Monday, July 29, 2013

भ्रष्‍टाचार के बीच ईमान की कीमत


दिल्‍ली और राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र में आजकल दो घटनाएं ऐसी हुईं, जिनके घटने के बाद लोक सेवकों अर्थात् पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा उचित काम किए जाने पर भी शासन-प्रशासन और इनके प्रतिनिधि घटनाओं के लिए इन्‍हें ही उत्‍तरदायी ठहरा रहे हैं। एक ओर तो देश का एक-एक आदमी सरकारी अकर्मण्‍यता, भ्रष्‍टाचार पर आंख मूंद कर रोष प्रकट कर रहा है तो दूसरी तरफ सरकारी स्‍तर का कोई जनकल्‍याणकारी कार्य होता भी है तो उसे राजनीतिक परिभाषाओं के अन्‍तर्गत ऐसे सिद्ध किया जा रहा है कि जैसे इस तरह का कार्य समाज विरोधी है। इन्‍हीं विडम्‍बनाओं का ही तो अभिशाप है कि आज भारतभूमि का सिर बुरी तरह कुचला, धंसा हुआ है।
     पिछले कई दिनों से दिल्‍ली के संभ्रान्‍त क्षेत्रों में रात को डेढ़ दो बजे बाइकर्स गैंग गैर-कानूनी स्‍टंटबाजी दिखा रहे हैं। इस दौरान वे यातायात कानून की धज्जियां तो उड़ाते ही हैं इसके अलावा हर आने-जानेवाले से दुर्व्‍यवहार भी करते हैं। इनसे तंग आकर पुलिसवालों ने 150 के करीब रहे बाइकर्स को नियन्त्रित करने के लिए उनमें से एक की बाइक के टायर पर गोली चलाई। टायर के बजाय गोली बाइक के पीछे बैठे लड़के पर लगी और वह अस्‍पताल में इलाज के दौरान मर गया। ऐसे में पुलिस पर आरोप लगाना कि उसने गोली क्‍यों चलाई बड़ा ही अजीब प्रश्‍न है। और इसके लिए पुलिस के विरुद्ध जिलाधिकारी को जांच के आदेश देना यह भी उतनी ही अजीब बात है। इस ऊहापोह में सरकारी सामाजिक उत्‍तरदायित्‍व का पूर्णाभाव साफ दिखाई देता है। जब पिछले कई दिनों से दिल्‍ली प्रशासन, पुलिस और जनता बाइकर्स के आधी रात को किए जानेवाले आतंक से परेशान हैं और इन हालातों में बाइक गैंग को घेरकर उनके खिलाफ कार्रवाई करने में किसी बाइकर्स की मौत हो भी जाती है तो इसमें बजाय पुलिस को उनके काम के लिए प्रोत्‍साहित करने के मीडिया, सरकार, प्रशासन उलटे पुलिस को ही कोसने लगते हैं। क्‍या ऐसे में समाज के जिम्‍मेदार वर्ग द्वारा दिल्‍ली सरकार और बाइकर्स गिरोह के घरवालों से प्रश्‍न नहीं किए जाने चाहिए कि आधी रात के बाद जवान लड़के बाइक लेके कहां और किस काम के लिए घूम रहे हैं? क्‍या जवान लड़कों का आधी रात के बाद सड़कों पर ऐसी गुंडागर्दी करना किसी सभ्‍य समाज, परिवार, समाज के लक्षण हैं? क्‍या यही वह भारत निर्माण है, जिसके नारे कांग्रेस उछाल रही है? और सबसे बड़ा प्रश्‍न यह है कि देश की राजधानी के संभ्रान्‍त क्षेत्रों में जब ये विकराल अव्‍यवस्‍था है तो दूर-दराज के इलाकों की व्‍यवस्‍था क्‍या होगी इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं होगा।
     दूसरी घटना में ग्रेटर नोएडा, सदर की एसडीएम दुर्गाशक्ति नागपाल को उत्‍तर प्रदेश शासन ने सिर्फ इसलिए निलंबित कर दिया कि उन्‍होंने सरकारी भूमि पर अवैध तरीके से हो रहे धार्मिक स्‍थल निर्माण को तुड़वा दिया। यमुना खादर और हिंडन नदी के तटों से अवैध रुप से रेत के खनन के विरुद्ध भी दुर्गाशक्ति ने कानूनी प्रक्रिया से र्कारवाई की थी। परिणामस्‍वरुप नेताओं के रिश्‍तेदार, खनन माफियाओं को उनके रहते-रहते अवैध कारगुजारियों को करने में दिक्‍कत हो रही थी। उन्‍हें सज्‍जनता और निष्‍ठा से सरकारी सेवा करने का फल अपने सेवा निलंबन के रुप में प्राप्‍त हुआ। 
     ऐसे में प्रश्‍न उठता है कि देश का कोई भी सरकारी कर्मचारी यदि ईमानदारी, निष्‍ठा से अपने कर्तव्‍यों का निर्वाह करता है तो क्‍या सर्वोच्‍च शासन व्‍यवस्‍था उसे इसके लिए प्रोत्‍साहित करेगी या उलटे उसके विरुद्ध ही दण्‍डात्‍मक कार्यवाही करेगी! और ऐसे में कोई भी राजकीय सेवक अपने कार्य को ईमानदारी से करने के लिए कैसे प्रेरित होगा जब उसे अच्‍छे, सच्‍चे बने रहने के दुष्‍परिणाम झेलने पड़ें! 
     अन्‍ना हजारे, अरविंद केजरीवाल जैसे अनेक समाज सेवी इस समय कहां हैं? इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शन के बैनर तले जिस मुहिम को वे आगे बढ़ा रहे थे यानि कि सरकारी क्षेत्र के भ्रष्‍टाचार को मिटाने के लिए जिस तैयारी के साथ उनका आंदोलन चला था, देश-विदेश भ्रष्‍टाचार के विरुद्ध कुछ समय के लिए एकजुट हो गया था और उस एकजुटता की आंच में उन्‍होंने आंदोलन में शामिल सभी लोगों को कसम दिलवाई थी कि भ्रष्‍टाचार का साथ नहीं देंगे, तो अब इस समय जब कुछ सरकारी सेवक अपनी ईमानदारी के कारण और भ्रष्‍टाचार के खिलाफ लड़ने के चलते शासकीय तौर पर गुनाहगार ठहराए जा रहे हैं, सेवा निलंबन झेल रहे हैं तो ऐसे में इंडिया अंगेस्‍ट करप्‍शन के कार्यकर्ताओं को उनके साथ खड़े रहना चाहिए। लेकिन अभी तक तो ऐसा न कुछ सुनाई दे रहा है और ना ही इस पर कहीं कोई सुगबुगाहट ही हो रही है।


Sunday, July 28, 2013

नयन बेचारे


धुन्‍ध नहीं कोहरा भी है अविद्यमान
चमकती वर्षा बूंदें गिर रहीं अविराम
जलबूंदों के असंख्‍य हार
आकाश का धरती को उपहार
नदियां नाले नहर पोखर तालाब
बरस चुके जल से लबालब
इन्‍द्रधनुष का आकर्षण
रंग-बिरंगा ये जलतरंग
इसे देख गांववासियों का कहना
दो-एक दिन अब न होगा बरसना
गाढ़े श्‍वेत प्रशांत घनदल रहे भटक
फिरते यहां-वहां जाते पानी के तलहट
बरसा बिखरा ठहरा बहता जल लेकर
पुन: लौट आते अम्‍बर में अपने घर
नीलनभ के पदचिन्‍ह बनकर
घन बैठे रंगपट्टियों से सजकर
रात इधर धरती पर
घनहीन व्‍योम है ऊपर
जुगुनू टिमटिमाते धरती के इधर
पुष्‍प व्‍योम का चन्‍द्रमा उधर
उसके साथ चमचम करते तारे
मैं बेकल आकाश देखते नयन बेचारे



                          

Saturday, July 27, 2013

व्‍यक्तित्‍व आधार कार्य, पूजा शैलियां


प्रा: हमें हमारे व्‍यक्तित्‍व की पहचान हमारे कार्यों से होने के संकेतक वाक्‍य-युग्‍म यहां-वहां लगे दिखाई देते हैं। ये हमें बताते हैं कि हमारा व्‍यक्तित्‍व शरीर-सज्‍जा से नहीं अपितु कार्य निष्‍पादन की हमारी निष्‍ठा एवं शैली से प्रदर्शित होता है। हालांकि इधर-उधर लगी ये पहचान उक्तियां साधारण व्‍यक्ति द्वारा उद्धृत नहीं होतीं। ये आदि सन्‍त महात्‍माओं के जीवन के गूढ़ ज्ञान की धारणाओं से प्रस्‍फुटित हो हो कर युग-विचरण करती हुईं हमारे जीवनकाल का भी मार्गदर्शन कर रही हैं। धन्‍य हैं वे लोग, संत, महात्‍माएं जो मानव जीवनकाल के लिए ऐसे संस्‍कार प्रसारित कर गए। जिनका अनुसरण न हो तो जग-जीवन निरर्थक प्रतीत होता है।
      अकसर हम कोई भी कार्य करते हैं तो कार्य-निष्‍पादन के दो अनुभवों से गुजरते हैं। या तो हमारी ये लालसा होती है कि हमें कार्य करते हुए कुछ सहकर्मी देखें। साथ ही वे हमारी कर्मगति पर कोई सकारात्‍मक टिप्‍पणी करें। या हम अपने कार्य में इतने तल्‍लीन हो जाएं कि अपने चहुंओर का आभास ही न रहे। कार्य-निष्‍पादन के ये दो प्रकार हमारे कार्यों की दो अलग व्‍यवस्‍था बनाते हैं। प्रथम मार्ग हमें कार्य-दायित्‍व के बनिस्‍पत कार्याभिनय हेतु उकसाता है। द्वितीय कार्य प्रकार कार्य-दायित्‍व के साथ-साथ कार्य के इष्‍टतम निष्‍पादन में भी सहायक होता है। इस प्रकार कार्य करते समय जो दो नकारात्‍मक और सकारात्‍मक स्थितियां कार्यकर्ता द्वारा उत्‍पन्‍न की जाती हैं, वे दो विपरीत व्‍यक्तियों को उनके कार्यों के माध्‍यम से परिभाषित करती हैं।
      पूजा-अर्चना, ईशभक्ति कार्य के भी दो अनुभवों से भी हमारा प्राय: साक्षात्‍कार होता है। एक व्‍यक्ति ईश्‍वर-उपासना अपने जीवन की सुरक्षा, मृत्‍यु-भय के वशीभूत हो करता है तो दूसरा ईश भक्ति में इतना रहस्‍यंभावी, एकाकार होता है मानो वह ईश्‍वरीय प्रत्‍युत्‍तर, प्रतिलाभ, प्रतिमान का आशय ही नहीं समझता। निश्चित रुप से भगवान के प्रति ऐसी आस्‍था से एक ऐसा भाव घनीभूत होता है, जिसमें चमत्‍कृत भगवतानुभव व्‍यावहारिकता धारण करने लगता है। निस्‍वार्थ रहस्‍यात्‍मक लगन से परमात्‍मा पूजन के विरोधाभास, नास्तिक अवरोध भी स्‍वत: हट जाते हैं। यह दशा-दिशा संसार के लिए अत्‍यन्‍त कल्‍याणकारी सिद्ध होती है। अर्थात् प्रभु भक्ति की निष्‍कपट शैली से भी किसी के व्‍यक्तित्‍व का एक दैवसम आरुप प्रकट हो सकता है। 




Friday, July 26, 2013

सूचना का आरक्षण


क्‍टूबर 2012 में केन्‍द्रीय सूचना आयुक्‍तों के सम्‍मेलन में प्रधानमन्‍त्री ने निजता हनन न होने देने की शर्त पर सूचना का अधिकार कानून का परिसीमन करने पर जोर दिया था। तमाम विरोधों के बाद सरकार का यह विचार अकार्यान्वित ही रहा। इस प्रकार एक जन हथियार को अपने हाथ का खिलौना बनाने को आतुर सरकार ने सोचा होगा कि चलो इसके तहत मिलने वाली जानकारियां खासकर घोटालों के विवरण ही तो लोग जान पाएंगे। उनका कुछ बिगड़ेगा थोड़े ही। क्‍योंकि सूचना अधिकार में सूचना प्राप्‍त करनेवाला उसके बाद कुछ नहीं कर सकता। जन लोकपाल इसमें कुछ कर सकता था। लेकिन भारतीय मानसपटल से उसे ऐसे भुलवा दिया गया है, जैसे उसके बाबत देश में कुछ हुआ ही नहीं।
सूचना के अधिकार का परिसीमन नहीं कर पाई सरकार को इस कानून से परेशानी ये हो रही है कि उसके द्वारा किए गए, किए जा रहे घोटालों के साक्ष्‍य सहित विवरण उघड़-उघड़ के सामने आ रहे हैं। हालांकि सूचना के अधिकार से मात्र घोटालों के विवरण, उनको करनेवालों के नाम ही तो सामने आते हैं। घोटालेबाजों को कोई सजा या दण्‍ड कहां मिल रहा है। लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए सरकारी चिंता अपनी छवि चमकाने पर केन्द्रित हो गई है। इस‍के लिए वह चाहती है कि उसके शासन में किए गए और अभी तक ढके हुए घोटाले अब जनता के सामने न आएं। और जिस कारण ये प्रकट हो रहे हैं उस कानून के परिसीमन करने का उनका विचार विशेषज्ञों द्वारा समझाए जाने पर उन्‍हें यथोचित नहीं लगता। इसलिए अब इस कानून को किसी और माध्‍यम से ऐसे कुन्‍द कर दिया जाए कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे कहावत की तर्ज पर इसे लागू भी रहने दिया जाए तथा इसमें एक ऐसा प्रावधान जोड़ दिया जाए कि सरकार अपने को इसके परिसीमन से ही हटा दे।
परिणामस्‍वरुप राजनीतिक दल अपने को सूचना के अधिकार से बाहर रखने की छूट की मांग कर रहे हैं। मतलब लोकतन्‍त्र के नाम पर दलाली, ठगी की जिन सरकारी कारगुजारियों को जनता के सामने लाने के लिए सूचना का अधिकार कानून अस्तित्‍व में आया, अब सरकारी लोग ही खुद इससे बाहर रहने की मांग कर रहे हैं। सरकार की ओर से यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब राजनीतिक दल केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के उस आदेश पर आपत्ति जता रहे हैं जिसमें उन्‍हें सार्वजनिक प्राधिकार परिभाषित कर आरटीआई के तहत उत्‍तरदायी बनाया गया है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब व्‍यक्त्‍िा से लेकर अलग-अलग तरह के सरकारी और गैर-सरकारी संगठन आरटीआई अधिनियम की विभिन्‍न धाराओं के अन्‍तर्गत आ सकते हैं तो इन सब पर शासन करनेवाली कार्यपालिका में शामिल राजनीतिक दल इसमें शामिल क्‍यों न हों। आखिर वे भी तो उन लोगों, संगठनों का ही प्रतिनिधित्‍व कर रहे हैं जो आरटीआई के तहत आते हैं। तो क्‍या प्रतिनिधियों को देश के प्रति उन दायित्‍वों का निर्वाह नहीं करना चाहिए जो आम जनता करती है।
इससे बड़ी बिडंबना क्‍या होगी कि आज लोगों के लिए स्‍थापित तन्‍त्र अपने लिए ही समर्पित, केन्द्रित हो चुका है। लोगों के पास संविधान, विभिन्‍न सरकारी अधिनियमों को समझने के लिए हजारों साल का जीवन होना चाहिए। तब ही वे इन्‍हें समझ पाएंगे। विधायिका, न्‍यायपालिका में अधिनियमों के जो नित नए अध्‍याय लिखे, बनाए जा रहे हैं उनकी व्‍यावहारिकता कितनी उपयोगी है यह खुद उन्‍हीं से पूछा जाए तो वे भी बगलें झांकने लगेंगे। तब क्‍यूं इन उलझाऊ नियमों-विनियमों का सृजन किया जा रहा है और जिनके लिए जिन गरीबों, मध्‍यमवर्गीय लोगों के लिए इन्‍हें बनाया जा रहा है, वे कब अपनी शोषित दिनचर्या से फुर्सत पाते हैं, जो इन्‍हें समझ सकें। सरकार को इन जनविरोधी नियमों नीतियों के लिए लताड़ सकें। लोकतन्‍त्र की सैद्धांतिक व्‍याख्‍या से गरीब का जीवन नहीं सुधरेगा। इसे व्‍यवहार में ऐसे फलित करना होगा कि जो सुविधाएं तन्‍त्रचालक भोग रहे हैं, वे सबसे पहले जनता को मुहैया हों। लेकिन यहां सुविधाएं मिलने की बात तो बहुत दूर है, राजनीतिज्ञ तो इस कुप्रयास में लगे हैं कि जनता को उनके घपले-घोटालों, अवैध लेनदेनों की कोई जानकारी ही न मिल सके। इसीलिए अब उन्‍होंने सूचना का अधिकार को पंगु बनाने का नया दांव खेला है। इसलिए एक तरह से वे खुद को सूचना के आरक्षण में रखना चाहते हैं।
सोमवार 19 अगस्‍त 2013 को जनसत्‍ता में 

Wednesday, July 17, 2013

समस्‍याओं की समिति



रेन्‍द्र मोदी द्वारा कांग्रेस की नीतियों पर किए गए कटाक्ष के उत्‍तर में दो दिन पहले ही अजय माकन ने कहा था कि देशभर में घूम-घूम कर युवाओं को व्‍याख्‍यान देनेवाले मोदी ने पिछले ग्‍यारह सालों से गुजरात के मुख्‍यमंत्री रहते हुए अपने लोगों के लिए किया ही क्‍या है। माकन का आरोप है कि गुजरात मिड डे मील योजना का क्रियान्‍वयन करने में राज्‍यों की सूची में नीचे से तीसरी श्रेणी में है। क्‍या माकन का आशय यह है कि मिड डे मील के नाम पर बच्‍चों को जहर खिलाकर मारा जाए। और तब इसके क्रियान्‍वयन में बिहार की तरह सूची में ऊपर बने रहने की कोशिश की जाए। मिड डे मील के नाम पर दी जा रही ऐसी सेवा का क्‍या करना जो बच्‍चों को खाने के नाम पर मौत दे रही हो। फिर गुजरात में संभ्रान्‍त परिवार इकाइयां ज्‍यादा हैं इसलिए वहां ऐसी किसी योजना की उतनी आवश्‍यकता नहीं है, जितनी कि अन्‍य राज्‍यों खासकर कांग्रेस शासित राज्‍यों में है। मिड डे मील, मनरेगा, खाद्य सुरक्षा जैसी योजनाएं किसी लोकतन्‍त्र में लोगों की सेवा उद्देश्‍य से कम और आयातित जनसंख्‍या, अनियन्त्रित अविवेकी जनसंख्‍या को भीख स्‍वरुप दान देने की तुच्‍छ इच्‍छा से ज्‍यादा पोषित हैं। इन योजनाओं का एकमात्र लक्ष्‍य मत विस्‍तार करना ही है।
     लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था के नाम पर व्‍याप्‍त मकड़जाल से दुखी होकर किसी महाशय ने कभी एक चुटुकुला लिखा था। इसमें एक व्‍यक्ति दूसरे से पूछता है कि भारत में अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने और इनका नियंत्रण व नियोजन करने के लिए कुल कितनी समितियां हैं। दूसरे व्‍यक्ति ने तपाक से कहा कि इसकी जांच के लिए भी एक समिति गठित कर ली जाए। आशय कहना का ये है कि देश में खरपतवार की तरह फैली समस्‍याओं का हल उतनी तेजी से नहीं हो पाता या कहें कि होता ही नहीं है, जितनी तीव्रता से इनकी छानबीन के लिए समितियां बना ली जाती हैं। जनहित याचिकाओं पर संज्ञान लेकर उच्‍च या सर्वोच्‍च न्‍यायालय के न्‍यायाधीश समस्‍याएं सुनकर सम्‍बन्धित उत्‍तरदायी मंत्रालयों, संस्‍थानों और विभागों को आदेश तो दे देते हैं कि वे इनका हल करें। परन्‍तु सन्‍दर्भित समस्‍या का समाधान हमेशा भविष्‍य की ओट में सिमट जाता है।
    बोफोर्स तोप लेनदेन में हुई हेराफेरी की समस्‍या सालों से टालमटोल में ही रही। इसके दोषी की मौत हो जाने के बाद शायद यह अध्‍याय अब हमेशा के लिए बन्‍द हो जाएगा। भोपाल गैस कांड के आरोपियों को भी सत्‍ताधारियों ने मिलकर सुरक्षित बचा लिया था। इस समस्‍या का समाधान भी न हो सका। चारा घोटाले के आरोपी को न्‍यायालयों से एक प्रकार का समर्थन ही मिल रहा है। दिल्‍ली वसंत विहार बलात्‍कार पीड़िता की हत्‍या के बाद बनाई गई सुझाव समिति के कार्यवाहक अध्‍यक्ष न्‍यायाधीश वर्मा का निधन हो गया पर दोषियों को अभी तक दण्‍ड नहीं मिला। न जाने कितने कलंक हैं जिनके काले धब्‍बे मिटे बिना ही वे इतिहास बन जाएंगे। और अब वैज्ञानिक कुडनकुलम परमाणु संयंत्र के परिचालन पर खुशी बांट रहे हैं। इसके विरोध में हुए अनेक प्रदर्शनों और प्रदर्शनकारियों की इसे न लगाने की इच्‍छा के बावजूद सरकारी मंशा किसी भी कीमत पर या कहें अमेरिकी इच्‍छानुसार इसे स्‍थापित करने की ही थी। अपना लाभार्जन करने के बाद सरकार और उसका मार्गदर्शक अमेरिका कुछ समय तक ही इसका परिरक्षण कर पाएगा। और बाद में इसके नुकसान, नकारात्‍मक परिणाम तो स्‍थानीय जनता को ही झेलने पड़ेंगे।
     बड़े विनाश, केदारनाथ में हुई अनहोनी में हजारों मर गए। लाखों का भविष्‍य अन्‍धेरे में पड़ गया है। लेकिन विनाश के क्षेत्र से केवल 400 किलोमीटर दूर स्थित देश की राजधानी, केन्‍द्र सरकार पर इसका कोई असर नहीं है। दुख है कि असमय मौत के मुंह में समाए हजारों लोगों, लाखों पीड़ितों के लिए ना तो देशवासियों में और ना ही केन्‍द्रीय नेतृत्‍वकर्ताओं में कोई ऐसी वेदना व्‍याप्‍त हुई, जिससे अनहोनी के बाद सच्‍चे राष्‍ट्रीय ढांढस का अनुभव होता। एक महीना भी नहीं बीता कि आपदा से कार्यपालिका, विधायिका, न्‍यायपालिका, प्रेस सब का मोहभंग हो गया है। इसके विपरीत सब का ध्‍यान केवल एक महिला और उसे क्‍यों मारा गया जैसे विषय पर आकर टिक गया। नेतामंडलियां तो किसी भी समस्‍या के लिए कोई स्‍थायी और त्‍वरित हल ढूंढने के बनिस्‍पत आरोप-प्रत्‍यारोप में समय व्‍यर्थ कर रही हैं।
     ऐसे में लोगों की सहायता करने के लिए उनकी दृष्टि में सम्‍मानपूर्वक बस चुकी भारतीय सेना में यानि कि रक्षा क्षेत्र में 26 प्रतिशत प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश सीमा में कोई परिवर्तन नहीं करने का रक्षा मंत्री एंटनी का निर्णय सराहनीय है। रक्षा उत्‍पादन क्षेत्र में छब्‍बीस प्रतिशत से अधिक सीमा की एफडीआई पर मंत्रिमंडल की रक्षा समिति के पास विचार करने का अधिकार रखना एक प्रकार से देशहित में है। अन्‍य क्षेत्रों में भी एफडीआई की सीमा को तिहाई से अधिक नहीं रखा जाना चाहिए।   
         


Tuesday, July 16, 2013

पांचतत्विक मुक्तिमार्ग


श्रावण आने में कुछ दिन बाकी हैं। आषाड़ का उत्‍तरार्ध कितना उर्वशी है! शनिवार को हरिद्वार जाने के लिए सुबह पौने सात बजे प्रस्‍थान किया। पिछली रात अनिद्रा में व्‍यतीत हुई। मन में था कि सुबह नींद से जगने पर लक्षित यात्रा के लिए तैयार होना कष्‍टकारी होगा। विशेषकर जब से यात्रा उद्देश्‍य मन-मस्तिष्‍क में प्रतिध्‍वनित होना शुरु हुआ तब ही से यात्रा की, उद्देश्‍य पूर्ण होने की चिंता भी वहां पसर गई थी। इसी भावनात्‍मक समीकरण में शुक्रवार की रात गुजरी कि यात्रा और इसका उद्देश्‍य कैसे पूरा होगा। लेटे-लेटे पश्चिम दिशा में विद्यमान खिड़की से आसमान के एकमात्र झिलमिलाते तारे, इसकी रश्मियां देखता रहा। तारा कितना विचित्र है, कितनी दूर है और किसी को नींद से संघर्ष करने के दौरान कितनी आत्‍मशांति प्रदान कर रहा है, ये सोचकर अनायास ही यादों की गतिमान धुन्‍ध से कितने ही जाने-अनजाने मुखचित्र झांकने लगे। हृदय बेकल हुआ, शरीर में झिरझिरी व्‍याप्‍त हुई और आंखों के पोर अश्रुबूंदों से भीग गए। कल्‍पनालीला रुकी तो स्‍वयं को पुन: जीवन की वास्‍तविकता, कठोरता में पाया। करवट बदलकर सुबह की प्रतीक्षा करने लगा।
      दिल्‍ली हरिद्वार राजमार्ग पर दौड़ते चौपहिया वाहन में बैठा मैं मार्ग के दोनों ओर की हरिभूमि, हरे वृक्षों, दूर क्षितिज पर ढलके नीलनभ और ऊंचे पेड़ों की हरियाली का समागम देखकर मोहित होता रहा। आषाड़-श्रावण के मिलन के लिए व्‍याकुल मौसम की तैयारियां देखकर हर्षातिरेक मेरे अन्‍दर कुलांचे मारने लगा। निर्मल धुले आकाश पर कहीं-कहीं श्‍वेत, रंगीन घनचित्र उभरे हुए थे। थकान मिटाने के लिए रुड़की शहर की सीमा पर स्थित एक ढाबे में कुछ देर विश्राम किया। प्रखर सूर्य प्रकाश होने के बाद भी ढाबे की छप्‍पर के नीचे कितनी शीतल मृदुल हवा चल रही थी। एक वयोवृद्ध कांवड़िया भी हमारे पास बैठकर ही भोजन कर रहा था। शायद वह प्रकृति के लिए चौकस मेरी दृष्टि भांप गया था। इसीलिए सदाशयता से अपने और अपनी यात्रा के बारे में बात करने लगा। वृद्ध होने के उपरान्‍त भी उसका हृष्टपुष्‍ट शरीर, जीवटता देखकर प्रेरणा मिली।
      दोपहर साढ़े बारह बजे हरिद्वार पहुंचे। श्री केदारनाथ की अनहोनी के बाद पर्यटकों, तीर्थयात्रियों का आवागमन बहुत कम हो गया है। इसीलिए हर की पैड़ी खाली ही दिखी। मंशा देवी और चण्‍डी देवी मन्दिरों में भी बहुत कम लोग नजर आए। गंगा नदी के तट पर स्थित भीमगौड़ा खड़खड़ी श्‍मशान घाट पहुंचे तो गांव से मृत शरीर को लानेवालों के पहुंचने की प्रतीक्षा करने लगे। थोड़ी ही देर में शव लेकर लोग पहुंच गए। सिर की तरफ से शव को कंधा लगाते ही रुआंसा हो गया। अपने जैसा यदि कोई दिखता तो निश्चित रुप से आसुंओं पर नियन्‍त्रण नहीं रख सकता था। लेकिन शवयात्रा में सम्मिलित सभी लोग मुझे श्‍मशान के विराग, बेगानेपन की तरह ही नजर आए। इसलिए गुजरे मनुष्‍य के लिए, उसकी भावनाओं के सम्‍मान में मन में एकत्रित लगाव आंसुओं, उदासी में परिणत होने से पूर्व ही स्थिर बन गया। अंत:करण में अपनी संवेदनाओं की प्रतिछाया देखी और उससे लिपटकर दहाड़ें मार रोने लगा।
      पांच-छह चिताएं पहले से ही जल रही थीं। उनसे हटकर किनारे बांई ओर चिता तैयार की गई। तेज हवा के कारण दूसरी चिताओं से आनेवाली तपन, जल चुके अवशेषों के कण पलभर भी वहां खड़ा नहीं होने देते थे। फिर दोपहर के एक बज चुके थे और गांव से शव लेकर आनेवालों को अन्तिम संस्‍कार करके वापस भी तो जाना था। इसलिए दूसरी चिताओं के पूरी तरह बुझने तक का इंतजार करना ठीक नहीं था। चिता को अग्नि दी गई। दो दिन पहले तक जीवन-जंजालों से विचलित मनुष्‍य प्रशांत, प्रस्थिर सा धधकती आग के बीच लेटा हुआ था। चिता की पृष्‍ठभूमि में मटियाले रंग में सरसराती, बहती गंगा नदी से मूक संवाद करने का निरर्थक प्रयत्‍न किया। वह तो जैसे मनुष्‍य नाम के प्राणी से खिन्‍न-भिन्‍न, उसकी ओर देखने तक की इच्‍छा नहीं रखती थी। नीले आसमान ने श्‍वेत बादलों के छोटे-छोटे सुन्‍दर वस्‍त्र धारण किए हुए थे।
     आकाश-वायु, पृथ्‍वी-जल के बीच अग्नि में अर्थात् पंचतत्‍व में विलीन होने का तात्‍पर्य यदि सभी समझ पाते तो कोई समस्‍या ही न होती। हमारा शरीर जिन पांच तत्‍वों से निर्मित है, जिनके प्रति हमें कृतज्ञता प्रदर्शित करनी चाहिए, हमने उनका ही तिरस्‍कार किया। धरती बिगाड़ी, जल दूषित किया। परिणामत: आकाश और हवा का स्‍वभाव बिगड़ा और मानव जीवन श्री केदारनाथ में हुई अनहोनी जैसी विनाशलीला के रुप में अपनी प्रस्‍तावना लिखवा चुका है। यदि पंचतत्‍वों के प्रति आस्‍थागत रहकर इन्‍हें प्रकृतिवत रहने दिया जाएगा तो ही विनाशलीला की कहानी रुक सकेगी। जगत जीवन का कल्‍याण हो सकेगा।
     हरिद्वार से लौटते समय दिन-रात के संगम का विहंगम दृश्‍य व्‍याप्‍त था। दांई ओर का रक्‍ताभ हुआ अम्‍बर अंश स्‍वप्‍न कल्‍पनाओं जैसा लगता रहा। उस पर अस्‍त होने से पूर्व गोल सूर्य के रंगाकर्षण परालौकिक प्रतीत होते थे। सुदूर दिखती धरती की सीमा पर खड़े लम्‍बे, ऊंचे वृक्षों से छन-छन कर आती सूर्य किरणें शायद नहीं जानती थीं कि बांई तरफ का नभ रात की कालिमा ओढ़ चुका है। बांई ओर खड़े पेड़ और हरेभरे खेत सहमे, डरे, चुप्‍पी साधे दया के पात्र बने हुए थे। तारकोल की काली सड़क जिस पर हमारा चौपहिया चल रहा था वो भी रात के सिद्धांत पर अडिग थी। जैसे कह रही थी कि डूबते सूरज और उसकी भ्रमव्‍यापी सुन्‍दरता मत देखो। मन ने दोनों में से एक को चुनने की बात पर भोलीभाली, असहाय प्‍यारी रात का चुनाव किया। विलीन होते समय सूरज कैसे दिख रहा है इस भाव को भूल मैं तब तक राजमार्ग के बांए हिस्‍से की स्‍याह सीधी सन्‍ध्‍या को निहारता रहा जब तक कि धरती पूरी तरह से निशालीन नहीं हो गई।
      अन्तिम क्षणों में दादीजी पता नहीं पिताजी के समक्ष कुछ इच्‍छा प्रकट कर पाई थी या नहीं लेकिन उनके दाहसंस्‍कार से लेकर अस्थि विसर्जन तक की प्रक्रिया में मुझे लगा जैसे पांचतत्विक हो वे कह रहीं थीं बेटा मुझे मुक्ति मिल गई है।

शुक्रवार १२.०७.२०१३ शाम को दादीजी के निधन की खबर सुनकर शुक्रवार १२.०७.२०१३ रात से लेकर शनिवार १३.०७.२०१३ दिनभर तक का संस्‍मरण।   

Friday, July 12, 2013

मौत की ठोकर मनुष्‍य जोकर


वीरवार शाम साढ़े तीन बजे मित्र का फोन आया कि दिनेश के पिताजी की हत्‍या हो गई है। कह रहा था कि तेरे कार्यालय के बगल में मॉडर्न स्कूल के मुख्‍य गेट पर रात्रि ग्‍यारह बजे उन्‍हें अपने चौपहिए में मृत पाया गया। इंदिरापुरम स्थित घर पहुंचने में देर होने पर परिवारीजनों ने उनकी खोजखबर शरु की और छोटे बेटे ने नोएडा सेक्‍टर-11 के पास स्‍कूल के सामने उन्‍हें रक्‍त से सना बेहोश पाया। उन्‍हें पास के मेट्रो अस्‍पताल ले जाया गया। जहां चिकित्‍सकों ने उन्‍हें मृत घोषित कर दिया। नोएडा सेक्‍टर-8 स्थित प्रसिद्ध चिपचाप होटल के प्रबन्‍धक मित्र के पिताजी पिछले बीस सालों से यहां काम रहे थे।
    सेक्‍टर-94 स्थित श्‍मशान घाट से जब मित्र का फोन आया कि हम सब यहीं पर हैं तो मैं कार्यालय में अकेला था। साथी की तबियत खराब थी। वह नहीं आया था। सोचा कि ये लोग पहले तो रात को, नहीं तो कम से कम सुबह तक तो मुझे बता ही सकते थे कि ऐसी दुर्घटना हुई है। लेकिन फिर  सोचा कि ये सारी मस्तिष्‍क उलझन बेकार है। इससे मृत व्‍यक्ति वापस तो नहीं आएगा।
      जिस मित्र ने मुझे फोन किया था उससे आखिरी बार उसके विवाह में ही भेंट हुई थी। वह मुझसे आधा किलोमीटर दूर ही रहता है। पर विवाहोपरान्‍त मिलना तो दूर फोन या किसी अन्‍य संचार माध्‍यम से सम्‍पर्क भी हमारे बीच नहीं है। जिस मित्र के पिताजी की हत्‍या हुई उससे तो सालों से किसी भी प्रकार का सम्‍पर्क नहीं है। नोएडा से इंदिरापुरम भी कितनी दूर है, लेकिन उससे भी मिलना नहीं हो सका। ये है इस शहर में रहते मित्रों की कहानी। जो मित्र एक दूसरे के बिना नहीं रह सकते थे, एकदूजे को कोई बात बताए बिना पानी पीने तक की बात भी भूल जाते थे, उनसे आज गाहेबगाहे, वो भी जब कोई दुर्घटना हो, तब ही सम्‍पर्क हो पा रहा है। मैं इसके लिए स्‍वयं या अपने दोस्‍तों को दोषी नहीं मानता। यह सब इसलिए है क्‍योंकि जो भी जहां भी काम करता है या रहता है वह वहां की प्रत्‍यक्ष विसंगतियों से या स्‍वयं उनका हिस्‍सा बन कर इतना टूटाटूटा, अविवेकी हो गया है कि उसके लिए घर से कार्यालय और कार्यालय से घर का लक्ष्‍य ही शेष बचा है। घर भी उनके लिए प्रतिदिन के खानपान सहित अन्‍य भौतिक जरुरतों का अड्डा मात्र बन कर रह गया है। सम्‍बन्‍धीगणों से स्‍वाभाविक रागानुराग का निरन्‍तर क्षय हो रहा है।
     जो भी हो मुझ जैसे जीवित व्‍यक्ति को यहां-वहां दुनियाभर में जब किसी की मृत्‍यु की सूचना प्राप्‍त होती है तो मैं मौत के दर्शन में विलीन हो जाता हूँ। मेरे मन में पीड़ित की मृत्‍युपूर्व भावनाएं, उसके सम्‍बन्धियों की आगामी जीवन समस्‍याएं विचित्र पीड़ा उत्‍पन्‍न करने लगती हैं। लेकिन दूसरे ही क्षण दुनिया में मानव की तुच्‍छ स्थिति के दर्शन पर विचार करते ही मैं भी गुजर चुके व्‍यक्ति, समय को अनदेखा करता हुआ अपने आज में स्थिर हो जाता हूँ।  
          सोचा कि उत्‍तराखण्‍ड में हजारों की संख्‍या में मारे गए व पांचपांच दसदस कर रोज मर रहे, दुनिया में इधरउधर धरना-प्रदर्शन, सेनायुद्ध, आंतक, बलात्‍कार, लूटपाट, परस्‍पर विवादों के परिणामस्‍वरुप अनेक लोग मर रहे हैं तो दिनेश के पिताजी के नहीं रहने से क्‍या फर्क पड़ता है। इस दुर्घटना से पहले मेरे पास उनके जीवन का क्‍या आभास था। कुछ भी तो नहीं। मुझे तो याद भी नहीं था कि दिनेश, उसके पिताजी भी यहीं कहीं इसी शहर की दौड़ में सम्मिलित हैं। तो फिर  उनके स्‍थायी रुप से नहीं रहने के अनुभव से मैं इतनी पीड़ा क्‍यों प्राप्‍त करुं और करुं भी तो किस आधार पर। जब उनसे कोई सम्‍पर्क ही नहीं था तो उनके लिए दुखी होने का मेरे पास कोई अधिकार भी नहीं है।
         आज समझ आया कि रुपएपैसों, सामाजिक हैसियत की भूख नेताओं और अधिकारियों में क्‍यों रहती है। यह विचार भी कौंधा कि सज्‍जन आम आदमी बन कर कुत्‍तों की मौत मरने से तो लाख अच्‍छा है कि बेईमान नेता, अधिकारी बना जाए। क्‍योंकि उनके यानि कि नेताओं, अधिकारियों को इतनी सुरक्षा-सुविधा मिलती ही है कि उन्‍हें ऐसे ही कोई सड़क चलते नहीं मार सकता। सबसे बढ़ कर जो बात है वो ये कि हम अच्‍छे हैं या बुरे यह अहसास हमारे जीवित रहतेरहते ही है। अच्‍छा आदमी अच्‍छा होकर भी यदि बेमौत मर जाता है तो उससे बेहतर यह है कि बुरे बन कर जीवन में उपस्थित रहा जाए। क्‍योंकि जीवन के रहतेरहते ही तो अच्‍छेबुरे के तराने हैं। मृत्‍यु के बाद मनुष्‍य का क्‍या होता होगा, इस तक किसी की पहुंच नहीं है। लेकिन मुझे अभी तो यही लगता है कि मौत की ठोकर पर जोकर बन कर हम पता नहीं कहां जाकर गिरेंगे।  


Monday, July 8, 2013

जो मैं न बन सका


न् 2000 की बरसात का समय। कई सालों से शरीर को वज्र बनाने की इच्‍छा के चलते इस वक्‍त दण्‍डबैठक कर रहा हूँ। बारिश से गीले गांव के मैदान में दण्‍डबैठक करने की गिनती जब 350 तक पहुंची तो आधी भुजाएं मैदान के अन्‍दर धंस चुकी हैं। मन के अन्‍दर धधकते सामाजिक विसंगति प्रभाव में शरीर कठिनतम व्‍यायाम द्वारा अच्‍छी तरह तप जाना चाहता है। पसीने और वर्षा की रिमझिम बूंदों से तरबतर पूरे तन में बल प्रवाह हो रहा है। अपने से छोटे लड़कों से कह कर अब अपनी जांघों और भुजाओं पर लठ्ठ मार करवा रहा हूँ। उनको सतर्क करता हूँ कि लाठियों का प्रहार कहीं गर्दन, मुँह पर न हो इसका ध्‍यान रखना। व्‍यायाम करते हुए जब ढाई घण्‍टे व्‍यतीत हो गए तो मां ने आवाज लगाई, खाना ठण्डा हो रहा है। पिताजी गुस्‍सा हो रहे हैं। क्‍या जिन्‍दगी भर यही करेगा। हाथ से गुस्‍से का इजहार करते हुए मां को लौट जाने को कह दिया। उस समय खण्‍ड के दौरान अपनी बाजुओं में इतनी शक्ति महसूस होती थी कि शेर की छाती भी फाड़ सकता था। पूरे एक साल घर में रहने के दौरान बीएसआरबी, सिविल सर्विसेज इत्‍यादि परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए पिताजी मेरे पीछे पड़े रहे। मुझे न जाने क्‍यूं लगता था कि जब पूरे देश में अनाचार, अनैतिकता व्‍याप्‍त है तो तब ऐसी किसी शासन सेवा में जाने का क्‍या फायदा, जो ऐसे अनाचार अनैतिकता का पोषण कर रही है। मुझे सरकारी सेवा या प्राइवेट नौकरी करने के नाम पे बहुत चिड़ मचती थी। मेरा सपना था गांव में रह कर खेती किसानी करुँ। जीवन को सच्‍चे अर्थों में जिऊं। किन्‍तु मेरे कसरती व्‍यवहार की तारीफ मेरी मां और दादाजी के अलावा किसी ने नहीं की। क्‍या पता वो कसरती कोशिश आज तक बरकरार रहती तो मैं अपने स्‍वस्‍थ और मजबूत शरीर के साथ कुछ समाज कल्‍याण के कार्य कर रहा होता। अपने अनुसार अपना कायाकल्‍प करता, बनता। जहां तक खाने-रहने की बात है तो वह तो आवारा कुत्‍ते को भी नसीब हो जाता है। फिर मैं तो अपने मां-बाप की औलाद था मुझे घर के बचे-खुचे खाने के टुकड़े डालने में उनका क्‍या बिगड़ जाता! वे मुझे कुत्‍ता समझ के भी खिलाते तो भी मैं उनकी भगवान सरीखी सेवा करता। अच्‍छे सहायक पुत्र के रुप में सदैव उनके चरणों में पड़ा रह कर उनके भावी आदेश की प्रतीक्षा करता। लेकिन नहीं उन्‍हें अपनी, अपने परिवार, मेरी इतनी चिन्‍ता नहीं थी जितनी कि समाज की। कि समाज क्‍या कहेगा। जवान लड़का घर पर क्‍या कर रहा है। पहलवानी के सारे करतब करते हुए, भारी से भारी बोझा ढोते हुए मैं कामना करता कि पिताजी मुझे बधाई देंगे। कहेंगे कि शाबाश बेटे तेरी ताकत देख कर मैं आश्‍चर्यचकित हूँ। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। पिताजी की मुझे देख कर चिढ़ने और दुश्‍मन जैसा बर्ताव करने की आदत ने मुझे अंतत: इस फैसले पर टिका दिया कि बेटे शरीर सौष्‍ठव के तेरे अरमान चुक चुके हैं। अब दिल्‍ली नोएडा जैसे शहरों की ओर कूच करो और नौकरी करके अपने जीवन की ऐसी तैसी करो।
इसलिए अपने वज्र जैसे शरीर को नकली जीवन, खानपान के हवाले करने के लिए मैं बहुत बुझे मन से शहर की ओर चल पड़ा। आज शरीर इतना क्षीण हो चुका है कि कोई तेज आवाज में बात भी करता है तो दिल कांप उठता है। रातें अनिद्रा में व्‍यतीत हो रही हैं। विडंबनापूर्ण नौकरी और नौकरी प्रबन्‍धकों के बचकाने व्‍यवहार पर दिल किलोमीटर तक पछताता है। सोचता है किनके साथ रह कर दिनचर्या गुजार हो रही है।
यह देश, इसके लोग पेशेवर बनने और परंपरा को भी अपनाए रखने के चक्‍कर में कुछ भी प्राप्‍त नहीं कर सके हैं। आज की स्थितियां अत्‍यन्‍त जटिल हैं। जो काम चुटकी बजाते हो सकते हैं उसके लिए भी पूरी फौजदारी की जा रही है। जो चर्चा के विषय नहीं हो सकते वे संसद के पटल पर सालों पड़े रह कर सांसदों की जिज्ञासा बने हुए हैं। खाद्यान, खनिज सम्‍पन्‍न देश चाहता तो अच्छे शासकों के नेतृत्‍व में निश्चित स्‍वर्ग बन चुका होता। लेकिन नहीं जहां आरक्षण पद्धति से ऐसे लोगों को शासकीय पदों पर विराजमान किया जाता हो, जो पद पर बने रह कर आजीवन इसी खुशी में निकाल देते हैं कि हम पदासीन हैं, अधिकार सम्‍पन्‍न हैं तो उनसे उम्‍मीद करना कि वे बहुत कुछ करेंगे वो भी कुछ खास काम करेंगे, बिलकुल बचकाना है। ऐसे लोग बचकानी हरकतों के तानेबाने में ही सारा समय निकाले दे रहे हैं। अच्छे लोग पगलाए से, कुण्ठित होकर घूम रहे हैं। उनसे समाज ऐसे बर्ताव करता है जैसे वे जीवन की अआइई भी नहीं जानते।
     शिक्षा व्‍यवस्‍था पूर्ण रुप से चौपट हो गई है। दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में स्‍नातक को चार साला पाठ्यक्रम बनाने का सरकारी कदम क्‍या मूर्खता की बड़ी मिसाल नहीं है। जिन मुद्दों को बिलकुल भी छेड़े जाने की जरुरत नहीं है, उन्‍हें शासन अपनी अकर्मण्‍यता के ढकाव के लिए जबरन छेड़ रहा है। और जो विषय विचारणीय हैं उन्‍हें या तो उठाया ही नहीं जा रहा है और यदि किसी जनवादी पार्टी द्वारा उनका जिक्र किया भी जाता है तो उन्‍हें किसी न किसी कारण टरकाया जा रहा है। स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं की बुरी स्थिति किसी से छिपी नहीं है। सरकारी का हाल कहने की आवश्‍यकता नहीं है और प्राइवेट मरीज को मुद्रा की मशीन समझ कर इलाज करते हैं। इस पर भी उनका ध्‍यान मरीज को स्‍वस्‍थ करने के लिए नहीं अपितु अपने ज्‍यादा बिल बनाने पर लगा रहता है। ऐसे यूरोपीय ढांचे की नकल करके हथेली सरकार क्‍या सिद्ध करना चाहती है, समझ से परे है।
बहुत कुछ है भड़ास निकालने के लिए लेकिन अब लग रहा है कि पढ़ने वाले कहीं मुझसे ईर्ष्‍या न करने लगें कि यह बकवास बन्‍द क्‍यों नहीं हो रही। इस विषय पर आपकी सच्‍ची, निष्‍पक्ष राय मेरे लिए मेरी भड़ास से ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण होगी।  

Wednesday, July 3, 2013

मेरी बाट जोहता कौन…पता नहीं!


पूरे दिन वातावरण में धूप और छाया का प्रभाव था। कमरे में बैठेबैठे मैं कल्‍पनाशील बन कर देख रहा था कि दरवाजे पर हवा के सहारे धीमेधीमे हिलते परदे को कभी धूप की चमक लगती तो कभी बादलों से घिरते आसमान के बाद उत्‍पन्‍न मौसमीय छाया की उदासी उसे घेर लेती। सब कुछ कितना परिवर्तनशील बना हुआ था। मस्तिष्‍क-पटल पर स्‍मृतियों के दिव्‍यांश अत्‍यन्‍त विचलित हो कर प्रेमोन्‍माद बढ़ाने लगे। साथ बैठे परिवार के लिए अपनी शारीरिक उपस्थिति छोड़ कर हृदय से न जाने कहां, किस तक पहुँच गया। नहीं ज्ञात कि वह कौन है जिसके लिए जब तब मेरे सामान्‍य जीवन समय का विशेषीकरण हो जाता है। ऐसे में मैं स्‍वयं को एक नए व्‍यक्तित्‍व में बदला हुआ पाता हूँ। जिस भ्रमारोहण पर होता हूँ और वहां जो राह दिखाई देती है उस पर इतना चौकन्‍ना हो कर चलता हूँ कि कोई चींटी, जीव मेरे पैर से कुचला न जाए। कोई प्रकृति उपक्रम आंखों से छूट न जाए। मौसमीय राग-विराग अनसुना न रह जाए।    
एक छोटे से जीवन में हमारे पास बड़े देश के लोकतन्‍त्रीय तामझाम और इसके विरोधाभासों, विद्रूपताओं, विसंगतियों, विडम्‍बनाओं को समझने के लिए कितना कम समय होता है! जैसेजैसे समय के पैरों में आधुनिकता, मशीनों के पंख लग रहे हैं वैसेवैसे नए विचार, सामाजिक चालचलन, सत्‍ता संचालन प्रक्रियाएं अस्तित्‍व में आ रही हैं। इससे जीवन की स्‍वच्‍छंद मुसकान, सहज खुशी विलुप्‍त हो रही है। व्‍यक्तिगत उपेक्षा, तिरस्‍कार में वृद्धि हो रही है। जीवन के दो सबसे बड़े आश्‍चर्य यानि कि जीवन और मृत्‍यु सबसे सस्‍ते हो चले हैं। नवजातों के कूड़ादानों में मिलने, उन्‍हें मारने की खबरें सुनते हैं तो भी हममें हलचल नहीं होती और देश में आई आपदा में एक साथ हजारों लोगों के मरने के बाद भी हममें विशेष संवेदना नहीं उपजती। जीवित लोगों के लिए सब कुछ सामान्‍य बना रहता है।
सामान्‍य जिन्‍दगी में क्‍या रखा है। सामान्‍य जिन्‍दगी के अपने हृदय के कुत्सित विचारों से ऊब ही होती है। ऐसे विचार बवंडर का कारण मेरे जीवन समय के भूखण्‍ड यानि कि भारत के शासनाधीश हैं इन आंखोंवाले अन्‍धों की अमानवीय नीतियां, गतिविधियां हैं। इन के शासन में मैं अपनी दैनिक कार्य प्रणालियों से हार गया हूँ। सुबह उठ कर संसार में अपनी उपस्थिति कितनी बोझिल लग रही है!  निद्रा में जाने से पूर्व कितनी करवटें बदलनी पड़ती हैं! मेरे साथ कुछ भी ऐसा घटित नहीं होता जिससे जीवन का सच अनुभव कर सकूँ। जीवन को जीवन से भी अधिक जी कर महसूस कर सकूँ। हरेक सांसारिक क्रियाकलाप कितना निरर्थक और ढोंग लगता है! प्रत्‍येक परिचित मनुष्‍य कितनी द्विअर्थी बातें करता है! यह देख मैं पथरायी आंखों से अपने मन में अपना विचित्र निरुपण करने लगता हूँ और संसार-समय के लिए लम्‍बीलम्‍बी अवधि तक नितान्‍त भ्रम बन जाता हूँ। केवल एक विचार मुझे अपनी भौतिक उपस्थिति, जागृति तक याद रहता है। इस विचार में किसी की स्‍मृति होती है। किसकी होती हैयह मुझे भी नहीं पता! इस समय मेरे लिए यही स्‍मृतिविहार जीवन की सुधा होती है। जिसके लिए संवेदित हूँ वह मेरे लिए चिन्‍तनशील है या निश्चिन्‍त, यहीं पर मैं धयानस्‍थ होता हूँ और अनस्तित्‍व होते स्‍वयं को संभालता हूँ।
रात घिर आने तक उसकीन जाने किसकी यादों की रहस्‍यमय यात्रा करता रहता हूँ। रात्रि का आभास हुआ तो देखा आधा चांद आसमान में उभर आया है। मैं आकाश के नीचे अपनी पलकें झपकाता हुआ चांद को देख कर आकण्‍ठ भ्रमात्‍मक हो जाता हूँ। भ्रम की यात्रा में फिर उसकान जाने किसका चिंतन चलता है और इस चिन्‍तन पथ पर वहां तक पहुँच जाता हूँ, जहां मेरी स्‍मृति में खड़े हो कर रोते हुए कोई मेरी बाट जोह रहा होता है। कौनपता नहीं!