Friday, June 6, 2014

अच्‍छे दिनों का आम आदमी को अहसास तो हो

किसी भी किस्‍म के चुनाव में जीत ही बड़ी बात नहीं होती। जीतकर सत्‍तारूढ़ होनेवाले राजनीतिक दल अगर बड़े-बड़े काम करें तो कुछ समझ आता है। चुनाव में अपनी पार्टी के प्रचार के लिए राजनीतिक दलों ने अप्रैल-मई की गर्मी में जितना देशव्‍यापी भ्रमण किया है, क्‍या वैसी ही यात्राएं नेतागणों को अब काम के सिलसिले में नहीं करनी चाहिए? महात्‍मा गांधी सहित अनेक दिवंगत पुरुषों के स्‍मृतिस्‍थल पर जाकर अतिविनम्रता का जो व्‍यवहार मन्‍त्रीजन कर रहे हैं, क्‍या उसके लिए भारत जैसे देश में मन्त्रियों को समय मिल जाना चाहिए?
देश की अधिकांश जनसंख्‍या जीवन की आधारभूत जरूरतों के लिए प्रतिदिन बहुत जटिल तन्‍त्र से उलझती है। खाद्य पदार्थों तक आसान पहुंच बनाना हो या बच्‍चों का विद्यालय में प्रवेश या फिर बीमार होने पर सरकारी चिकित्‍सालयों में इलाज करवाना, सब कुछ बहुत ज्‍यादा मुश्किल है इस देश में। शायद ही कोई साधनहीन व्‍यक्ति हो, जो ऐसी परिस्थितियों में अपने गरीब परिवार सहित आत्‍महत्‍या का विचार न करता हो।
 ऐसे में हमारे नेताओं को अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर विकास दर की प्रतिस्‍पर्धा में बने रहने की चिन्‍ता छोड़ देनी चाहिए। उनका ध्यान उस गरीबी को पाटने पर होना चाहिए, जिसे मुद्दा बनाकर उन्‍होंने चुनाव में जीत पाई। राष्‍ट्र नायकों को मरणोपरान्‍त सम्‍मान, उनकी प्रतिमाओं पर माल्‍यार्पण जैसे कार्यक्रम उसी देश में ठीक लगते हैं, जिसके वर्तमान जीवित नागरिकों की मूलभूत जीवन आवश्‍यकताएं सुगमता से पूरी हो रही हों।
कुछ यूरोपियन राष्‍ट्र सम्‍मान-स्‍मृति समारोहों का आयोजन करते हैं। लेकिन वहां यह संस्‍कृति तब अपनाई गई जब वे अपने नागरिकों की सभी जीवन सम्‍यक जरूरतें पूरी करने के कई दशक गुजार चुके। खाद्य व जलापूर्ति तक अपने लोगों को सही से उपलब्‍ध नहीं कर सकनेवाले देश की सामूहिक प्राथमिकताएं क्‍या हों, इस पर नए राष्‍ट्रीय नेतृत्‍व को क्रान्तिकारी तरीके से विचार करना होगा। एक सामान्‍य आदमी अगर अपनी बुनियादी जरूरतों के अनुरूप बदलाव महसूस करता है, तो शासन व्‍यवस्‍था के प्रति लोकतान्त्रिक भरोसा जगेगा।
सामाजिक और शासकीय अपेक्षा आधुनिक व्‍यवस्‍था में हरेक आदमी को योग्‍य बनाने की नहीं बल्कि उसे मूलभूत अधिकारसम्‍पन्‍न बनाने की हो। लोकतान्त्रिक व्‍यवस्‍था के अनुरूप योग्‍य व्‍यक्ति तो शासन-प्रशासन में मौजूद हैं ही। उनका कर्तव्‍य है कि अब वे अपनी योग्‍यता से देश के सबसे कमजोर आदमी को एक भारतीय नागरिक की सच्‍ची हैसियत प्रदान करें।
प्रधानमन्‍त्री नरेन्‍द्र मोदी की दूरदृष्टि के अनुसार तो देश को इस कार्य में सफलता मिल सकती है। लेकिन प्रश्‍न है कि मोदी ही अकेले कब तक लोककल्‍याण की महत्‍वाकांक्षा में जिएंगे। उनके मन्त्रिमण्‍डल और राजनीतिक समूह राजग के प्रत्‍येक सदस्‍य व कार्यकर्ता को भी ऐसी भावना से संचित होना होगा। राजग नेतृत्‍व को यह भी ध्‍यान में रखना होगा कि आम आदमी के पास गरीबी में जीने और इससे उबरने के लिए केवल एक ही जीवन है। देश का आम आदमी विकट संघर्ष कर रहा है। उसे राहत देने की नीतियां बनाने और उनके त्‍वरित क्रियान्‍वयन में नई सरकार ज्‍यादा विचार-विमर्श करने के बजाय ज्‍यादा काम करे। कोई भी नीति बने तो उसके केन्‍द्र में समाज के सबसे उपेक्षित वर्ग का ध्‍यान अवश्‍य रहे। उसे लगना तो चाहिए कि अच्‍छे दिन कैसे होते हैं।

12 comments:

  1. आम आदमी को भी वाकई ये एहसास होना चाहिए कि अच्छे दिन के मायने क्या है ? सत्ताधीशों के साथ-साथ सरकारी मशीनरी को भी ईमानदारी से कर्मवत् होना होगा....

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  2. बहुत सही लिखा आपने
    सत्ताधारियों के अच्छे दिन आने के साथ ही आम जनता के भी अच्छे दिन आये तभी सही मायने होंगे अच्छे दिनों के

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  3. विजेता पार्टी के कार्यों पर १०० दिन पूरे होने के बाद ही कुछ कहा जा सकता है ,अभी शुरुआत है.

    आपकी चिंता भी जायज है ,आशा है आप की आवाज़ सत्ता में बैठे सभी प्रतिनिधिओं तक पहुंचेगी.

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  4. एक आम आदमी की अपेक्षाओं को बहुत अच्छे से रखा है आपने. सरकार के कायों का असर दिखने में जो वक़्त लगे पर इसमें कोई संशय नहीं है कि विकास होगा सबका.

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  5. बहुत सारगर्भित चिंतन...इंतजार है आम जनता को अच्छे दिनों का...

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  6. अभी शुरुआत है जो ठीक लग रही है ... पर केवल मोदी जी की रताफ से लग रही है ... उनके किसी मंत्री का कुछ ख़ास अजेंडा नहीं आया ... देखें क्या होता है ...

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  7. पहले आम आदमी के अपेक्षा को पूरा करे सरकार विचारणीय लेख.....

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  8. बिल्कुल सही कहा आपने... हालात बदलने की आस संजोये बैठे हैं हम तो ....

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  9. हाँ! जादू की छड़ी अब तो ज्यादा नाज-नखरा न करे तो ही बेहतर है..

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  10. सोच में आमूलचूल परिवर्तन की ज़रूरत है

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  11. 'अच्छे दिनों का आम आदमी को अहसास' होगा या होना तो चाहिए। मगर आम आदमी को अब भी सब्र से काम लेना होगा। कोई जादू की छड़ी तो है नहीं की बस घुमाया और सब ठीक। समय तो देना ही होगा। तभी शाद अच्छे दिन आयेंगे। बाकी तो उम्मीद पर दुनिया कायम है।

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