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Saturday, December 20, 2014

आतंक की भेंट

ब तक पाकिस्‍तान के नाम पर थू-थू करता रहा भारत आज उसके प्रति अचानक श्रद्धान्‍‍जलिमय हो गया है। वहां के सेना विद्यालय पर हुए आतंकी आक्रमण में मृत विद्यार्थियों के प्रति भारतीय सम्‍वेदनाएं यहां-वहां सब जगह से टपक रही हैं। ‘----नहीं! नहीं! इसे पाकिस्‍तानी दुर्घटना के रूप में मत लीजिए। बच्‍चे तो सबके समान ही हैं। अरे उनके प्रति हुई ऐसी क्रूरता को भारत-पाक से जोड़ कर मत देखिए। जहां-जहां मैं भटकता हूं, मुझे यही वाक्‍य सुनाई दे रहे हैं।
          मैंने विचार किया, अरे यह तो कुछ-कुछ वैसा ही भावना-प्रदर्शन है, जैसा गुटखा-बीड़ी और मदिरा-चाय का पान करनेवाले कहते हैं कि मदिरा-धूम्र-चायपान स्‍वास्‍थ्‍य के लिए हानिकारक है। लेकिन इनके उत्‍पादन, विज्ञापन, प्रचार-प्रसार के लिए उनमें रोजगार और अधिकार के आधार पर गलाकाट प्रतियोगिता भी साथ-साथ होती है। पाकिस्‍तानी विद्यालय की घटना पर मेरा स्‍वाभाविक विचार पाकिस्‍तान के लिए सम्‍वेदना, सहायता, प्रार्थना के रूप में बिलकुल नहीं उभरा। और मेरा ही क्‍या किसी भी सम्‍वेदनशील भारतीय का स्‍वाभाविक विचार ऐसे देश के प्रति सम्‍वेदन-सहाय-प्रार्थी कैसे हो सकता है!
जो देश आतंक के तीन विकृत ध्रुवों में बंटा हुआ हो, वहां के किस ध्रुव पर विश्‍वास किया जा सकता है। वहां की सरकार, सेना और इन दोनों के कुत्सित गठन से तैयार आतंकवाद कोई पृथक सत्‍ता नहीं है। बल्कि वहां सरकार, सेना और आतंकवादियों को अलग करके देखने का कोई सामाजिक आधार है ही नहीं। ये तीनों चाहे-अनचाहे या मानें चाहकर ही आतंकी कामों में परस्‍पर सहयोग करते रहे हैं। भारत विरोधी पाकिस्‍तानी सैन्‍याक्रमण हो या आतंकाक्रमण, इन्‍हें भौतिक एवं भाविक रूप से वहां की सरकार ही प्रायोजित करती है और सरकार सामाजिक मताधिकार की ही वाहक होती है।
          जब पूरे विश्‍व में अधिकांश परिवारों के लोग भी आपस में प्रेमपूर्वक नहीं रह रहे हों, तब दो कट्टर दुश्‍मन देशों का एक आतंकी घटना के बहाने गाया जानेवाला आतंकविरोधी राग किसी को कितना और कब तक सुहाएगा, ये तो समय ही बताएगा। ईर्ष्‍या, द्वेष, वैर और मतभेद मनुष्‍य के स्‍वयं के साथ भी होते हैं। आत्‍महत्‍या करनेवाले इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। मतभेदों का विस्‍तार बहुत दूर तक हो गया है। भाई का भाई से, बहन का बहन से, पिता का पुत्र से, मां का बेटी से, मित्र का मित्र से, पड़ोसियों का पड़ोसियों से, सरकार का निजी कंपनियों से, कंपनियों का कर्मचारियों से, बड़े पदाधिकारियों का छोटे कर्मचारियों से। जब मनुष्‍य जीवन में मतभेदों की पैठ रिश्‍तों-सम्‍बन्‍धों तक में हो गई हो, तो धर्माधार पर विभाजित दो देशों के बीच पनपे मतभेदों को किसी कीमत पर कभी भी पाटा नहीं जा सकता।
          अनेक विषयों से सम्‍बन्धित मतभेद समाप्‍त किए जा सकते हैं, पर धर्म सम्‍बन्‍धी मतभेद कभी खत्‍म नहीं हो सकते। जब तक पूरे संसार का धर्म एक नहीं होगा, तब तक धर्म प्रणालियों के मतभेदों के कारण उभरनेवाला घरेलू और विदेशी आतंक तो दुनिया को झेलना ही होगा।
          निस्‍संदेह आतंक के कारण आज आधुनिक हो गए हों, लेकिन कारणों की मूल प्रेरणा धर्म से ही उपजती है। आतंक का वास्‍तविक स्‍वभाव, प्रवृत्ति वह नहीं है, जो हमें हथियारों से लैस आंतकवादियों के रूप में नजर आता है। बल्कि इसकी सहज स्‍वाभाविक प्रवृत्ति का निर्धारण तो संसार की लोकतान्त्रिक छतों के नीचे के चार खम्‍भे करते हैं। जो अधिकांश लोकतान्त्रिक देशों में कार्यपालिका, विधायिका, न्‍यायपालिका और प्रेस के रूप में विद्यमान हैं। यह चार स्‍तम्‍भ बौदि्धक चालाकी और चंचलता से भरे हुए हैं। बाकी देशों में तो नहीं, लेकिन इस देश में इनकी भूमिका अब तक अपने सबसे संस्‍कारिक धर्म के विरुद्ध कुतर्क, विवाद परोसने की ही रही है। ऐसी स्थि‍ति में दुर्घटनाएं ही हो सकती हैं।
          बच्‍चों के मरने पर आतंक के प्रतिरोध में बोलने व आंसू बहानेवालों को सबसे पहले अपने भीतर झांकने की जरूरत है। यदि वे भीतर ह्रदय में भी बच्‍चों के कल्‍याण के प्रति अंशमात्र भी चिंतित हैं या होंगे, तो निश्चित रूप से उनके राग में मैं भी शामिल हूं और रहूंगा। और अगर वे छल से व अपने घर-परिवार या राज-परिवार की राजनीति से दुष्‍प्रेरित हो ऐसा व्‍यवहार कर रहे हैं, तो बच्‍चों का मरना जीने से बेहतर होगा।

4 comments:

  1. मानवीय संवेदना धर्म और भूगोल तो जानती नहीं. सच तो ये भी है जब मुंबई में बर्बर खेल हुआ था तब भी पूरे पाकिस्तान के लोग जश्न नहीं मना रहे थे. ऐसे भयानक त्रासदियों के पीछे हमेशा वही लोग रहे हैं (जैसा आपने लिखा है) जिनको जिम्मेदारी देश को दिशा देने की दी गयी है. पाकिस्तान के सन्दर्भ में यह बात बहुत अजीब है कि चुनी हुई सरकार पर सेना प्रबल है और देश का एक बड़ा भूभाग है जहाँ सेना के वश की कोई बात नहीं. ऐसे में सेना को खुद से भारत के खिलाफ प्रायोजित आतंकवाद के वीभत्स रूप के एक चेहरा देखने को मिला है. उम्मीद है निर्दोष बच्चों की जान वहां के तंत्र को सही मार्ग पर आने को बाध्य करेगी.

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  2. बहुत ही अलग नज़रिया पेश किया है इस घटना पर...सही है जिनकी संवेदनाएं इस आतंकवादी घटना के बाद अनायास बाहर आ रही हैं उन्हें गर बच्चों पर इतनी ही करुणा है तो ठंड से बिलखते बच्चों को कुछ गर्म कपड़े भेंट कर दें..क्योंकि सिर्फ आतंकवाद से ही बच्चे नहीं मरते।

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  3. निहारजी की बातों से सहमत हूँ

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  4. संवेदनाओं की बात आप ने सही कही.अजीब से हो गए हैं वे भारतीय [या पहले से ही थे] जिन्हें खुद शायद नहीं मालूम कि वे किस दिशा में जा रहे हैं ,क्या करना चाहते हैं,उन्हें अपने पास का नहीं दिखता..असम में हुई हत्याओं पर सब मौन हैं ..ना आँसू..न चर्चा ,न संवेदनाएँ..:(

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