महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Sunday, December 28, 2014

पूष की रात और दिन

पूष की रात और दिन एक समान बने हुए हैं। रात को तो थोड़ी देर उठ कर जीवन का रोजनामचा लिख लेता हूं, पर सुबह मैं विकट आलस्‍य की चपेट में होता हूं। जीविका का आसन्‍न सं‍कट आने पर भी सुबह देर तक सोया हूं, ये सोच कर आज साढ़े सात बजे उठ गया। बिटिया को स्‍कूल छोड़ा। सुबह-सुबह धुन्‍ध का अन्‍धेरा फैला हुआ था। सड़क पर बीस मीटर के बाद कुछ नजर नहीं आता था। वाहन प्रकाश जला कर धीमे-धीमे खिसक रहे थे।
तेज गति में वाहन चलानेवालों की आज खैर नहीं, सोच कर मन को शान्ति मिली। कम-से-कम धुन्‍ध के सफेद अन्‍धेरे में तो इन अनावश्‍यक गतिशील वाहनों और इनके चालकों पर धीरज का प्रतिबन्‍ध लग सका है। नहीं तो ये वाहन को सड़क सहित उड़ा ले जाने को आतुर रहते हैं और इस आतुरता में इन्‍हें यह ध्‍यान भी नहीं रहता कि मेरे जैसे पथिक भी सड़क पर चलते हैं। सम्‍भवत: वे वाहनों पर बैठ कर भागते हुए मुझ जैसों को कीड़ा ही समझते हैं। तब ही तो कभी भी मुझ जैसों की जीवन-सुरक्षा के भाव से वे अपने वाहनों को संयम और सहजता से नहीं चलाते। हम जैसे तो उन्‍हें सड़क के दाएं-बाएं कहीं नजर आ जाएं, तो उनकी गतिकी के लिए व्‍यवधान बन कर ही उपस्थित होते हैं। लेकिन आज अभी धुन्‍ध के प्रतिबन्‍ध ने इनकी सारी अकड़ ठिकाने लगा दी है। यह देख व महसूस कर मन को बड़ा सुकून मिलता है।
          बिटिया को विद्यालय के द्वार से अन्‍दर जाते हुए देखता रहता। विद्यालय भवन में प्रवेश करते ही वह शीतमिश्रित अन्‍धेरी धुन्‍ध और बच्‍चों की भीड़ में खो गई। उसकी सुरक्षा और भलाई के लिए ईश्‍वर से प्रार्थना करता हूं और विद्यालय भवन के अन्‍दर अदृश्‍य हो चुकी बिटिया को याद करते हुए वापस घर की ओर चल देता हूं।
          वापसी में रास्‍ते पर देखता हूं कई छोटे बच्‍चे अपने अभिभावकों के साथ विद्यालय जा रहे हैं। शीत लहर का झोंका शरीर में कंपकंपी करता है और मैं घर पहुंचने तक बिटिया और विद्यालय सम्‍बन्‍धी भावनाएं भूल चुका होता हूं।
          घर शीताधिकता में अनाकर्षित करता है। घर के द्वार और खिड़कियों सहित सभी वस्‍तुएं शीत की नमी से सिमटी हुई प्रतीत होती हैं। ठण्‍ड में सूर्यप्रकाश के बिना जीवन सिकुड़ जाता है। सभी जीव इस मौसम में एक भावनात्‍मक अवसाद से पीड़ित हो जाते हैं। और मेरा तो इस मौसम में बहुत बुरा हाल है। व्‍यायाम, अध्‍ययन, लेखन-मनन सभी मनपसंद रुचियों-गतियों पर शीत की नमी बिछी हुई है।
          अलसायी दिन-दोपहरी भी जल्‍दी आ गई। कार्यालय जाते समय बल्‍लभ डोभाल जी के घर पर रुका। वे ठण्‍ड से बचने के लिए सारे गर्म वस्‍त्र पहन बिस्‍तर पर पालथी मारे बैठे थे। प्रणाम अभिवादन के बाद कहने लगे, ‘‘बड़ी ठण्‍ड है!! बुड्ढों के लिए यह ठण्‍डी खतरनाक है। दो-तीन दिन से ठण्‍ड लगने के कारण सिर चकरा रहा है। तबियत ठीक नहीं है।’’ उनकी बात सुन चिन्‍तातुर होकर बोला, ‘‘कपड़े पहने रखिए। लकड़ी जलाइए और गर्माहट लीजिए। हीटर है ही आपके पास जलाइए उसे।’’ उन्‍होंने मुझे कुछ निजी कार्य सौंपे और मैं कार्यालय की ओर चल दिया।  
          गलनयुक्‍त पौष जैसे मेरे लिए तन-मन से नर्क बन कर प्रस्‍तुत है। रात को घर पहुंचते-पहुंचते देखता हूं शीत प्रकोप में जन-जीवन घरों में दुबका हुआ है। असहनीय शीत में कोई दूकानदार या पैदल या‍त्री दीख पड़ता है, तो वह बड़ा उद्यमी लगता है।
इतनी रात बीते सड़कों पर जीवन बेशक अनुपस्थित लगे, पर घरों के अन्‍दर तरह-तरह के टेलीविजन चैनलों के समक्ष आधुनिक और प्रगतिशील जीवन आंखें गड़ाए विकास के भ्रम में झूल रहा है, मनोरंजन कर रहा है। विकास की आधुनिक सीढ़ी पर चढ़ता आदमी आज धरती की ओर देखने को राजी नहीं है। विकास का भ्रम उसे जीवन की क्षणभन्‍गुरता के प्रति क्षणांश को भी एकाग्र नहीं कर पा रहा। उसके सिर पर भविष्‍य सवार है और पैरों के नीचे वाहनों के गति-यन्‍त्र लगे हुए हैं। वह भागे जा रहा है। ये जाने बिना कि अन्तिम पड़ाव क्‍या होगा और उसे प्राप्‍त करने के बाद क्‍या करना है!!
     घर पहुंचा तो देखा बिटिया सोई नहीं थी। उसके बचपन पर डाका डाल रहा आधुनिक जीवन का विचार मुझे क्रोध से भर देता है। और मैं रोज ही उसे जल्‍दी नहीं सोने के लिए डांट देता हूं। उसकी खांसी अभी भी बनी हुई है। और मेरी विवशता भी मेरे सिर पर तनी हुई है।
विकेश कुमार बडोला

Saturday, December 20, 2014

आतंक की भेंट

ब तक पाकिस्‍तान के नाम पर थू-थू करता रहा भारत आज उसके प्रति अचानक श्रद्धान्‍‍जलिमय हो गया है। वहां के सेना विद्यालय पर हुए आतंकी आक्रमण में मृत विद्यार्थियों के प्रति भारतीय सम्‍वेदनाएं यहां-वहां सब जगह से टपक रही हैं। ‘----नहीं! नहीं! इसे पाकिस्‍तानी दुर्घटना के रूप में मत लीजिए। बच्‍चे तो सबके समान ही हैं। अरे उनके प्रति हुई ऐसी क्रूरता को भारत-पाक से जोड़ कर मत देखिए। जहां-जहां मैं भटकता हूं, मुझे यही वाक्‍य सुनाई दे रहे हैं।
          मैंने विचार किया, अरे यह तो कुछ-कुछ वैसा ही भावना-प्रदर्शन है, जैसा गुटखा-बीड़ी और मदिरा-चाय का पान करनेवाले कहते हैं कि मदिरा-धूम्र-चायपान स्‍वास्‍थ्‍य के लिए हानिकारक है। लेकिन इनके उत्‍पादन, विज्ञापन, प्रचार-प्रसार के लिए उनमें रोजगार और अधिकार के आधार पर गलाकाट प्रतियोगिता भी साथ-साथ होती है। पाकिस्‍तानी विद्यालय की घटना पर मेरा स्‍वाभाविक विचार पाकिस्‍तान के लिए सम्‍वेदना, सहायता, प्रार्थना के रूप में बिलकुल नहीं उभरा। और मेरा ही क्‍या किसी भी सम्‍वेदनशील भारतीय का स्‍वाभाविक विचार ऐसे देश के प्रति सम्‍वेदन-सहाय-प्रार्थी कैसे हो सकता है!
जो देश आतंक के तीन विकृत ध्रुवों में बंटा हुआ हो, वहां के किस ध्रुव पर विश्‍वास किया जा सकता है। वहां की सरकार, सेना और इन दोनों के कुत्सित गठन से तैयार आतंकवाद कोई पृथक सत्‍ता नहीं है। बल्कि वहां सरकार, सेना और आतंकवादियों को अलग करके देखने का कोई सामाजिक आधार है ही नहीं। ये तीनों चाहे-अनचाहे या मानें चाहकर ही आतंकी कामों में परस्‍पर सहयोग करते रहे हैं। भारत विरोधी पाकिस्‍तानी सैन्‍याक्रमण हो या आतंकाक्रमण, इन्‍हें भौतिक एवं भाविक रूप से वहां की सरकार ही प्रायोजित करती है और सरकार सामाजिक मताधिकार की ही वाहक होती है।
          जब पूरे विश्‍व में अधिकांश परिवारों के लोग भी आपस में प्रेमपूर्वक नहीं रह रहे हों, तब दो कट्टर दुश्‍मन देशों का एक आतंकी घटना के बहाने गाया जानेवाला आतंकविरोधी राग किसी को कितना और कब तक सुहाएगा, ये तो समय ही बताएगा। ईर्ष्‍या, द्वेष, वैर और मतभेद मनुष्‍य के स्‍वयं के साथ भी होते हैं। आत्‍महत्‍या करनेवाले इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। मतभेदों का विस्‍तार बहुत दूर तक हो गया है। भाई का भाई से, बहन का बहन से, पिता का पुत्र से, मां का बेटी से, मित्र का मित्र से, पड़ोसियों का पड़ोसियों से, सरकार का निजी कंपनियों से, कंपनियों का कर्मचारियों से, बड़े पदाधिकारियों का छोटे कर्मचारियों से। जब मनुष्‍य जीवन में मतभेदों की पैठ रिश्‍तों-सम्‍बन्‍धों तक में हो गई हो, तो धर्माधार पर विभाजित दो देशों के बीच पनपे मतभेदों को किसी कीमत पर कभी भी पाटा नहीं जा सकता।
          अनेक विषयों से सम्‍बन्धित मतभेद समाप्‍त किए जा सकते हैं, पर धर्म सम्‍बन्‍धी मतभेद कभी खत्‍म नहीं हो सकते। जब तक पूरे संसार का धर्म एक नहीं होगा, तब तक धर्म प्रणालियों के मतभेदों के कारण उभरनेवाला घरेलू और विदेशी आतंक तो दुनिया को झेलना ही होगा।
          निस्‍संदेह आतंक के कारण आज आधुनिक हो गए हों, लेकिन कारणों की मूल प्रेरणा धर्म से ही उपजती है। आतंक का वास्‍तविक स्‍वभाव, प्रवृत्ति वह नहीं है, जो हमें हथियारों से लैस आंतकवादियों के रूप में नजर आता है। बल्कि इसकी सहज स्‍वाभाविक प्रवृत्ति का निर्धारण तो संसार की लोकतान्त्रिक छतों के नीचे के चार खम्‍भे करते हैं। जो अधिकांश लोकतान्त्रिक देशों में कार्यपालिका, विधायिका, न्‍यायपालिका और प्रेस के रूप में विद्यमान हैं। यह चार स्‍तम्‍भ बौदि्धक चालाकी और चंचलता से भरे हुए हैं। बाकी देशों में तो नहीं, लेकिन इस देश में इनकी भूमिका अब तक अपने सबसे संस्‍कारिक धर्म के विरुद्ध कुतर्क, विवाद परोसने की ही रही है। ऐसी स्थि‍ति में दुर्घटनाएं ही हो सकती हैं।
          बच्‍चों के मरने पर आतंक के प्रतिरोध में बोलने व आंसू बहानेवालों को सबसे पहले अपने भीतर झांकने की जरूरत है। यदि वे भीतर ह्रदय में भी बच्‍चों के कल्‍याण के प्रति अंशमात्र भी चिंतित हैं या होंगे, तो निश्चित रूप से उनके राग में मैं भी शामिल हूं और रहूंगा। और अगर वे छल से व अपने घर-परिवार या राज-परिवार की राजनीति से दुष्‍प्रेरित हो ऐसा व्‍यवहार कर रहे हैं, तो बच्‍चों का मरना जीने से बेहतर होगा।

Friday, December 5, 2014

भाग्‍य के हाथ जीवन की बागडोर

जो कहते हैं कि भाग्‍य कुछ नहीं होता, उनके लिए एक उदाहरण है। एक ओर आ‍स्‍ट्रेलियन क्रिकेट खिलाड़ी की मृत्‍यु का संस्‍कार एक हफ्ते से चल रहा है। दूसरी ओर सुकमा के घने जंगल में नक्‍सलियों द्वारा मारे गए केरिपुब कर्मियों की मौत का दुख एकाध दिन में ही सुस्‍ता गया है। मृतकों के पीड़ित परिवार को अड़तीस लाख देने की घोषणा के साथ राजनीति से लेकर सड़क तक का भारतीय लोकतन्‍त्र अपनी खती हुई दिनचर्या में उलझ गया है।
क्रिकेट खेलते हुए दुर्घटना में मृत फिलिप ह्यूज के लिए आस्‍ट्रेलियन महाद्वीप पूरे 168 घंटों तक शोक-संतप्‍त रहा। उनसे सम्‍बन्धित सभी वस्‍तुओं, भावनाओं, आचरणों, आचार-व्‍यवहार, पसंद-नापसंद का सामूहिक संवेदनाई प्रदर्शन-प्रवचन हुआ। बत्‍तीस वर्ष का उनका छोटा जीवन अचानक बहुत बड़ा हो गया। उनका अन्तिम संस्‍कार भी एक यादगार मेला बन गया। यहां-वहां सब जगह उनके लिए पीड़ा प्रवाहित वक्‍तव्‍य-हस्‍ताक्षर हुए। समाचारपत्रों के खेल पृष्‍ठों में उनकी मृत्‍युपरांत छवि से क्रिकेटप्रेमी भीतर तक भीगे। यह केवल भाग्‍य नहीं बल्कि अहोभाग्‍य है।
सुकमा में देश के लिए मरे केरिपुब कर्मियों के प्रति देशज शोक में वेदना कम औपचारिकता ज्‍यादा है। सुरक्षाकर्मियों की जीवन-सुरक्षा का सच्‍चा विचार उनकी मौत पर बंटनेवाले मुआवजे के नीचे दबा रह जाता है। यदि सरकारी मंशा होती, तो अड़तीस लाख गुणा चौदहका हिसाब पहले लगाती। पांच करोड़ बत्‍तीस लाख की धनराशि से यदि नक्‍सलियों से भिड़ने के लिए नवोन्‍नत युद्ध सामग्री खरीद कर केरिपुब जवानों को दी जाती, तो उनके जीवन बच सकते थे। सीरिया जैसे मुसलिम देशों में इस्‍लामिक स्‍टेट के विरुद्ध अमेरिका ने सबसे उन्‍नत हथियारों से सम्‍पन्‍न होने के बाद भी अभी तक अपनी थलसेना नहीं उतारी। इसका मतलब उसे अपने सैनिकों के जीवन महत्‍वपूर्ण लगते हैं।
कीड़ों की तरह भटकनेवाली जनसंख्‍या में से कई और आएंगे रोजगार के नाम पर सेना में भर्ती होने। जनसंख्‍या की इस देश में कोई कमी नहीं है। इसलिए यहां अमेरिका और आस्‍ट्रेलिया की तरह एक-एक मनुष्‍य का जीवन कभी महत्‍वपूर्ण नहीं हो सकता। यहां तो देश के गौरव-गरिमा के लिए अपना बलिदान देनेवालों के सैन्‍य-वस्‍त्र उनके अंतिम संस्‍कार से पहले ही कूड़े के ढेर में मिल रहे हैं। यह है भाग्‍य-भाग्‍य की बात। जीवन की बागडोर भाग्‍य के हाथ में ही तो है।
फिलिप ह्यूज, चौदह शहीद केरिपुब कर्मियों और सांसारिक भावनाओं की पृष्‍ठभूमि में जाने-अनजाने मर चुके व मर रहे लोगों को भुला-बिसराकर भारतीय गणतन्‍त्र बहस कर रहा है, रामजादों और हरामजादों की परिभाषा में उलझा हुआ है।
उपरोक्‍त का ध्‍यान करते-करते मेरी गम्‍भीर मुद्रा एक वृद्ध को रुष्‍ट कर गई। वह समझा कि मैं अपेक्षित भौतिक सुख न मिलने पर परेशान हूं और बोला, ‘‘बेटे हिम्‍मत रखो। परेशानियों में जीने से ही आदमी निखरता है। सहज भाव से मेरे मुख से निकल गया, ‘‘दद्दू, जी कर क्‍या होगा? जीने के बाद मुझे अवश्‍य बताना कि इससे क्‍या मिला।’’ इस संवाद के बाद मेरे और दद्दू के बीच एक लम्‍बी चुप्‍पी पसर गई। उन्‍होंने मुस्‍कुराते हुए सोचना शुरु किया और धीरे-धीरे डरावनी गम्‍भीरता ओढ़ ली।
इस आलेख को ब्‍लॉग में डालते हुए भारतीय दुर्भाग्‍य फिर से जागा। कल रा‍त तीन बजे के आसपास कश्‍मीर में हमारे दस-ग्‍यारह सैनिक आंतकियों से लड़ते हुए मृत्‍यु को प्राप्‍त हुए।
विकेश कुमार बडोला

Saturday, November 22, 2014

धर्म-क्षेत्र की हानि के बहाने

ह बात सतलोक आश्रम चलानेवाले रामपाल के बहाने कह रहा हूं। याद करें, जिस दिन रामपाल को कानूनी रूप से देशद्रोही ठहरा कारावास मिला, उसी दिन केन्‍द्रीय अन्‍वेषण ब्‍यूरो (सीबीआई) के निदेशक रंजीत सिन्‍हा को सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने 2जी स्‍पेक्‍ट्रम विषय की जांच से अलग कर दिया। देखा व समझा जाए तो रामपाल से बड़ा अपराध रंजीत सिन्‍हा का है, पर उन्‍हें कोई कानूनी दण्‍ड नहीं मिला।
ऐसे प्रशासकों के कारण ही देश में गरीबों की बड़ी संख्‍या बढ़ रही है और परिणामस्‍वरूप बुरी तरह पीड़ित व प्रताड़ित जनसमूह अपने जीवन का कल्‍याणकारी निदान रामपाल जैसे लोगों की शरण में जा ढूंढने को विवश होता है।
 सिन्‍हा पर आरोप है कि उन्‍होंने बहुत बड़े अवैध धन लेन-देन के आधार 2जी स्‍पेक्‍ट्रम विषय की साफ-सुथरी सरकारी जांच में व्‍यवधान डाले। यह अवैध धनराशि इतनी बड़ी है कि इससे लाखों लोगों को त्‍वरित रोजगार प्रदान किया जा सकता है। इस धनराशि का रोजगारपरक निवेश ना भी किया जाए, इसे एक निश्चित अनुपात में जरूरतमंद लोगों में बांट दिया जाए, और लोग अपने-अपने हिस्‍से आई राशि को पांच साल के लिए बैंक में जमा कर दें, तो भी लोगों की माहवार आमदनी पांच-दस हजार रूपए हो सकती है। इस प्रकार वैध धनराशि लोगों के व्‍यक्तिगत अधिकार में होते हुए भी बैंकों के माध्‍यम से सरकारी कामों में भी निवेशित हो सकती है। इससे बेहतर आर्थिक आयोजन क्‍या हो सकता है! आर्थिक आत्‍मदृष्टि जाग्रत कर कोई भी शासक इस योजना को कार्यरूप दे सकता है। लेकिन नहीं, अभी दूर तक इस प्रकार की कोई कार्ययोजना भारतीय लोकजीवन में उभरती हुई नहीं दिखती।
बेरोजगार, जीवन की मूलभूत आवश्‍यकताओं के लिए भटकते और साठ साल पहले रोपे गए औद्योगिक प्रगति के विचार से अपने ग्रामीण-आत्‍मनिर्भर जीवन से भी विलग कर दिए गए लोग अपना जीवन कैसे जी रहे हैं, क्‍या इसकी मानवीय अनुभूति सरकार, कानून या शासन-प्रशासन को है? मूलभूत सुख-‍सुविधाओं के अलावा विलासिता का सुरक्षित जीवन जी रहे प्रमुख राजकीय प्रतिनिधि या न्‍यायविद हों या प्रशासनिक अधिकारी अथवा मीडिया के विश्‍लेषणकर्ता हों, जब तक वे सब गरीबी व विपन्‍नता को अपने शरीर व मन से नहीं झेलेंगे, तब तक वे गरीबों की मन:स्थिति को कैसे समझ सकते हैं!
सन् 2006 में आर्यसमाजियों के साथ रामपाल के समर्थकों की झड़प में एक युवक मारा गया। प्रथम दृष्टि में रामपाल का इस दुर्घटना से क्‍या जुड़ाव होता है, कुछ भी नहीं। तब भी पुलिस, प्रशासन से लेकर न्‍यायालय सभी उसे कानून के उल्‍लंघन का दोषी ठहरा न्‍यायालय में उपस्थित होने को कहते रहे। वह उपस्थित नहीं हुआ तो कानून का उल्‍लंघन माना गया। एक व्‍यक्ति जो सरकारी मानसिकता से उबरने के लिए सिंचाई विभाग की सरकारी नौकरी छोड़ अध्‍यात्‍म पथ अंगीकार करने की इच्‍छा से सतलोक आश्रम तक की वर्तमान वीभत्‍स स्थिति तक पहुंचा, क्‍या इसके लिए वह अकेला दोषी है?
मीडिया रामपाल को धार्मिक ठग और उसके हजारों अनुयायियों को अंधभक्‍त, मूर्ख व अज्ञानी बता रहा है। उसके आश्रम पर कब्‍जा करने के बाद पुलिस को वहां जांच में जो कुछ मिल रहा है, मीडिया उस पर आश्‍चर्यविमूढ़ हो रहा है। कोई समाचारपत्र लिखता है कि आश्रम में कंडोम मिले, तो कोई वहां अवैध वस्‍तुओं के होने की पुष्टि करता है। इलेक्‍ट्रानिक मीडिया में प्रसारित और प्रिंट मीडिया में प्रकाशित अधिकांश विज्ञापनों में महिलाओं के अंग उभार दिखाना और विज्ञापित वस्‍तुओं को खरीदने का अनुरोध करना क्‍या दूसरे ग्रह के लोगों के लिए है? जब यह सब कुछ धरती के लोगों के लिए ही है, तो धरती पर कहीं कंडोम मिलने पर इतना अचरच करना अपरिपक्‍व मानसिकता को दर्शाता है। जैसे पेट के लिए सभी को खाना चाहिए, वैसे ही संभोग भी सभी के लिए एक आवश्‍यकता है। रामपाल जैसे बाबा अगर संभोगीय स्थिति में नहीं भी होते हों, पर उसके आश्रम में तैनात सेवाकर्मियों को तो संभोग से रोका नहीं जा सकता। तो अगर वहां आश्रम में सुरक्षित यौन सम्‍बन्‍धों के निरोधक मिल गए तो क्‍या बड़ी बात है! और ऐसे निरोधकों पर इतनी हायतौबा क्‍यों, जब यह व्‍यापार, रोजगार, और सामान्‍य जीवन की एक जरूरत है तो? और हम ऐसी उम्‍मीद ही क्‍यों कर लेते हैं कि वर्तमान सुख-सुविधाओं की उन्‍नत व्‍यवस्‍थाओं के बीच बैठा बाबा शुद्ध व सात्विक बाबा ही है! आश्रम में मिलनेवाली वस्‍तुओं पर तब इतना हल्‍ला क्‍योंयह भी विचारणीय है कि जिन आधुनिक व्‍यवस्‍थाओं को रखने और उनका उपभोग करने के लिए बाबा को दोषी कहा जा रहा है, उनको तैयार करनवाले क्‍या दूध के धुले हुए हैं? रामपाल भी पहले आधुनिक व्‍यवस्‍थाओं का प्रबन्‍ध करनेवाला एक छोटा सरकारी घटक था। बाद में अध्‍यात्‍म के नाम पर वह भटक जाता है और कुछ लोग उसका अनुसरण करने लगते हैं, तो इसमें रामपाल व उसके अंधभक्‍तों के अलावा क्‍या कोई और व्‍यवस्‍था दोषी नहीं है? किसी के द्वारा एक गलत रास्‍ते का चयन उससे पहले बने एक या अधिक गलत रास्‍तों के आधार पर ही होता है।
अगर लोगों के हवाले से शासन-प्रशासन चाहता है कि झूठे बाबा, अंधभक्ति या ठगाधारित धार्मिकता खत्‍म हो, तो इसके लिए सबसे पहले और जरूरी काम शासन-प्रशासन को ही करने होंगे। पहला काम, जनसंख्‍या पर नियन्‍त्रण। दूसरा, नियन्‍त्रण के बाद की जनसंख्‍या को जीवन की आधारभूत आवश्‍यकताओं की सुगम आपूर्ति। तीसरा, पारंपरिक जीवन की व्‍यवस्‍था बनाने के प्रति एक ठोस कार्ययोजना।
आधुनिक जीवन, जिसके अन्‍दर समाज व सरकार के मिश्रण से तैयार उपभोग की स्थितियां आत्‍मघात और आत्‍मभ्रान्ति ही दे रही हैं, उसमें परिवर्तन पुरातन ग्राम-स्‍वराज व्‍यवस्‍था ही कर सकती है। भले इस व्‍यवस्‍था को बनाना आज सपना लग रहा है, लेकिन यह याद रहे कि यही आनंदपूर्ण जीवन की सर्वश्रेष्‍ठ आधारशिला होगी।
जब जीवन का धर्म-क्षेत्र तक बदनामी झेल रहा हो, तब यह अनुमान भयग्रस्‍त ही करेगा कि अब जीवन में बचा ही क्‍या है। लेकिन सच्‍चे मानुष तब भी हार नहीं मानते। उन्‍हें फिर भी एक आस कहीं न कहीं नजर आती ही है।


विकेश कुमार बडोला

Friday, November 7, 2014

प्‍लेइंग इट माई वे


प्‍लेइंग इट माई वे पुस्‍तक पर बवाल मचा हुआ है। सचिन तेंदुलकर ने इसमें अपने क्रिकेटीय जीवन की उन बातों का खुलासा किया है, जो आम क्रिकेट प्रेमी को पता नहीं थीं। इस शताब्‍दी के दूसरे दशक में विचरित देश-दुनिया के लिए क्रिकेट शायद अब वह नहीं रहा, जो दस-बीस साल पहले हुआ करता था। 
          पीछे 2007 में चलते हैं। दक्षिण अफ्रीका में विश्‍व कप क्रिकेट का अन्तिम मुकाबला भारत और आस्‍ट्रेलिया के बीच हुआ। आस्‍ट्रेलिया ने टॉस जीत पहले बल्‍लेबाजी की, तीन सौ से ज्‍यादा रन ठोक डाले। भारत लक्ष्‍य प्राप्‍त न कर सका और हार गया। भारतभर में मैच के दौरान पसरा सन्‍नाटा मैच खत्‍म होने के बाद तक बना रहा। दिनों, हफ्तों और महीनों तक क्रिकेट प्रेमियों का रक्‍तचाप बढ़ा रहा। तनाव, कुण्‍ठा, हताशा और निराशा में वे अपने सामान्‍य जीवन के कार्य भी ठीक से नहीं कर पाए। क्रिकेट के प्रति ऐसा लगाव और उसकी विश्‍व-प्रतियोगिता के अन्तिम मुकाबले में देश का हारना, शायद सन् 2007 तक देश का सबसे बड़ा दु:ख हुआ करता था। 
          सचिन ने क्रिकेट को बड़ा किया है। उनके रहते-रहते क्रिकेट मैच में लोगों की विशेष रुचि हुआ करती थी। वे इस खेल में अपने अप्रतिम योगदान के कारण अत्‍यन्‍त लोकप्रिय रहे और अब भी हैं। 2007 के विश्‍व कप के दौरान भारतीय क्रिकेट टीम के कोच ग्रेग चैपल ही थे। मुझ जैसा क्रिकेट का कीड़ा उन बातों काे तभी समझ-जान गया था, जिन्‍हें प्‍लेइंग इट माई वे के जरिए लोग अब जान रहे हैं। सचिन खेल के दौरान देश में, लोगों और पूंजीवादी व्‍यवस्‍था के परिचालक यानि कॉर्पोरेट घरानों के बीच में प्रिय हुआ करते थे और हैं, और इसी का फायदा उठाकर एफएमसीजी बिक्री बढ़ाने के लिए कम्‍पनियों ने उनका जमकर विज्ञापनी इस्‍तेमाल किया। कहने का मतलब है जब वे चारों ओर से अपने दम पर सबको हिलाने-डुलाने की स्थिति में थे, तो बीसीसीआई की क्‍या औकात थी कि वे सचिन की शिकायत पर ग्रेग चैपल के खिलाफ कोई अनुशासनात्‍मक कार्रवाई नहीं करता। तो फिर सचिन ने चैपल की तानाशाही का खुलासा तब क्‍यों नहीं किया? अगर वे इन बातों को समेट कर तभी पुस्‍तकाकार दे देते, तो उनके प्रति लोगों का सम्‍मान और बढ़ जाता। जब क्रिकेट के प्रति लोगों की दीवानगी चरम पर थी, जब देश का कालाधान आईपीएल के रूप में निवेशित नहीं हुआ था, तब अगर वे ये खुलासे करते तो शायद आज क्रिकेट के प्रति लोगों में स्‍वाभाविक दीवानगी बनी रहती। अब उनके खुलासे का कोई मतलब नहीं रहा। 
         भूखे को रोटी, बीमार को दवा, बेघर को छत ना भी मिले, तो कोई बात नहीं। शासन-प्रशासन लोगों की आधारभूत आवश्‍यकताओं की व्‍यवस्‍था नहीं करता तो भी ज्‍यादा दिक्‍कत नहीं। जनता का खून-पसीना चूसना, कराधान के नाम पर उनके आर्थिक हित हड़पने की ताबड़तोड़ गतिविधियों को चलाना, यह भी लोगों के लिए समस्‍या नहीं है। जीवन की जरूरतों के अभाव के लिए शायद ही कभी ऐसा सामूहिक शोक व दुख देखा गया होगा, जैसा क्रिकेट में हारने का होता हुआ आया है इस देश में। जो लोग क्रिकेट खेलते हैं, जिन्‍हें इसके खेल और खेल इतर नीति के समीकरण मालूम हैं और जो अपनी आर्थिक सम्‍पन्‍नता के बावजूद समय व्‍यतीत करने के लिए इस खेल में दिलचस्‍पी लेते हैं, उनका तो समझ आता है, पर रोटी-पानी के लिए धक्‍के खा रहे लोगों का इसके प्रति रुझान क्‍यों है, यह आज तक समझ नहीं आया। 
विकेश कुमार बडोला 

Sunday, October 26, 2014

भोगोपभोग से मुक्ति की चाह

देश का सामूहिक जीवन बहुत अधिक कुंठित है। समझ-बूझ रखनेवाले लोग तब भी अपने-अपने सामाजिक परिवेश को आशा और विश्‍वास बनाए रखने के लिए प्रेरित करते रहते हैं। मनुष्‍य या मनुष्‍यों का समूह एक समाज के रूप में सहजता से जीवनयापन कैसे कर सकता है, जब उसके पास परम्‍परा और आधुनिकता के साथ सामंजस्‍य बनाए रखते हुए जीवन जीने की बाध्‍यता हो। इस कारण परम्‍परागत सामाजिक धर्म, उत्‍सव, त्‍योहार, खेल, आदि जीवन संगतियां सामूहिक भाव-बहाव से संचालित न होकर व्‍यक्तिगत एकल भाव से परिचालित होने लगी हैं, जिसकी हानि अनेक सामाजिक विसंगतियों के रूप में हो रही है। जैसे, धर्म जो ऐकान्तिक अराधना थी, वह सड़क पर लाउडस्‍पीकर के द्वारा गाया-बजाया जानेवाला एक सामाजिक ध्‍वनि प्रदूषण बन गया है। त्‍योहार, जो सामाजिक संचेतना और ऊर्जा के वाहक थे, सबसे पहले व्‍यापारिक क्रियाओं के आधार बने और होते-होते आज अपव्‍यय, अव्‍यवस्‍था के सबसे बड़े कारक बन गए हैं। खेल व क्रीड़ाएं कभी तन-मन को स्‍वस्‍थ रखनेवाली गतिविधियां थीं, वे अब आज भारतीय स्‍वतन्‍त्रता के बाद से लेकर अब तक हुए अवैध धन के लेन-देन को राजकीय प्रबन्‍ध के सहारे गति दे रही हैं।
वर्तमान में मनुष्‍य जीवन के रंजन के लिए निर्धारित उसकी प्रत्‍येक पारम्‍परिक और सामाजिक संगति को व्‍यापार से जोड़ चलाया जा रहा है। व्‍यापार गलाकाट सामाजिक प्रतिस्‍पर्द्धा बढ़ा रहा है। व्‍यापार में उद्यमिता की कोई बात-विचार है ही नहीं। व्‍यापारिक भागदौड़ एक जनवर्ग द्वारा अत्‍यधिक लाभ अर्जित करने का माध्‍यम मात्र बन गई। उपभोक्‍ता और व्‍यापारी बन मनुष्‍य वस्‍तुओं के बजाय स्‍वयं का भोगोपभोग करने पर लगा हुआ है। उसकी आत्‍मरुचि समाप्‍त हो गई और उसमें उपभोक्‍तावाद के परिणामस्‍वरूप अनावश्‍यक महत्‍वाकांक्षाओं के विचार जड़ें जमाने लगे हैं। मनुष्‍य केवल दिमाग से ही किसी बात या विचार का विश्‍लेषण कर पा रहा है। इससे उसमें आत्‍मतनाव की अधिकता हो गई है। आत्‍मतनाव शुरु होने का मतलब है मनुष्‍य का मनुष्‍यता से तीव्र विचलन। ऐसा होने पर जनमनगण की कल्‍याण भावना कैसे बनेगी। इसी कारण सामाजिकता, उद्यमिता व जनकल्‍याण के कार्य मनुष्‍य की आत्‍मरुचि से संगठित नहीं हो पा रहे। इन सबसे जीवन बाहर से तो चमक रहा है, पर अन्‍दर से अन्‍धेरों में लिपटा हुआ है।
     जीवन यदि अन्‍धेरा है तो उसमें उजाला लाने के लिए हमें दूसरा जीवन नहीं मिलनेवाला। इसी तरह यदि जीवन आशान्वित है, तो भी आशाओं के फल यदि इस जीवन के बने-रहने के आखिरी भाव तक भी नहीं मिले, तब कैसा प्राकृतिक न्‍याय और कौन सी जीवन या जैविक मौलिकता! शायद भगवान के प्रति भी यहीं इसी विचार-बिन्‍दु से भ्रम-पोषित अविश्‍वास बढ़ने लगता है। भगवान के प्रति पूर्ण अविश्‍वास भी यह सोच कर नहीं होता कि हमें इतना तो मान-जान लेना ही चाहिए कि जीवन सदैव नहीं रहेगा। इस रहस्‍य को जानने-समझने की चाह सभी मनुष्‍यों में कभी न कभी तो होती ही है कि आखिर मौत के बाद का खेला है क्‍या! बेशक जीवन के प्रति बच्‍चों का आत्‍मविश्‍वास बढ़ाने के विचार से परिपक्‍व और प्रौढ़ जन उन्‍हें प्रसन्‍नतापूर्वक जीवन गुजारने की सलाह देते रहे हैं और अभी भी दे रहे हैं, और यह उनका व्‍यक्तिगत कर्तव्‍य भी होता है, जिसकी अनुभूति उन्‍हें आत्‍मप्रेरणा से स्‍वयं ही होती है, पर वे भी अपने नितान्‍त एकल जीवन-दर्शन में मृत्‍यु के विचार पर विचारहीन और भावविहीन होते हैं।
आज इस भाव से एकाकार होना सम्‍पूर्ण सामूहिक जीवन के लिए बहुत आवश्‍यक है। यही भावना वैश्विक उपभोक्‍तावादी दुष्‍प्रवृत्तियों पर चमत्‍कारिक नियन्‍त्रण कर सकती है। दुनिया के अतिसंवेदनशील विद्वानों, लोगों ने समय-समय पर सबकी खुशहाली के लिए यही मन्‍त्र तो फूंका है। यदि यह मन्‍त्र युवाओं की समझ में भी आ जाए तो संसार उपभोक्‍तावाद से बाहर निकल सकता है और यह हो गया, तो जीवन पहले कभी नहीं अनुभूत किए गए सबसे सुन्‍दर, सबसे अपेक्षित भावनाओं से सुसज्जित होगा।

Friday, October 10, 2014

मालगुडी डेज के नारायण

ज आर. के. नारायण का 108वां जन्‍म-दिवस है। दक्षिण भारतीय अंग्रेजी लेखक और उत्‍तर भारतीयों में मालगुडी डेज के लेखक के रूप में प्रसिद्ध नारायण अपने समय के बड़े उत्‍प्रेरक लेखक रहे। जिन्‍हें उनके अंग्रेजी उपन्‍यास वेंडर ऑफ स्‍वीट्स पढ़ने का अवसर मिला, वे नारायण की साहित्यिक उत्‍कृष्‍टता से भलीभांति परिचित हैं। उनके लेखन में पचास-साठ के दशक का दक्षिण भारतीय जीवन अपने मूलरूप में प्रकट होता है। उनकी रचनाएं अपने किसी भाग, अंश या खण्‍ड में यह अहसास ही नहीं होने देती कि इन्‍हें कोरी कल्‍पनाओं के आधार पर रचा गया है। आर. के. नारायण की मर्मस्‍पर्शी रचनाओं पर आधारित शंकर नाग के निर्देशन में बनाया गया मालगुडी डेज धारावाहिक जितनी बार भी देखा जाए उतनी बार जीवन के सम्‍बन्‍ध में एक नई संवेदना और सीख ही देता है। विशेषकर बच्‍चों के अपरिपक्‍व मन-मस्तिष्‍क पर मालगुडी डेज धारावाहिक का चलचित्रण सकारात्‍मक असर डालता है और जीवन के मूल को समझने और उसके अनुसार आचरण करने की प्रेरणा देता है।
वेंडर ऑफ स्‍वीट्स उपन्‍यास का हिन्‍दी रूपान्‍तरण मिठाईवाला भी निरुपम है। मिठाईवाला की भूमिका में अनंतनाग ने अत्‍यन्‍त प्रभावी अभिनय किया है। उपन्‍यास की कहानी, कथ्‍य और उद्देश्‍य को धारावाहिक में इतने मर्म से प्रस्‍तुत किया गया है कि दर्शक के अनन्‍य प्रबोध चक्षु स्‍वत: खुलने लगते हैं। इसमें उसे आर. के. नारायण, मालगुडी डेज, मिठाईवाला, शंकर नाग, अनंत नाग सहित धारावाहिक के सभी चरित्र चित्रण गुजरे कालखण्‍ड में अपने जीवन से जुड़े हुए लगते हैं। मालगुडी डेज के माध्‍यम से उत्‍तर भारतीयों के सामने आर. के. नारायण के लेखकीय कौशल को प्रस्‍तुत करने के लिए शंकर नाग निश्चित रूप से प्रंशसनीय हैं। लेकिन शंकर नाग ने भी तो आर. के. नारायण के उपन्‍यास से प्रभावित होकर ही धारावाहिक बनाने की प्रेरणा ली। इसलिए मालगुडी डेज के सम्‍पूर्ण वाड.मय का जो भी साहित्यिक या कलात्‍मक आकर्षण है उसके सबसे बड़े निर्माता तो आर. के. नारायण ही हैं।
हिन्‍दी में मनोहर श्‍याम जोशी ने मालगुडी डेज की पटकथाएं लिखीं। उन्‍होंने धारावाहिक के संवाद भी रचे। हिन्‍दी के अनेक जाने-माने कलाकारों, निर्देशकों और साहित्‍य-सेवकों ने भी मालगुडी डेज नामक अंग्रेजी साहित्‍य-श्रृंखला को हिन्‍दी में अनूदित और चलचित्रित कर बहुत बड़ा काम किया है। मालगुडी डेज के हिन्‍दी संस्‍करण से ही हिन्‍दीभाषी आर. के. नारायण की सत्‍साहित्यिक उत्‍कृष्‍टता को जान पाए। कला और साहित्‍य प्रेमियों का उनके प्रति जो भी समादर है, उसके आधारभूत तत्‍वों में खुद आर. के. नारायण तो हैं ही साथ ही मालगुडी डेज को हिन्‍दी में प्रस्‍तुत करनेवाला कलाकार-दल भी इसके लिए बधाई व आदर का पात्र है।  
आर. के. नारायण साहब की साहित्यिक स्‍मृतियां इसलिए भी उज्‍ज्‍वल बनी हुई हैं क्‍योंकि दक्षिण भारत की राजनीति-शासन ने साहित्‍य को सम्‍मान देने का अपना अध्‍यवसाय कभी रुकने नहीं दिया। वहां के प्रशासनिक तन्‍त्र ने साहित्‍य के लिए अलग से विशेष योजनाएं चलाईं, जो आज तक यथावत हैं। इस साहित्‍यकार ने मद्रास के उपनगरीय क्षेत्र मालगुडी, कुम्‍भम को भी अपने साहित्‍य के द्वारा विश्‍व-पटल तक पहुंचाया। विश्‍व को इन क्षेत्रों की सांस्‍कृतिक, सामाजिक, आर्थिक पहचान से अवगत कराया। उनके इस योगदान को मालगुडी और कुम्‍भम का संवेदनशील व्‍यक्ति कभी नहीं भुला सकता।
यही कार्य साहित्‍य को देखते हुए पूरे देश में होने चाहिए ताकि आर. के. नारायण जैसे लेखकों की रचनाओं से जनमानस जीवन-प्रसाद ग्रहण करता रहे।
                                              --विकेश कुमार बडोला

Wednesday, September 17, 2014

एक अकेला जीवन

प्रत्‍येक व्‍यक्ति अपने सामान्‍य जीवन के अलावा भी एक दैनिक परिकल्पित जीवन से जुड़ा रहता है। ऐसा जीवन अकेला होता है। एक प्रकार से यह व्‍यक्तिगत व्‍यथाओं का संसार है। व्‍यक्ति के मन में उमड़ती-घुमड़ती ये व्‍यथाएं दैनिक जीवन की उन समस्‍याओं की भावनात्‍मक टूटन हैं, जिनसे मुक्ति के लिए न व्‍यक्ति-प्रयास सफल होता है और ना ही उसे इसमें किसी की सहायता मिलती है। घनिष्‍ट मित्र अगर ऐसी समस्‍याओं से परिचित रहते भी हैं, पर उनका भी अपना व्‍यक्तिगत पक्ष सुखद नहीं होता। उनके सामने भी अपनी व मित्रों की समस्‍याओं में से सबसे बड़ी समस्‍या चुनकर उसके लिए जीतोड़ शारीरिक-मानसिक-आर्थिक-सामाजिक संघर्ष करने की विवशता होती है। इस कारण व्‍यक्ति-व्‍यक्ति से मिलकर बने जनसमूह में परस्‍पर सहायता-सहभाव-सद्भाव-सम्‍भाव की भावना जम नहीं पाती। अपनी-अपनी मुसीबतों के भ्रमजाल में फंसकर सभी रोबोट बन हुए हैं। अपने अधिकारी के आदेश पर मशीन की तरह चलने के लिए विवश।
अकेला जीवन अनुभूतियों से भरा होता है। अनुभूतियां मानव से बहुत कुछ करवाती हैं। कविता, कहानी, उपन्‍यास, संस्‍मरण लिखवाती हैं। संगीत से जुड़ने और चित्रकला, पाककला, शिल्‍पकारी, समाज-सेवा के लिए उत्‍प्रेरित करती हैं। अकेले जीवन के अन्‍तर्मन से ''बारम्‍बार गूंजनेवाला'' एक संगीत गुंथा रहता है। संगीत की यह धुन अनचाहे ही अकेले जीवन में लहराने लगती है। अकेला जीवन किसी से इस धुन के बारे में वह सब कुछ परिभाषित नहीं कर सकता, जो अनुभव के स्‍तर पर वह प्राप्‍त करता है। कहीं कोई भी इच्छित संगीतमय आवाज गूंजती है, तो बहुत सुहाने तरीके से, अन्‍तर्मन से गुंथा हुआ संगीत ही याद आता है, उसका प्रसन्‍न आभास होता है। जीवन की यह घड़ी शान्तिदायक होती है।
व्‍यक्ति की एक नितान्‍त व्‍यक्तिगत रुचि होती है। वह आनेवाले कल को इसी रुचि के अनुरूप देखना चाहता है। व्‍यक्ति में एक व्‍यक्तिगत विश्‍वास होता है। इसमें पूरी दुनिया सिमटी रहती है। वह स्‍वयं और उसका परिवार, सम्‍बन्‍धी, मित्र सभी उसके लिए जीवन का बड़ा सहारा होते हैं। आधे से अधिक जीवन किसी की सहायता के बिना गुजार चुका व्‍यक्ति भी रिश्‍तों के सहारे की आस से हमेशा बंधा रहता है। अपने अकेले जीवन में उसकी यह आकांक्षा सदैव बनी रहती है। गुजरते जीवन में अधिकांश लोगों को धूर्त बता चुकी अकेले जीवन की नजरें फिर भी हमेशा आशावान रहती हैं कि उसे कोई तो समदृष्‍ट मिलेगा कभी न कभी।
व्‍यक्ति दिखने में तो धरती-आकाश के नजरिए से बहुत छोटा है, पर उसके मन की भावनाओं का विस्‍तार दुनिया के विस्‍तार से भी ज्‍यादा होता है। व्‍यक्ति यदि दूसरे व्‍यक्ति को साधारण दृष्टि से देखता है तो दूसरे व्‍यक्ति का व्‍यक्तित्‍व नगण्‍य हो जाता है, लेकिन दृष्टिकोण में सकारात्‍मक बदलाव आते ही दूसरा व्‍यक्ति विशिष्‍ट बन जाता है। दूसरे के जीवन को उसी नजरिए से देखने की अन्‍तर्दृष्टि मिल जाती है, जैसे दूसरा व्‍यक्ति खुद अपने जीवन को देखता है। यह दृष्टिकोण मानवीय समाज में तेजी से बढ़ना चाहिए। इसी से मानव आपस में चमत्‍कार की हद तक प्‍यार करने लगेंगे।
अपनी नजर में एक परिपक्‍व आदमी बहुत मूल्‍यवान होता है। यही नजर अगर उसे देखनेवाले अन्‍य व्‍यक्तियों में भी आ जाए तो मानवीय जीवन आनन्‍द से भर जाए। व्‍यक्ति शारीरिक रूप से सीमित है, पर भाविक स्‍तर पर वह बहुत बड़ा है।
एक दिन एक आदमी दुनिया में नहीं रहता। यह बात सामान्‍यत: बहुत छोटी है, पर आदमी के नहीं रहने पर बहुत कुछ ढह जाता है। उसकी कल्‍पनाएं, इच्‍छाएं, आकांक्षाएं सब मर जाती हैं। संसार को देखने की उसकी सौन्‍दर्यपरक दृष्टि का दुखान्‍त हो जाता है। अपनी नजर में संसार को गले लगाकर जीनेवाला व्‍यक्ति जब अचानक मृत्‍यु में स्थिर होता है तो उसके बाद का जीवित मानवीय जीवन-समूह उसे भूलकर अपने काम-धन्‍धों में लग जाता है। जीवन में मौजूद लोगों को मरे हुए की जीवन-स्‍मृतियों में विचरण का मौका भी बड़े स्‍मृतिश्रम से मिल पाता है।
और शेष बचे हुए मानवीय जीवन की व्‍यस्‍तता की प्रस्थिति ऐसी है कि उसके एक परिवार का पिता अपने बच्‍चे को प्राइवेट स्‍कूल के गेट तक छोड़ने जाता है। स्‍कूल की विसंगतियों, नासमझी के डर से पिता अपने बच्‍चे की सुरक्षा, अधिकार की वेदना से अन्‍दर तक हिल जाता है। बच्‍चे के मासूमियत भरे चेहरे को देखकर उसका मन भारी हो जाता है। वह बड़ी इच्‍छा से सोचता है, काश मैं अपने बच्‍चे को अपनी शारीरिक सक्षमता रहने तक केवल अपनी छाती से ही चिपकाए रहता!”
पिता बच्‍चे को विद्यालय छोड़कर वापस घर आता है। घर पहुंचते ही अन्‍य समस्‍याओं की मानसिक उलझन उसे अपने बच्‍चे के साथ भावनात्‍मक रूप से निरन्‍तर नहीं जोड़े रखती। वह अन्‍य समस्‍याओं में फंसते-फंसते अपने बच्‍चे के लिए मोहित अपने मन को अलविदा कहता है। इस तरह से पुन: एक अकेला जीवन अकेलेपन की कैद में चला जाता है।
                                             विकेश कुमार बडोला