Friday, March 14, 2014

राज व्‍यवस्‍था या नक्‍सली, दोषी कौन?

मानव ने अपने जीवन को जब से अपने वश में किया है तब से वह बहुत ज्‍यादा उलझ गया। जब तक वह प्रकृति के साथ अपने जीवन को जोड़े हुए था तब तक जीवन-जगत एक महान अभ्‍यास था। प्रत्‍येक व्‍यक्ति कर्म-धर्म-मर्म से परिचित था। इनका परिचय प्राप्‍त कर लेना मनुष्‍य के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी। आज यदि मनुष्‍य इनसे विमुख है तो यह त्‍वरित नहीं हुआ। जीवन को ऊंचे स्‍तर पर समझने में जो उक्‍त कारक सहज ही पहले के मानवीय-जीवन में सम्मिलित थे, आज उनसे जुड़ने के लिए अल्‍पायु जीवन में कई बार सोचना-विचारना पड़ता है। ऐसी स्थिति में जीवन के वास्‍तविक कर्म पूरे नहीं हो पा रहे हैं। मनुष्‍य का एक ही प्राथमिक एवं अन्तिम कर्म रह गया है। यह है जीविकोपार्जन। समाज के स्‍वभाव को आदर्श तरीके से स्‍थापित करने के बारे में सोचने के लिए हम स्‍वप्रेरित नहीं हैं। इस ओर यदि हममें से कुछ लोग अग्रसर हैं भी तो यह संस्‍थागत रूप में होता है। कोई भी मनुष्‍य कल्‍याण-कार्य सामाजिक कम और व्‍यापारिक अधिक प्रतीत होता है।
     एक तन्‍त्र विशेषकर लोकतन्‍त्र क्‍यों बनता है? इसके अन्‍तर्गत शासन प्रणाली और विधिक व्‍यवस्‍था क्‍यों स्‍थापित होती है? इसीलिए कि निर्धारित भूखण्‍ड जो किसी राष्‍ट्र की पहचान है, उसके सभी व्‍यक्ति शासकीय और विधिक व्‍यवस्‍था की सुरक्षा में अपनी मूलभूत जीवन आवश्‍यकताओं को सुगमता से प्राप्‍त करें। सबकी मूलभूत आवश्‍यकताएं पूरी हों। योग्‍य व्‍यक्ति शासन पद्वति और विधि व्‍यवस्‍था से जुड़ें ताकि शासकीय स्‍तर पर प्रतिपादित नियमों को समाज हित में समुचित तरीके से लागू किया जा सके।
लेकिन यदि इन सब शासकीय मूल-मान्‍यताओं और उद्देश्‍यों से भटककर शासक निजी बातों, विचारों और सिद्धान्‍तों को शासकीय प्रणाली और विधिक व्‍यवस्‍था के नाम पर लोगों पर थोपेंगे तो कैसे कोई लोकतान्त्रिक अवधारणा स्‍वयंसिद्ध हो सकती है! लोकतन्‍त्र सुचारू रूप से तभी चल सकता है जब इसकी भावना को शासन के स्‍तर पर प्रतिदिन सुदृढ़ बनाया जाएगा। और ऐसा भी तभी सम्‍भव हो सकता है जब लोक और इसका तन्‍त्र एक दूसरे की आवश्‍यकताओं एवं इच्‍छाओं को ढंग से जाने। जब लोक समाज अपने जैविक मूल्‍यों को व्‍यावहारिक बनाए और जब राज व्‍यवस्‍था लोकोपकार के लिए उनके जैविक मूल्‍यों का हनन करने के बजाय उनका संरक्षण करे।  
लोक की भावना यदि अपनी परम्‍परा से जीवनयापन करने की है और तन्‍त्र उसे आधुनिक बनने को विवश करे तो यह स्थिति संघर्ष को जन्‍म देगी। इसी का परिणाम है नक्‍सली, उनका केरिपुब के सुरक्षाकर्मियों से युद्ध। जो लोग शहरों में हैं सरकार से वे भी नाराज हैं। वे भी अपने जीवन पर शासकीय पहाड़ से गिरते उस विचारधारा के झरने को विवशता से सह रहे हैं, जिसमें शामिल होकर अधिक से अधिक बार उन्‍हें लगता है कि वे ठगे गए। शहर में रहकर उनकी मूल जीवन आवश्‍यकताओं की पूर्ति के बहाने उनके जीवन को ऐसे मशीनीकरण से लपेट दिया गया है, जिसमें उनकी मुख्‍य जरुरतों (रोटी, कपड़ा, मकान, दवाइयां), जिनके लिए वे शहर पर आश्रित हुए थे, की गुणवत्‍ता इतनी भी नहीं रही कि ये उन्‍हें जीवन के कुछ वर्षों तक स्‍वस्‍थ, सहज, नीरोग रख सकें। तो ऐसे शहरीकरण, शहरीकरण को पोषित करनेवाले ऐसे लोकतन्‍त्र की क्‍या जरूरत है? प्रश्‍न यह भी है कि जब शासकीय परिधि के अन्‍दर तमाम व्‍यापारिक और जीवन से जुड़ी गतिविधियां नैतिकता-मौलिकता-सामाजिकता से विमुख हैं, तो इन्‍हें संचालित, व्‍यवस्थित, शासित करनेवाले तन्‍त्र की लोक को क्‍या जरूरत है? नक्‍सलियों का अभियान कहीं इसी सोच से तो नहीं जन्‍मा? और यदि यहीं से जन्‍मा है तो इसमें गलत कौन है नक्‍सली या राज व्‍यवस्‍था

12 comments:

  1. नक्सली या राज व्यवस्था में से गलत कौन हैं यह कहना कठिन है क्यूंकि शायद दोनों ही अपनी अपनी जगह न पूरी तरह सही है और ना ही पूरी तरह गलत। रही बात शहरीकरण की तो जैसा आपने लिखा मौलिक जरूरतों तक का पूरा ना हो पाना, तो इतना सब होने के बाद, देखने के बाद और झेलने के बाद भी, तो लोगों में शहरी जीवन के प्रति लालसा कम नहीं हुई। बल्कि दिन प्रति दिन बढ़ ही रही है।
    कभी कभी मुझे ऐसा लगता है कि यह सब कुछ किसी घड़े के अत्याधिक भरने जैसा है। मतलब शहर में जनसंख्या अमर बेल कि तरह बढ़ती जा रही है और गाँव खाली होते जा रहे है। तो मेरी समझ से यदि ऐसे में शहर और गाँव में रहने वाले लोगों की संख्या निश्चित कर दी जाये तो शायद सुधार लाया जा सकता है नहीं ? बशर्ते सरकार और प्रशासन भी जनता और देश के बारे में सोचें न कि सिर्फ अपने बारे में...आपको क्या लगता है।

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  2. फोड़े को नासूर बनते देने में पहले तो राजनैतिक लाभ दिखता है फिर समस्या की बाध्यता।

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  3. आपने बहुत सही कहा कि लोकतन्‍त्र सुचारू रूप से तभी चल सकता है जब इसकी भावना को शासन के स्‍तर पर प्रतिदिन सुदृढ़ बनाया जाएगा।
    शहरीकरण और नैतिकता-मौलिकता-सामाजिकता के बीच संतुलन का बहुत अभाव है और शासकीय रूचि की भी ..यह अंतर अभी और बढेगा और असंतोष भी ,उनसे जन्मा विरोध और विरोधी भी .दोष उस व्यवस्था की जिसने इस विरोध को शुरू में ही समझा नहीं और आवश्यकतानुरूप सही कदम नहीं उठाये.अब स्थिति नियंत्रण से बाहर हो रही है तब भी प्रयाप्त चिंतन या कार्य इस दिशा में हो रहे हैं?शायद नहीं.

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  4. राज व्यवस्था का डायलॉग अब दमदार निकल रहा है कि हम बदला लेंगे पर अपनी व्यवस्था नहीं बदलेंगे . भले समस्या बढ़ती जाए .

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  5. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन संदीप उन्नीकृष्णन अमर रहे - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  6. आज लोक, शासन तंत्र के जाल में फंस कर विवश है और लोक तंत्र केवल एक वर्ग के हाथ की कठपुतली बन कर रह गया है. आज नक्सली या इसी तरह की अन्य समस्यायें खुद राजनीतिक दलों द्वारा अपने लाभ के लिए पैदा की गयीं और आज ये इतनी शक्तिशाली हो गयीं हैं कि उनके नियंत्रण से बाहर हो गयी हैं. वे भस्मासुर पैदा कर सकते हैं पर उसको नष्ट करना नहीं जानते.

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  7. यथार्थ से जुड़े सूत्र संजोये है इस पोस्ट में:

    लोक की भावना यदि अपनी परम्‍परा से जीवनयापन करने की है और तन्‍त्र उसे आधुनिक बनने को विवश करे तो यह स्थिति संघर्ष को जन्‍म देगी। इसी का परिणाम है नक्‍सली, उनका केरिपुब के सुरक्षाकर्मियों से युद्ध। जो लोग शहरों में हैं सरकार से वे भी नाराज हैं। वे भी अपने जीवन पर शासकीय पहाड़ से गिरते उस विचारधारा के झरने को विवशता से सह रहे हैं, जिसमें शामिल होकर अधिक से अधिक बार उन्‍हें लगता है कि वे ठगे गए।

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  8. ये व्यवस्था अपने आप में एक जाल से कम नहीं ... लोक और तंत्र अक्सर विरोध पे ही खड़े होते हैं अधिकतर समस्याओं को लेकर ... और सच्चा तंत्र वही है जो सही समय पे सही सामजस्य बिठा लेता है ... अपने देश का तंत्र तो कभी ये सोच भी नहीं सकता ...

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  9. राज व्यवस्था से पूरी तरह खुश लोग तो इस धरती पर कहीं नहीं हैं लेकिन इतना तो जरूर है की अपने यहाँ जिस तरह से एक ही नियम दो लोगों पर दो तरह से लगते वो घोर असंतोष पैदा करता है. ना जाने कितने रसूखदार गुनाह किये बैठे हैं और घूम रहे हैं शान से. कितने बरस हो गए.

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  10. भारत में लोकतंत्र शब्द सुनने में ही अच्छा लगता है

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  11. भारत में लोकतंत्र शब्द सुनने में ही अच्छा लगता है

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  12. भारत में लोकतंत्र शब्द सुनने में ही अच्छा लगता है

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