महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Friday, March 7, 2014

मानव नहीं हम रोबोट कहलाएंगे

जकल हालात बहुत उथल-पुथल वाले हैं। राजनीति की गरमी। चुनावी लहर। मौसमीय गर्मी और ठण्‍ड। सब कुछ तेजी से बदल रहा है। एक व्‍यक्ति का सोचने का नजरिया ही बदल गया है। इक्‍कसवीं सदी की व्‍यवस्‍था में कितना कुछ हो रहा है। सामान्‍य आदमी के पास किसी घटना के घटने का सही कारण नहीं होता। उसे जानकारी नहीं होती कि कोई घटना किस एवज में घट रही है। सामान्‍य व्‍यक्ति से दूर घटित होती शासकीय कुटिलता सब कुछ निगलने वाली है। घटनाओं, गतिविधियों, भाषणों, वार्ताओं, उद्घाटनों, अधिसूचनाओं में समाज का सच कहीं गहरे दबा हुआ है। उजाले की महिमा को अंधेरों ने मजबूती से रोका हुआ है। देश में जो नहीं होना चाहिए वो फटाफट हो जाना चाहता है। जिनको नहीं होना चाहिए वे जबरन खुद को स्‍थापित करने पर लगे हुए हैं। आखिर इस सबसे क्‍या हासिल होगा। मनुष्‍य की भागदौड़ का लक्ष्‍य क्‍या है। इस तक पहुंचने के बाद क्‍या करेगा वह। आराम और शान्ति जैसे शब्‍द अप्रासंगिक हो चले हैं। एकान्‍त खतरे में है। हमें अपनी दिनचर्या में दिल में क्‍या याद रहता है। हम अपनी स्‍वयं की जान-पहचान के लिए एक पूरे दिन में कितने प्रयास करते हैं।
अकेले में स्‍वयं को पहचान, बाकी तो सब है व्‍यवधान
क्‍या हम सब खुद को जान चुके हैं। अगर नहीं तो इधर-उधर की भटकन क्‍यों परेशान किए हुए है सबको। हम जैसे ही शरीर और सोच-विचार वाले पहले भी इस दुनिया में आए। वे भी अपने समय की हलचलों में विचलित हुए। पर अब वे नहीं हैं। हलचलें लेकिन अब भी हैं। तो उनका अपने समय की उथल-पुथल से चिंतित होने का क्‍या कारण था। क्‍या यह नहीं कि वे स्‍वयं को नहीं पहचान पाए। हां बिलकुल यही। जो कुछ हो रहा है वह सब प्रारब्धित है। उसमें हमारा मन-विचलन-चिन्‍तन कोई अन्‍तर नहीं डाल सकता। तब भी हम जैसों को यानि कि आकाश से उपग्रह से कीड़े-मकोड़े नजर आनेवालों को अपने भावनात्‍मक अधिकार की चिन्‍ता रहती है। हम डरे हुए रहते हैं कि हम हर जगह, हर बात, प्रत्‍येक घटना, छोटी-बड़ी घटनाओं से प्रत्‍यक्ष क्‍यों नहीं जुड़े हुए हैं। सबकी जानकारी प्राप्‍त कर अप्रत्‍यक्ष रूप से भी क्‍यों नहीं उनसे जुड़े हुए हैं। दिमाग को कबाड़-भण्‍डार बना दिया है। क्‍या भरा है इसके अन्‍दर। सब कबाड़ ही तो है। एक बार इसे खाली कर देखिए। कितना मजा आएगा। थोड़ी देर के लिए भूल जाइए कि हम सांसारिक उथल-पुथल में शामिल हैं। मान लीजिए कि आप मरे हुए लोगों की तरह हैं, जो सांसारिक घटनाओं के उबाल से अंशमात्र भी परिचित नहीं हैं। हमारे दुख का यही कारण है। हम हर जगह शरीर या भाव-विचार रूप में उपस्थित रहना चाहते हैं। इससे मुक्ति पाइए। स्‍वयं को जानिए। अपनी पहचान करिए। मैं तो ऐसा ही करनेवाला हूं। नहीं तो बाईसवीं सदी में उछल कर पहुंचने को आतुर दुनिया में हम निश्चित मशीन बन जाएंगे। मानव नहीं हम रोबोट कहलाएंगे। तब भावनाएं कहा से लाएंगे। और यह नहीं होंगी तो समझिए जीवन समाप्‍तप्राय हुआ। तेजी से व्‍यतीत हो रहे जीवन में मानव को पता नहीं कितनी वस्‍तुओं की लालसा है। क्‍या हमें स्‍वयं की स्‍वयं के लिए उपलब्‍धता नहीं चाहिए। अपने साथ गुजारा हुआ ऐसा समय नहीं चाहिए, जिसमें हमें अपने होने न होने का कारण ज्ञात हो सके। मैं उम्‍मीद करता हूं कि समय का छल लोगों को और अधिक नहीं भाएगा। वे भौतिक भ्रम से निकलकर सार्थक जीवन तत्‍व को पहचानेंगे।

13 comments:

  1. अपने आस पास क्या हो रहा है इसे जानना आज पहले से अधिक ज़रूरी हो गया है और संसार से भागने में बहादुरी नहीं है,हाँ भौतिक वस्तुओं के मोह से दूर होने की अवश्य आवश्यकता है.
    सच कहूँ तो हम आधे मशीन तो हो ही चुके हैं,जिस तरह की घटनाएँ आस पास हो रही हैं उन्हें देख कर यही लगता है कि भावनाएँ शुष्क हो रही हैं ,संवेदनाएँ मरने लगी हैं ..हालात बुरे हैं मगर इन्हें बदतर होने से बचाना ज़रूरी है.

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  2. सच में आपका ये पोस्ट काफी बेहतरीन है.. हम सब बेकार के खोल-डिब्बे में दुबके हुए हैं..हमारे समाज और उसमे जीने वाले इंसान का सच दफ़न होता जा रहा है...

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  3. बहुत बढ़िया पोस्ट...!! सही कहा अपने को खाली कर देखिये... अपने को पहचानिये.. जो सबसे जरुरी है...

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  4. आज के मशीनी युग में हम सब भी मशीन ही हो गये हैं,अपने अहमियत और काबलियत को पहचानना आवश्यक है, बहुत ही बेहतरीन आलेख।

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  5. प्रकृति का पुरुष और पुरुष कि प्रकृति का घालमेल होने से ऐसा ही होगा ,रोबोट नहीं बने इसके लिए अपनी प्रकृति तो पहचानना ही होगा विचार को उद्धेलित करता सुन्दर पोस्ट

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  6. बहुत ही सार्थक और प्रासंगिक आलेख है । हम अपने आसपास से अनजान रहते हैं तभी तो पबरी तरह अपनेआप से भी नही जुड पाते । सचमुच हम यंत्रवत् होते जारहे हैं ।

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  7. जिस रफ़्तार से समय बदल रहा है .. क्या अहिसा रह पायेंगे ... क्या ये सब संभव होगा ... अपने आप से मिलना ...

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  8. अकेले में स्‍वयं को पहचान, बाकी तो सब है व्‍यवधान..............बहुत बढ़िया

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  9. संसार में रह कर भी संसार से दूर अपने आप की खोज निश्चय ही कठिन है पर इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं शांति प्राप्त करने का..बहुत विचारणीय आलेख...

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  10. बहुत पसंद आया आपका आलेख. किसे वक़्त है जो सोचे कि इस अंधी दौड़ में भागकर क्या हासिल होनेवाला है.

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  11. SAMAY NAHI HAI..shanti aur aaram sach mein nahi hai .. kahaan bhaag jaaye insan

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  12. महाजन ! आप आगे बढ़ें ...

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  13. हम डरे हुए रहते हैं कि हम हर जगह, हर बात, प्रत्‍येक घटना, छोटी-बड़ी घटनाओं से प्रत्‍यक्ष क्‍यों नहीं जुड़े हुए हैं। सबकी जानकारी प्राप्‍त कर अप्रत्‍यक्ष रूप से भी क्‍यों नहीं उनसे जुड़े हुए हैं। दिमाग को कबाड़-भण्‍डार बना दिया है। क्‍या भरा है इसके अन्‍दर। सब कबाड़ ही तो है। एक बार इसे खाली कर देखिए। कितना मजा आएगा।...बहुत सुंदर। पर इन बातों को सभीको समझा पाना खासा मुश्किल है।।।

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