Thursday, December 19, 2013

पूष का धुन्‍धलका

मार्गशीर्ष के उतरते-उतरते और पौष के झरते ही मौसम ठण्‍ड, धुन्‍ध में लिपट गया है। रविवार पन्‍द्रह दिसम्‍बर तक तो नोएडा और इसके आसपास का क्षेत्र सुबह से ही चटक धूप के आगोश में था, लेकिन सोमवार सोलह दिसम्‍बर की सुबह तो जैसे कोहरे, धुन्‍ध में से ही पैदा हुई थी। प्राय: ऐसा मौसम मुझे अवसादग्रस्‍त किए रहता था, पर लगता है अब इस अनाकर्षित मौसम के प्रति मेरी दृष्टि में सकारात्‍मक बदलाव आ गया है।
श्‍वेत सुन्‍दर चन्‍द्रमा
सोमवार को सुबह सात बजे बस अड्डे के लिए चला। वहां तक ऑटोवाला मुझे मेरे जोखिम पर ही ले गया। वह चलने को तैयार नहीं था। मैंने किराया बढ़ाया तो वह धुन्‍ध में अन्‍धेरी सड़क पर डरते-डरते चलने को राजी हुआ। रेंगते हुए जब बस अड्डा पहुंचा तो ओंस और कोहरे की नमी से जैकेट भीग गई थी। बस से चिपक कर मालूम हुआ कि ये कोटद्वार की बस है। धुन्‍ध ऐसी कि हाथ को हाथ नजर नहीं आ रहा था। कोटद्वार जाते हुए राजमार्ग के दोनों ओर क्‍या-क्‍या है और क्‍या-क्‍या हो रहा है, पता ही नहीं चला। सरसों के पीले फूल सफेद धुन्‍ध में बिलकुल बेजान दिखे। ज्‍यादातर खेतों में पका हुआ गन्‍ना पसरा था। वो भी जब आंखें फाड़कर नजर दौड़ाई तो ही यह नजारा दिख सका। इसके अलावा मैं राजमार्ग के दोनों ओर छह घण्‍टे तक कुछ भी नहीं देख पाया।
मुझे ठण्‍ड लग गई। अचानक बढ़ी ठण्‍ड से कै आने को हुई। सुबह उठने से लेकर और कोटद्वार पहुंचने तक किसी से एक शब्‍द भी न बोल सका। भावनाएं तो जैसे धुन्‍धीले मौसम से सन कर पग-पग पर तैयार मनुष्‍यगत अव्‍यवस्‍थाओं के कारण मर गईं थीं। विवेक बेहोश हो गया। पूरी यात्रा के दौरान सोता-जागता और ऊंगता-खिझाता रहा। कहीं कै न आ जाए, इस अहसास से घबराया हुआ मैं कोटद्वार पहुंचा तो देखा कि पर्वतों की घाटी पर बसा यह गढ़वाली शहर उस धुंए और धुन्‍ध को तो जैसे पहचानता ही नहीं था, जिससे मैं कई तरह से पिछले छह घण्‍टे से पीड़ित था।
कोटद्वार में सूर्य किरणें धरती को फाड़ कर उसके अन्‍दर तक पहुंची हुईं थीं। नंगे पैर भी अगर वहां की मिट्टी पर चलता तो भी ठण्‍ड नहीं लगती। सूर्य ताप इतना तीक्ष्‍ण कि दो पल भी सूर्यप्रकाश ले लेने पर ठण्‍ड के रोगी उठ खड़े हों। यात्रा के लिए बांधा हुआ खाना कोटद्वार में खाया। पर्वत घाटी के आंचल में बसा यह शहर प्राकृतिक रूप से अच्‍छा है, लेकिन आधुनिकता की निरुद्देश्‍य दौड़ यहां भी बड़े शहरों की तरह ही एक रीति बन गई है। जिन बातों, विचारों, व्‍यवहार, प्रयोग, कुसंस्‍कृति से बड़े शहर जकड़े हुए हैं वे यहां भी पैर जमा चुके हैं।    
आप्टिकल फाइबर केबल बिछाने के लिए सड़क के दोनों किनारे दूर-दूर तक चार फीट गहराई तक खुदे हुए थे। खोद कर निकाली गई मिट्टी वहीं सड़कों के किनारे फैली हुई थी। विद्यालय से लौटते छोटे और मासूम बच्‍चे उसी गीली, सूखी मिट्टी के छोटे-मोटे टीलों और गड्डों से होते हुए घर जा रहे थे। पैदल मार्ग की ऐसी अव्‍यवस्‍था से कोई बच्‍चा खड्डे में गिर जाए या पूरी तरह से अनियन्त्रित हो चल रहे वाहनों में से कोई वाहन उसे टक्‍कर मार दे तो! अपने आसपास और दूर-दूर, जहां तक भी नजर घुमाई किसी को उन बच्‍चों की उपस्थिति का ही भान नहीं था। सरकारी, सामाजिक अव्‍यवस्‍था उनके लिए दुर्घटना का कारण बन सकती है, ये सोच तो जैसे उस वातावरण और उसमें मौजूद वयस्‍कों में थी ही नहीं। यह सोच कर और भी आश्‍चर्य हुआ कि जान जोखिम में डाल घर की ओर जा रहे बच्‍चे अकेले ही थे। पता नहीं उनके अभिभावकों का हृदय इतना पत्‍थर क्‍यों है! 
ऐसे में संसार का भावी समय बड़ा ही बेचारा प्रतीत होता है। उस समय के मासूम बच्‍चों की चिंता होने लगती है। मेरे इस मनोभाव पर यदि कोई कहे कि ऐसा सोचना बेकार है, और होगा वही जो सांसारिक नियति में लिखा है तो मैं कहूंगा कि ऐसा सोचनेवाला भावी दुनिया के बच्‍चों की चिंता तो दूर है, अभी के बच्‍चों की फिक्र भी नहीं करता होगा।
काम निपटा कर मैं और पिताजी पैदल ही सम्‍बन्‍धी के घर की तरफ आ रहे थे। रात को चांद कोटद्वार शहर पर चांदनी का छिड़काव किए हुए था। पर्वत घाटियों में दिन में जितना प्रखर सूर्यप्रकाश होता है रात को उतनी ही ज्‍यादा ठण्‍ड भी होती है।
अगले दिन दोपहर दो बजे कोटद्वार से वापस नोएडा की ओर चला। पर्वतों, घाटियों के प्रभाव से निकलते ही दिल्‍ली की ओर दौड़ती बस के अन्‍दर बैठा मैं फिर धुन्‍ध में प्रवेश कर चुका था। लेकिन ये सांझ की धुन्‍ध थी, जो सुबह की अपेक्षा अच्‍छी लगी। आंखों के लिए जो दृश्‍य दूरस्‍थ थे वे शाम और रात के बीच की धुन्‍ध में बदले हुए थे। लगभग ओझल, बुझे-बुझे सूरज की अन्तिम किरणें इन दृश्‍यों पर से फिसल कर अदृश्‍य हो चुकी थीं। धुन्‍धपूर्ण और अन्‍धेरे का आकर्षण मेरे मन में प्रकृति के प्रति दया का तार गुंजा रहा था। मैं उस दूर दिखते कोहरे में डूबे आकाश, धरती और घने वृक्षों के अन्‍दर की, उनके आगे की समय-स्थितियों में विचरण करने लगा। वहां के पता नहीं किन जीवों के जीवन की यादें आने लगीं।
कल कोटद्वार जाते समय जितना अवसादग्रस्‍त था, आज वहां से लौटते हुए उतना ही प्रफुल्लित हूँ। मन लगा कर बहुत दूर तक देखता रहा। गन्‍ना, सरसों के खेत, जुते हुए खेतों की मिट्टी, उनके मेड़ों पर खड़े पेड़ों और प्रकृति के प्रत्‍येक अंश को कोहरा अपने धुंए के आवरण में ले चुका था। चन्‍द्रप्रकाश उस कोहरे पर फैल चुका था। हलके चन्‍द्रप्रकाश में उभरती ठण्‍डे धुन्‍धलके की छवि हृदय में गहरा सूराख कर गई। उसांसें शुरु हो गईं। मासूम बच्‍चे, भोली प्रकृति और न जाने कौन-कौन विचित्र तरीके से याद आने लगा। विचलित करती स्‍मृतियों की अनुगून्‍ज सुनाई देने लगी।

Friday, December 13, 2013

समलैंगिक अल्‍पसंख्‍यक और वोटबैंक


किसी देश की परिभाषा क्‍या होती है? यह प्रश्‍न मेरे लिए बहुत जटिल बन गया है। शायद इस प्रश्‍न की जटिलताएं स्‍वतन्‍त्र भारत से पहले और बाद के समय में ही पनपने लगी थीं। परिस्थितियों, मतान्‍तरों और हास-विलास से दिग्‍भ्रमित शासकीय मस्तिष्‍कों ने राष्‍ट्रीय परिभाषा को और भी ज्‍यादा उलझा दिया है। अब तो लगता है कि अपने जैसों का एक समूह तैयार कर एक भूभाग पर एक नया देश बनाया जाए। यहां केवल उन्‍हीं को रहने का न्‍यौता दिया जाए, जो सुबह जागने से लेकर रात सोने तक अपने भाव-विचार में भारत में होने व रहने को एक दुखद भ्रम मानते हैं।
     हमेशा की तरह इस समय भी भारत में अनावश्‍यक बातों और घटनाओं का अंबार लगा हुआ है। एक अनावश्‍यक घटना घटी नहीं कि दूसरी घटने के लिए कतार में विचलित रहती है। घटनाएं क्‍या ये तो दुर्घटनाएं हैं। इनसे किसी का पेट नहीं भरता, किसी को घर नहीं मिलता, किसी को शिक्षा, कपड़े, दवाइयां, अन्‍य जरूरी सुविधाएं नहीं मिलतीं। ये बिना किसी बात के घटती हैं। इन घटनाओं का कोई आधार नहीं हैं। इनका कोई मूल, कोई मान्‍यता नहीं है। बस ये घटे रही हैं ताकि लोगों की स्‍मृति में देश के वास्‍तविक अपराधी और इनके अपराध स्‍थायी रूप से न बस जाएं। अपने साथ होनेवाले धोखों को आम आदमी जब तक बार-बार याद नहीं करेगा तब तक वो भ्रष्‍ट व्‍यवस्‍था के प्रति आक्रोशित नहीं हो सकता। बस यही मूलमन्‍त्र है जो अनावश्‍यक घटनाओं के घटने के केन्‍द्र में विराजमान है। 
     पांच राज्‍यों के विधानसभा चुनाव से पहले केन्‍द्र सरकार द्वारा दंगा विरोधी विधेयक (बिल) लाया गया, लेकिन चुनाव परिणामों ने बिल सम्‍बन्‍धी इस घटना के व्‍यापक प्रसार, विमर्श, वाद-विवाद पर एक तरह से विराम लगा दिया। अल्‍पसंख्‍यक वोट हथियाने के बहाने केन्‍द्र सरकार ने चुनावों की बहती गंगा में अपने हाथ तो गीले कर दिए, पर अपने विरोध में पड़े जनमत देख कर उसने अच्‍छी तरह से धोए बिना ही अपने गीले हाथ झट पोंछ लिए। तथाकथित बिल में प्रावधान जोड़ा गया था कि देश में कहीं भी कोई दंगा होगा तो उसका दायित्‍व बहुसंख्‍यक पर होगा। कोई भी बहुसंख्‍यक अपने विरोध में पारित किए जाने हेतु प्रस्‍तावित ऐसे बिल से क्‍या महसूस करेगा, उसके दिल पर क्‍या बीती होगी इसकी चिंता भला केन्‍द्र को क्‍यों हो, क्‍योंकि उसे पता है कि नाममात्र के लिए अल्‍पसंख्‍यक घोषित समुदाय की जनसंख्‍या कुछ ही वर्षों में बहुसंख्‍यक जनसंख्‍या से ज्‍यादा होगी। ऐसा होगा तो उसके शासन में बने रहने की संभावनाएं हमेशा रहेंगी।
     यदि देश में आतंकी विचारधारा पनपी है तो यह सुगमता से नहीं हुआ। इसके पनपने के कारणों का समर्थन किया गया। आतंकवाद का विस्‍तार हुआ तो आतंकवादियों को आतंक छोड़ कर समाज की मुख्‍यधारा में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया। आंतक फैलानेवालों को दण्‍ड देने के बजाय उन्‍हें शासकीय मदद से बसाने की योजनाएं बनने लगीं। परिणामस्‍वरूप अल्‍पसंख्‍यक अनपढ़, बेरोजगार ये सोच कर आतंकी संगठनों में शामिल होने लगे कि सरकार सामान्‍य जीवन में लौटने के लिए उन्‍हें अपने खर्चे पर बसाएगी, लेकिन ऐसी योजना की कोई समय-सीमा भी तो तय होनी चाहिए। देश पहले आतंकियों का आतंक और फिर उनके पुनर्वास का खर्चा झेले, ऐसी राजनीति के पीछे केवल अल्‍पसंख्‍यक वोट का लालच ही हो सकता था। दुर्भाग्‍य से ऐसी राजनीति के अनेक प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष दुष्‍परिणाम बहुसंख्‍यकों के रूप में देश ने झेले हैं और झेल रहा है।
     आजकल समलैंगिकों के रूप में एक नया अल्‍पसंख्‍यक वर्ग तैयार हो रहा है। सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने समलैंगिकता को अवैध घोषित कर दिया है। मीडिया को इस खबर को न्‍यायालय के एक निर्णय की खबर के तौर पर छापना चाहिए था, इसका प्रसारण करना चाहिए था लेकिन यहां तो समलैंगिकता के पक्ष-विपक्ष में राजनीति, समाज, धर्म के विशेषज्ञों की तू-तू मैं-मैं के विशेष परिशिष्‍ट निकाले जा रहे हैं। इस विषय पर केन्‍द्र सरकार के राजनीतिज्ञों के वक्‍तव्‍य ऐसे टूटे हृदय और स्थिर दिमाग से आ रहे हैं जैसे कि ये आज आम लोगों की जिन्‍दगी से जुड़ा सबसे अहम विषय है। कहने का मतलब ये है कि अल्‍पसंख्‍यकों के दम पर राजनीति करने और मत हथियाने के क्रम में समलैंगिक के रूप में एक और अल्‍पसंख्‍यक वर्ग राजनीति की जमीन पर तैयार हो गया है। देश की वास्‍तविक समस्‍याओं को भूल कर अप्राकृतिक मैथुन को वैध ठहराने के लिए प्रदर्शन कर रहे लोगों की आवाज में अपनी आवाज शामिल करनेवालों की सद्बुदि्ध के लिए प्रार्थना करना जरूरी हो गया है।

Wednesday, December 11, 2013

सालों पुराना एक प्रेमगीत


चलती जाती जिन्‍दगी में तेरा याद आना
हाय जान जाती है
तू क्‍यों मुझे दिल से
नहीं बुलाती है
कहां छुपी है तेरी मुहब्‍बत
कहां मैं तेरे दिल को जान लूंगा
कब कैसे तेरी जिन्‍दगी को अपना मान लूंगा
कब तू सामने हो औ कब मैं तेरा नाम लूंगा
तेरे लिए होनेवाली बन्‍दगी में हाय खुदा का आ जाना
और आके दुआ देना कि तुम दोनों को मैं मिलाऊंगा
बेवफा की बेवफाई को मिटाकर प्‍यार करना सिखाऊंगा
कब ये दो प्राण आमने-सामने हों
और कब मैं फूल बरसाऊंगा

दिल के करीब आके
तुमने क्‍यों धोखा दिया
मंजिलें जो मुहब्‍बत की बनीं
उनको क्‍यों दरका दिया
क्‍या मेरे चेहरे ने तुम्‍हें प्‍यार करना न सिखाया
क्‍यों मेरी किसमत ने तुम्‍हें अपना न बनाया
मजबूर होके तुम्‍हें छोड़ना पड़ा है मुझको
मंजूर शायद है ये आसमां और धरती को
ये मेरे आंसू मेरे सच्‍चे प्‍यार का इजहार करते हैं
दुनिया में हम जैसे क्‍यों मिलके बिछड़ जाते हैं
कैसे मैं देखूं तुमको कैसे महसूस कर लूं
बुरी जो तेरी सच्‍चाई उससे कैसे किनारा कर लूं
यादों के अम्‍बार लगा के उनको क्‍यों बिखरा दिया
मैं तो धोखेबाज न था मुझको क्‍यों धोखा दिया
हरेक सांस जो तेरे साथ रहकर चली
कसम से उसमें एक अपनापन था
बुरे दौर में आदमी लाख बुराइयां सोचता
पर मैं इन सबसे मीलों तक अनजान था
दिल के जर्रे में एक खयाल उठा कि हम एक सांस बन जाएं
क्‍यों न एक साथ एक पल के लिए जिएं फिर साथ मर जाएं
जालिम जमाना पग-पग पर सितम ढाएगा
हम एक कदम साथ आगे बढ़ाएंगे
तो उस पर अनगिन रोड़े अटकाएगा
काश तेरा वो चुप हो जाना
गुम होके किसी डर से सिमट जाना
मेरे चेहरे की भलाई से असर खाके हो
मैं क्‍या मेरा हर हाल इस दुनिया में
तेरे प्‍यार भरे अहसास से बल खाके हो
तू सोचना अपने को कयामत मेरी नजर के सहारे
मैं पागल, दीवाना और मस्‍ताना हुआ जाता हूं
जब तू जीभर जी ले दुनिया को
और हो तब कहीं चलने को तैयार
उस पल तक तेरा ही बस तेरा रहेगा इंतजार
तू बन सकती थी कोई मंजिल किसी के लिए
किसी भोलेपन के सहारे
डुबोने का काम हरेक ने किया तुझे
सपनों में ही भटकते रहे तेरे किनारे
तू उदाहरण हो सकती थी दुनिया के होने का
पर तू रुलाई गई सताई गई बुरी तरह
तेरे अन्‍दर के मन को चैन पाने का कोई विचार न हुआ
तूने फिर जैसे अच्‍छाई और सच्‍चाई से कर लिया विरह
पर मैं तेरे मुखड़े को देखके कोई जीवन सा पा गया
तुझे राह में लाने के लिए मैं प्रार्थनाओं में समा गया
मेरी अच्‍छाइयों के सहारे मेरी जितनी भी प्रार्थना सफल हो
वो आपके जीवन का हंसता-मुस्‍कुराता-चमचमाता कल हो

Friday, December 6, 2013

१६ दिसम्‍बर क्रान्ति


किसी भी व्‍यक्ति, प्रकृत दृश्‍य, घटना-दुर्घटना से हमारी प्रभावित होने की क्षमता का प्रश्‍न है। ये विचार इसलिए कौंधा क्‍योंकि अचानक जीवन का अर्थ मेरी दृष्टि में चारों ओर से सिमटकर एक सघन व्‍यर्थता में बदल गया है। जैसे-जैसे समय का विस्‍तार हो रहा है, मेरी वैचारिकता में खोखलाहट घर करती जा रही है। लगने लगा है कि मुझ सहित सम्‍पूर्ण मानु‍षिक परिवेश क्‍यों और किसलिए है?
जब हमें अपनी तुष्टि और स्‍वार्थी प्रवृत्ति के अतिरिक्‍त कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं होता तो मनुष्‍यरुपेण हमारी मान्‍यता किसलिए? इसका क्‍या औचित्‍य? ईश्‍वर, सन्‍त, महात्‍मा, महानुभवों, बुदि्धजीवियों से हम, आप, सब लोग मात्र अध्‍ययन शिक्षण के लिए प्रभावित होते हैं। उन जैसा बन जाने की संकल्‍पशक्ति हममें आ ही नहीं पाती।
प्राकृतिक व्‍यवस्‍था और प्रकृति हमारी कहानी, कविता, चित्रकारी, अनुसन्‍धान और वैज्ञानिक जिज्ञासाओं की तुष्टि हेतु उपस्थित हो पाती है। हम प्रकृति से प्रकृति जैसा बनने की प्रभाविता को जीवनपर्यन्‍त स्थिर नहीं रख पाते। बल्कि वास्‍तविक जीवन में हमने प्रकृति को नष्‍ट करने के अतिरिक्‍त कोई अन्‍य कार्य नहीं किया।
इसी प्रकार सामाजिक घटनाएं-दुर्घटनाएं तथा दैवीय और प्राकृतिक आपदाएं भी हमें तब तक ही संवेदना के केन्‍द्र में रख पाती हैं, जब तक इनका आत्‍मप्रभाव विद्यमान रहता है। आत्‍मप्रभाव हमारे जीवन का सुचारु विचार नहीं बन पाता। हमारी चेतना और इन्द्रियां अधिक समय तक सभ्‍यता, सादगी, सदाचार, सद्बुदि्ध, सद्भावना से रहने में बेचैनी महसूस करने लगती हैं। हमारा परोपकारी भाव और सदाशयता का विचार स्‍वयं के संकल्‍प से नहीं अपितु भीड़ के प्रवाह से उद्वेलित होता आया है। तभी तो किसी अच्‍छे-बुरे अनुभव और घटना से प्रभावित होने की हमारी क्षमता एक सार्थक सामाजिक लक्ष्‍य तक पहुंचे बिना ही मरणासन्‍न हो जाती है। अन्‍त में हम पुन: दैनंदिन की उलझनों में फंस जाते हैं।
पिछले साल सोलह दिसम्‍बर को हुई दुष्‍कर्म की घटना के सन्‍दर्भ में उपर्युक्‍त भाव जागृत हुआ है। सोलह दिसम्‍बर २०१३ को इस लोमहर्षक घटना को एक साल पूरा हो जाएगा। मौत के साथ एक साल गुजार चुकी पीड़िता को इस दिन श्रृद्धांजलि अर्पित होगी। दुष्‍कर्म के परिणामस्‍वरूप मौत की शिकार हुई लड़की के बहाने समाज में अपराधों के विरुद्ध संगठित आक्रोश जताने की जो प्रवृत्ति उजागर हुई है आज उसे स्‍थायित्‍व प्रदान करने की सख्‍त जरूरत है। अपराधों के प्रति युवाओं का गुस्‍सा मात्र फैशन या भेड़चाल के कारण न हो। गुस्‍सा जताने, संगठित होकर अपराधी को सजा दिलवाने के लिए वे स्‍वैच्छिक रूप से आगे आएं।
सोलह दिसम्‍बर २०१२ वाक्‍य के साथ अब क्रान्ति शब्‍द जुड़ गया है। कुछ दिन पहले कार्यालय आते समय सड़क किनारे खड़े एक लड़के ने मुझे एक पर्चा थमाया। इस पर १६ से २९ दिसम्‍बर २०१३ तक दामिनी के माध्‍यम से उस जैसे अत्‍याचार झेल रही दामिनियों के लिए एकजुट होने का अनुरोध किया गया है। पर्चे में युवा संगठन की ओर से बलात्‍कार, यौन-शोषण को रोकने के लिए नौ महत्‍वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं। इन्‍हीं के लिए आवाज बुलन्‍द करने के उद्देश्‍य से १६ दिसम्‍बर से बारह दिन का प्रदर्शन रखा गया है।
ये अच्‍छा है कि युवावर्ग सामाजिक भ्रष्‍टाचार, यौन-शोषण, महिला बलात्‍कार के विरुद्ध एकजुट होकर आवाज उठाने जैसी पहल कर रहे हैं, लेकिन उन्‍हें इन बुराइयों के आधारभूत कारणों की पड़ताल भी अवश्‍य करनी चाहिए, जिसमें पाश्‍चात्‍य जीवन-शैली के प्रति बढ़ते उनके रुझान और इनके ओछे प्रयोग भी सहायक हैं। आज युवाओं को अपने अन्‍दर भारतीयता की अन्‍तर्दृष्टि उत्‍पन्‍न करने की जरूरत है। कोई भी आन्‍दोलन, सामाजिक उद्देश्‍य इसके बिना संचालित नहीं हो सकता। हालांकि विदेश में बस चुके या विदेशी जीवन-शैली को अपने जीवन में रचा-बसा चुके लोग एक सीमा के बाद इस जीवन से बुरी तरह ऊब जाते हैं। उन्‍हें कहीं न कहीं ये बात सालती रहती है कि उनके जीवन की सार्थकता अंतत: अपनी ही संस्‍कृति के साथ चलकर है, लेकिन इस विचार-स्थिति तक आते-आते जीवन के महत्‍वपूर्ण युवा-वर्ष निकल चुके होते हैं। आज के युवाओं को इस बात को जल्‍दी ही ग्रहण करना होगा और सार्थक जीवन उद्देश्‍यों को युवा रहते-रहते ही प्राप्‍त करना होगा।

Sunday, December 1, 2013

समय की मृत्‍यु

भी-कभी जब आज का समय भयंकर रूप से डसता है और इसका दर्द गहरे उतरता है तो जीवन के गुजर चुके समय की यादें भावुक कर देती हैं। तुलनात्‍मक रूप से पहले का समय ज्‍यादा सुखद प्रतीत होने लगता। ये सोच कर और भी टीस होती कि मेरे जैसों के जन्‍म से भी पूर्व का मनुष्‍य जीवन-समय जीवन की मूलभूत आवश्‍यकताओं के स्‍तर पर तो अच्‍छा ही रहा होगा। जहां बैठ कर यह सब लिख रहा हूँ वही धरती बीस साल पहले कितनी सुहावनी थी। बच्‍चों से लेकर बुड्ढों का जीवन कितना सुखमय और स्‍वाभाविक था! खाने-पीने की वस्‍तुओं को लेकर आज की तरह की चिंताएं नहीं थीं। अब इतनी कल्‍पनाशक्ति भी नहीं बची, जिसके सहारे अपने जीवन के व्‍यतीत सुनहरे समय के साहित्य-संस्‍मरण की प्रभावी प्रस्‍तुति कर सकूं। इक्‍कीसवीं सदी का मानव-जीवन जैसे हवा पर सवार है। भागदौड़, अतिगतिमान होने के कारण मानव व्‍यवहार से जीवन की मूलगति गायब हो गई है। 
संतरी, पीले, भूरे, लाल रंग से 
सजा क्षितिज
  
आज दिनभर घर पर ही रहा। शाम को घर की छत पर टहलते हुए मार्गों, उपमार्गों पर दनदनाते हुए दौड़ते वाहनों का सामूहिक शोर सुनाई दे रहा है। तेजी से चलते भारी वाहनों की ध्‍वनि तो जैसे तूफान की आहट लगती। तेज बजते हॉर्न, दूर मसजिद के लाउडस्‍पीकर से आनेवाली लहराती आवाज और मनुष्‍यों के कोलाहल के प्रभाव में सुन्‍दर शाम से कुछ समय के लिए मोहभंग होता है। शान्ति शब्‍द जैसे शहर के शब्‍दकोश से समाप्‍त हो गया।
आज तीस तारीख। नवम्‍बर बीतने को है। गुलाबी ठंड पड़ रही है। सांझ ढलना देख रहा हूँ। धरती को स्‍पर्श करता आकाश का क्षितिज संतरी, पीले, भूरे, लाल रंग से सजा हुआ है। पक्षियों के झुण्ड पंखों को फड़फड़ाते हुए अपने गंतव्‍य की ओर बढ़ रहे हैं। धूल-धूसरित पेड़-पौधे बुझे सहमे जैसे वर्षा की बौझारों के इंतजार में खड़े हों। ऊपर दक्षिणी आसमान के कोने पर एकमात्र तारा चमक रहा है। मेरी भावनाएं मुझे प्रतिदिन चांद, तारे, सूरज, धूप, हरे-भरे पेड़ों, सुवासित-सुन्‍दर पौधों के लिए आकृष्‍ट करती रहती हैं। अगर ऐसा न हो तो मेरा जीवन अन्‍धकार की काल-कोठरी बन जाए। वैसे भी जहां मैं रहता हूँ वह देशस्‍थान कलिकाल के उत्‍तरकाण्‍ड में प्रवेश कर ही चुका है। सामाजिक रूप से जीवन परिस्थितियां हताशा और निराशा ही उत्‍पन्‍न कर रही हैं। ऐसे में प्रकृति के घटकों पर ध्‍यान न लगे तो समझ लेना चाहिए कि मनुष्‍य काठ का बन चुका है।
प्रकृति से संवाद करते हुए मालूम पड़ा कि वह बच्‍चों की खिलखिलाहट के लिए बेचैन है। उसे अपने कृत्रिम आंगन में बच्‍चों के खेलने-कूदने, दौड़ने-भागने, हंसने-रोने की गतिविधियां देखनी हैं, लेकिन फिर उदास होते हुए उसने खुद ही स्‍वीकार कर लिया कि इसमें बच्‍चों का क्‍या दोष। उन्‍हें जैसा वातावरण मिलेगा उनका बर्ताव वैसा ही होगा। उनके लिए मेरा असली रूप बचा ही नहीं तो वे बेचारे घर से बाहर आकर करेंगे भी क्‍या। कंक्रीट के जंगल में बन्‍द कर उन्‍हें दिए गए प्‍लास्टिक के खिलौने उनको संवेदन कैसे बना सकते हैं। प्रकृति की चिंता में शामिल मैंने इधर-उधर नजरें घुमाईं। वाकई बच्‍चे शाम के वक्‍त भी घर-आंगन, सड़क पार्क में मौजूद नहीं हैं।  
क्षितिज पर पसरे आकाश के कोनों ने रंग बदलना शुरु कर दिया है। अब वहां अकल्‍पनीय रंगों की रेखाएं, गुच्‍छे और छींटें फैल चुके हैं। नभ की दक्षिण दिशा में झिलमिलाता, झिलझिमाता सितारा अपनी विशेष चमक से बेचैन करता रहा। इस समय सच में ये लग रहा है कि मैंने अपनी जिन्‍दगी के खाते में कितनी खुशियां जमा कर दी हैं! धरती पर खड़े होकर आकाश को देखता मैं इन दोनों को सदैव के लिए अपने बांहपाश में बांध लेना चाहता हूँ। मैं समाज, देश के किसी नियम के प्रति इसके द्विअर्थी, निम्‍नअर्थी होने के कारण कभी ईमानदार नहीं रहा, लेकिन अभी बड़े जोर से ये अनुभव हो रहा है कि प्रकृति के नियमों के प्रति मैं भौतिक ही नहीं आत्मिक रूप से भी समर्पित हूँ।
मैं देखता हूँ हर नई सुबह में प्रकृति उदास है। भौतिकीय प्रयोगों ने उसे एक तरह से बर्बाद कर दिया। उसे अपना पुराना समय याद आता तो वो उसके प्रभाव में विलीन हो जाती और वर्तमान की अपनी हालत देख कर सिसकने लगती। मैं उसका मन मजबूत करूं तो कैसे क्‍योंकि प्रकृति प्रेम में जब तक प्रत्‍येक मनुष्‍य विचलित नहीं होगा तब तक इसका भला नहीं हो सकता। लगता है अब संसार-समय की आयु बीतने वाली है। समय का हृदय प्रकृति रुकती है, नष्‍ट होती है तो समय की मृत्‍यु निश्चित है। (30 नवम्‍बर 2013 की सांझ का अनुभव)