Saturday, January 18, 2014

माघ, मूसलाधार, मैं (पुन:)

माघ, मूसलाधार, मैं  नाम से गत वर्ष (माघ, मूसलाधार, मैं 2013) भी एक संस्‍मरण लिखा था। तब माघ के उत्‍तरार्ध में उस रात भी ऐसी मूसलाधार वर्षा हुई जैसी इस वर्ष माघ के पूर्वार्द्ध में ही हो गई। जहां-जहां भी इस माघ की वर्षा हुई उन स्‍थानों पर आधी रात के बाद जो भी व्‍यक्ति जाग रहा होगा और असहाय कर देनेवाली बादलों की कड़कड़ाहट सुन पा रहा होगा, वह तो जैसे वर्षा थमने और बिजली की खूंखार गड़गड़ाहट के रुकने तक हृदयाघात  की स्थिति में था।
प्रकृति के आगे बेबस दुनिया
     रात का वर्णन लिखने के दौरान सुबह भी रात के द्वारा रौंदे जाने से बुझी, डरी, सहमी और कुरुप बनी हुई है। मन में तो यह है कि यह मौसम शीघ्र कटे और नया सुहावना दिन आए, पर किसानों और फसलों के बारे में सोच कर इस समय को भी सहर्ष आत्‍मसात कर लिया।
वैसे रात्रि के समय अन्‍य जीवों, प्राणियों की मन:स्थिति क्‍या रही होगी इसका मैं एक अनुमान ही लगा सकता हूँ, पर मैं स्‍वयं आकाशीय बिजली की ध्‍वनि से इतना भयभीत था कि आती हुई नींद भी तब तक के लिए स्‍थगित हो गई जब तक बिजली की कड़कड़ाहटें और वर्षा बूंदों की झमझमाहटें पूरी तरह बन्‍द नहीं हो गईं। निरन्‍तर गिरतीं मोटी जलधारों के बीच-बीच में जब आकाश को स्‍थान-स्‍थान से फाड़ती, कड़कती और भूकम्‍पन करती बिजली चमक रही थी तो मानवीय अस्तित्‍व इस समय कितना दीनहीन बना हुआ था! अधिकांश लोगों की तरह ही मैं भी इस प्राकृतिक झंझावात के व्‍यतीत होने की प्रतीक्षा करता रहा। सिर की छत के ऊपर आकाशीय बिजली गिरने के आभास को शीघ्रातिशीघ्र असत्‍य घोषित करनेवाले व्‍यतीत क्षणों को धन्‍यवाद देता रहा। इस समय मैं किसी ऐसे भूतल कक्ष में शरण लेना चाहता था, जहां नभ विद्युत की ध्‍वनि सुनाई ही न दे, उसका प्रकाश दिखाई ही न दे। 
ठण्‍ड में मौसम के आक्रमण से सुरक्षित मैं जब घर के अन्‍दर अप्रत्‍यक्ष मौसमीय ध्‍वनि से इतना असहाय, व्‍याकुल था तो उन प्राणियों, जीवों पर क्‍या बीतती होगी जो इस प्राकृतिक, विद्युत-जल सम्मिश्रित प्रलय को प्रत्‍यक्ष झेल रहे होंगे! ऐसे में जब घर भी असुरक्षित लगने लगे तो बेघर कितना जीवनहीन महसूस कर रहे होंगे! यह स्थिति किसी भी मानव को विनम्र बनाने के लिए कितनी उपयोगी हो सकती है, यह सोच कर लगा कि घमण्‍ड और स्‍वार्थ के शीर्ष पर बैठे हुओं को प्रतिपल ऐसे ही मौसमीय अट्टाहस मिलते रहने चाहिए, ताकि वे अपने वास्‍तविक अस्तित्‍व को पहचानें और कुछ वर्षों के अपने जीवन को ईश्‍वरीय-प्राकृतिक शक्ति से श्रेष्‍ठ न समझें।
मूल जीवन सिद्धान्‍तों को चुनौती देते आधुनिक बुदि्धीवीरों को चेताने के लिए ही प्रकृति क्रुद्ध हो ऐसा मौसमीय मंचन करती है लेकिन दुखद है कि स्‍वयं को एक प्रकार से अमर समझनेवाले आज के अधिकांश मानव माघ की मौसमीय चेतावनी से अनभिज्ञ नशे में चूर मूर्छित हो पड़े होंगे।
कुछ भूक्षेत्र ऐसे भी रहे होंगे जहां कल रात केवल शान्‍त वर्षा ही हुई होगी। ये उस भूक्षेत्र में रहनेवालों का भाग्‍य होगा कि उन्‍होंने कल रात नभमण्‍डल में बिजली की असहनीय ध्‍वनि टंकार नहीं सुनी। पता नहीं बिजली चमकने, कड़कड़ाने और गिरने से कल रात कौन-कौन घायल हुआ होगा! जिस प्राणी, जीव ने भी इस सबसे डरावनी ध्‍वनि को घर की मजबूत चाहरदीवारियों से बाहर खुले में सुना या देखा होगा उसका भला तो भगवान ही कर सकता था। और उनके शक्तिवान हृदय पर भी कम आश्‍चर्य नहीं किया जा सकता, जिन व्‍यक्तियों ने कल रात की सृष्टि, विद्युत वृष्टि को भी पूर्व की भान्ति सामान्‍य समझ कर उसका आनन्‍द लिया होगा।
     जो भी हो मैं तो कल रात तब तक दम साधे बैठा रहा जब तक जगह-जगह एकत्रित अन्तिम वर्षा जल बून्‍दें धरती पर टपक नहीं गईं। जब तक रात के सन्‍नाटे में पुन: दीवाल घड़ी की टिक-टिक सुनाई नहीं देने लगी।
(18.1.2014, 12.30, दोपहर)

16 comments:

  1. बहुत ही रोमांचक संस्मरण,वैसे प्रकृति के आगे हम सब बेबस ही रहते है। धन्यबाद।

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  2. बहुत प्रभावी चित्रण..

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  3. विकेश जी, सच कहा । कल की रात सचमुच डरावनी थी । यहाँ कई जगह खेतों में ओलों की मोटी चादर बिछ गई ।कितने ही किसानों की उम्मीदों पर वज्रपात हुआ है । प्रकृति से किसी का वश नही पर सबसे अधिक सजा धरतीपुत्रों को ही भोगनी पडती है ।

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  4. उत्तम प्रस्तुति विकेशजी।।।

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  5. प्रकृति का प्रभावी चित्रण.......

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  6. प्रकृति के इस उग्र रूप से भी जीवन्त संवाद ....कोई उसका प्रेमी ही कर सकता है।

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  7. प्रकृति के इस उग्र रूप का बहुत ही सजीव चित्रण किया है आपने गिरिजा जी की बात से सहमत हूँ। प्रकृति पर किसी का वश नहीं पर सबसे ज्यादा अधिक सजा धरती पुत्रों को ही भोगनी पड़ती है।

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  8. जाड़े की वर्षा, ओलावृष्टि, प्रकृति के कुपित होने के अतिरिक्त क्या इंगित करते हैं। कल्पना कर के मन काँप उठता है कि आज भी लोग फुटपाथों पर बसर करने को विवश हैं।

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  9. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति...

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  10. ये प्राकृति के विकराल रूप की नहीं ... समाज की विसंगतियों ... उसकी दुर्बलताओं का भी सजीव चित्रण है ...

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  11. विकेशजी, ये सच में प्रकृति का रौद्र वक़्त होता है... हमने भी कई बार इसे झेला है.... हम सब मजबूर तो हैं ही उस विधाता के आगे...

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  12. उम्दा -
    शुक्रिया महाशय -

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  13. सच है। जो कष्ट हमें नहीं हुआ उसे महसूस कर पाना सबके बस की बात नहीं। सर्दी की तीव्रता के दिनों में एक पल के नीचे ठंड से मारे गए पक्षी दिख जाते हैं तो एहसास होता है कि जिन सुविधाओं को हम सामान्य समझते हैं वे कितनी बड़ी हैं।

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  14. एक तो भीषण ठंढ और उस पर वारिश .......रोमांचक रूप से वर्णित....

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  15. ऐसे मौसम की कल्पना करके और बेघर, बे-वसन लोगों के बारे में सोच कर ही सिहरन होती है. प्रकृति जब भी कुपित होती है, सबसे ज्यादा दंश तो बेसहारा और गरीबों को ही भोगना होता है.संवेदना जगाती पोस्ट.

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  16. सत्य और सटीक बहुत खूब !

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