प्रयोग अब तक क्‍यों नहीं निश्चित किया गया? मतदान-केन्‍द्रों पर एक वोटिंग मशीन के बजाय मतदाताओं की संख्‍यानुसार मशीनें लगाई जाएंगी तो एक मतदान का समय कुछ सेकंड न सही पर घण्‍टों की बर्बादी से बचने के लिए कुछ मिनट तो हो ही सकता है। अगर मतदान के दिन बैंक क्रेडिट या डेबिट कार्ड की तरह ही मतदाता पहचान-पत्र को भी केन्‍द्रीयकृत स्‍वैपिंग सिस्‍टम से जोड़ दिया जाए तो सौ प्रतिशत मतदान की गारण्‍टी दी जा सकती है। इसके लिए एक ऐसा सॉफ्टवेयर तैयार किया जा सकता है, जिसे मतदान के दिन पूरे भारत में सभी बैंक एटीएम से जोड़ दिया जाए। ताकि मतदाता अपनी सुविधानुसार सॉफ्टवेयर के आसान इस्‍तेमाल के जरिए देश में कहीं से भी अपने निर्वाचन क्षेत्र के राजनीतिक दल का चुनाव कर सके। इस क्रम में साफ्टवेयर मतदाता से केवल मतदाता संख्‍या और निर्वाचन-क्षेत्र की जानकारी पूछे। या मतदाता-पहचान पत्रों को भी आधार कार्ड की तरह व्‍यक्ति की आंख की पुतली और उंगलियों के छाप के रिकॉर्ड के आधार पर तैयार किया जाए। मतदान के दिन मतदाता पहचान-पत्र को एटीएम पर स्‍वैप करते ही साफ्टवेयर मतदाता को निर्धारित कोण पर खड़े होने का संकेत प्रसारित करे। मतदाता के ऐसा करने पर उसके क्षेत्र की मतदान निर्वाचन नामावली खुल जाएगी। और वह अपनी पसंद के बटन पर क्लिक करके मतदान कर सकता है। यह मतदान की सुरक्षित व्‍यवस्‍था होगी। इसमें मतदान-स्‍थल की सुरक्षा के लिए तैनात सुरक्षाकर्मियों की तैनाती कम होगी। मतदान प्रक्रिया से लेकर मतगणना तक के लिए सरकारी कर्मचारियों को व्‍यक्तिगत प्रयास ना के बराबर ही करने होंगे। कम्‍प्‍यूटर सॉफ्टवेयर के कारण यह सारी कार्यवाही त्‍वरित, पारदर्शी और त्रुटिरहित होगी। मतदान के दिन एटीएम से जुड़े बैंकिंग लेन-देन बन्‍द हों तो यह व्‍यवस्‍था अत्‍यन्‍त उपयोगी हो सकेगी।
 बूढ़े व्‍यक्ति या बीमार लोग जो मतदान-स्‍थल पर जा कर मतदान नहीं कर सकते उनके लिए निर्वाचन आयोग द्वारा एक केन्‍द्रीयकृत निर्वाचन दूरभाष नम्‍बर तैयार किया जाए। यह मतदान के कम्‍प्‍यूटर सॉफ्टवेयर से जुड़ा हुआ हो। इस नम्‍बर पर फोन करते ही रिकॉर्डेड आवाज पूछे कि इस पार्टी के लिए एक दबाएं उस पार्टी के लिए दो दबाएं। इस तरह के नए-नए मतदान प्रयोग करके सौ प्रतिशत मतदान को साकार किया जा सकता है। लेकिन एटीएम, फोन कॉल से जुड़ी यह मतदान सुविधाएं पूर्णत: पारदर्शी होनी चाहिए। इनकी हैकिंग की कोई संभावना न हो। निर्वाचन आयोग को इनके परीक्षण प्रदर्शन के दौरान इनकी श्रेष्‍ठता पर कोई संदेह न हो। यह व्‍यवस्‍था बनती है तो स्‍वयं को सिद्ध करने में लोकतन्‍त्र को बड़ी राहत मिलेगी। कार्यपालिका को इस ओर अवश्‍य सोचना चाहिए। इससे निश्चित रूप से एक-एक आदमी लोकतान्त्रिक चुनाव में भागीदार बन सकेगा।