महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Sunday, April 20, 2014

खुद का चैन

खुद को चैन मिले इसलिए बहुत सी बातों से अनजान रहना ही ठीक होता है। हर बात की जानकारी या सभी बातों का ज्ञान होना तब बहुत दुखी करता है, जब जानकारियों और ज्ञान के पीछे की सच्‍चाई सामने आती है। नींद में हमें बहुत सी बातों या घटनाओं का पता नहीं होता। नींद में होने के दौरान हम कई असामान्‍य घटनाओं को देख-सुन-अनुभव नहीं कर पाते हैं तो बड़ी राहत होती है, लेकिन कभी अचानक नींद खुलने पर ऐसा सुनाई और दिखाई देता है कि खुद पर खीझ होने लगती है। महसूस होता है कि सोए रहते तो वह सब सुनाई और दिखाई ही नहीं देता, जिसे सुन व देख कर मन खट्टा हो गया।
ऐसी घटना के बाद दुनिया और लोगों के बारे में नजरिया ही बदल जाता है। अपनी दृष्टि में असुर‍क्षा की भावना उभर आती है। मन में उस व्‍यवस्‍था के प्रति विद्रोह पैदा हो जाता है, जिसके कारण ऐसी दुखद परिस्थितियां पैदा हुईं। बाहुबल की कमी के कारण मेरे जैसा व्‍यक्ति मानसिक रूप से ही ऐसी दुर्व्‍यवस्‍था के प्रति संघर्ष करता है और आखिर में शारीरिक कमी व दिमागी कमजोरी दर्द का रूप ग्रहण कर लेती है। ऐसी स्थिति के बारे में देर तक सोचने पर एक बात दिमाग में आती है कि जिन बातों और घटनाओं से परेशानी हो रही है, वे तो मेरे शारीरिक व मानसिक रूप से अनुपस्थित रहने पर भी घटित होतीं। घटनास्‍थल पर मैं होता ही नहीं वे तब भी घटतीं। तो क्‍यों मैं इनके लिए इतना विचलित हूं? मैं इनसे जुड़कर, ऐसी घटनाओं की विसंगतियों का विश्‍लेषण करके क्‍या प्राप्‍त कर लूंगा? जब ऐसी बातें और घटनाएं किसी भी परिस्थिति में घटनी ही हैं तो मेरा उन पर क्‍या वश? मेरा उनके विरोध या पक्ष में खड़ा होने का क्‍या अर्थ? मैं तो अपने को इन सबसे अस्‍पृश्‍य रखूं। मन से भी और तन से भी इनसे अलग रहूं। इसी में मेरी और मेरे जीवन की भलाई है।
इन दशाओं में अपनी दीन-हीन गति पर तरस भी आता है। लोकतान्त्रिक, राजनीतिक, भौतिक, आर्थिक रूप से अपनी कमजोरी का अहसास होते ही तन-मन काठ बन जाते हैं। अन्‍त में अव्‍यवस्‍था फैलानेवालों के नजरिए के प्रति स्थिर होता हूं। उनकी दृष्टि से जीवन को टटोलता हूं। उनकी भावनाओं की बेवकूफी समझता हूं। मूर्खता बढ़ानेवाले उनके भावावेश के पीछे के कारणों का विश्‍लेषण करता हूं तो ज्ञात होता कि व्‍यक्ति तो एक इकाई है। अपने और अपने व्‍यक्तित्‍व के लिए वह जो कुछ भी सीखता है, वह अनेक व्‍यक्तियों की इकाई यानि कि समाज के माध्‍यम से ही सीखता है। समाज का संचालन इस युग में जिस सत्‍ता के हाथों में है, समाज को ढालने का काम उसी सत्‍ता का होता है। अगर सत्‍ता संचालन समझ, सोच-विचार से नहीं हो रहा है तो समाज क्‍या बातें ग्रहण करेगा और समाज से व्‍यक्ति क्‍या प्राप्‍त करेगा?
        कुछ दिनों से नींद बेहोशी जैसी बनी हुई है। इसलिए देर रात तक जागना स्‍थगित था। जागरण से उत्‍पन्‍न चिन्‍तन-मनन नहीं होने से दिमाग शान्‍त था। कल रात भी चैन की नींद की आशा में समय पर सो गया। नींद और जागरण के बीच की बेहोशी में स्थिर हुआ ही था कि अचानक कुछ लोगों के बड़बड़ाने की आवाज सुनाई दी। अवचेतन मन ने सोचा सपना होगा, पर सपनों में जो कुछ दिखाई या सुनाई देता है उसकी पुनरावृत्ति कहां होती है! जब बड़बड़ाहट में पुरुष और महिला दोनों की आधुनिक भाषा-शैली पर ध्‍यान गया तो नींद उचट गई। १९ अप्रैल २०१४ की आधी रात आनेवाले हफ्तों तक मेरी नींद उजाड़ने का बड़ा आधार बनी।
तृतीय तल के कमरे की पीछेवाली खिड़की से तीन मीटर की दूरी पर दूसरी गली के मकान हैं। मेरी व पिछली गली के मकानों के पृष्‍ठभाग के बीच में दो मीटर खाली जगह है। मेरी खिड़की से पीछे के जो मकान दिखाई देते हैं, वे अभी तृतीय तल तक निर्मित नहीं हैं। उनकी द्वितीय तल की छतें साफ दिखाई देती हैं। छह-सात लड़के और पांच या छह लड़कियां उनमें से एक छत पर एकत्रित थे। वे आपस में जोर-जोर से बातें कर रहे थे। नींद में समाने से पहले जो बड़बड़ाहट सुनाई दे रही थी, वह इन्हीं की थी। स्‍पष्‍ट समझ गया कि शनिवार की रात को लड़के-लड़कियां दारू पार्टी के लिए इकट्ठे हुए हैं। पीछे के किसी मकान में कुछ लड़के किराए पर रहते होंगे। उन्‍हीं की जान-पहचान के कुछ और लड़के-लड़कियां आज वहां एकत्रित थे। सभी दारू पीकर धुत थे। उन सभी की वार्तालाप के दौरान लड़कियों के मुख से मां-बहन की गालियां सुनकर मैं अपने कानों पर विश्‍वास नहीं कर पाया। आधी रात को जोर-जोर से भद्दी, गंदी और यौनिक बातें करते हुए उन्‍हें थोड़ा सा भी संकोच नहीं था कि आसपास परिवारवाले लोग रहते हैं।
उनमें से कोई लड़का कह रहा था, मैं कनाडा, इंगलैंड और पेरिस घूम के आ गया हूं, पर अपनी बंदी की जुदाई बर्दाश्त नहीं कर पाया और वापस इंडिया आ गया। तुरन्‍त एक लड़की ने प्रतिवाद किया, अबै तू च...या है। बंदी के लिए विदेश की नौकरी छोड़ के आ गया। तेरे जैसा मा...द मैंने कहीं नहीं देखा। तुझे पता है बंदियां आजकल केवल पैसा और सेक्‍स से मतलब रखती हैं। इसी तरह की इधर-उधर की बातें करते हुए वे एकाध घंटे तक छत पर जमे रहे। इतने में उनके कमरे से कोई लड़का आया और चिल्‍लाया, अबै नीचे आ जाओ सब लोग। चिकन उबल गया है। दारू भी खत्‍म हो गया है। सोसाइटी के लोग उठ जाएंगे। अब बकवास बंद करो और नीचे आ जाओ।
मैं उनके जाने के बाद देर तक सोचता रहा, लड़के तो मैंने बहुत से देखें हैं, जो बिन परिवार के अकेले रहते हुए आवारागर्दी करते हैं, दारू पीते हैं। पर अब लड़कियां भी इस सीमा तक पहुंच गई हैं कि असभ्‍य व्‍यवहार में लड़कों से होड़ ले रही हैं!’
राक्षसी प्रवृत्तियां हमेशा सुबह के सूर्यप्रकाश से चिढ़ती हैं। इस समय उनका अस्तित्‍व छिन्‍नभिन्‍न हो जाता है। यही सोचकर खिड़की से पीछे के मकान की उस छत को देखा, जहां कल रात देशकाल की सभ्‍यता का दम निकल रहा था। इस समय वहां सन्‍नाटा था। पत्‍नी ने पूछा, कल रात को तुम कुछ कह रहे थे। क्‍या हुआ था? मुझे तो नींद में पता ही नहीं चला। मैंने कहा, काश मैं भी ऐसे होने-घटने के समय नींद में ही रहता तो कितना बढ़िया होता!’ जो बिगड़ गए, बर्बाद हुए उनको तो रोका नहीं जा सकता, पर जो छोटे-छोटे बच्‍चे हैं उन्‍हें तो हम लोगों को सही रास्‍ता दिखाना ही पड़ेगा। देश-दुनिया के साथ-साथ हमें खुद को भी तभी चैन मिल पाएगा।

Friday, April 18, 2014

वरिष्ठ साहित्यकार श्री बल्‍लभ डोभाल का नागरिक अभिनन्दन और उनकी पुस्त‍क दस प्रतिनिधि कहानियां का विमोचन


रिष्‍ठ साहित्‍यकार श्री बल्‍लभ डोभाल विगत 30 मार्च को 84 वर्ष के हो गए। इस शुभावसर से प्रेरणा पाकर सूर्या संस्‍थान, वेदान्‍त मण्‍डलम, नौएडा नागरिक महासंघ हितकर हिमालय, डा. डी. पी. सक्‍सेना मेमोरियल ट्रस्‍ट नोएडा, वृहद् दिल्‍ली साहित्‍यकार मंच एवं अदबी संगठन (फरीदाबाद) जैसी साहित्यिक-सामाजिक-सांस्‍कृतिक अखिल भारतीय संस्‍थाओं ने सोमवार 31 मार्च 2014 को हिन्‍दी भवन, दीनदयाल उपाध्‍याय मार्ग, माता सुन्‍दरी मार्ग, दिल्‍ली में डोभाल जी का सादर अभिनन्‍दन किया। इस विशेष अवसर पर किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डोभाल जी के कहानी संग्रह दस प्रतिनिधि कहानियां का लोकार्पण किया गया। पुस्‍तक का लोकार्पण सुविज्ञ पाठक श्री प्रदीप चौधरी द्वारा किया गया। पुस्‍तक विमोचन के इतिहास में संभवत: यह पहली बार होगा कि किसी प्रतिष्ठित साहित्‍यकार की पुस्‍तक का विमोचन किसी सुधी पाठक द्वारा किया गया। यह लेखक की अतिसंवेदनशीलता का परिचायक है। इससे निश्चित रूप से समाज में, खासकर साहित्‍य समाज में एक नई विचारधारा का विकास होगा। और इसका सम्‍पूर्ण श्रेय श्री बल्‍लभ डोभाल तथा अंतस को भेदनेवाले उनके साहित्‍य सृजन को जाता है। श्री प्रदीप चौधरी ने डोभाल जी और उनकी साहित्यिक रचनाओं से अपने लगाव के बारे में अत्‍यन्‍त भावुक वक्‍तव्‍य दिया।
बाएं से डा. गंगा प्रसाद विमल, डा. मनोहर लाल शर्मा, डा. बलदेव वंशी, श्री बल्‍लभ डोभाल, श्री से.रा. यात्री, श्री देवेन्‍द्र मित्‍तल 
डोभाल जी के नागरिक अभिनन्‍दन कार्यक्रम में डा. मनोहर लाल शर्मा, डा. बलदेव वंशी, श्री से. रा. यात्री, डा. गंगा प्रसाद विमल, किताबघर प्रकाशन के श्री सत्‍यव्रत, हिन्‍दी अकादमी दिल्‍ली के सचिव श्री हरिसुमन बिष्‍ट, श्री पंकज बिष्‍ट आदि महाशय उपस्थित थे। डोभाल जी के नागरिक अभिनन्‍दन और उनकी पुस्‍तक विमोचन के कार्यक्रम में अनेक विद्वानों और लेखकों का जमघट लगा। इस शुभ घड़ी में कई वक्‍ताओं ने डोभाल जी की सृजन गाथा पर मननयोग्‍य प्रकाश डाला। प्रमुख वक्‍ताओं में डा. गंगा प्रसाद विमल, श्री से. रा. यात्री, डा. बलदेव वंशी तथा डा. मनोहर लाल शर्मा सम्मिलित थे।
प्रतिष्ठित समालोचक डा. मनोहर लाल शर्मा ने बल्‍लभ जी के सृजन को अत्‍यन्‍त प्रेरणादायी और समाजोपयोगी बताया। उन्‍होंने डोभाल जी को व्‍यक्तिगत लाभ के लिए किसी के आगे नहीं झुकनेवाले एक ऐसे साहित्‍यकार के रूप में रेखांकित किया, जिसने साहित्यिक यात्रा में स्‍वार्थ के पड़ावों से कभी कोई समझौता नहीं किया। जीवन में कई बार घोर उपेक्षा, अनदेखी की घटनाओं को जिसने अपने साहित्‍य को सींचने के लिए परिवर्तित किया हो और अपने लेखन में इससे उत्‍प्रेरणा ग्रहण की हो, वह व्‍यक्ति केवल अपनी साहित्‍य सृजनात्‍मकता के लिए ही नहीं अपितु अपने व्‍यक्तित्‍व के लिए भी सदैव अभिनन्‍दनीय, पूजनीय रहेगा।

अभिनन्‍दन संगोष्‍ठी का मंच संचालन सूर्या संस्‍थान नोएडा के मुख्‍य कार्यपालक श्री देवेन्‍द्र मित्‍तल और वेदान्‍त मण्‍डलम् के श्री विजय विजन ने किया। कार्यक्रम संयोजक प्रभा-सूरज थपलियाल, डा. ऊषा-कैलाश डोभाल और प्रकाश-सुनील डोभाल ने कार्यक्रम के समापन पर उपस्थित सभी साहित्‍यकारों, लेखकों एवं साहित्‍य प्रेमी सुधी पाठकों को धन्‍यवाद ज्ञापित किया।

Thursday, April 17, 2014

विज्ञान वरदान या अभिशाप

न्‍द्रह बीस साल पहले विद्यालय की कक्षाओं में एक निबन्‍ध लिखने को दिया जाता था--विज्ञान वरदान भी है और अभिशाप भी। उस समय बच्‍चों के पास इस विषय पर लिखने के लिए काल्‍पनिक सामग्री, तथ्‍य ही ज्‍यादा थे। बच्‍चे तो इस समय भी इस पर कुछ खास नहीं लिख पाएंगे। असल में यह विषय वयस्‍कों के लिए चिन्हित होना चाहिए कि वे इस पर केन्द्रित होकर केवल लिखें ही नहीं बल्कि गम्‍भीर चिन्‍तन भी करें।
        शुरु में किसी विज्ञान उन्‍नति, वैज्ञानिक प्रगति का उद्देश्‍य यदि मानव कल्‍याण होता है लेकिन कालान्‍तर में सम्‍पूर्ण विज्ञानोन्‍नति विनाश लीला रचने पर स्थिर हो जाती है। दुनिया के देशों के सत्‍ता प्रतिष्‍ठान अपने यहां अनेक तरह की सामाजिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक, सांस्‍कृतिक, सामरिक व्‍यवस्‍थाएं संभालने के लिए जिस कानूनी प्रणाली का अनुसरण करते हैं, उसका शुरुआती असर लगातार नहीं बना रहता। परिणामस्‍वरुप सभी क्षेत्रों की व्‍यवस्‍था में एक प्रकार की शिथिलता हावी होती जाती है। इसके बाद व्‍यवस्‍थागत कार्य इन्‍हें करनेवालों की चित्‍तवृत्ति, ईमानदारी, बेईमानी के आधार पर सम्‍पन्‍न होते हैं। यदि बेईमान कर्मचारी-अधिकारी ज्‍यादा होंगे, उनके पास अधिक शासकीय अधिकार होंगे तो निश्चित है सेवाओं, वस्‍तुओं, मशीनों के स्‍थापित प्रयोग उद्देश्‍य इनके बलबूते, इनकी मानसिकता से तय होंगे। दुर्भाग्‍य से आज सम्‍पूर्ण दुनिया में ऐसे ही नियन्‍ता स्‍थापित हैं। इन्‍हीं के पास राष्‍ट्राधिकार, क्षेत्राधिकार, विशेषाधिकार निहित हैं। वे इनका दुरुपयोग कर रहे हैं। इसी के दम पर आज आतंक, मतभेद, रक्‍तपात की बहुतायत है।
          विज्ञान वरदान है जब वह मनुष्‍य के पूरे जीवन को सुरक्षित करे। जब प्राकृतिक मृत्‍यु तक मानव सुखी, खुशहाल रहेगा तो ही वैज्ञानिक वरदान अभीष्‍ट है। यदि विज्ञान जीवन, मानवीय मनोविज्ञान के गूढ़तम रहस्‍य उजागर करने की दिशा में कार्यान्वित होता और इस प्रक्रिया में उसके दुरुपयोग को पूर्ण रूप से नियन्त्रित किया जाता तो निसन्‍देह वह स्‍तुत्‍य होता।
लेकिन आज के विज्ञान आधारित जीवन पर दृष्टि डालें तो यह वरदान न्‍यून और अभिशाप अधिक दिखता है। मशीनों, उपकरणों, रोबोटिक यन्‍त्रों की वर्तमान दुनिया और लोग भावशून्‍य हो चले हैं। यातायात साधनों, संचार उपकरणों, घरेलू भौतिक वस्‍तुओं की परिधि में मानव मन-मस्तिष्‍क सामान्‍य मानुषिक व्‍यवहार और विचार करने योग्‍य भी नहीं बचे हैं। लोगों, सम्‍बन्धियों को परस्‍पर जोड़ने के लिए जिन चल-अचल दूरभाष यन्‍त्रों का आविष्‍कार हुआ आज उनका प्रयोग हिंसा, अलगाववादी गतिविधियों को बढ़ाने में हो रहा है। सामान्‍य रुप से विचार करने पर तो यही लगता है कि आज मोबाइल फोन, इंटरनेट, अन्‍य भौतिकीय यन्‍त्रों, उपकरणों के बिना जीवन चलाना कठिन है। लेकिन यदि हममें थोड़ा सा जीवन अनुराग, विवेक जागृत होता है तो हम सोचते हैं कि ये सब व्‍यर्थ हैं।
     विज्ञान, वैज्ञानिक गतिविधियां कालान्‍तर में केवल व़स्‍तु उपभोग, नकारात्‍मक प्रयोग में संलिप्‍त रहती हैं। वस्‍तुओं और सेवाओं की जो सौगात वैज्ञानिकों ने अपनी स्‍वलगन, अथाह परिश्रम से प्रस्‍तुत की उनका इस्‍तेमाल करनेवाले अवैज्ञानिक लोग कभी भी आविष्‍कारकों को साभार याद नहीं करते। या बहुत कम ऐसा करते हैं। तो ऐसे लोगों, ऐसे कृतघ्‍न मानवों के लिए आविष्‍कारकों द्वारा आविष्‍कारों की झड़ी लगाने की क्‍या जरूरत थी! प्राय: हर संवदेनशील मनुष्‍य देखता और महसूस करता है कि किस प्रकार आगे बढ़ने के खोखले सिद्धान्‍त के भरोसे चीजों के प्रयोक्‍ताओं के सिर पर अजीब भूत बैठा हुआ है।
     लिखते समय लेखक को अभिव्‍यक्ति की स्रोत भाषा और इसके आविष्‍कार, आविष्‍कारक पर क्‍या आश्‍चर्य नहीं करना चाहिए? विद्युत प्रकाश में अपनी रातों को देखनेवाला मनुष्‍य क्‍या इतना सोचने की फुर्सत निकालता है कि विद्युत प्रकाश का सृजन करनेवाला कितना महान था! जिस पेन से हम लिखते हैं उसकी वैज्ञानिक रचना और रचनाकार के बारे में कभी सोचते हैं हम! इसी प्रकार सभी अन्‍य चल-अचल वस्‍तुएं हैं, जिन्‍होंने हमारे जीवन को इतना सुगम कर दिया कि अब हममें से कई भ्रष्‍टों और दुष्‍टों ने इनके दुरुपयोग, अंधप्रयोग में अपनी रही-सही विचारशक्ति ही खो दी है। इस रूप में विज्ञान को अभिशाप कहना तर्कसंगत होगा।
कुछ लोग पुरानी बातों, जीवन को याद करनेवालों को पिछड़ेपन की संज्ञा देते हैं, पर क्‍या हमारा अस्तित्‍व हमसे पहले मनुष्‍य जीवन में अवतरित होनेवालों के बिना सम्‍भव हो सकता था! निसन्‍देह नहीं। तो क्‍यों कर कुछ लोगों के एकछत्र राज करने की गोपनीय राष्‍ट्रनीति और राजनीति के अन्‍तर्गत आगे-बढ़ना, विकास जैसे शब्‍दों को आम जनजीवन में प्रसारित किया गया! आखिर आगे बढ़ने का सही अर्थ क्‍या है! क्‍या हमारे पुरखे, वंशज हमसे बेहतर जीवन नहीं जीते थे? स्‍वास्‍थ्‍य, संस्‍कार, समाज, प्राकृतिक जीवनयापन के आधार पर जितना खुशहाल पहले का जीवन था, अब वैसा नहीं रहा। आज एक नवजात मानव शिशु को अगर गाय का शुद्ध दूध नहीं मिल पाता है तो ऐसी वैकासिक स्थिति का क्‍या लाभ! एक वृद्ध को अगर पारिवारिक संबल नहीं मिल पा रहा है, जो पुरातन संस्‍कृति की निष्‍पत्ति से संभाव्‍य था, तो ऐसे विकास की गति किसलिए! क्‍या मानव का जानवरों जैसा खुल्‍ला व्‍यवहार और प्रतिपल इसमें होनेवाली बढ़ोतरी ही तरक्‍की की परिभाषा है?
     कोई आविष्‍कारक किसी वस्‍तु को क्‍या सोच कर बनाता है? ये प्रश्‍न इसलिए महत्‍वपूर्ण है क्‍योंकि वैज्ञानिक की सोच का प्रभाव उसके खोजे गए सिद्धान्‍त और निर्मित उपकरण में परिलक्षित होता है। और संसार की सहज गतिशीलता के लिए वैज्ञानिक के रूप में मानव की सोच तथा इसका प्रभाव उचित होना चाहिए। यदि विज्ञानी संवेदनशील है, उसे मानवीय भावनाओं की चिन्‍ता है तो निश्चित ही वह अपने वैज्ञानिक प्रयोग मानव-कल्‍याण विचार को केन्‍द्र में रख कर करेगा। इसके अतिरिक्‍त कई ऐसे विज्ञानविधाता हैं, जिनकी प्रयोगधर्मिता का लक्ष्‍य अपनी त्‍वरित लोकप्रियता, धनार्जन होता है। दुर्भाग्‍यवश आज के वैज्ञानिक, इनकी प्रयोगशालाएं इसी मानसिकता के सहारे आगे बढ़ रही हैं।
     माना कि कतिपय लोगों के लिए वैज्ञानिक प्रौद्योगिकी उपकरण मोबाइल फोन परस्‍पर सम्‍पर्क साधने का बहुत अच्‍छा माध्‍यम है। लेकिन यह भी मानना होगा कि लोगों में स्‍वाभाविक जुड़ाव बचा ही कहां है। तब मोबाइल किसलिए? ऐसी कोई सरकारी सुविधा है नहीं कि हम सरकार के किसी संस्‍थान, व्‍यक्ति को मोबाइल से सम्‍पर्क करें और वह तुरन्‍त हमें सहायता उपलब्‍ध कराने आ पहुंचे। सरकारी चिकित्‍सालयों में रोगियों की भीड़ देख कर मन से यही प्रार्थना निकलती है कि हे भगवान कोई रोगग्रस्‍त ही न हो दुनिया में, विशेषकर भारत में। निजी चिकित्‍सालय विशेषज्ञ संस्‍थान बनने की महत्‍वाकांक्षा में रोगियों के लिए अत्‍यधिक असहनीय होते जा रहे हैं। चिकित्‍सा के अतिरिक्‍त शिक्षा क्षेत्र में भी बहुत सी समस्‍याएं हैं। जीवन से जुड़े अनेक क्षेत्र आज अपनी सेवाएं देने में अत्‍यन्‍त उलझ चुके हैं। सेवा लेनेवाले व्‍यक्ति कितनी कठिनाइयों में इन तक अपनी पहुंच बना पाते हैं, यह सोचकर ही रक्‍तचाप बढ़ने लगता है। 
     खाद्यान, खनिज सम्‍पन्‍न भारतीय ग्रामों की वैश्विक औद्योगिकीकरण के लिए बलि चढ़ा दी गई है। इस औद्योगिकीकरण से अरबों की जनसंख्‍या में से चयनित देशों के कुछ लाख लोग ही तो समस्‍त जीवन-सुविधाओं का नि:शुल्‍क भोग कर पाते हैं। शेष देश और उनके लोग तो औद्योगिकी की कच्‍ची सामग्री के रुप में परिवर्तित हो चुके हैं। तब विज्ञान के पक्ष में किस बात का सामूहिक प्रशंसा-गान हो रहा है! एक व्‍यक्ति, एक परिवार को जब अपने जीवन की प्रत्‍येक आवश्‍यकता के लिए अर्थ-प्रायोजित जटिल तन्‍त्र से समझौता करना पड़ रहा है तो तब तथाकथित प्रगति व प्रगतिवाद के मायने स्‍वयं ही झूठे सिद्ध हो जाते हैं। विज्ञान पक्ष भोंथरा प्रतीत होने लगता है। अन्‍त में आध्‍यात्मिक तत्‍व ही जीवन का पोषक तत्‍व सिद्ध होता है। विज्ञान तो आज अभिशाप के लिए ही तीव्रता से अग्रसर है।
विकेश कुमार बडोला