महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Saturday, November 22, 2014

धर्म-क्षेत्र की हानि के बहाने

ह बात सतलोक आश्रम चलानेवाले रामपाल के बहाने कह रहा हूं। याद करें, जिस दिन रामपाल को कानूनी रूप से देशद्रोही ठहरा कारावास मिला, उसी दिन केन्‍द्रीय अन्‍वेषण ब्‍यूरो (सीबीआई) के निदेशक रंजीत सिन्‍हा को सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने 2जी स्‍पेक्‍ट्रम विषय की जांच से अलग कर दिया। देखा व समझा जाए तो रामपाल से बड़ा अपराध रंजीत सिन्‍हा का है, पर उन्‍हें कोई कानूनी दण्‍ड नहीं मिला।
ऐसे प्रशासकों के कारण ही देश में गरीबों की बड़ी संख्‍या बढ़ रही है और परिणामस्‍वरूप बुरी तरह पीड़ित व प्रताड़ित जनसमूह अपने जीवन का कल्‍याणकारी निदान रामपाल जैसे लोगों की शरण में जा ढूंढने को विवश होता है।
 सिन्‍हा पर आरोप है कि उन्‍होंने बहुत बड़े अवैध धन लेन-देन के आधार 2जी स्‍पेक्‍ट्रम विषय की साफ-सुथरी सरकारी जांच में व्‍यवधान डाले। यह अवैध धनराशि इतनी बड़ी है कि इससे लाखों लोगों को त्‍वरित रोजगार प्रदान किया जा सकता है। इस धनराशि का रोजगारपरक निवेश ना भी किया जाए, इसे एक निश्चित अनुपात में जरूरतमंद लोगों में बांट दिया जाए, और लोग अपने-अपने हिस्‍से आई राशि को पांच साल के लिए बैंक में जमा कर दें, तो भी लोगों की माहवार आमदनी पांच-दस हजार रूपए हो सकती है। इस प्रकार वैध धनराशि लोगों के व्‍यक्तिगत अधिकार में होते हुए भी बैंकों के माध्‍यम से सरकारी कामों में भी निवेशित हो सकती है। इससे बेहतर आर्थिक आयोजन क्‍या हो सकता है! आर्थिक आत्‍मदृष्टि जाग्रत कर कोई भी शासक इस योजना को कार्यरूप दे सकता है। लेकिन नहीं, अभी दूर तक इस प्रकार की कोई कार्ययोजना भारतीय लोकजीवन में उभरती हुई नहीं दिखती।
बेरोजगार, जीवन की मूलभूत आवश्‍यकताओं के लिए भटकते और साठ साल पहले रोपे गए औद्योगिक प्रगति के विचार से अपने ग्रामीण-आत्‍मनिर्भर जीवन से भी विलग कर दिए गए लोग अपना जीवन कैसे जी रहे हैं, क्‍या इसकी मानवीय अनुभूति सरकार, कानून या शासन-प्रशासन को है? मूलभूत सुख-‍सुविधाओं के अलावा विलासिता का सुरक्षित जीवन जी रहे प्रमुख राजकीय प्रतिनिधि या न्‍यायविद हों या प्रशासनिक अधिकारी अथवा मीडिया के विश्‍लेषणकर्ता हों, जब तक वे सब गरीबी व विपन्‍नता को अपने शरीर व मन से नहीं झेलेंगे, तब तक वे गरीबों की मन:स्थिति को कैसे समझ सकते हैं!
सन् 2006 में आर्यसमाजियों के साथ रामपाल के समर्थकों की झड़प में एक युवक मारा गया। प्रथम दृष्टि में रामपाल का इस दुर्घटना से क्‍या जुड़ाव होता है, कुछ भी नहीं। तब भी पुलिस, प्रशासन से लेकर न्‍यायालय सभी उसे कानून के उल्‍लंघन का दोषी ठहरा न्‍यायालय में उपस्थित होने को कहते रहे। वह उपस्थित नहीं हुआ तो कानून का उल्‍लंघन माना गया। एक व्‍यक्ति जो सरकारी मानसिकता से उबरने के लिए सिंचाई विभाग की सरकारी नौकरी छोड़ अध्‍यात्‍म पथ अंगीकार करने की इच्‍छा से सतलोक आश्रम तक की वर्तमान वीभत्‍स स्थिति तक पहुंचा, क्‍या इसके लिए वह अकेला दोषी है?
मीडिया रामपाल को धार्मिक ठग और उसके हजारों अनुयायियों को अंधभक्‍त, मूर्ख व अज्ञानी बता रहा है। उसके आश्रम पर कब्‍जा करने के बाद पुलिस को वहां जांच में जो कुछ मिल रहा है, मीडिया उस पर आश्‍चर्यविमूढ़ हो रहा है। कोई समाचारपत्र लिखता है कि आश्रम में कंडोम मिले, तो कोई वहां अवैध वस्‍तुओं के होने की पुष्टि करता है। इलेक्‍ट्रानिक मीडिया में प्रसारित और प्रिंट मीडिया में प्रकाशित अधिकांश विज्ञापनों में महिलाओं के अंग उभार दिखाना और विज्ञापित वस्‍तुओं को खरीदने का अनुरोध करना क्‍या दूसरे ग्रह के लोगों के लिए है? जब यह सब कुछ धरती के लोगों के लिए ही है, तो धरती पर कहीं कंडोम मिलने पर इतना अचरच करना अपरिपक्‍व मानसिकता को दर्शाता है। जैसे पेट के लिए सभी को खाना चाहिए, वैसे ही संभोग भी सभी के लिए एक आवश्‍यकता है। रामपाल जैसे बाबा अगर संभोगीय स्थिति में नहीं भी होते हों, पर उसके आश्रम में तैनात सेवाकर्मियों को तो संभोग से रोका नहीं जा सकता। तो अगर वहां आश्रम में सुरक्षित यौन सम्‍बन्‍धों के निरोधक मिल गए तो क्‍या बड़ी बात है! और ऐसे निरोधकों पर इतनी हायतौबा क्‍यों, जब यह व्‍यापार, रोजगार, और सामान्‍य जीवन की एक जरूरत है तो? और हम ऐसी उम्‍मीद ही क्‍यों कर लेते हैं कि वर्तमान सुख-सुविधाओं की उन्‍नत व्‍यवस्‍थाओं के बीच बैठा बाबा शुद्ध व सात्विक बाबा ही है! आश्रम में मिलनेवाली वस्‍तुओं पर तब इतना हल्‍ला क्‍योंयह भी विचारणीय है कि जिन आधुनिक व्‍यवस्‍थाओं को रखने और उनका उपभोग करने के लिए बाबा को दोषी कहा जा रहा है, उनको तैयार करनवाले क्‍या दूध के धुले हुए हैं? रामपाल भी पहले आधुनिक व्‍यवस्‍थाओं का प्रबन्‍ध करनेवाला एक छोटा सरकारी घटक था। बाद में अध्‍यात्‍म के नाम पर वह भटक जाता है और कुछ लोग उसका अनुसरण करने लगते हैं, तो इसमें रामपाल व उसके अंधभक्‍तों के अलावा क्‍या कोई और व्‍यवस्‍था दोषी नहीं है? किसी के द्वारा एक गलत रास्‍ते का चयन उससे पहले बने एक या अधिक गलत रास्‍तों के आधार पर ही होता है।
अगर लोगों के हवाले से शासन-प्रशासन चाहता है कि झूठे बाबा, अंधभक्ति या ठगाधारित धार्मिकता खत्‍म हो, तो इसके लिए सबसे पहले और जरूरी काम शासन-प्रशासन को ही करने होंगे। पहला काम, जनसंख्‍या पर नियन्‍त्रण। दूसरा, नियन्‍त्रण के बाद की जनसंख्‍या को जीवन की आधारभूत आवश्‍यकताओं की सुगम आपूर्ति। तीसरा, पारंपरिक जीवन की व्‍यवस्‍था बनाने के प्रति एक ठोस कार्ययोजना।
आधुनिक जीवन, जिसके अन्‍दर समाज व सरकार के मिश्रण से तैयार उपभोग की स्थितियां आत्‍मघात और आत्‍मभ्रान्ति ही दे रही हैं, उसमें परिवर्तन पुरातन ग्राम-स्‍वराज व्‍यवस्‍था ही कर सकती है। भले इस व्‍यवस्‍था को बनाना आज सपना लग रहा है, लेकिन यह याद रहे कि यही आनंदपूर्ण जीवन की सर्वश्रेष्‍ठ आधारशिला होगी।
जब जीवन का धर्म-क्षेत्र तक बदनामी झेल रहा हो, तब यह अनुमान भयग्रस्‍त ही करेगा कि अब जीवन में बचा ही क्‍या है। लेकिन सच्‍चे मानुष तब भी हार नहीं मानते। उन्‍हें फिर भी एक आस कहीं न कहीं नजर आती ही है।


विकेश कुमार बडोला

Friday, November 7, 2014

प्‍लेइंग इट माई वे


प्‍लेइंग इट माई वे पुस्‍तक पर बवाल मचा हुआ है। सचिन तेंदुलकर ने इसमें अपने क्रिकेटीय जीवन की उन बातों का खुलासा किया है, जो आम क्रिकेट प्रेमी को पता नहीं थीं। इस शताब्‍दी के दूसरे दशक में विचरित देश-दुनिया के लिए क्रिकेट शायद अब वह नहीं रहा, जो दस-बीस साल पहले हुआ करता था। 
          पीछे 2007 में चलते हैं। दक्षिण अफ्रीका में विश्‍व कप क्रिकेट का अन्तिम मुकाबला भारत और आस्‍ट्रेलिया के बीच हुआ। आस्‍ट्रेलिया ने टॉस जीत पहले बल्‍लेबाजी की, तीन सौ से ज्‍यादा रन ठोक डाले। भारत लक्ष्‍य प्राप्‍त न कर सका और हार गया। भारतभर में मैच के दौरान पसरा सन्‍नाटा मैच खत्‍म होने के बाद तक बना रहा। दिनों, हफ्तों और महीनों तक क्रिकेट प्रेमियों का रक्‍तचाप बढ़ा रहा। तनाव, कुण्‍ठा, हताशा और निराशा में वे अपने सामान्‍य जीवन के कार्य भी ठीक से नहीं कर पाए। क्रिकेट के प्रति ऐसा लगाव और उसकी विश्‍व-प्रतियोगिता के अन्तिम मुकाबले में देश का हारना, शायद सन् 2007 तक देश का सबसे बड़ा दु:ख हुआ करता था। 
          सचिन ने क्रिकेट को बड़ा किया है। उनके रहते-रहते क्रिकेट मैच में लोगों की विशेष रुचि हुआ करती थी। वे इस खेल में अपने अप्रतिम योगदान के कारण अत्‍यन्‍त लोकप्रिय रहे और अब भी हैं। 2007 के विश्‍व कप के दौरान भारतीय क्रिकेट टीम के कोच ग्रेग चैपल ही थे। मुझ जैसा क्रिकेट का कीड़ा उन बातों काे तभी समझ-जान गया था, जिन्‍हें प्‍लेइंग इट माई वे के जरिए लोग अब जान रहे हैं। सचिन खेल के दौरान देश में, लोगों और पूंजीवादी व्‍यवस्‍था के परिचालक यानि कॉर्पोरेट घरानों के बीच में प्रिय हुआ करते थे और हैं, और इसी का फायदा उठाकर एफएमसीजी बिक्री बढ़ाने के लिए कम्‍पनियों ने उनका जमकर विज्ञापनी इस्‍तेमाल किया। कहने का मतलब है जब वे चारों ओर से अपने दम पर सबको हिलाने-डुलाने की स्थिति में थे, तो बीसीसीआई की क्‍या औकात थी कि वे सचिन की शिकायत पर ग्रेग चैपल के खिलाफ कोई अनुशासनात्‍मक कार्रवाई नहीं करता। तो फिर सचिन ने चैपल की तानाशाही का खुलासा तब क्‍यों नहीं किया? अगर वे इन बातों को समेट कर तभी पुस्‍तकाकार दे देते, तो उनके प्रति लोगों का सम्‍मान और बढ़ जाता। जब क्रिकेट के प्रति लोगों की दीवानगी चरम पर थी, जब देश का कालाधान आईपीएल के रूप में निवेशित नहीं हुआ था, तब अगर वे ये खुलासे करते तो शायद आज क्रिकेट के प्रति लोगों में स्‍वाभाविक दीवानगी बनी रहती। अब उनके खुलासे का कोई मतलब नहीं रहा। 
         भूखे को रोटी, बीमार को दवा, बेघर को छत ना भी मिले, तो कोई बात नहीं। शासन-प्रशासन लोगों की आधारभूत आवश्‍यकताओं की व्‍यवस्‍था नहीं करता तो भी ज्‍यादा दिक्‍कत नहीं। जनता का खून-पसीना चूसना, कराधान के नाम पर उनके आर्थिक हित हड़पने की ताबड़तोड़ गतिविधियों को चलाना, यह भी लोगों के लिए समस्‍या नहीं है। जीवन की जरूरतों के अभाव के लिए शायद ही कभी ऐसा सामूहिक शोक व दुख देखा गया होगा, जैसा क्रिकेट में हारने का होता हुआ आया है इस देश में। जो लोग क्रिकेट खेलते हैं, जिन्‍हें इसके खेल और खेल इतर नीति के समीकरण मालूम हैं और जो अपनी आर्थिक सम्‍पन्‍नता के बावजूद समय व्‍यतीत करने के लिए इस खेल में दिलचस्‍पी लेते हैं, उनका तो समझ आता है, पर रोटी-पानी के लिए धक्‍के खा रहे लोगों का इसके प्रति रुझान क्‍यों है, यह आज तक समझ नहीं आया। 
विकेश कुमार बडोला