महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Friday, December 5, 2014

भाग्‍य के हाथ जीवन की बागडोर

जो कहते हैं कि भाग्‍य कुछ नहीं होता, उनके लिए एक उदाहरण है। एक ओर आ‍स्‍ट्रेलियन क्रिकेट खिलाड़ी की मृत्‍यु का संस्‍कार एक हफ्ते से चल रहा है। दूसरी ओर सुकमा के घने जंगल में नक्‍सलियों द्वारा मारे गए केरिपुब कर्मियों की मौत का दुख एकाध दिन में ही सुस्‍ता गया है। मृतकों के पीड़ित परिवार को अड़तीस लाख देने की घोषणा के साथ राजनीति से लेकर सड़क तक का भारतीय लोकतन्‍त्र अपनी खती हुई दिनचर्या में उलझ गया है।
क्रिकेट खेलते हुए दुर्घटना में मृत फिलिप ह्यूज के लिए आस्‍ट्रेलियन महाद्वीप पूरे 168 घंटों तक शोक-संतप्‍त रहा। उनसे सम्‍बन्धित सभी वस्‍तुओं, भावनाओं, आचरणों, आचार-व्‍यवहार, पसंद-नापसंद का सामूहिक संवेदनाई प्रदर्शन-प्रवचन हुआ। बत्‍तीस वर्ष का उनका छोटा जीवन अचानक बहुत बड़ा हो गया। उनका अन्तिम संस्‍कार भी एक यादगार मेला बन गया। यहां-वहां सब जगह उनके लिए पीड़ा प्रवाहित वक्‍तव्‍य-हस्‍ताक्षर हुए। समाचारपत्रों के खेल पृष्‍ठों में उनकी मृत्‍युपरांत छवि से क्रिकेटप्रेमी भीतर तक भीगे। यह केवल भाग्‍य नहीं बल्कि अहोभाग्‍य है।
सुकमा में देश के लिए मरे केरिपुब कर्मियों के प्रति देशज शोक में वेदना कम औपचारिकता ज्‍यादा है। सुरक्षाकर्मियों की जीवन-सुरक्षा का सच्‍चा विचार उनकी मौत पर बंटनेवाले मुआवजे के नीचे दबा रह जाता है। यदि सरकारी मंशा होती, तो अड़तीस लाख गुणा चौदहका हिसाब पहले लगाती। पांच करोड़ बत्‍तीस लाख की धनराशि से यदि नक्‍सलियों से भिड़ने के लिए नवोन्‍नत युद्ध सामग्री खरीद कर केरिपुब जवानों को दी जाती, तो उनके जीवन बच सकते थे। सीरिया जैसे मुसलिम देशों में इस्‍लामिक स्‍टेट के विरुद्ध अमेरिका ने सबसे उन्‍नत हथियारों से सम्‍पन्‍न होने के बाद भी अभी तक अपनी थलसेना नहीं उतारी। इसका मतलब उसे अपने सैनिकों के जीवन महत्‍वपूर्ण लगते हैं।
कीड़ों की तरह भटकनेवाली जनसंख्‍या में से कई और आएंगे रोजगार के नाम पर सेना में भर्ती होने। जनसंख्‍या की इस देश में कोई कमी नहीं है। इसलिए यहां अमेरिका और आस्‍ट्रेलिया की तरह एक-एक मनुष्‍य का जीवन कभी महत्‍वपूर्ण नहीं हो सकता। यहां तो देश के गौरव-गरिमा के लिए अपना बलिदान देनेवालों के सैन्‍य-वस्‍त्र उनके अंतिम संस्‍कार से पहले ही कूड़े के ढेर में मिल रहे हैं। यह है भाग्‍य-भाग्‍य की बात। जीवन की बागडोर भाग्‍य के हाथ में ही तो है।
फिलिप ह्यूज, चौदह शहीद केरिपुब कर्मियों और सांसारिक भावनाओं की पृष्‍ठभूमि में जाने-अनजाने मर चुके व मर रहे लोगों को भुला-बिसराकर भारतीय गणतन्‍त्र बहस कर रहा है, रामजादों और हरामजादों की परिभाषा में उलझा हुआ है।
उपरोक्‍त का ध्‍यान करते-करते मेरी गम्‍भीर मुद्रा एक वृद्ध को रुष्‍ट कर गई। वह समझा कि मैं अपेक्षित भौतिक सुख न मिलने पर परेशान हूं और बोला, ‘‘बेटे हिम्‍मत रखो। परेशानियों में जीने से ही आदमी निखरता है। सहज भाव से मेरे मुख से निकल गया, ‘‘दद्दू, जी कर क्‍या होगा? जीने के बाद मुझे अवश्‍य बताना कि इससे क्‍या मिला।’’ इस संवाद के बाद मेरे और दद्दू के बीच एक लम्‍बी चुप्‍पी पसर गई। उन्‍होंने मुस्‍कुराते हुए सोचना शुरु किया और धीरे-धीरे डरावनी गम्‍भीरता ओढ़ ली।
इस आलेख को ब्‍लॉग में डालते हुए भारतीय दुर्भाग्‍य फिर से जागा। कल रा‍त तीन बजे के आसपास कश्‍मीर में हमारे दस-ग्‍यारह सैनिक आंतकियों से लड़ते हुए मृत्‍यु को प्राप्‍त हुए।
विकेश कुमार बडोला

10 comments:

  1. जो देश अपने शहीदों का सम्मान नहीं कर सकता, उस देश के बारे में क्या कहा जा सकता है. आये दिन इस तरह की घटनाओं को देख कर सर शर्म से झुक जाता है. अपने जवानों को केवल भाग्य के सहारे छोड़ देना निश्चय ही दुखद है..

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  2. " भारतीय दुर्भाग्‍य "

    जाने क्यों अभिशप्त हैं हम ये सब झेलने और जीने को ? इंसान के जीवन का मोल कहीं औपचारिकताओं में गुम है तो कहीं स्वार्थपरक सोच में :(

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  3. हिंदुस्तान में एक जीवन की कीमत उसकी पद प्रतिष्ठा उसकी हैसीयत से आंकी जाती है.एक सैनिक को तैयार करने में समय और श्रम लगता है ,एक सैनिक का जीवन बहुमूल्य होता है ,कई दिनों के मेडिकल एक्साम /टेस्ट आदि के बाद ही उसकी भरती होती है फिर उसे ट्रेनिंग दी जाती है,एक लंबी और कठिन राह से गुज़र कर उसे वर्दी हासिल होती है ,सेना समझती है उसके इस नुक्सान को ....लेकिन बड़ी जनसंख्या के कारण आदमी की आसान उपलब्धता है इसीलिये राजनीति में बैठे लोग एक आम नागरिक की कीड़े-मकोडों से अधिक क्या कीमत समझेंगे ?सच, भाग्य के अधीन है यहाँ जीवन की बागडोर..दुखद स्थिति है..भारत का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा .

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  4. बहुत ही विचारणीय उत्तेजक और मार्मिक आलेख है यह .जाने कब लोग इस तरह सोचना व करना शुरू करेंगे .

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  5. वाकई बहुत दुखद है. सवाल यह भी है कि नक्सली आन्दोलन के लिए अब नयी रणनीति क्यों नहीं अपनाई जाए. केंद्र और राज्य सरकार दोनों को साथ होकर निबटना होगा इसे.

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  6. जो बिकता है वाही चलता है ... फिर मीडिया इससे अछूता कैसे रहे ...
    फिर मीडिया ही क्यों .. पूरा देश आज बस राजनीति की पृष्ठभूमि में जी रहा है ... अपने अपने खेमे हैं सबके ...एक पक्ष तो दूस्ता विपक्ष में होना ही है ... फिर चाहे कोई मरे कोई जिए क्या फर्क पड़ता है ...
    शर्म आ रही है ऐसा माहोल देख कर देशा का ...

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  7. विकेश कुमार वडोला जी बहुत ही बढ़िया लेख आपने लिखा, इसके लिए आपको साधूवाद .

    मैं आपसे यह कहना चाहता हूँ की गूगल एडसेंस हिंदी ब्लोग्स को अब स्पोर्ट करने लगा है,
    अब आप भी गूगल एडसेंस से विज्ञापन दिखा कर कुछ कमाई कर सकते है.... धन्यवाद...

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  10. हम भी तो अहो दुर्भागी हैं जो शोक-संतप्त होते हुए भी अपनी दिनचर्या में लगे रहते हैं और आवाज भी उठाते हैं तो इतना धीरे से कि दूसरे कान को भी सुनाई नहीं पड़ती है.

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