Thursday, August 29, 2013

मानवीयता छोड़ कहां जा रहे हम


गर ज्‍यादार लोग समझदार होते तो दुनिया के किसी भी देश को कानून की जरुरत ही नहीं होती। लोगों की मूर्खता, बेवकूफी के कारण मूर्खों में से आगे आ कुछ ने इतनी समझदारी दिखाई कि उन्‍होंने लोक और समाज नियन्‍त्रण की बात उठाकर शासन की अवधारणा प्रस्‍तुत की। जब ये अवधारणा बनी होगी उस समय की वस्‍तुस्थिति का तो पता नहीं लेकिन आज ये लोक शासन की अवधारणा अनेक अन्‍तर्जटिलताओं से ग्रस्‍त है। एक आदमी क्‍या कुछ सोच सकता है इसकी कोई सीमा नहीं। कितने अच्‍छे और बुरे कार्य कर सकता है इस पर भी किसी का नियन्‍त्रण नहीं है। शासन अपने हाथों में लिए हुए लोगों को इतना तो सोचना ही चाहिए कि संसार की सर्वोच्‍च साध्‍यता तब ही है जब प्रत्‍येक सामाजिक गतिविधि नैतिकता के सर्वश्रेष्‍ठ मानदण्‍डों पर खरी उतरे। ऐसा करने के लिए इन मानदण्‍डों को सार्वभौमिक, सर्वस्‍वीकार्य बनाने के लिए शासनाधीशों को सर्वप्रथम स्‍वयं को इस हेतु प्रस्‍तुत करना होगा। लेकिन राह दिखानेवाले ही जब राह बिगाड़नेवाले बन जाएं तो विशाल जनसंख्‍या के अनेक भाव-विचारों से समाज का परिचालन होने लगता है। यदि ये भाव-विचार अच्छे होते तो निश्चित रुप से समाज की दशा-दिशा उचित होती। दुर्भाग्‍य से अधिकांश जनसंख्‍या के भाव-विचार इतने असामाजिक हैं कि उन्‍हें कठोर शासन के अन्‍तर्गत रखना ही पड़ेगा। परन्‍तु एक बार पुन: वही प्रश्‍न उभरता है कि जब शासन ही अनियन्त्रित हो तो सामाजिक नियन्त्रण का सुचारु नियम कैसे बने।
जो अनुभव हमारा मानवीय हो सकने को तत्‍पर होता है उसमें हमेशा आधुनिक रीतियों के आकर्षण व्‍यवधान उत्‍पन्‍न कर देते हैं। हम पुन: मानव-अमानव अस्तित्‍व के मध्‍य सन्‍तुलन स्‍थापित करने में महत्‍तवपूर्ण जीवन समय व्‍यतीत कर देते हैं। ऐसा होते रहने से सामाजिकता का ह्रास तीव्र गति से हो रहा है। देशकाल के लिए मौलिक चिन्‍ताओं और सम्‍भावनाओं की रुपरेखा अनुभव एवं प्रतिष्‍ठा तक सिमट कर रह गई है। इसे कार्यरुप में बदलने के लिए जो कठोर निर्णय लिए जाने चाहिए, दुर्भाग्‍य से शासन-प्रशासन उनके पक्ष में नहीं है। और इस दिशा में यदि कोई योग्‍य जननायक कार्य भी करता है तो उसे 'धर्मनिरपेक्ष', 'साम्‍प्रदायिक' कहकर हतोत्‍साहित किया जाता है।
आज यदि कोई व्‍यक्ति सरकार, समाज के निकृष्‍ट ताने-बाने से परेशान होकर साधु-सन्‍त बनने की सोचे तो यह भी सम्‍भव नहीं। क्‍योंकि आजकल समाज के बड़े से बड़े ठग, लुटूरे, दुर्जन गेरुए वस्‍त्र पहन और लम्‍बी-लम्‍बी दाढ़ी मून्‍छ बढ़ा कर साधु-सन्‍त बने हुए हैं। ऐसे में यदि दुर्जन दुनिया के प्रत्‍यक्ष घनचक्‍कर से बचने के लिए सज्‍जन व्‍यक्ति सन्‍यासी बनना चाहे तो उसके लिए यह रास्‍ता भी सुरक्षित नहीं बचा। इस दुरुहता में मन बरबस यही प्रार्थना करता है कि हे भगवान! मशीनी होते मानव के घमण्‍ड को चूर करने के लिए अब धरती पर आ जाओ। नहीं तो आपकी भक्ति का अर्थ खत्‍म हो जाएगा। धरती का पावन भूखण्‍ड अनन्‍तकाल से मानवीय दुर्बुद्धि का शिकार होता रहा है। आज भी हो रहा है। एक सीधे रास्‍ते पर चलते हुए सज्‍जनता से जीवनयापन करना कितना कठिन होता जा रहा है! दुर्जनता अपने को सही और न्‍यायसंगत ठहरा रही है। इसके लिए संवैधानिक प्रणाली तैयार हो रही है। दुर्जन लोग अपने कहे-अनकहे को कानूनी जामा पहना कर समाज पर थोपने की जिद कर रहे हैं। संवेदनशील, विचारवान, बुद्धिमान और सज्‍जन लोग दुर्जनता के कानून तले दब कर मरने को विवश हैं।
 दशकों-दशक गुजरते गए और समय के प्रवाह में पिछला भूला-बिसरा हो जाता है। काल के गर्त में समा जाता है। फिर भी समय के वर्तमान काल के जीवन और इसमें हिल-डुल रहे मनुष्‍य को अपनी उपस्थिति न जाने क्‍या ज्ञात होती है कि वह मानवीयता छोड़ कर धोखा और लूट में लिप्‍त है। मनुष्‍य अपनी आत्‍मा से इतना बेपरवाह है कि वह अच्‍छे-बुरे व्‍यावहारिक घटनाक्रम को अपनी हार-जीत का पैमाना मान चुका है। अपने अन्‍तर्मन के निर्णय उसे बोझिल लगने लगे हैं। अपने मानवीय पहलू से जुड़ना अब हरेक के लिए शर्म की बात है। उधारी, मक्‍कारी, पराधीनता के जीवन को विज्ञापनों के द्वारा महिमामण्डित किया जा रहा है। यन्‍त्रों की बदौलत जीवन ढोने का आदी हो चुका आज का आदमी जीवन में मेहनत, संघर्ष, धैर्य, सादगी और आत्मिक सोच की अहम जरूरत भूल चुका है। न जाने चार पहियों के वाहन, दुपहिए वाहन, रेलगाड़ी, हवाई जहाज में इधर से उधर और उधर से इधर करने में क्‍या रखा हुआ है, जो हमें स्‍वयं को समझने का मौका भी नहीं मिल पा रहा है कि हम क्‍यूं हैं, क्‍या हैं, किसलिए हैं, कब तक हैं और नहीं रहने पर कहां होंगे?
संसार के व्‍यवस्‍थापकों को रुक कर सोचने की आवश्‍यकता है कि मानव-जीवन की शान्ति उनका सबसे बड़ा लक्ष्‍य हो। एक-दूसरे पर पैर रख कर आगे बढ़ने की प्रवृत्ति से राष्‍ट्रों को और राष्‍ट्रों के अन्‍दर विभाजित राज्‍यों को बचना ही होगा। हम सब अपने भाव-विचारों को निरन्‍तर नवजात शिशु जैसी निश्‍छलता और मृत्‍यु पूर्व की गम्‍भीरता से संचित करेंगे तो निश्चित रुप से जीवन का सच्‍चा रस बरसेगा। मानव हर्ष में झूमेगा।  



Sunday, August 25, 2013

बलात्‍कार के मूल



राजधानी में एक वर्ष में हुईं दो सामूहिक बलात्‍कार की घटनाएं अगर कुछ सामाजिक बदलाव कर पाईं हैं तो वह यह कि अब बलात्‍कार से सम्‍बन्धित खबरों और पुलिस थानों में दर्ज इनकी रिपोर्टों पर लोकतन्‍त्र का कोई न कोई स्‍तम्‍भ जब-तब संज्ञान लेता ही रहता है। यह बात अलग है कि संज्ञान पूर्व की दुष्‍कर्म की घटनाओं के दोषियों को दण्‍ड देने के बारे में हो रही व्‍यवस्‍थागत उठापटक से प्रेरित होकर नहीं बल्कि बलात्‍कार की नई घटना होने पर लिया जाता है। इस बार बलत्‍कृत हुई मुम्‍बई की फोटो पत्रकार का सौभाग्‍य था कि उसका शारीरिक उत्‍पीड़न होने के बाद उसे इस तरह मारा-पीटा नहीं गया कि उसकी जान चली जाती। वह जीवित है। अस्‍पताल के कक्ष में अपने होने न होने की उस भावना में बह रही है, जिसे बलात्‍कारियों ने गहरे आहत कर दिया है।
इस विषय पर क्रोधित होनेवालों, बात करनेवालों, न्‍याय करनेवालों, लिखनेवालों के बीच फिर वही पुराना वाद-विवाद होगा कि यह सब पाश्‍चात्‍य, आधुनिकता, फैशन, खुलनेपन, सेक्‍स प्रसारकों के कारण हो रहा है या जन्‍म से विकृत मानसिकता रखनेवाले ऐसे अपराध करते हैं। इस सम्‍बन्‍ध में यदि हम सभी कारकों पर विचार करेंगे तो शायद कुछ व्‍यावहारिक सुधार हो सकें। विषयगत समस्‍या के उन्‍मूलन के लिए जीवन के कई पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए और इनमें व्‍याप्‍त विसंगतियों को चिन्हित कर, उन्‍हें रोक कर ही इस दिशा में ठोस कार्य किए जा सकते हैं।
इस हेतु सर्वप्रथम भारतीय सामाजिक ताने-बाने को देखें। आज देश में मौजूद जनसंख्‍या राष्‍ट्रीय आंकड़ों में प्रदर्शित संख्‍या से बहुत ज्‍यादा है। राजनीति के फलने-फूलने के लिए जो सबसे बड़ी खुराक है, वह है जनसंख्‍या। अब यह जनसंख्‍या भारतीय मूल की है या आयातित, इससे चुनाव जीत कर सत्‍तासीन होनेवालों को कोई फर्क नहीं पड़ता। आज जो बाहरी लोग देश में घुसे हुए हैं कहने को तो कुल जनसंख्‍या में उनकी गिनती भी होती है। पर सच्‍चाई ये है कि इस देश के मूल निवासी न होने के कारण राष्‍ट्रीय रजिस्‍टर में उनका अंकन हो ही नहीं पाता। ऐसे लोग क्‍या करते हैं, कहां व कैसे रहते हैं, इनकी आय-व्‍यय का हिसाब-किताब क्‍या है, ये ऐसे प्रश्‍न हैं जिनकी पड़ताल बहुत जरुरी हो गई है। यही वे लोग हैं जो सामूहिक बलात्‍कार, चोरी-डकैती करने, दंगा-आतंक फैलाने, नकली मुद्रा बनाने, इसका प्रचार-प्रसार करने तथा हर उस अवैध गतिविधि में शामिल पाए जाते हैं जो प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष रुप से देश का अहित कर रही है। ऐसे में सरकार का प्रथम दायित्‍व तो यह बनता है कि वह शरणार्थियों के रुप में आए बांग्‍लादेशियों, पाकिस्‍तानियों, नेपालियों, म्‍यामारियों को वापस इनके देशों में भेजे। ये परदेसी आते तो शरणार्थी बन कर हैं पर यहां की लचर कानून-व्‍यवस्‍था का फायदा उठा कर शीघ्र ही गोरखधन्‍धों में लिप्‍त हो जाते हैं। जिनके संस्‍कारों में देश, परिवार, सम्‍बन्‍धों का कोई मूल्‍य न हो वे हमारे देश में आकर यहां के मूल्‍य-मान्‍यताओं को सम्‍मान देंगे और यहां की व्‍यवस्‍था से चलेंगे, ऐसी उम्‍मीद करना ही बेकार है। दुर्भाग्‍य से हमारी सरकारें गद्दी पर बैठने के लालच से ऐसी उम्‍मीद हमेशा से पाले हुईं हैं। क्‍योंकि उन्‍हें शरणार्थियों में अपना नया वोट बैंक जो नजर आता है। इसलिए देश के उद्धार के लिए पहले तो अपने ही देश की जनसंख्‍या वृद्धि को रोकना होगा और यदि यह कार्य शीघ्र क्रियान्वित नहीं हो सकता तो कम से कम इतना तो करना ही होगा कि भारत स्‍वयं के शरणस्‍थल बनने पर तत्‍काल रोक लगाए।
अब उन्‍मुख होते हैं आज के राष्‍ट्रीय पथ-प्रदर्शकों की ओर। नेताओं की बात करना इसलिए जरुरी नहीं है कि अगर ये काम के होते तो न समस्‍याएं होतीं और ना कुछ लिखने की जरुरत ही पड़ती। अस्‍पताल में पैदा होनेवाले आज के बच्‍चे सांसारिक भाव-विचारों से परिचित होते ही सबसे पहले विज्ञापनों, फिल्‍मों के आभासी सम्‍पर्क में आते हैं। घोर अभावों में पल रहे किसी बच्‍चे के घर में टी.वी. तो जरुर होता है। इस पर प्रसारित होनेवाले कार्यक्रमों में ऐसा कोई कार्यक्रम नहीं है, जिससे कुछ अच्‍छा ज्ञान मिले। तीव्र गति से चलते-फिरते चलचित्र, भारतीय जीवन की सच्‍चाई से कोसों दूर अमीरी और भोगवाद को परोसता टी.वी. बच्‍चों में जो कुछ भर रहा है उसे वास्‍तविक दुनिया में अनुपलब्‍ध पाकर वे विद्रोही, हठी ही बनेंगे। विज्ञापनों, फिल्‍मों, नाटकों का विषाक्‍त आभास उन्‍हें संघर्ष, श्रम से जी चुराने को दुष्‍प्रेरित करता है। चीजों को जल्‍दी और अपनी शर्तों पर प्राप्‍त करने की होड़ उन्‍हें अपराधोन्‍मुखी बनाती है।
ऐसी आभासी दुनिया को अपने अभिनय से और ज्‍यादा सजानेवाले बॉलीवुड के फिल्‍म अभिनेता, खेल जगत के प्रसिद्ध खिलाड़ी जो आज युवाओं के अनुकरणीय हैं, क्‍या उनका यह दायित्‍व नहीं कि वे अपने कार्यक्षेत्र में उन्‍हीं कार्यों को शामिल करें, उन्हीं कलाओं को अभिव्‍यक्‍त करें जो जीवन में वास्‍तविक रुप से मौजूद हों। वे बिलकुल भी वह सब न दिखाएं या बताएं जिससे देखनेवाले पथभ्रष्‍ट हों। मीडियावाले भी अपना उत्‍तरदायित्‍व समझें और उन्‍हीं समाचारों, घटनाओं, बातों का ज्‍यादा प्रसार करें जिनसे नए बच्‍चों को कुछ अच्‍छा सीखने को मिले। बलात्‍कार का दुखदायी समाचार जहां पर छपा हो उसी के बगल में सेक्‍स शक्ति बढ़ाने के विज्ञापन छापना बन्‍द होना चाहिए। इसी तरह बॉलीवुड और हॉलीवुड की अभिनेत्रियों की अधनंगी तसवीरों सहित उनकी अमीरी चोंचलों की खबरें भी नहीं छापीं जानी चाहिए। लोकतन्‍त्र के चतुर्थ स्‍तम्‍भ को यह तो तय करना ही पड़ेगा कि वह नई पीढ़ी में अच्‍छे संस्‍कार डालने के पक्ष में रह कर उसी प्रकार से अपने समाचारपत्र छापना चाहता है या इस पीढ़ी को सेक्‍स, कामुकता बढ़ाने के विज्ञापन पढ़वा कर उनसे इन्‍हें खरीदने की मौन अपील करते हुए मात्र धनलाभ अर्जित करना चाहता है। फिल्‍म निर्माण से जुड़े लोगों को भी अपनी फिल्‍मों के विषय सोच-समझ कर चुनने होंगे। 'दोस्‍ती' जैसी फिल्‍में बनेंगी तो समाज पर भी उसका अच्‍छा असर पड़ेगा।  'डर' जैसी बेहूदी फिल्‍म में अभिनेता द्वारा जबर्दस्‍ती अभिनेत्री के पीछे पड़े रह कर एकतरफा प्‍यार में उसे प्रताड़ित करने और अन्‍त में हिंसा पर उतारु हो जाने से कौन सा सार्थक संदेश समाज में फैलता है! इन्‍हीं बातों पर ध्‍यान देकर कलुषता की ओर तेजी से बढ़ते समाज को रोका जा सकेगा।
    

Thursday, August 22, 2013

कैंसर के विरोधाभास

क समाचारपत्र का अर्द्ध-पृष्‍ठ कैंसर बचाव दिवस पर कैंसर से जीतनेवाले जाबांजों को शीर्षकीय सलाम कह रहा था। पढ़ते ही दिमाग खटका और तय हुआ कि कैंसर व जाबांजों पर विस्‍तार से लिखूंगा। युवराज सिंह, मनीषा कोइराला, लीजा रे जैसे धनसम्‍पन्‍न हस्तियों को जांबाज कहा गया। जिनके पास पैसों की भरमार है, जो अपनी मामूली बीमारी के इलाज के लिए भी महंगे देशी-विदेशी अस्‍पतालों तक आसान पहुंच रखते हैं उन्‍हें यदि अपनी किसी गम्‍भीर बीमारी का लम्‍बा, महंगा इलाज कराना पड़ा और वे इसमें सफल हो कर स्‍वस्‍थ हो गए तो इसमें इतनी बड़ी क्‍या बात है। भारतीय मध्‍यम वर्ग, नौकरीपेशा की तरह ऐसी बीमारी में सरकारी या मझौले निजी अस्‍पतालों में अगर इन्‍हें इलाज कराना होता तो अव्‍यवस्‍थाओं, असुविधाओं, अनदेखी की मार से इनका मनोबल टूट कर बुरी तरह बिखर चुका होता। इन्‍हें स्‍वयं इस भ्रम से बाहर निकलना होगा कि इनकी ख्‍याति इनके व्‍यक्तित्‍व से नहीं, अपितु इनके बैंक बैंलेस से है। यह भी इनके लिए विचारणीय होना चाहिए कि क्रिकेट, फिल्म  से जुड़ कर पैसे कमाना, मूल्‍यहीन ख्‍याति अर्जित करना आज भारतीय लोकतन्‍त्र की विसंगतियों का एक निम्‍न स्‍तरीय ताना-बाना है। संवेदनशील और आदर्श व्‍यक्ति की नजर में आम आदमी की जिन्‍दगी की कीमत पर फलने-फूलने वाले इन क्षेत्रों का कोई मूल्‍य नहीं है।
क्रिकेट, बालीवुड जगत के इन लोगों ने कैंसर से लड़ाई लड़ी इसलिए ये अपनी लड़ाई जीत जाने के बाद प्रेरक, आदर्श बन गए। कैंसर से पीड़ित रहते इन्‍हें हुई शारीरिक-मानसिक पीड़ा से एक व्‍यक्ति के तौर पर मैं अत्‍यन्‍त संवेदना रखता हूँ। इनकी दर्द-विभीषिका, रोग दुरुहता को मैं अपने स्‍तर पर अनुभव कर सकता हूँ। पर क्‍या इनके दुख-दर्द उन लोगों के विद्रूप शारीरिक, मानसिक संतापों से बढ़ कर हैं, जो अपने साढ़े पांच फुटा शरीर के अन्‍दर के न जाने कितने कैंसर सरीखे रोगों से कब से लड़ रहे हैं। जिनकी रोटी, घर तक का स्‍थायी ठिकाना कभी न रहा। अपनी बीमारी के इलाज के लिए जो सरकारी अस्‍पतालों की बीमार, जर्जर व्‍यवस्‍था पर निर्भर हैं। क्‍या उनकी जाबांजी का कहीं उल्‍लेख होता है? क्‍या कोई उन्‍हें नामी हस्तियों की तरह अहसास, लगाव से याद करता है? उनके लिए कहीं कोई आंहों की दुनिया बनती है? क्‍या उन पर कैंसर बचाव दिवस के नाते कोई देशी-विदेशी मदद मेहरबान होती है? जीते जी मृत्‍यु का अभ्‍यास करते लोगों, गरीबों के लिए भी क्‍या कोई ऐसा ही समाचार परिशिष्‍ट निकलेगा? जो तंत्र द्वारा थोपे गए विकराल जीवन और इसके परिणामस्‍वरुप उनके शरीर में पलने, बढ़ने, मृत्‍यु तक उससे छुटकारा नहीं मिलने वाले कैंसर से लड़नेवालों के रुप में उन्‍हें विभू‍षित करेगा? या जनसंचार स्‍टार संचार बन कर मात्र रुपए-पैसों, सुविधाओं में खेलनेवालों की पूंजी वंदना करेगा? आज संचारसाधकों, पत्रकारों के सम्‍मुख तराजू के बैठे हुए अमीर पलड़े के बजाय हवा में सुविधा-अधिकारहीन हो लहरा रहे गरीब पलड़े को भारी करने की प्रमुख जिम्‍मेदारी है। इस पेशे के हाथ में लेखन का वो चमत्‍कार है, जिससे विषधर बन कर डोल रही धरती अमृत स्‍थायित्‍व प्राप्‍त कर सकती है।
      विघ्‍न-बाधाओं को पार करते हुए अपना जीवन सहर्ष देश सेवा में समर्पित कर चुके नेताओं, खिलाड़ियों, कवि-लेखकों की असाध्‍य दुख बीमारी में अगर कोई चिकित्‍सा सुविधा सम्‍पन्‍न अस्‍पताल उनका इलाज करके उन्‍हें वापस जीवन धारा में ले आता तो ऐसी चिकित्‍सकीय व्‍यवस्‍था, सुविधा के गुणगान सहित नया जीवन पाए समाज सेवियों को लोगों के आदर्श के रुप में प्रस्‍तुत किया जाता, उन्‍हें जांबाज कहा जाता तो ऐसा करना सार्थक होता। इसके बाद निश्चित रुप से देश-दुनिया की बसावट जैसी होनी चाहिए वैसी ही होती। अच्‍छे जनसेवकों, व्‍यक्तियों को स्‍वास्‍थ्‍य लाभ दिया जाता तो जीवन का परिदृश्‍य कुछ और ही होता। जिनके लिए आम लोग, गरीब मजदूर दीर्घायु की कामना करते रहे उन्‍हें पागल घोषित कर दिया गया, गायब करवा दिया गया, असामयिक मौत दे दी गई। जिन्‍हें देश की अच्‍छाई में वृद्धि हेतु जीना चाहिए था, जो कैंसर जैसी असाध्‍य कही जानेवाली किसी बीमारी से भी पीड़ित नहीं थे, उन्‍हें मूल्‍यहीन सिद्ध कर जीवन की पृष्‍ठभूमि में पहुंचा दिया गया। और जो समाज के नैतिक-चारित्रिक पतन, धन लालच में बढ़ोतरी करते रहे वे आज प्रेरक जाबांज हैं। आज बच्‍चों के नैतिक अध्‍याय से शास्‍त्री, विवेकानंद, भगत सिंह, रवीन्‍द्र नाथ टैगोर, ध्‍यानचंद जैसे प्रेरणा स्‍तम्‍भ लगभग गायब ही हो चुके हैं। इनके स्‍थान पर वहां ऐश्‍वर्य, सचिन, अमिताभ की जीवनियां शामिल कर दी गई हैं। तन्‍त्रात्‍मक सोच को पूंजी ने ऐसा जकड़ लिया है कि पूंजीगत तामझाम को ही वह नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत के रुप में परोसना चाहती है। भोगवाद की आन्‍धी ने आदमी को उसी से अलग कर दिया है। आज अधिकांश मनुष्‍य न किसी अच्‍छाई से प्रेरित होते हैं और ना ही किसी बुराई को समझने का ही विवेक रखते हैं। ऐसी झूलेलाल वाली अवस्‍था में तो उन्‍हें ठगनेवालों की कमी कहां पड़नेवाली है। खाद्य सामग्री में जानलेवा रासायनिक मिश्रण करके पूंजी की ढेरियां लगवाने और लगानेवाले आज कैंसर का महंगा इलाज करने, इलाज करवा कर स्‍वस्‍थ हुए अमीरों को जाबांज कहने का नाटक करवा रहे हैं। ऐसे नाटकों पर विचार करके दीन-दुनिया की निकृष्‍टतम सच्‍चाई ही सामने आती है। इससे मन खिन्‍न और दिमाग सुन्‍न हो जाता है।

Sunday, August 18, 2013

आवश्‍यकता युवा वेदान्तियों की


हाथों से आंखें मसल रहा हूँ। बन्‍द आंखों के अन्‍दर अन्‍धकार व्‍याप्‍त है। तारे टिमटिमाते लग रहे हैं। वहां पर शीघ्रातिशीघ्र बनती-बिगड़ती समस्‍त श्‍यामाकृतियां उद्देश्‍यहीन हैं परन्‍तु तब भी उनमें एक अनोखा आकर्षण है। मैं इस आकर्षण से बचने की सोचता हूँ। आंखें खोल वापस वास्‍तविकता को देखने का प्रयास करता हूँ। लेकिन ठोस जगत, प्रत्‍यक्ष भौतिकीय चराचरों को देख कर उपजनेवाले दु:ख की याद आते ही आंखों को बन्‍द ही रखने का निर्णय किया।
     बन्‍द नयनों में सर्वप्रथम स्‍वयं का साक्षात्‍कार हुआ। अपने होने न होने का मूल्‍य तय हुआ। अपनी उपयोगिता, दायित्‍व के विचार कौंधे। जीवन-यात्रा के लक्ष्‍य, उनकी प्राप्ति-अप्राप्ति, समाज पर उनके सद्प्रभाव और मृत्‍यु के बाद मेरे भौतिकीय अस्तित्‍व के शून्‍यानुभव इत्‍यादि का मन्‍थन चलता रहा। विचारों की झुलसा देनेवाली ऐसी लपटें जब भी उपस्थिति होती हैं तो लगता है मैंने कुछ भी नहीं किया। संसार की सुन्‍दरिमा को बढ़ाने के लिए कितना कुछ किया जा सकता है। जीवन को जगाने और ऊपर उठाने के लिए कितने काम ऐसे हैं, जो स्‍वयं को स्‍वयं की अनुमति मिलते ही हो सकते हैं। लेकिन अज्ञात आत्‍म-संकीर्णता ने जीवन के प्रारम्‍भ से ही व्‍यवधान उत्‍पन्‍न किए हुए हैं। पहले इन व्‍यवधानों से संघर्ष करो। अबोध रहते-रहते इनके वश में आए स्‍वयं का स्‍वतन्‍त्र विश्‍लेषण करो। विश्‍लेषण करते-करते यदि जीवन-सन्‍ध्‍या में जीवन अभिबोध जागृत हो भी जाता है तो जीवन शरीर का इतना क्षरण हो चुका होता है कि वह व्‍यावहारिक रुप से कुछ भी अच्‍छा करने की स्थिति में नहीं रहता। तब एकमात्र पथ दृष्टिगत होता है। कि वेदान्‍त बन जाओ, सुविचार प्रवाहित करो। नवजातों के लिए सुसंस्‍कारित समाज की स्‍थापना करो।
     यह प्रक्रिया अनादिकाल से चल रही है। परन्‍तु वृद्ध वेदान्‍ती, संस्‍कारी, धर्म-प्रचारक युवाओं को युवा रहते-रहते ऐसे ज्ञान सूत्र नहीं समझा पाते। और यदि ऐसे ज्ञान सूत्र केवल वृद्ध मनुष्‍यों के मध्‍य ही प्रसारित-प्रतिष्‍ठापित होंगे तो इनको व्‍यवहार में बदलने का स्‍वप्‍न क्‍या कभी पूर्ण हो पाएगा? क्‍योंकि संसार में संज्ञान, संस्‍कार, सदकर्मों को व्यवहृत स्‍वरुप देनेवाला एक ही है, और वह है युवा। यदि मनुष्‍य युवा रहते हुए धर्ममार्गी, सुविचारी, संस्‍कारी बन जाए तो सामाजिक विसंगतियां एक निश्चित समयावधि में समाप्‍त हो जाएं। इसके लिए शासकीय सरोकार भी निरन्‍तर बना रहना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्‍य से विसंगतियों की नींव पर खड़ा शासन ऐसे किसी नवप्रवर्त्‍तन की स्थिति में नहीं है।
     बन्‍द नयनों के भीतर फैले हुए अन्‍धेरे का आकर्षण अब अव्‍यावहारिक लगने लगा। इच्‍छा हुई कि इस आकर्षण के आधार पर जो नवसंकल्‍प मैंने लिए वे खुली आंखों के सामने बाहर तैयार हों। वे भौतिक संसार को सद्सिंचित करें। जितने भी युवक-युवतियां हैं वे सब वेदान्‍ती, धर्माधिकारी, सुविचारी, संस्‍कारी हों और वृद्धों की सेवा-सुश्रूषा करें। संसार को स्‍वर्ग बनाने के लिए क्‍या दुनिया को युवा वेदान्तियों की आवश्‍यकता नहीं है? नहीं है तो अवश्‍य होनी चाहिए।

Sunday, August 11, 2013

इक्‍कीस वर्ष पुरानी डॉयरी



डेढ़ दिन से घर में अव्‍यवस्‍था फैली हुई है। आवश्‍यक-अनावश्‍यक वस्‍तुओं को अलग-अलग किया जा रहा है। इसी क्रम में अपनी पुरानी पुस्‍तकों, डायरियों, कागजों, प्रपत्रों के सम्‍पर्क में आया। जब से लिखना शुरु किया था तब ही से अनेक डायरियां, पुस्‍तकें, सन्‍दर्भ प्रलेख और प्रपत्रादि मेरे पास हमेशा उपलब्‍ध रहे। पढ़ाई, नौकरी के लिए स्‍थानांतरण होने पर कुछ विशेष डॉयरियां, पुस्‍तकें इत्‍यादि भी मैं हमेशा अपने साथ ही ले जाया करता। विवाहोपरान्‍त और मूल्‍यहीन समय के थपेड़ों ने अब इतना स्‍मृतिवान नहीं छोड़ा कि पहले का समस्‍त लेखन-कर्म और इसका संग्रहण एक अनुक्रमणिका के रुप में मेरे मस्तिष्‍क में सदा विद्यमान रहे।
     घर की नई-पुरानी वस्‍तुओं को रखने-हटाने के लिए जहां पर पालती मार कर बैठा हुआ था, पुरानी डॉयरियों को पढ़ते हुए वही स्‍थान मेरे लिए विगत के सुनहरे दिनों में झांकने की खिड़की बन गया। इन्‍हें पलटते-पढ़ते सन् 1991 में मुद्रित आठ इंच लम्‍बी और चार इंच चौड़ी एक महरुन रंग की डॉयरी हाथ आई। यह मेरी सबसे प्रिय डॉयरियों में से एक है। बाईस वर्ष पुरानी यह डॉयरी अब तक मेरे साथ है। स्‍नातक की पढ़ाई के दौरान यह डॉयरी बड़ी बुआ के पुत्र के पास हुआ करती थी। वे इसमें अंग्रेजी शब्‍दों के हिन्‍दी अर्थ लिखा करते थे। उन्‍होंने न जाने क्‍या सोच कर इसे मुझे दे दिया। उन्‍होंने पृष्‍ठ संख्‍या 3 पर यदि कुछ लिखा होता था तो इससे आगे के पांच-दस पृष्‍ठ खाली होते और उनके बाद फिर आगे के पृष्‍ठों पर कुछ लिखा होता था। मुझे मिलने से पूर्व साढ़े तीन सौ पृष्‍ठ की इस डॉयरी के मात्र आठ दस पृष्‍ठों में ही कुछ लिखा गया था। बाकी खाली थे। मेरे द्वारा इसमें लिखे गए कुछ संस्‍मरणों, कविताओं, चिपकाए गए कुछ मुद्रित लेखों और लिखने के बाद विचित्र मन:स्थिति में फाड़े गए कुछ पृष्‍ठों के उपरान्‍त आज भी इसके डेढ़-दो सौ पृष्‍ठ रिक्‍त हैं।
     मंगलवार 27.8.1996 को मैंने इस डॉयरी में अपना प्रथम संस्‍मरण लिखा। ये सत्रह वर्ष पुरानी बात है। शुक्रवार 30.8.1996 के संस्‍मरण में मैं लिखता हूँप्रकृति की शक्तियों एवं अनुभवों से सम्‍पन्‍न यादों और दूरियों की संरचना को ही मैं अपना संसार समझता हूँ। विशेषत: जिस युग प्रवाह में हम सम्मिलित हैं वहां तो इन दो अनुभवों को हर स्थिति-परिस्थिति में घटित होते हुए देखा जा सकता है। यह कभी भी सफल नहीं हुआ कि जिस व्‍यक्ति से हम सहानुभूति करते हैं वह सदैव हमारे सम्‍मुख रहे। बल्कि विपरीत ही होता रहा है। कि हमारा सबसे अधिक प्रिय हमसे दूर-सुदूर रहता है। भावात्‍मक मानसिकता के मनुष्‍य का संसार और उसके जीवित होने का कोमल आधार यही सब तो है। प्रिय बन्‍धु का संस्‍मरण करते हुए जो अनुभव जन्‍म प्राप्‍त करता वह गहराइयों तक निस्‍वार्थ व निष्‍कलंक बन जाए तो इससे बड़ा आश्‍चर्य संवेदनायी वसुन्‍धरा पर और क्‍या हो सकता है। यह तो मुझे ज्ञात नहीं किन्‍तु इस आश्‍चर्य को सर्वोत्‍तम कहने के लिए किसी जटिलता से समझौता नहीं करना पड़ेगा इतना अवश्‍य ज्ञातव्‍य है। नित कठोर परिश्रम सम्‍पूर्ण करते रहने से व्‍यक्ति यदि किसी की याद में विशेष रुप से रमता है, किसी को उसकी कठिनाइयों से उबारने का प्रयास बनाता है, किसी की छवि की कलात्‍मक एवं रचनात्‍मक अभिव्‍यक्ति करता है तो निसन्‍देह उसको मन्दिर में बिठा दिया जाए। वह परमात्‍मा है। रविवार 9.9.1996 का संस्‍मरणज्‍यों-ज्‍यों मैंने किए गए प्रयासों के प्रतिफल स्‍वरुप सफलता का भ्रम एकत्र किया त्‍यों-त्‍यों मुझे असफलता मिलती रही और मेरा अत:स्‍थल सघन होते हुए भी नैराश्‍य भाव से दरकता रहा। नकारात्‍मक भावनाएं मुझे अपने में खींची ले गईं। मैं नहीं चाहते हुए भी निन्‍दा और चुगली से अछूता न रहा। जिससे मेरी रचनाएं प्रभावित हुईं। बल्कि यूं कहना चाहिए कि मेरा दृष्टिकोण ही हर ओर से निष्क्रिय बन गया। जिससे मुझे मेरी अपनी रचनाएं अच्‍छी होते हुए भी नीरस लगने लगीं। किसी मित्र को उसकी खुशी में उस खुशी को दुगुना करने के बाबत मैंने स्‍वयंरचित चार पंक्तियों की शायरी कर डाली तो उसने शायरी को यह कह कर सराहा कि वह किसी बड़े लेखक की है। मैंने उसे समझाया, कवि का अर्थ जानते हो, सत्‍य और नैतिकता पर चलनेवाला ही कवि कहलाएगा। क्‍या तुम्‍हें मेरी मुखाकृति से असत्‍य-अनैतिकता का ऐसा कोई क्रूर भाव आता दिख रहा है, जिसके आधार पर तुमने मेरी शायरी को मुझसे छीन लिया?यह कह कर मैंने गर्व और कुछ खोकर पिघल जाने के भाव से दोबारा वही चार पंक्तियां दोहराईं-
                                         झूठा बयान करना तेरे बाबत लोगों में
                                        देगा न मुझे तनहाई में पल का भी चैन
                                            राह में झुके हुए थे जो अजनबीवश
                         सपनों में ढूंढेंगे तुझे फिर वही नैन
उन दिनों नई दिल्‍ली से प्रकाशित होनेवाले दैनिक नवभारत टाइम्‍स के रविवारीय परिशिष्‍ट में खुला मन्‍च नाम का एक कॉलम आता था। उसमें समाचार-पत्र की ओर से पाठकों के लिए एक प्रश्‍नोत्‍तरी संचालित होती थी। प्रश्‍न भी पाठकों के होते और उत्‍तर भी पाठक ही देते। पूछे गए प्रश्‍नों के उत्‍तर देने में मैं भी बढ़चढ़ कर प्रतिभागिता करता। सितम्‍बर-अक्‍टूबर 1996 के दौरान मैं और मेरा एक दोस्‍त खुला मन्‍च में पूछे गए प्रश्‍नों के उत्‍तर देनेवालों के रुप में प्राणपण से सक्रिय थे। प्रश्‍नों के मेरे द्वारा दिए गए कुछ उत्‍तर देखिएप्रश्‍न : प्रेम और आकर्षण में फर्क क्‍या? उत्‍तर: प्रेम से आशय व्‍यक्ति विशेष से स्‍थायी लगाव होना है। प्रेम परिवार के सांस्‍कृतिक जुड़ाव की आधारशिला होता है। प्रेम से ही दो प्रेमियों को एक साथ मरने-जीने की शपथ लेते हुए सुना जा सकता है। प्रेम के बल पर ही मैत्रीपूर्ण सम्‍बन्‍धों की स्‍थापना होती है। आकर्षण किसी की विशेष प्रभावी आदत, अंग परिचालन, व्‍यवहार करने का तरीका, मिलनसार प्रवृत्ति और सुन्‍दर रुप-शरीर को देखने से उत्‍पन्‍न होता है। इसको प्रेम का अस्‍थायी रुप भी कह सकते हैं क्‍योंकि प्रेम भी दो व्‍यक्तियों की समान वैचारिक आदत, सुन्‍दर रुप और छटा पर ही शुरु होता है।
प्रश्‍न : क्रिकेट में एक ओवर में छह गेंदें ही क्‍यों फेंकी जाती हैं? उत्‍तर: प्रारम्‍भ में जब इंगलैण्‍ड और आस्ट्रेलिया के मध्‍य क्रिकेट की श्रृंखलाएं खेली जाती थीं तो एक ओवर में आठ गेंदें फेंकने का चलन था। किन्‍तु इन दोनों देशों में सभी गेंदबाज तेज थे इसलिए उनकी क्षमता के अनुसार आठ गेंदों के स्‍थान पर छह-छह गेंदें फेंकी जाने लगीं। वैसे भी स्पिन गेंदबाजी की तकनीक मूलरुप से भारत में विकसित हुई थी। अगर इंगलैण्‍ड में हुई होती तो निसन्देह वे एक ओवर में आठ गेंदें ही रखते क्‍योंकि स्पिन गेंदबाज गेंद को एक-दो कदम से भाग कर ही फेंकता है और इस कारण वह थकता भी नहीं और एक ओवर आठ गेंदों का हो सकता था।
सत्रह-बीस वर्ष पूर्व की पत्रकारिता अपने दायित्‍व के प्रति पूर्णत: सचेत थी। तब मीडिया की विश्‍वसनीयता अधिक थी। इसीलिए राष्‍ट्रीय स्‍तर के समाचार-पत्र में कुछ छपना बड़ी बात होती थी। 
     बुधवार को अपना अस्तित्‍व नामक संस्‍मरण ब्‍लॉग पर प्रसारित किया था। इस पर श्रीमान पी.सी. गोदियाल द्वारा की गई टिप्‍पणी आज याद आ गई। उन्‍होंने लिखा था कि यह संस्‍मरण डॉयरी लेखन की याद दिलाता है और एक अरसे बाद डॉयरी में लिखे गए को पढ़ने में मजा आता है। बाईस वर्ष पुरानी अपनी इस महरुनी रंग की डॉयरी को पढ़ कर बिलकुल वैसा ही लग रहा है जैसा गोदियाल जी ने कहा था। वैसे तो डॉयरी में बहुत कुछ था। परन्‍तु उसे यूं एक ब्‍लॉग पोस्‍ट में समेटना उचित नहीं लगता। वैसे मैं शायरी पसंद नहीं करता पर फिर भी अन्‍त में एक दूसरी डॉयरी में मेरे द्वारा लिखी गई शायरी की कुछ पंक्तियां यहां प्रस्‍तुत हैं---
                         आसमां से भी ऊपर उड़ने की हसरतें थीं खत्‍म हो गईं
                        जिंदगीभर की प्‍यास बुझाने की आरजुएं बह गईं
                       सीने में उफनती थी जो हसरत सबसे अलग होने की
                      दुनिया के संग रहकर सीने से बाहर आकर सब जैसी हो गई
                    खुदा का ख्‍वाब एक दुरुस्‍त आदमी बनाने का पूरा न हो पाया है
                     खुदा के बनाए हुए आदमी ने खुदा को ही नचाया है
                     अब तो सब के साथ मैं भी खुदा की नजर में खटकता हूँ
 अब तो मेरी भी रुह बदनाम हो गई
आसमां से भी ऊपर उड़ने की हसरतें थीं खत्‍म हो गईं, तमाम हो गईं

Wednesday, August 7, 2013

अपना अस्तित्‍व

सुबह बिस्‍तर पर अर्द्ध-निद्रा में दाएं-बाएं पलटते हुए ही सुनाई दिया, दीदी आज अमावस्‍या है दीदी। ये आवाज पड़ोसी के घर के दरवाजे पर खड़ी मांगनेवाली की थी। हर शनिवार, अमावस्‍या के दिन वह मांगने के लिए आती है तो यही वाक्‍य बोलती है। इसके अलावा मैंने उसे कुछ और कहते हुए कभी नहीं सुना। तीसरी मंजिल पर स्थित घर के दरवाजे पर रबर से बंधे समाचारपत्र टकराए तो फट की तेज ध्‍वनि से अर्द्ध-निद्रा भी उचट गई। उठ कर बिस्‍तर पर बैठ जाता हूँ। आंखों के सामने खिड़की से बाहर सुन्‍दर, सुवासित बेलवृक्ष लहरा रहा है। आज लगता है सुबह से ही आकाश बरसाती बादलों से घिरा हुआ है। धूप नदारद है। बिलकुल बेकार मौसम है। मेरे लिए यह वातावरण घुटन का कारण बनता है। हालांकि गर्मी से बचने के क्रम में यह मौसम, इस शहर के लिए ठीक है, परन्‍तु मुझे इस ठंडक से वह गर्म मौसम अधिक सुहावना लगता है, जिसमें साफ आसमान और सूर्यप्रकाश की किरणें होती हैं। दो दिन पहले तक ऐसा ही मनहर मौसम था। जब तक नीला आकाश न दिखाई दे, पीली धूप न खिले और धीमी-धीमी हवा न चल रही हो, मुझे जैसे मूड-खराबी का डंक लग जाता है। स्‍वयं को प्रसन्‍न रखने के अनेक मनोवैज्ञानिक प्रयास विफल हुए। अप्रसन्‍नता में घर के अन्‍दर के सभी कार्य निपटा कर बाहर चल पड़ता हूँ। असामाजिक, अव्‍यवस्थित शहर की परिस्थितियां, गतिविधियां इस मौसम में मुझे अधिक प्रताड़ित करने लगती हैं।
सड़क बूंदाबांदी से भीगी हुई है। गुटखा, चिप्‍स, टॉफी, कई अन्‍य चीजों के खाली, फटे और गन्‍दे प्‍लास्टिक पैकेट यहां-वहां बिखरे हुए हैं। कॉलोनी की नालियां अव्‍यवस्थित तरीके से ढकी हुई हैं। मेरे जैसा ही कोई होगा जिसके पास अपना घर, कार, किराएदार, अच्‍छा बैंक बैलेंस नहीं हो। अधिकांश कॉलोनीवासी सम्‍पन्‍न हैं। सबके बच्‍चे तथाकथित अंग्रेजी शिक्षा थोप रहे पब्लिक स्‍कूलों में पढ़ रहे हैं। तब भी क्‍या पढ़ाई में बच्‍चों को यह नहीं बताया जाता कि घर और कॉलोनी की साफ-सफाई होनी चाहिए। कोई भी बच्‍चा या उसके अभिभावक कॉलोनी में गन्‍दे तरीके से फैले कूड़े के प्रति कभी चिंतित नहीं दिखते। गंदगी और अव्‍यवस्‍था के बारे में बात करते हुए मैंने कभी किसी को नहीं सुना।
कॉलोनी के बाहर निकला। उप-मार्गों पर अनावश्‍यक रूप से वाहन दौड़ रहे हैं। जरूरत के बिना ही तेज हॉर्न बजाते हुए, अनियन्त्रित तरीके से आवागमन करते वाहन और इनके चालकों का व्‍यवहार ही ऐसा होता है मानो वे पैदल चलनेवालों को रौंद देना चाहते हों। सूखी टांगोंवाले, भौंडे, भद्दे लड़के चुस्‍त जींस, गन्‍दे फैशनवाली कमीज पहने मोटरसाइकिल पर बैठकर कहां जा रहे हैं, समझ से परे है। ठीकठाक कपड़े पहने हुए वाहन चालक भी यातायात नियमों का पालन नहीं करते। ट्रक जैसे चौपहिया वाहन मात्र पन्‍द्रह-बीस फुट चौड़ी सड़क पर ऐसे चलते हैं जैसे एक्‍सप्रेस-वे पर चल रहे हों। चौपहिया वाहनों पर साइकिल, हाथ, हाथी के चिन्‍होंवाली राजनीतिक पार्टियों के छोटे-छोटे झण्‍डे होते हैं। मार्गों के किनारे तम्‍बाकू, बीड़ी, सिगरेट के खाली प्‍लास्टिक पैकेट, गुटखा-खैणी खाकर थूके हुए लाल-भूरे-काले थक्‍के पसरे हुए हैं। कूड़ेदान बनाकर प्राधिकरण ने जनता पर उपकार किया है, पर कूड़ादानों के द्वार नहीं होने से उनमें फेंका गया कूड़ा आवारा पशुओं, कुत्‍तों, सूअरों द्वारा जब-तब सड़कों पर फैला दिया जाता है। कूड़े का त्‍वरित निस्‍तारण और प्रसंस्‍करण अभी इस शहर का प्रारम्भिक सपना है न जाने यह सपना कब पूरा होगा। कूड़े की बात पर याद आया कि यहां से गाजीपुर डेरी फॉर्म के पीछे का कूड़ा डम्पिंग ग्राउंड स्‍पष्‍ट दिखने लगा है। दिल्‍ली-एनसीआर से इकट्ठा कर सालों से यहां कूड़ा फेंका जा रहा है। कूड़े के ढेर बड़ी ऊंची पहाड़ियों जैसे नजर आने लगे हैं।
सड़कों के गड्ढों में बारिश का पानी भरा हुआ है। मेरे पीछे से तेज गति में आते चौपहिया के चारों पहिए गड्ढों में पड़े और गंदले पानी के छींटे मेरे कपड़ों को भिगोते हुए मेरे मुंह पर भी गिर गए। लम्‍बी सांसें खींचकर तुर्कों, मुगलों और अंग्रेजों के उन शुरुआती कदमों को कोसने लगा जो बारी-बारी से भारत की पवित्र वसुन्‍धरा पर पड़े। भारतवर्ष के नागरिकों को परतन्‍त्रता के अभिशाप ने क्‍या बना कर छोड़ दिया है! इस देश की राजनीति, शासन, नियम-कानून केवल धर्मनिरपेक्ष जैसे एकदम बेकार हवा-हवाई विषय के लिए ही स‍मर्पित होंगे? क्‍या कभी इनका क्रियान्‍वयन आम भारतीय के लिए आवश्‍यक आधारभूत सुविधाओं, सेवाओं के लिए भी होगा?
अब एक मित्र के घर पहुंच गया हूँ। वो टीवी पर जम्‍मू में बिहार रेजिमेंट के पांच जवानों को पाकिस्‍तानी सेना द्वारा मारे जाने का समाचार सुन कर विचलित हो रहा है। उसको दुखी देख देहरादून से आए उसके साथी ने उसे डांटा और टीवी बन्‍द करने के लिए कहा। अस्‍सी वर्ष के दो बुजुर्गों को भारतीय व्‍यवस्‍था के बाबत विमर्श करते हुए सुनता रहा। हताशा, निराशा का वातावरण उत्‍पन्‍न हो गया। मन में आया कि हाथ को काट कर कहीं दूर फेंक आऊं।
घर पहुंचते-पहुंचते नभ की कुरूपता चरम पर थी। छींटाछांटी करते बादल न ढंग से बरस रहे थे और ना ही आकाश से हट रहे थे। बिजली चमक रही भी। बादलों की गड़गड़ाहट घर को हिलाती प्रतीत हुई। मुझ जैसे कमजोर दिलवाले के लिए यह कड़कड़ाती आवाज असहनीय बनी हुई थी। तीव्र कड़कड़ाहट की अन्तिम ध्‍वनियां इतनी तेज होतीं कि जहां खड़ा या बैठा था वहीं दोनों कानों पर हाथ रख लेता। दिल तेज-तेज धड़कने लगता। लगता जैसे यह बिजली मेरे सिर पर ही आकर गिरेगी।
रात घिर आने तक थोड़ा-थोड़ा पानी बरसता रहा। बाहर कपड़े सुखानेवाली तारों पर नीचे की ओर पंक्तिबद्ध हो विद्यमान पानी की बूंदों को देख रहा हूँ। वर्तमान सांसारिक और प्राकृतिक परिस्थितियों में अपना अस्तित्‍व भी इन्‍हीं जैसा लगता है। एक झटका लगा नहीं कि सब समाप्‍त।  
मंगलवार 6-8-2013 का संस्‍मरण।