Wednesday, September 25, 2013

मनमोहनोवाच



राष्‍ट्रीय एकता परिषद की बैठक में एक बार फिर प्रधानमन्‍त्री ने यूपीए की अकर्मण्‍यता का ठीकरा पूरे देश पर फोड़ा। पता नहीं यह वार्षिक बैठक थी यह परिस्थितिजन्‍य। लेकिन जो भी है सार्वजनिक मंचों से प्रधानमन्‍त्री द्वारा जताई गईं देशव्‍यापी चिंताओं का उद्देश्‍य आखिर है क्‍या। वे चिंताओं, समस्‍याओं को ठीक करने के लिए आखिर किसका आहवान करते हैं। दंगें हों या महिलाओं की असुरक्षा का विषय इनका नियंत्रण आहवान करनेवालों को करना है या उन्‍हें जिनसे आहवान किया जा रहा है। समाज या सार्वजनिक रुप में ऐसा कोई संगठन नहीं है जिसके पास इन समस्‍याओं को रोकने और इनका निवारण करने के संसाधन हैं। एक नागरिक मतदाता के रुप में जिस नेतृत्‍व को लोकतन्‍त्र का संचालन सौंपता है, यह उसका कर्तव्‍य है कि वह देश को सही से चलाए। ना कि नेतृत्‍वकर्ता उलटा जनता से आहवान करे कि दंगों व महिला असुरक्षा पर हमें शर्म आनी चाहिए। जनता उलट आप से ही पूछती है कि आखिर आप क्‍या कर रहे हैं? आप सत्‍तासीन क्‍यों हैं? क्‍या पूंजी का ऐसा कुचक्र चलाने के लिए ही आप सत्‍ताधारक बने हुए हैं, जिससे सच्‍चे कृषकों और उद्यमियों का जीवन दिन-प्रतिदिन कठिन होता जाए? वास्‍तविक श्रमिकों, उद्यमियों के लोकतान्त्रिक, नागरिक और संवैधानिक हितों को खाद्य सुरक्षा इत्‍यादि जैसे भीखदान में बदलने से आप ने वास्‍तविक लोकतान्त्रिक मूल्‍यों की परिभाषा ही बदल कर रख दी है। एक तरह से सच्‍चे लोकतन्‍त्र के समानान्‍तर आपकी बेतुकी अर्थनीतियों से चलनेवाली अर्थव्‍यवस्‍था आज इस देश पर जबरदस्‍ती थोपी जा रही है। इसमें आपके गुरु अमेरिका जैसों का बड़ा हाथ है। राष्‍ट्रीय एकता परिषद की बैठक में आपने जिन मुद्दों पर अपनी चिंताएं जताईं एक प्रकार से उनका निर्माण इन्‍हीं नीतियों का परिणाम है।
     बात जब समाज और देश में सुख शान्ति की होती है तो इसके लिए जो सबसे जरुरी काम है उसकी अनदेखी कब तक होती रहेगी। और यह काम है जनसंख्‍या नियंत्रण की ठोस नीति बनाना। आज जनसंख्‍या नीति पर बोलने को सत्‍ताधारी बिलकुल तैयार नहीं हैं। ज्‍यादा जनसंख्‍या क्‍या कभी किसी देश या समाज का भला कर सकती है? तो फिर अपने प्रधानमन्‍त्री सार्वजनिक मंचों से इस समस्‍या पर बात क्‍यों नहीं करते हैं? राष्‍ट्रीय एकता परिषद में जिन चिंताओं के लिए प्रधानमन्‍त्री ने तीखे तेवर दिखाए हैं क्‍या उनका विवेक कभी चिंताओं के मूल में जाकर देखेगा कि इनका प्रमुख कारण अधिक जनसंख्‍या है। ऐसे जनसमूह हैं जो सीमांत राष्‍ट्रों से भारत में घुस आते हैं। यहीं रह-बस जाते हैं। अपने लिए नागरिक प्रमाणपत्र बनवा लेते हैं। क्‍या राष्‍ट्रीय एकता परिषद में सभी समस्‍याओं के इस प्रमुख कारण पर भी कभी कोई राष्‍ट्रीय आहवान होगा? या ऐसे लोगों को राष्‍ट्र पर, राष्‍ट्र के मूल नागरिकों पर केवल वोट बैंक के लिए बोझ बना कर लादा जाता रहेगा?


Saturday, September 21, 2013

मोदी विरोध व समर्थन


प्रधानमन्‍त्री पद के प्रत्‍याशी के रुप में नरेन्‍द्र मोदी के नाम की घोषणा से देश में एक साथ कई प्रतिक्रियाएं उभरने लगी हैं। शरद यादव भाजपा को कॉरपोरेट कल्‍चर यानि कि निगमित संस्‍कृति से चलनेवाली राजनीतिक पार्टी बताते हैं। उनके अनुसार कॉरपोरेट सेक्‍टर के दबाव में ही नरेन्‍द्र मोदी को प्रधानमन्‍त्री पद का प्रत्‍याशी घोषित किया गया। शरद जी जहां तक कॉरपोरेट संस्‍कृति की बात है इसके सबसे बड़े पक्षकार तो नेहरु थे। आज तक यह देश इसी संस्‍कृति के बूते बननेवाली नीतियों से ही तो चलता हुआ आ रहा है। ऐसी संस्‍कृति देश के जर्रे-जर्रे में घुस चुकी है। कांग्रेस ने इस काम में सबसे बड़ा योगदान किया। कांग्रेस को छोड़ किसी अन्‍य राजनीतिक दल से उम्‍मीद करना कि वह दशकों की कुसंस्‍कृति से चलायमान भारत को एकदम से वापस भारतीय संस्‍कृति से जोड़ दे तो यह उम्मीद ऐसे ही है जैसे भगवान को साक्षात सम्‍मुख देखना। फिर जनता दल यूनाइटेड तो राजग से अलग हो चुका है। एनडीए में क्‍या हो रहा है क्‍या नहीं इस पर ध्‍यान देने के बजाय जेडीयू के अध्‍यक्ष अपने कार्यों पर ध्‍यान देंगे तो देश को ज्‍यादा उत्‍पादक विकल्‍प प्राप्‍त हो सकेंगे।  
     ज्ञानपीठ से सम्‍मानित कन्‍नड़ लेखक डा. यू. आर. अनंतमूर्ति को तो जैसे आभास हो गया है कि मोदी ही प्रधानमन्‍त्री ही बनेंगे। क्‍योंकि उन्‍होंने घोषणा कर दी है कि यदि नरेन्‍द्र मोदी प्रधानमन्‍त्री बनते हैं तो वे देश छोड़ देंगे। उनकी एक और बात पर ध्‍यान दें जिसमें उन्‍होंने कहा कि मोदी के प्रधानमन्‍त्री बनने से लोगों में भय व्‍याप्‍त होगा। भय इस देश के नागरिकों के लिए नई बात नहीं है। अधिकांश लोग दशकों से भय में ही तो जीते आ रहे हैं। यह भय कभी सामाजिक मूल्‍यहीनता, कभी आतंक, कभी महंगाई तो कभी अर्थव्‍यवस्‍था के चौपट होने के रुप में  गहराता ही गया है। कांग्रेस राज में देश का नागरिक जितना भयाक्रांत होता हुआ आया है उससे ज्‍यादा भय की शायद अब गुंजाइश ही नहीं रही। तो अनंतमूर्ति साहब किस भय की बात कर रहे हैं। मोदी के प्रधानमन्‍त्री बनने से वे किन लोगों के भयग्रस्‍त होने की बात कर रहे हैं। कहीं वे मुसलमान आतंकवादियों की बात तो नहीं कर रहे। क्‍योंकि कांग्रेस राज में देशी-विदेशी आतंकवादियों को खूब प्रसिद्धी मिलती है। देश का महत्‍वपूर्ण समय इन पर बात करने, इन्‍हें पकड़ने, इन पर मुकदमा चलाने, इनके देश से प्रत्‍यर्पण सन्धियों पर चर्चा करने, इन पर खर्चा करने, इन्‍हें जनसंचार के केन्‍द्र में रखने जैसी अनेकों गतिविधियां पर व्‍यतीत होता है। कहीं वे इस बात से तो नहीं डरे हुए हैं कि मोदी राज में ऐसी अनुत्‍पादक गतिविधियां बन्‍द हो जाएंगी। आतंकियों को हीरो बनाए बिना ही उन्‍हें तुरन्‍त दण्‍ड मिलने लगेंगे। ऐसा होगा तो आतंकवाद ही समाप्‍त हो जाएगा। लोग आराम व चैन से रहेंगे तो उन्‍हें अपने नए उपन्‍यास के कथानक नहीं मिल पाएंगे। सब ओर शांति रहेगी तो लिखने को बाकी क्‍या रहेगा। कहीं उनके भय के केन्‍द्र में ये बातें तो नहीं हैं। अनंतमूर्ति जी आप कन्‍नड़ के प्रख्‍यात लेखक हो, ज्ञानपीठ पुरस्‍कारधारक हो लेकिन दुर्भाग्‍य से मुझ जैसे तो आपका नाम या तो ज्ञानपीठ पुरस्‍कार मिलने के दिन की खबर पढ़ कर ही जान पाए थे। या आज जब आप मोदी विरोधी वक्‍तव्‍य दे रहे हैं तब ही मुझे पता चला है कि आप जैसा कोई है, ज्ञानपीठधारक है और कुछ कह रहा है। मुझे आशा है कि आपको देश छोड़ना ही पड़ेगा। वैसे आपके देश छोड़ने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़नेवाला। देश-दुनिया जब मूल्‍यों के बिना चल रही हो तो आपका क्‍या मूल्‍य। आपके बिना भी यह देश चलता रहेगा। हां आपसे प्रार्थना है कि मूल्‍यों को प्रतिष्‍ठापित करने के प्रयत्‍न करनेवालों को आप हतोत्‍साहित कतई न करें।  
     मार्क्‍सवादी कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के सीताराम येचुरी। खुद तो ये सीता और राम की सन्‍तान हैं, जैसा कि इनके नाम से झलकता है। पर ये ठेठ कम्‍युनिस्‍ट हैं। ऐसे मार्क्‍सवादी हैं कि किसी बिगड़े हुए विद्यार्थी को ठीक करने के लिए यदि अध्‍यापक उसे थोड़ा सा शारीरिक दण्‍ड देते हैं तो ये विद्यार्थी के अधिकारों को लेकर खड़े हो जाते हैं। अध्‍यापक इन्‍हें आततायी, कट्टर नजर आने लगता है। बेशक ये विद्यार्थी के नकारात्‍मक अधिकारों के लिए लड़ें पर अपने को किसी महात्‍मा, सच्‍चे समाजसेवक से कम नहीं समझते। ऐसी पार्टी के येचुरी ने मोदी के प्रधानमन्‍त्री बनने या न बनने दोनों स्थितियों को ध्‍यान में रख कर अपनी सुविधानुसार टीका की है। नरेन्‍द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर इन्‍हें जनता का निर्णय स्‍वीकार्य होगा और यदि मोदी प्रधानमन्‍त्री नहीं बनते हैं तो इस प्रश्‍न का इनका उत्‍तर अगर-मगर पर टिका होगा। क्‍योंकि इन्‍हें ये भी तो देखना है कि अगर राजग को गठबन्‍धन में इनकी जरुरत पड़ेगी तो ये उससे जुड़ने को सहर्ष उपलब्ध रहेंगे और यदि कांग्रेस सत्‍ता में आती है तो उस स्थिति के अनुरुप भी तो इन्‍हें अपनी उपलब्‍धता बचा कर रखनी होगी। तब इनके मार्क्‍सवादी सिद्धांत एक कोने में धूल फांकेंगे।
     नरेन्‍द्र मोदी के प्रधानमन्‍त्री बनने पर उपरोक्‍त तीनों महाशयों की टिप्‍पणियां स्‍वार्थवश दी गई हैं और इनका कोई विशेष औचित्‍य नहीं है। लेकिन सर्वोच्‍च नयायालय के पूर्व न्‍यायाधीश वैद्य नाथपुरा रामकृष्‍ण अय्‍यर ने मोदी का समर्थन करके इस बहस को रोचक और महत्‍वपूर्ण बना दिया है। उनके अनुसार मोदी स्‍वराज के सिद्धांतों पर चलनेवाले व्‍यक्ति हैं। वे भारत से गरीबी दूर करने की योग्‍यता और नीतियां रखते हैं। स्‍वराज के माध्‍यम से वे भारत को एक नई दिशा देने में पूर्णत: सक्षम हैं। उनके अन्दर समाजवादी और गांधीवादी मूल्‍य समाहित हैं। धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदारों को शायद वैद्य जी का कथन बुरा लगे। क्‍योंकि हिन्‍दू राष्‍ट्र में यदि हिन्‍दू संस्‍कृति के सहारे राष्‍ट्र को चला कर न केवल हिन्‍दुओं बल्कि यहां रह रहे तमाम अन्‍य धर्मावलम्बियों के कल्‍याण की बातें हो रही हों और इनके लिए त्‍वरित नीतियां भी बन रही हों तो वोट बैंक में अपने चालू खाते के बन्‍द होने के डर से कुछ तथाकथित राजनीतिक दलों, इनके अनुयायियों और इनके पत्रकारों को कष्‍ट होना स्‍वाभाविक है। 

Wednesday, September 18, 2013

प्रकृति में दोपहर


श्विन मास की यह स्थिर सुन्‍दरता दृष्टि को भी स्थिर कर रही है। ग्रीष्‍म और शीत के प्रचण्‍ड प्रभाव से विरक्‍त यह प्रकृति सम-शीतोष्‍ण बनी हुई है। शहरों में यद्यपि गर्मी है परन्‍तु ग्राम्‍य परिवेश इस वातावरण में पूर्णत: सन्‍तुलित है। यानि कि वहां पर न गर्मी न ठण्‍ड। धीरे चलती हवा। दिन-रात, सूर्य-चन्‍द्रमा, हरिभूमि की प्रकीर्तिमा और इनके सान्निध्‍य में भाग्‍यशाली गांववासी।
नोएडा नगर के मेरे आवास-स्‍‍थल में सुबह-सवेरे ही घर में व्‍याप्‍त सूर्यप्रकाश। धूप का ऐसा निखार कि उसे देखने के लिए रुकना पड़ता। भाव-विचारों में डूब कर उसके लिए सुन्‍दर विशेषण ढूंढने में जुट जाता। हरियाली, हरे-भरे वृक्षों से गुंथी हुई धूप और इसकी पीताभा मेरे अनगिन द्वंद्वों पर आकर्षण का पानी फेर देती। शरीर को स्‍पर्श करते हुए बहती हवा जैसे स्‍वास्‍थ्‍य का वरदान दे रही है। जैसे रोगी काया पर साक्षात अमृत बरस रहा हो। सिर से लेकर पैरों के तलवों तक के सारे कष्‍ट क्षण में विलीन हो गए हों जैसे।
     बाहर विस्‍तृत असीम आकाश का निर्मल रुप, नीला सौन्‍दर्य भौतिकवाद के रोग से पीड़ित लोगों को स्‍पर्श करते ही स्‍वस्‍थ कर दे रहा है। आकाश से प्रस्‍फुटित, प्रसारित सूर्य और इसका प्रकाश मन की कालिमा को मिटा उसे उज्‍ज्‍वल कर रहा है। अन्‍ध दौड़, व्‍यस्‍त दुनिया से बच कर मैं इन अतिविशिष्‍ट प्राकृतिक उपक्रमों को देख पाने में सक्षम हूँ। ये स्थिति मेरे लिए किसी वरदान से कम नहीं। प्रकृति के लिए स्‍वयं की ऐसी उपलब्‍धता से लगता जैसे मैं सब ओर से सम्‍पन्‍न हूँ। जैसे मेरे लिए कोई कमी कहीं है ही नहीं।
     दिन का कौन सा समय सबसे अधिक आकर्षक होता है। इस प्रश्‍न के उत्‍तर में लोग स्‍वास्‍थ्‍य, खानपान, मनोरन्‍जन के उद्देश्‍य की पूर्ति के अनुसार सुबह या शाम को ही सबसे अच्‍छा बताएंगे। लेकिन मेरा मत है कि दिन के दोपहर-समय में मानवीय व्‍यक्तित्‍व, भावना और दर्शन सबसे अच्‍छी स्थिति में होते हैं। इस स्थिति से जो आकर्षण उत्‍पन्‍न होता है शायद उससे अधिक आकर्षण दिन के किसी और समय में नहीं होता। इस समयावधि के दौरान तेज भौतिक बहाव में बहते मानव-जीवन में जो संवेदनायी ठहरावस्थिरता साकार होती है, उसमें जीवन विशेषकर मानव जीवन सर्वोपयुक्‍त होता है। इस दौरान मानव निर्मित परस्‍पर गड्डमड्ड बुराइयां वाष्‍प बन उड़ जाती हैं। एक ऐसा भावनात्‍मक केन्‍द्र बिन्‍दु मनुष्‍य के विवेक में उभरता है, जो अपने चारों ओर परोपकारी भाव की तरंगें प्रसारित करता रहता है। ऐसे भाव आधुनिक समय को परिचालित करनेवाले समाज के प्रतिनिधियों को अवश्‍य ग्रहण करने चाहिए। यदि वे निरन्‍तर इन्‍हें आत्‍मसात करेंगे तो जीते जी व मौत के बाद के जिस स्‍वर्ग प्राप्ति की अभिलाषा अरबों लोगों ने सहेज रखी है, उसे व्‍यवहार बनने में समय नहीं लगेगा। मनुष्‍य उस स्‍वर्ग को जीते जी ही खुली आंखों से देख सकेगा।
     मैंने सितम्‍बर माह की इस दोपहर से प्रभावित हो जो कल्‍पना लोक बनाया और कल्‍पना लोक को व्‍यावहारिक बनाने का जो मार्ग सुझाया क्‍या उसका निर्माण इतना सुगम है? क्‍या मुझ जैसों के जीवित रहते-रहते लोगों को नकारात्‍मक भौतिकी की लम्‍बी गहरी खाई से निकलने का कोई अवसर प्राप्‍त हो सकेगा? दिन-दोपहर के जो अनुभव मैंने बांटे वे शायद मेरे जैसे बहुत कम लोगों को ही अच्‍छे लगते हैं। अधिकांश मनुष्‍यों का इस दिशा में सोचने का मार्ग ही बहुत पहले अवरुद्ध हो चुका है। तब कैसे प्रकृति और मानव के मध्‍य स्‍वाभाविक प्रेम सम्‍बन्‍ध बना रह सकेगा? जब भौतिकवाद की आन्‍धी दिन दुगुनी रात चौगनी गति से संसार में बह रही हो तो दोपहर जैसे प्रकृति के अनुभवों को मानव कैसे अपने अंत:स्‍थल में बसा सकेगा? यह विचार मुझे संसार के सभी प्राणियों की ओर से डराता है, भयाक्रान्‍त करता है।  






Saturday, September 14, 2013

धूम्रपान निषेध


दादीजी की तेरहवीं करके 25 जुलाई को पैतृक घर से कोटद्वार आ रहा था। सतपुली, पौड़ी गढ़वाल, उत्‍तराखण्‍ड से जीएमओयूलि की बस में सवार हुआ। पत्‍नी, साढ़े चार वर्षीय बालिका, सासू जी भी साथ ही थीं। बस में चढ़ कर देखा कि सीट उपलब्‍ध है या नहीं। खिड़कियोंवाली सभी सीटों पर लोग बैठे हुए थे। ये सोच कर की पत्‍नी, बालिका और सासू जी सभी उल्टियां करते हैं और इन्‍हें खिड़कीवाली सीटें चाहिए मैं बस से नीचे उतर आया। इतने में परिचालक आया। असभ्‍यता और अधिकार के साथ कहने लगा, चढ़ो बस में मैं सीट दिलाता हूँ। हर किसी को खिड़की चाहिए। सभी नेता बने हुए हैं। एक बार तो मन हुआ कि इसे जोर का चांटा मारूं। पर बस तक छोड़ने आए सम्‍बन्‍धी, पत्‍नी और सासू जी के रहते चुप ही रहा और बस में बैठ गए। बारिश हो रही थी। पत्‍नी, सासू जी और बालिका परिचालक की सीट पर बैठ गए। इसलिए उन्‍हें तो बाहर की ताजी हवा मिलती रही। पर मैं पीछे बैठा हुआ था। बारिश की बौछारें अन्‍दर न आ पाएं इसलिए अधिकांश यात्रियों ने खिड़कियां बन्‍द की हुईं थीं। मुझे बाहर की स्‍वच्‍छ हवा नहीं मिल पा रही थी। घुटन महसूस होने लगी। यहां तक तो ठीक था क्‍योंकि मैं ध्‍यान, संकेन्‍द्रण के द्वारा घुटन, सांस लेने में हो रही कठिनाई को दूर करता रहा। लेकिन अचानक बीड़ी की दुर्गन्‍ध आने लगी। सोचा नाक बन्‍द कर इससे छुटकारा पा लूं। पर यह कोई अचानक आया हवा का झोंका नहीं था जो क्षण में आया और गया और अपनी गंध भी अपने साथ ले गया। नाक से रुमाल हटाया तो बीड़ी की दुर्गन्‍ध पहले से अधिक मात्रा में फैल चुकी थी। बाहर बारिश, खिड़कियां बन्‍द और बस के अन्‍दर बीड़ी की दुर्गन्‍ध का गुबार। बढ़िया तरीके से बने, चौड़े राष्‍ट्रीय राजमार्ग 119 पर गाड़ी की गति भी बहुत तेज थी।  यह सब अनुभव करके मेरा सिर दर्द शुरु हो गया। उल्टियां होने का अहसास होने लगा। जब सहनशक्ति कम होने लगी तो परिचालक से बोला, कोई बस में बीड़ी पी रहा है, उसे मना कर दीजिए वह बीड़ी न पिए। बहुत समस्‍या हो रही है। खुद मना कर लो। मैं क्‍यूं मना करुं। मुझे क्‍या पता कौन पी रहा है। पी रहा है तो पीने दो उसे। मैं क्‍या करुं। परिचालक ने अकड़ और ऐंठ से जवाब दिया। मैंने उसे कहा, आप इस बस के परिचालक हैं और बस में घटनेवाली अवैध गतिविधियों को रोकने का सम्‍पूर्ण दायित्‍व आपका है। अपना दायित्‍व ठीक से निर्वाह करने के बजाय आप मुझसे ही बदतमीजी कर रहे हैं। जब मैंने उससे उसका नाम पूछा तो नाम बता कर और मुंह के अन्‍दर पता नहीं क्‍या-क्‍या बड़बड़ाते हुए चालक के पास चला गया और मेरी ओर इशारा करते हुए बात करने लगा। मुझे अचम्भा इस बात पर हुआ कि कोई भी सहयात्री मेरे सहयोग में कुछ नहीं बोला। पूरी बस में मेरी, मेरी पत्‍नी और परिचालक की आवाज के अतिरिक्‍त और कोई आवाज नहीं हुई। हां बीड़ी की दुर्गन्‍ध अब पहले से ज्‍यादा हो गई थी। एक शब्‍द भी और बोलता तो शायद उल्टियां करने लगता। इसलिए चुप लगा गया और नाक को रुमाल से कसकर बान्‍ध दिया। यह सोचकर आगे-पीछे नजर घुमाई कि शायद बीड़ी पीनेवाला दिख जाए। पर वह तो पता नहीं कौन सी आड़ ले कर धूम्रपान कर रहा था कि दिखाई ही नहीं दिया। जो भी हो पर वह अपने दुस्‍साहस में पूरी तरह से कामयाब था। परिचालक ने शायद उसे देखा। पर उससे कुछ न बोला।
      कोटद्वार पहुंच कर पत्‍नी, सासू जी और बिटिया को ये कह कर घर भेज दिया कि तुम चलो मैं एक काम निपटा कर आता हूँ। बस का नम्‍बर नोट किया और आरटीओ कार्यालय की ओर चल पड़ा। रास्‍ते में सहायक सम्‍भागीय परिवहन अधिकारी (एआरटीओ) की गाड़ी आती हुई दिखी। भागते हुए गाड़ी को रुकवाया। महिला परिवहन अधिकारी ने मेरी शिकायत पूरी मनोयोग से सुनी और दोषी परिचालक के विरुद्ध उचित कार्रवाई करने का आश्‍वासन दिया। दोषी परिचालक से सम्‍बन्धित आवश्‍यक जानकारी मुझसे प्राप्‍त कर परिवहन अधिकारी ने अपना पता और दूरभाष संख्‍या मुझे भी उपलब्‍ध कराई।
इस घटना के दस-पन्‍द्रह दिन के बाद ही कार्यालय सहायक सम्‍भागीय परिवहन अधिकारी, कोटद्वार गढ़वाल ने प्रधान प्रबन्‍धक, जीएमओयू लिमिटेड कोटद्वार और अध्‍यक्ष, जीप टैक्‍सी/मैक्‍सी यूनियन कोटद्वार को अपनी व्‍यवस्‍थान्‍तर्गत संचालित वाहनों पर धूम्रपान ना करने एवं जहरखुरानी गिरोह से सावधान जैसी सूचना चस्‍पां किए जाने हेतु निर्देशित किया। मुझे यह जानकार प्रसन्‍नता हुई कि इस सार्वजनिक कल्‍याण कार्य के लिए उपरोक्‍त बस एवं टैक्‍सी यूनियन अध्‍यक्षों को प्रेषित पत्र की प्रतिलिपियां जिलाधिकारी पौड़ी गढ़वाल, सम्‍भागीय परिवहन अधिकारी गढ़वाल और मुझे भी भेजी गईं।
      यदि सहायक सम्‍भागीय परिवहन अधिकारी के निर्देशानुसार चिन्हित कार्य की दिशा में जीएमओयू लिमिटेड कोटद्वार और जीप टैक्‍सी/मैक्‍सी यूनियन कोटद्वार द्वारा उचित र्कारवाई की जाती है तो गढ़वाल की परिवहन व्‍यवस्‍था हेतु यह एक सराहनीय कदम होगा। जिलाधिकारी और सम्‍भागीय परिवहन अधिकारी गढ़वाल से भी अपेक्षित है कि वे इस परिप्रेक्ष्‍य में अपने स्‍तर पर उपयोगी कदम उठाने का कष्‍ट करें। कल ही पौड़ी गढ़वाल की यात्रा कर लौटे पड़ोसियों से पता चला कि आजकल सभी जीएमओयूलि बसों के प्रवेश द्वार पर बड़े-बड़े अक्षरों में धूम्रपान निषेध लिखा हुआ है। यह सुनकर दिल को बड़ी शांति मिली।

Wednesday, September 11, 2013

किसका सहारा ले मानव-जीवन


पने दिल का हाल किसे बताऊं! मैं बहुत परेशान हूँ। रातों की नींद उजड़ गई। नींद से पहले जैसे रोज ही मौत से लड़ता हूँ। लगता रहता है कि अभी निष्‍प्राण हुआ कि तभी। पता नहीं कौन सी ललक होती है, जिसके सहारे नींद तक पहुंच कर मौत से संघर्ष रुक जाता है। सुबह की धूप में नई जिन्‍दगी फिर  से अच्‍छी लगने लगती है। मौनवश होकर प्रकृति को देखता हूँ। पेड़-पौधों, सूर्य किरणों, फूलों, नई सुबह के नए अनुभवों से पिछला सभी कुछ किसी गहरी परत के नीचे दब जाता है। रोजाना के कार्यों, संवादों को नवीनता प्रदान करने की कोशिश करता हूँ। हरेक जीवन गतिविधि के प्रति अपने पुराने विचारदर्शन को ये सोच कर नया करता हूँ कि आनेवाले गिरे हुए समय में खुद को गिरने से बचा सकूं। दिनभर की मेरी अच्‍छी जिन्‍दगी में जो बाहरी दुनिया की गन्‍दगी प्रवेश करती है उस से मजबूती से भिड़ने के लिए अपने अन्‍दर खाने को अपनी ही संवेदनाओं की खुराक देता हूँ। लेकिन दिन बीतने और रात के शिकंजे में खुद को एक बार फिर  से पड़ा देख मैं डर जाता हूँ और देर रात तक डर के वशीभूत हो कभी अपनी मौत तो कभी दुनियावी छिछलाहट के अनुभवों के संग युद्ध करते-करते आखिर में नींद में होता हूँ। नींद में भी सपनों की ऐसी श्रृंखला बनती है जो जीवन, मृत्‍यु और मृत्‍यु के बाद भी देखे जा सकनेवाले ऐसे दृश्‍यों को मानस-पटल पर अंकित कर देती, जिनसे सुबह उठने से लेकर कई दिनों तक छुटकारा नहीं मिलता। कभी अपने हाथ की लकीरों में अपना व्‍यक्तित्‍व पढ़ता हूँ तो कभी हाथों से किए जानेवाले श्रम के बलबूते अपने भाग्‍य को गढ़ने, सुधारने के प्रयत्‍न करता हूँ। कमबख्‍त नींद भी तो काम के वक्‍त पर आती है। सुबह नहाने के बाद सोने का मन होता है। लेकिन इस वक्‍त सो नहीं सकता। सुबह ने जागने का दायित्‍व जो सौंप रखा है। परिवार के साथ जो रह रहा हूँ। साधु-सन्‍त तो हूँ नहीं कि योग करते-करते ही नींद की झपकी ले ली या नींद खुलते ही योग-ध्‍यान में लीन हो जाऊं। पड़ोसी जब दुखों, समस्‍याओं से थोड़ा-बहुत उबर कर बहुत दिनों के बाद नजर आता है तो मुझे पता चलता है कि कुछ दिनों पूर्व से वो कितने कष्‍टों में है। खुद से घृणा होने लगती कि पड़ोसी की मुसीबत की कोई खबर ही नहीं तुझे। अपने लिए अपनी नजर की घृणा में तब कमी होती है जब पड़ोसी को कहते हुए सुनता हूँ कि भाई साहब आप खुद ही परेशान और दुखी हैं, ऐसे में आपको बताना, तंग करना ठीक नहीं समझा। अपनी हालत ये हो गई कि किसी की मदद करने की दिली इच्‍छा को भी दबा देना पड़ता है। भिखारी को भीख देने के लिए जेब में हाथ डालता हूँ तो मुंह से व्‍यवस्‍था और व्‍यवस्‍थापकों के लिए अपशब्‍द निकल पड़ते हैं। वो हाथ फैलाए बैठा रहता है और मैं विडंबना से ग्रसित होकर दूर निकल जाता हूँ। परिवार सहित आत्‍महत्‍या करनेवालों के प्रति प्रगाढ़ सहानुभू‍ति होती है। बिना किसी रोग, दुर्घटना के केवल समाज-सरकार की तीव्र उपेक्षा से एक परिवार इकाई जब मौत को गले लगा ले और शासनाधीश इस ओर निश्चिंत हों तब उसके लिए जीवित होना न होना एकसमान होता है। ऐसे में उनके लिए एकमात्र रास्‍ता आत्‍महत्‍या ही होता है। फिर  भी मौत की नींद में समाने के बाद भी जो सपने वे देखते हैं वहां भी पास-पड़ोसवाले, नाते-रिश्‍तेदार उन्‍हें कोसते हुए ही नजर आते हैं। लोगों की छीछालेदर वे मौत के बाद भी झेल रहे होते हैं। अकेले रह रहे बूढ़े दम्‍पत्तियों और लावारिश बच्‍चों को देख कर कैसे लग सकता है कि भारत निर्माण हो रहा है। सरकार भ्रूण हत्‍या खासकर कन्‍या भ्रूण हत्‍या को अपराध मानती है। भ्रूण की मौत पे शायद इतना दुख न हो जितना भ्रूण के पांच-छह फुट के मानव में बदलने के बाद जीते जी हो रही उसकी सामाजिक हत्‍या से होता है। समाज की देखरेख जब सरकार करती है तो समाज सुधार भी करे। भ्रूण के मानव के रुप में पलने-बढ़ने के लिए अनुकूल सामाजिक वातवारण भी तो निर्मित करे। जो आया ही नहीं उसकी चिन्‍ता काहे की। जो हैं चिन्‍ता के केन्‍द्र में वे होने चाहिए। स्‍वाभाविक, स्‍वच्‍छन्‍द जीवनयापन पर आधुनिकता की मोटी जंग जम गई है। एक-दूसरे को लाख दिलाशाएं देते हुए हम सब जीवन में आशावादी बने रहने की कितनी भी कोशिश क्‍यों न करें लेकिन सच ये है कि सभी आम लोग घोर निराशा में जी रहे हैं। लोग आस्‍था-अनास्‍था को लेकर झगड़ रहे हैं। कोई विज्ञान तो कोई धर्म-ईश्‍वर के पक्ष में खड़ा दीखता है। पर मनुष्‍य जीवन की क्षणभन्‍गुरता और क्षणभन्‍गुर जीवन की समस्‍याएं पूर्व युगों की तरह इस युग में भी जस की तस हैं। इन्‍हें न तो विज्ञान-वैज्ञानिक समाप्‍त कर पाए हैं और ना ही धार्मिक-ईश्‍वरीय शक्तियां खत्‍म कर पाईं हैं। तो फिर  कौन  है  जिसका सहारा लेकर मानव जीवन का आत्‍मविश्‍वास बढ़े। यदि मानव जीवन धर्म-प्रणालियों से परे केवल नवजात बच्‍चे जैसी भाव-विह्वलता लेकर गुजरे तो कितना अच्‍छा हो। इस दिशा में यदि सामाजिक प्रयास, प्रयोग होते हैं तो इसके लिए अनेक शुभकामनाएं हैं।

Thursday, September 5, 2013

कानून के विद्रूप


जिसके लिए देश-दुनिया पूरे दो महीने तक एक नई अवस्‍था में पहुंच गए थे। अनेक लोग अपना रोजगार, पढ़ाई, नागरिक सेवाएं छोड़ कर इसके समर्थन में कूद पड़े थे। प्रशासन और पुलिस की त्‍वरित सेवाएं ली गईं थीं। आवाज उठाने के लिए तैनात लोगों को रोकने के लिए पुलिस बल के अनेक कर्मियों की दिनचर्या अस्‍त-व्‍यस्‍त हो गई थी। एक पुलिसकर्मी को हृदयाघात लगा और उसकी मृत्‍यु हो गई। अनेक सरकारी, गैर-सरकारी संगठन जिस हेतु अपने-अपने स्‍तर की कसरत करते रहे। एक आम नागरिक से लेकर राष्‍ट्रपति और सबसे बढ़ कर लोकतन्‍त्र साठ दिनों की अवधि में जिसके लिए अपने तरह की अपूर्व संवेदनशीलता, आक्रामकता, परस्‍पर-ढांढस में उतरता चढ़ता रहा, उसे कार्यपालिका विधायिका न्‍यायपालिका से होते हुए किशोर न्‍याय बोर्ड के माध्‍यम से यूं ऐसे तिरोहित कर दिया गया। 
गहराई से यदि आकलन करेंगे तो पाएंगे कि सोलह दिसंबर 2012 केवल पीड़िता के पक्ष में उभरीं जनसंवेदनाओं और अपराधियों के विरुद्ध उठे जनाक्रोश के बूते केवल एकपक्षीय घटना नहीं थी। इस घृणित काण्‍ड ने पीड़ित लड़की, उसके परिवार, मित्रों, समाज, सरकार, देश-विदेश को केवल यह सोचने के लिए ही विवश नहीं किया कि समाज किस ओर जा रहा है और इसके रक्षक इस दिशा में क्‍या कर रहे हैं बल्कि इसने मनीषियों, विद्वानों, विचारकों द्वारा लोकतन्‍त्र के बाबत कहे गए उस तथ्‍य को भी अभिपुष्‍ट किया कि लोकतन्‍त्र वास्‍तव में कुछ नहीं है। लोकतान्त्रिक वास्‍तविकता बड़ी कड़वी है। इसकी कार्यप्रणालियों को संचालित करनेवाले सत्‍ता-प्रतिष्‍ठान यथा कार्यपालिका, विधायिका, न्‍यायपालिका और प्रेस ने देश की संवैधानिक व्‍यवस्‍था को जनता के हित में लचीला बनाने के लिए आज तक कितने काम किए हैं। सतसठ वर्ष पूर्व तैयार संविधान, कानून एक अलग परिस्थिति में बनाए गए थे। तब से लेकर आज तक वर्ष दर वर्ष देशकाल और इसका संचालन अलग-अलग परिस्थितियों में होता हुआ आ रहा है। तो क्‍या संविधान, कानून का ढांचा भी वर्ष दर वर्ष उत्‍पन्‍न होनेवाली सर्वथा भिन्‍न परिस्थितियों के अनुसार बदला नहीं जाना चाहिए। तब का कानून यदि वयस्‍कता के लिए किसी व्‍यक्ति की आयु अट्ठारह वर्ष निर्धारित करता है तो इसका आधार उस समय-विशेष की परिस्थितियां थीं। कृषि बहुलता के कारण देश की अधिकांश जनसंख्‍या ग्रामों में रहती थी। प्रत्‍येक व्‍यक्ति संयुक्‍त परिवार से जुड़ा हुआ था। संयुक्‍त परिवार के संस्‍कार व्‍यक्ति को मर्यादा सिखाते थे। शील-संकोच की अधिकता थी। अमर्यादित व्‍यवहार यदि होता भी था तो उसका स्‍तर इतना घिनौना नहीं था कि सारे देश का एक निर्धारित समय उस पर थू-थू करने या उसके विरुद्ध खड़े होने में व्‍यतीत हो जाए। 
आज जब देश में भ्रष्‍टाचार जीवन और व्‍यक्तित्‍व का एक अहम अंग बन चुका है और प्रत्‍येक कार्य इसका प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष प्रमाणपत्र दिखाने पर पूरा होता हो तो यह कैसे सम्‍भव नहीं हो सकता कि चेहरे-मोहरे से तीस से ऊपर दिखनेवाला व्‍यक्ति विद्यालयी प्रमाणपत्र में स्‍वयं को अट्ठारह से कम सिद्ध कर ले। बलात्‍कार, चोरी, हत्‍या करे और न्‍यायपालिका में अपने नाबालिग होने का प्रमाणपत्र प्रस्‍तुत कर दे तो उसे किशोर समझा जाता है और उसके क्रूरतम अपराध के दण्‍डस्‍वरुप उसके टुकड़े-टुकड़े करने के बजाय तथाकथित कानून उसे केवल तीन वर्ष की सजा सुनाता है। 
दूसरी ओर कानून के रक्षक अपने भ्रष्‍टाचार, अवैध गतिविधियों के लिए इसे अपने मनमाफिक बनाते हैं और संशोधित करते हैं। उदाहरणस्‍वरुप सूचना का अधिकार कानून के दायरे से छह राष्‍ट्रीय राजनीतिक दलों ने खुद को यह कह कर बाहर रखने का विधेयक पारित कर लिया कि उन्‍हें केन्‍द्र से पार्टी गतिविधियों के लिए अनुदान मिलता है। इसलिए वे अपनी गतिविधियों का हिसाब-किताब नहीं बता सकते। इसी प्रकार दागी सांसदों, विधायकों के चुनाव में खड़े न होने, वोट न देने के लिए सर्वोच्‍च न्‍यायालय के निर्देश को विधायिका इसके विरुद्ध विधेयक लाकर इसे निरस्‍त कराने के लिए आमादा है।
समय के अनुरुप कानून के लचीले नहीं होने के कारण बलात्‍कार के बाद लड़की की नृशंस पिटाई करके उसे मौत तक पहुंचाने का दोषी अपने अपराध के लिए यदि समुचित दण्‍ड नहीं पाता है तो इससे केवल समाज और संवेदनशील लोगों की भावनाएं ही आहत नहीं होतीं। इससे एक समय-विशेष की सम्‍पूर्ण समाजार्थिक व्‍यवस्‍था भी चरमराती है। कानून को यह भी विचार करना चाहिए कि पीड़ित लड़की के समर्थन में सड़कों पर आए लोगों और उन्‍हें रोकने में शासन-प्रशासन को जितनी भी प्रशासनिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक कसरत करनी पड़ी उसमें देश का कितना समय और धन बर्बाद हुआ। किसी बड़े देश की समय और धन की ऐसी बर्बादी से उबरना अधिक महत्‍वपूर्ण है या ऐसी बर्बादी के सिद्धदोषी को बचाने के लिए कानून की अव्‍यावहारिक अवधारणाएं, प्रावधान, धाराएं गिनाना और उन पर चलने को न्‍याय की महानता सिद्ध करना।




Sunday, September 1, 2013

आपको….प्रेम संस्‍मरण


पकी ओर से अपना ध्‍यान हटाता हूँ तो अपनी ही हानि करता हूँ। यदि मैं आपके लिए स्थिर नहीं रहता हूँ तो मेरा जीवन मृत्‍यु समान हो जाता है। मेरे बच्‍चे आपको भूल कर मैं अपना जीवन नर्क बनाता हूँ। लेकिन ऐसा केवल एक छोटी अवधि के लिए होता है। वह भी इसलिए कि निर्मल मन का यह मानव-प्राण रणनीतिक दुनिया और इसके समाज में झूठा, गलत नहीं होता। अर्थात् अपनी सच्‍चाई, सज्‍जनता का मूल्‍य चुका कर भी मैं अपनी ही हानि करता हूं कि आपको अल्‍प समय के लिए भूल जाता हूँ। पर फिर आपको याद करके ही शोला बना गुस्‍से से फुफकारता मैं शांत-प्रशांत हो जाता हूँ। बुरा सोचने, करने से पहले मैं आपको याद करता हूँ तो सारी बुराई समाप्‍त हो जाती है। इसलिए आप मेरे जीवन का वह प्रेमिल आधार बनते जा रहे हो जिसकी छत्रछाया में मैं खूब जिन्‍दगी जी रहा हूँ।

मैं अहसास में प्रेम के
ये मैंने हाथ फैलाया
मेरी हथेली को आपके
गुलाबी हाथ की हथेली ने पकड़ लिया है
मैं अवाक आपको सम्‍मुख पाकर
बेसुध अन्‍तर्मन तक हर्षा कर
विश्‍वास नहीं बनता
कि आप की सुन्‍दर पैरों की उंगलियां
मेरे नयनों से दिखती हैं
धीरे-धीरे प्रेमाकर्षण में
मेरी ओर बढ़ती हैं
मैं आभास में आपके
ये मैंने बाहें फैलाईं
आपने मुझे
अपने अन्‍क में भर लिया है
मैं इन घड़ियों के लिए
जीवन काटता था
हे ईश्‍वर! यहीं पर प्राण हर ले
मेरे प्रेमभाव को स्थिर कर दे
हमेशा के लिए

नीले नभ में श्‍वेत अर्धचन्‍द्र, सन्‍तरी गोल अस्‍त होता हुआ सूर्य और इसकी अस्‍तावस्‍था से उत्‍पन्‍न संतरी क्षितिज का रंगायन जीवन का सार्थक आभास कराता है। मनुष्‍यजनित रॉकेट का पंक्तिबद्ध धुआं दूर कहीं आकाश के दूसरे कोने में कुछ पलों के लिए विदित होता है और अन्‍त में अदृश्‍य हो जाता है। आज की यह गुलाबी सांझ, मधुर मौसमीय अहसास सब कुछ भुला गया सिवाय आपके। सन्‍ध्‍या का श्‍वेत अर्द्धचन्‍द्र अपने अकल्पित, अपरिभाषित सम्‍मोहन सहित चमक रहा है। अलसायी सांझ के बाद अब यह रात कितनी साफ सुथरी है। दूर-दूर तक सब कुछ स्‍पष्‍ट नजर आ रहा है। पृथ्‍वी पर चन्‍द्र प्रकाश की छाया कितनी निश्‍छल, भोलेपन से पसरी हुई है। मेरे मन में यह दिव्‍य प्रकृति अवस्‍था एक बेचैनी बढ़ाती है। जिससे प्रेम है उसकी स्‍मृतियां बरसने लगती हैं।
     धरती पर बिखरे चन्‍द्रप्रकाश में घरों, दीवारों, पेड़ों और पत्‍तों की छायाकृतियां कितनी रहस्‍यमय सुन्‍दरता से भरी हैं! मन में विचित्र हलचल है। आप मेरे मन में ऐसे ही हैं जैसे इस चन्‍द्र रोशनी में धरती की ये सब चीजें। आधी रात बीत जाने पर भी नींद नहीं आई। बाहर आया तो चांद अपनी मस्‍ती से लुभाने लगा। आकाश का स्‍वप्‍नदर्शी आभास और इसमें विचरण करता, अद्भुत अवर्णित आकर्षक रंग से दमकता गोल इन्‍दु का स्‍पन्‍दन बहका रहा है। मध्‍य आकाश में यह संसार के लिए एक आश्‍चर्य-पुन्‍ज बन कर चमक रहा है। मैं इसको देखते हुए मन्‍द रिमकती वायु के बहाव में प्रेम विह्वल हूँ।

मेरे सनम को सच्‍ची मोहब्‍बत से डर लगता है
मेरा इस मोहब्‍बत में जल जाने का जी करता है
बेफिक्र अपने मातम से आपकी यादों में दिन गुजरता है
आलम-ए-दीवानगी की हकीकत में आपका रुठना झूठ लगता है
आंखें बन्‍द करना सो जाना औ ख्‍वाब देखना आपको मुसीबत लगता है
क्‍यूंकि आपकी इस दुनिया में हर पल एक शख्‍स भटकता है
यूं कब तक बिन मुहब्‍बत के एक कमजोर जिन्‍दगी जियेंगे आप
बताओ तो आपके दिल की इजाजत को जुंबा पे आने से कौन रोकता है
मेरे सनम को सच्‍ची मोहब्‍बत औ इसके अहसास से डर लगता है
मेरा हंस-हंस के इस मोहब्‍बत में जल जाने का जी करता है
आखिर में हुआ कि शातिर सनम हमसफर न बन कर दगा दे गया
मेरे दिल के अरमानों से खुद की खूबसूरती को चुरा ले गया
उसकी आंखों का सुलूक मुझे जन्‍मों का अजनबी बता गया
जमीन पर यह आदमी और इसका दिल भर-भर आता है
मोहब्बत में मिली धोखेदारी को भी मोहब्‍बत से ही सजाता है