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Sunday, June 1, 2014

मोदी जैसे व्‍यक्तित्‍व के प्रतिरूप गढ़ने की आवश्‍यकता

पने मन्त्रिमण्‍डल के सदस्‍यों को सौ दिन के कार्यों की रूपरेखा बनाने के लिए कहना, मन्त्रिमण्‍डल एवं अनेक मंत्रालयों के प्रमुखों को अपने किसी सम्‍बन्‍धी को कार्यालयी कर्मचारी-वर्ग में नहीं रखने का आदेश देना, संयुक्‍त प्रगतिशील गठबन्‍धन के शासन में गठित कई उच्‍चाधिकार प्राप्‍त मन्त्रिसमूहों और अन्‍य मन्त्रिसमूहों को हटाना, अनेक मंत्रालयों और उनके विभागों को अपने मंत्रालयों-विभागों से सम्‍बन्धित कार्यों के निर्णय स्‍वयं लेने के लिए प्रेरित करना एवं किसी कठिनाई की स्थिति में प्रधानमन्‍त्री कार्यालय व मन्त्रिमण्‍डल सचिवालय से नि:संकोच सम्‍पर्क करने की अनेक स्‍वच्‍छ-पारदर्शी-सर्वस्‍वीकार्य जैसी प्राथमिकताएं नरेन्‍द्र मोदी जैसा व्‍यक्ति ही तय कर सकता है।
जो व्‍यक्ति अपने सामान्‍य संभाषण में भी कई गहन और शोधपरक बातें धाराप्रवाह हिन्‍दी में बोल सकता है, वह भारतीय शासन को सर्वश्रेष्‍ठ तरीके से संचालित करने के लिए कितनी अन्‍यान्‍य दूरदर्शी नीतियां बना रहा होगा, इसकी कल्‍पना एक सामान्‍य कुण्ठित भारतीय कभी नहीं कर सकता। यदि सत्‍ता के सर्वोच्‍च पद पर बैठा व्‍यक्ति अंशमात्र का पदाभिमान नहीं करे तो उसमें उस सामूहिक कर्तव्‍य के प्रति दृढ़ता बनी रहती है, जिसके लिए उसका लोकतान्त्रिक चयन हुआ है।
गुजरे छह दशकों में भारतीयों ने नरेन्‍द्र मोदी जैसे व्‍यक्ति को लोकता‍न्त्रिक बहुमत से शासन में लाने की इच्‍छा पाली होती तो आज भारतीय भूभाग की स्थिति हर प्रकार से अच्‍छी होती। एक संसाधन का दो अलग व्‍यक्ति अलग-अलग प्रयोग करते हैं। एक उसका सुरक्षित प्रयोग करता है। दूसरा उसका अतिक्रमित प्रयोग करता है। मोदी पहले प्रयोग की पक्षधरता करते हैं। उनके पास किसी कार्य योजना को लागू करने से पहले उसके सही-गलत प्रभावों के बारे में विचार करने की शक्ति है। विचारों को कार्यरूप में बदलने का शासकीय कौशल है। उनमें शासन करने का सर्वथा एक नया अवलोकन है। एक आम भारतीय नागरिक देश में अपनी स्थिति के बारे में क्‍या सोचता है और क्‍या पाना चाहता है, इस बिन्‍दु पर सोचने की दूरदर्शिता है। मुख्‍यमन्‍त्री रहते हुए अपने कार्यक्रमों का जिस नि:स्‍वार्थ सेवाभाव से उन्‍होंने क्रियान्‍वयन किया, वह अन्‍य राजनीतिज्ञों के लिए अनुकरणीय, देशी-विदेशी शोधार्थियों के लिए शोधनीय और विचारकों के लिए विचारणीय अवश्‍य होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं हो पाता है तो समझ लेना चाहिए कि मोदी केन्द्रित राजनीति के अलावा बाकी राजनीति राष्‍ट्रीय संचालन के लिए बहुत ज्‍यादा नौसिखिया है। शोधार्थी यदि उनसे वैरभाव पाले हुए हैं तो यह उनके मानवपक्षीय शोध लक्ष्‍य पर बड़ा प्रश्‍नचिन्‍ह लगाता है। अधिकांश विचारक यदि उन्‍हें अभी भी नहीं समझ पाए हैं तो यह उनकी वैचारिकता के खोखलेपन को दर्शाता है।
प्राय: एक व्‍यक्ति का अपने जीवन में अनेक घटनाओं के प्रति अपना जो रूढ़ रवैया होता है, वह राष्‍ट्रीय या सामूहिक हितों के बारे में विचार करते समय कहीं खो जाना चाहिए। विशेषकर ऐसे व्‍यक्ति यदि शासन-प्रशासन में हों तो तब यह रवैया अतिशीघ्र पृष्‍ठभूमि में पहुंच जाना चाहिए। लेकिन देखा यह गया है कि राष्‍ट्रीय व सामूहिक हितों के बाबत निर्णय करते समय व्‍यक्तिवादी मूढ़ता राजनीतिज्ञों-अधिकारियों पर हावी रही है। मोदी ऐसे प्रपंच से भारतीय मानसिकता को निकालने के लिए एक अग्र राजदूत बनकर सामने आए हैं।
एक व्‍यक्ति जीवित रहते हुए ही अपनी विचारधारा का प्रभावी प्रसार कर सकता है। नरेन्‍द्र मोदी जब तक हैं निसन्‍देह वे ऐसा करेंगे लेकिन यह प्रश्‍न स्‍वाभाविक रूप से उभरता है कि उनकी अनुपस्थिति में कहीं उन जैसे व्‍यक्तियों का अभाव न हो जाए। इस दिशा में भारतीय जनमानस को आत्‍मप्रेरणा से विचार करना चाहिए कि मोदी जैसे व्‍यक्तित्‍व के प्रतिरूप गढ़ने में अभी से लगने की अत्‍यन्‍त आवश्‍यकता है।

10 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन डू नॉट डिस्टर्ब - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. आप के विचारों से अक्षरशः सहमत .

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  3. निस्सन्देह ऐसे व्यक्तित्व का प्रतिरूप समय की आवश्यकता है. कहीं उन जैसे व्‍यक्तियों का अभाव न हो जाए...

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  4. मैं अब तक समाचार कम ही देखती थी लेकिन अब सबसे पहले समाचार चैनल देखती हूँ ,यह है मोदी जी के आने का प्रभाव । विश्वास और आशाओं से परिपूर्ण । यह विश्वास बना रहे इसके लिये बहु आवश्यक है उन जैसे ही कुछ और लोगों की जो सहयोग करें ।

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  5. मोदी जी आशा का संचार कर रहे हैं .. माये मानदंड ला रहे हैं जो कहीं विलुप्त हो रहे थे अपनी संस्कृति, समाज से ... इनका स्वागत और आने वाले समय में हर किसी में ये स्तर ढूंढना होगा, नहीं तो रिजेक्ट करना होगा समाज को तभी मिलेगा अच्छा तंत्र ...

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  6. नरेंद मोदी पर हम सब की आशा लगी है... और विश्वास पर खरे भी उतर रहे हैं.. ये सच है कि मोदी एक नायक की तरह उभरे हैं ...

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  7. पुरानी सरकारों ने भी ऐसे कई कदम उठाये हैं जो शुरू में बहुत क्रांतिकारी,ऐतिहासिक और काग़ज़ पर लोक-लुभावन थे. लेकिन वास्तविकता यही है कि अपने देश में बहुत गरीबी है, स्वास्थ्य सुविधायें नहीं है और भ्रष्टाचार चरम पर है. हमारा देश प्रजातांत्रिक ज़रूर है लेकिन ज़मीन पर के लोग सच्चे प्रजातंत्र से बहुत दूर हैं. अब देखना यही है कि अगले पांच सालों में क्या सब बदलता है. आपके इस पोस्ट पर सही टिप्पणी तभी दे पाऊँगा.

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  8. पिछले दस सालों में जो दुर्गति होनी थी, वो हो गयी.. अब जो उम्मीद जगी है, उसे सिर्फ सरकार पूरा नहीं कर सकती.. ये बेहद जरुरी है कि आम जनमानस भी अपने को बदलने के लिए तैयार रहे...

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  9. कहा जाए तो एक अबूझ आशा सबको इसतरह से सम्मोहित कर रही है कि प्रतिरूप स्वयं गढ़ने को उत्सुक हो उठा है . आज के युवा या बच्चों को मैं भी अति संवेदनशील मानती हूँ. जो सुन्दर भविष्य बना सकते हैं .

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  10. मोदी मैजिक की असल कलाबाजियां देखने में अभी वक्त लगेगा..पर शुरुआती दाव से तो जनाब ने जनमानस को अपना कायल बना लिया है.....

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