Saturday, March 30, 2013

भ्रम से मुक्ति की चाह



यूं चल रहे हैं हम बिना शरीर और मन के 
होलिका दहनवाली रात से बुआ का पच्‍चीस वर्षीय लड़का मेरे साथ है। पांच फुट नौ इंच लंबे, अस्‍सी किलो भारी इस नौजवान का शरीर वर्षों के व्‍यायाम से सुगठित है। लेकिन इसका मन-मस्तिष्‍क अस्थिर, भ्रमित और विचलित है। उसने मुझे बताया कि अभिभावक, सम्‍बन्धियों, समाज और विशेषकर सरकार की परिभाषा उसके समझ में नहीं आयी। पिछले तीन दिनों में बच्‍चों की तरह इसने मुझसे ऐसे-ऐसे प्रश्‍न पूछे कि उत्‍तर देते नहीं बने। उसने ऐसी बातें कीं कि मुझे समाज के बारे में एक नई नौजवान विचार-दिशा का पता चला, और ऐसा वाद-विवाद प्रस्‍तुत किया कि यदि छदम् लोकतन्‍त्र के संभालकर्ता इस जैसे नौजवान के सम्‍मुख पड़ जाएं तो हिंसा ही झेलेंगे। उसे अन्‍धी आधुनिकता के भंवर में फंसे अपने जीवन पथ का लक्ष्‍य अंधकारमय दिखाई देता है। उसने उन सब को कोसा जिस-जिस के सम्‍पर्क में वह बचपन से लेकर अब तक आया है। उसने स्‍वीकार किया कि उसकी जिन्‍दगी यदि आज चरित्रपूर्ण और सांस्‍कारिक समाज द्वारा संचालित होती तो वह धनहीन हो कर भी कितनी आत्‍म संतुष्टि प्राप्‍त करता!
उसे स्‍वामी विवेकानंद प्रेरक लगते हैं पर वह उन जैसी जीवन-नींव नहीं मिलने से दुखी है। वह विवेकानंद के आध्‍यात्मिक गुरु रामकृष्‍ण परमहंस के दर्शन का अनुसरण करना चाहता है, परन्‍तु बाल्‍यावस्‍था से ही उस पर थोपी गई सामाजिक चरित्रहीनता और कुसंस्‍कारों की कालिख उसे जीवन-सत्‍य के प्रकाश से डराती है। वह अपनी स्‍मृतियों से चिपकी हुई ऐसी कालिख को चाह कर भी नहीं हटा पा रहा है। वह भला मनुष्‍य बनना चाहता है। पर दैनंदिन के सामाजिक विघटन और तन्‍त्रात्‍मक अकर्मण्‍यता उसे सनकी बनाने पर लगी हुई है। वह परिवेश की विषैली विभषिका से एक विचित्र अन्‍तरद्वन्‍द में फंसा हुआ है।
मैं उसे भोजन के लिए बोलता हूँ तो वह सोच-विचार में मग्‍न मिलता है। वह गम्‍भीरता छोड़ मुस्‍कुराए ये सोच कर मैंने उसे कहा, हां भई चौधरी चरण सिंह क्‍या सोच रहा है, तो कुछ क्षण की चुप्‍पी के बाद वह कहता है, पता है भाई मैं क्‍या सोच रहा हूँ। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि जिस सलमान खुर्शीद पर विकलांगों के नाम पर धन हड़पने के पुष्‍ट आरोप लगे उसे सरकार ने पदोन्‍नत क्‍यों कर दिया। उसकी इस बात को सुन मुझसे कुछ बोला न गया। मेरे यह कहने पर कि तू लेख इत्‍यादि लिखा कर उसने कहा कि क्‍या होगा लेख लिख कर। जब सोचे, विचारे, लिखे और पढ़े गए से कोई क्रान्ति, परिवर्तन, बदलाव नहीं हो रहा है तो क्‍या करना यह सब करके। वह कहता रहाभाई अब अखबारवालों को ही देख लो। क्‍या इन्‍हें ये नहीं पता कि समाज के लिए क्‍या सही है और क्‍या गलत। जो अरविंद केजरीवाल पिछले छह दिन से बिना खाए-पिए दिल्ली में अनावश्‍यक बिजली दरों को बढ़ाने के विरुद्ध असहयोग आंदोलन चला रहा है, उस पर मीडिया का नाममात्र का ध्‍यान है। वह अखबार के पीछे के पन्‍नों में एक छोटी से खबर बना हुआ है। और जिसने अपने घर में हथियारों का जखीरा रखा, आतंकियों से सांठगांठ की, अनेक निर्दोष लोगों को मारने में अप्रत्‍यक्ष रुप से सहभागी रहा, वह (हीरो) बनकर जज, जनता, मीडिया सभी की हमदर्दी बटोर रहा है। कहने का मतलब ये है कि असली हीरो को गलत और नकली हीरो को सही ठहराया जा रहा है। ऐसे में घर, समाजवाले और सरकार हमसे मुद्रा-प्रेमी होने, जिम्‍मेदार बनने की बात करते हैं तो पता नहीं क्‍यूं इन सबसे चिढ़ होने लगती है। जब हमारे पथ-प्रदर्शन के ये सारे ठेकेदार अपना वास्‍तविक दायित्‍व भूलकर हमसे वास्‍तविक उत्‍तरदायित्‍व निभाने की उम्‍मीद करते हैं तो मुझे न जाने क्‍यों विद्रोह की सनक बेचैन करने लगती है। ऐस स्थिति में हमारे पास कौन सा रास्‍ता बचता है सही जीवन जीने के लिए। भाई मुझे तो इन सब झूठी पारिवारिक, सामाजिक और सरकारी परिस्थितियों से निजात पाने की सूझती है। मैंने अल्‍मोड़ा स्थित रामकृष्‍ण मिशन में बात की है। क्‍या मैं वहां जा सकता हूँ…..? 
मैं उसे क्‍या बताता! मैं स्‍वयं भ्रम की उस स्थिति से कहां उबर सका हूँ, जिससे वह पीड़ित है। इस समय उसकी और मेरी मानसिक स्थिति लगभग एकसमान है। अन्‍तर केवल इतना है कि मैंने परिवार, समाज और सरकार द्वारा अधिरोपित भ्रमपूर्ण परिस्थितियों से लड़ना सीख लिया है।



Tuesday, March 26, 2013

रंगों की दृष्टि



मंगलवार की यह दिन-दोपहरी मेरे लिए ही निर्मित है जैसे। धीमे बजता संगीत और आती-जाती चिड़ियों की चहचहाट ही आवाज के रुप में परिवेश में व्‍याप्‍त है। मैं अकेला बैठा हूँ। कुछ पढ़ने की कोशिश की। सोने की इच्‍छा हुई। किसी के घर जाने का मन हुआ। पुराने कागज पत्रों को निकाल कर छांट-सम्‍भाल कर रखने को मचला। फोन उठा कर किसी से बात करने का विचार आया। पर इन सब पर भारी पड़ी यह सम्‍पूर्ण दोपहर और विशिष्‍ट निस्‍तब्‍धता। इन्‍होंने मुझे अपने पर आंखें टिकाए रखने को विवश कर दिया।
दृष्टिहीन बच्चे होली खेलते हुए 
      मेरे कमरे की खिड़की से चार हाथ की दूरी पर एक पच्‍चीस फुट लम्‍बा, सघन और हरा-भरा बेल वृक्ष है। शहर के सीमेंट उद्यान में यह विचित्र है और अपने आप में एक भरपूर प्राकृतिक बागीचा है। इस समय सूरज उसकी शीर्षस्‍थ हरी पत्तियों पर सीधा प्रकाश बिखेरे हुए है। हरी पत्तियां आवाज किए बिना धीमे-धीमे हिल रही हैं। सूर्य की ओर सीधे उन्‍मुख पत्तियां धूप के ताप और प्रकाश प्रभाव से पीली दीखती हैं। पक्षी उड़ते हैं तो उनकी यहां-वहां पड़ती, उड़ती-भागती परछाइयां आंखों से पकड़ने की कोशिश करता हूँ। पर वे पल से भी तीव्र गति से ये दिखीं और वो विलीन हुईंपकड़ में ही नहीं आतीं।
     
बच्चों की निश्छल होली 



       नील-नभ, हरे वृक्ष, पीली धूप, भिन्‍न–भिन्‍न छाया से सजी धरती, रंग-बिरंग भावनाएं और स्‍वर्गमय एकान्‍त मेरे चहुं ओर की इक्‍कीसवीं सदी को सुखद भ्रम बना रहे हैं। पेड़ों का अपने पत्‍तों, शाखाओं, छायाओं के साथ हिलने के वर्णन के लिए मैं सबसे उपयुक्‍त शब्‍द ढूंढता हूँ। लेकिन मुझे देर तक सोचने पर भी कोई शब्‍द न सूझा। पेड़, पौधों, पक्षियों के पंख और पूंछ, घरों की छत पर सूखते कपड़ों को धीरे-धीरे हिला रही मनहर दोपहर की इस हवा को मैं किस तरह इकट्ठा करुं!
  सूरज की तेजी, इसके प्रकाश की पीतमयता को कुछ देर के लिए बादलों ने ढंप लिया है। पर यह धूपहीन और घनमय प्रकृति समय तो प्रखर सूर्य प्रकाश के सौंदर्य से भी अधिक सुन्‍दर है। कल रात को पूर्णमासी का चन्‍द्रमा बेहाल कर रहा था। चांद की रोशनी में पीछेवाले कमरे की खिड़की की सारी लौह-बनावट बिस्‍तर पर परछाई बन फैली हुई थी। अन्‍धेरा कमरा जैसे चन्‍द्रमा के रंग से उज्‍ज्‍वल था। सोने का प्रयास तो किया पर नींद किसे आती ऐसे में। और अब इस समय यह दोपहर बेहा  कर रही है।
बच्चों की मस्ती 
      कल दृष्टिहीन बच्‍चों के होली के रंग खेलते चित्र देखे थे। बरबस वे मेरी आंखों को याद हो रहे हैं। बच्‍चे कितने खुश थे एक-दूसरे पर हरा, लाल, पीला, गुलाबी रंग लगाते हुए। उन्‍हें इसका कुछ आभास नहीं था कि होली खेलते हुए कोई दूर से उनके चित्र खींच रहा है। होली खेलने के लिए उन्‍होंने सोची हुईं मुद्राएं नहीं बनाईं थीं। वे चाहे गए कोण में खड़े हो कर रंग नहीं उड़ा रहे थे। एक-दूसरे पर रंग लगाने की फोटो खिंचवाने के लिए उन्‍होंने विचारी गई भावभूमि नहीं बनाई। उनका प्रेम और सौहार्द प्रदर्शन अत्‍यन्‍त स्‍वाभाविक था। बनावटी होली से सुदूर वे परंपरागत तरीके से होली खेल रहे थे। वे तो साक्षात ईश्‍वरीय अंश बन के होलिका उत्‍सव में तन-मन से डूबे हुए थे। उनका चेहरा दृष्टिहीन हो कर भी कितना रंगानुभव, मानवानुभव लिए हुए था! उनकी हंसी रंगों को देखे बिना ही कितनी रंगीली लग रही थी! उनकी स्‍वाभाविक खुशी और प्रसन्‍नता फाल्‍गुन के सर्वोत्‍कृष्‍ट सरोकार को बरसा रही थी। चित्रकार को मन ही मन धन्‍यवाद दिया कि उसने कितना अच्‍छा काम किया।
      मैं अपनी आंखों से दिखती इस दोपहर, इस प्रकृताभा को उन दृष्टिबाधित बच्‍चों के कानों में शब्‍दों के रंग बना कर डालना चाहता हूँ। मेरे प्‍यारे बच्‍चों तुम्‍हारे प्रसन्‍न, उमंग-तरंग से पूर्ण मुखचित्र देख कर मैं अत्‍यन्‍त द्रवित हूँ। आशा करता हूँ कि तुम्‍हारा मन यूं ही प्रसन्‍न बना रहे। तुम्‍हारी खुशी यूं ही व्‍यक्‍त होती रही हमेशा रंगों के माध्‍यम से।
 (२६ मार्च २०१३, मंगलवार  का संस्मरण)

Monday, March 25, 2013

होली की रंगकामनाएं

होली चित्र विशेषांक

मुझे नहीं लगता कि बच्‍चों को होली खेलता देखने के अतिरिक्‍त किसी अन्‍य होली विवरण की आवश्‍यकता होनी चाहिए। 
आप सभी को होली की रंगकामनाएं। 

Sunday, March 24, 2013

महान महाप्रयाण की बुद्ध पूर्णिमा




ध्‍यानस्‍थ सिद्धार्थ
बुद्ध पूर्णिमा से तात्‍पर्य ज्ञान की ऐसी आत्‍म-चेतना से है, जिसमें निराकार अभिबोध परमानन्‍द में मन्‍द-मन्‍द लहराता है। बु‍द्ध अर्थात् ज्ञान के ब्रह्माण्‍ड का परमाणु बनना। पूर्णिमा अर्थात् परमगति को प्राप्‍त होना। इसके अतिरिक्‍त महात्‍मा बु‍द्ध का आत्‍म-बोध, बोद्धिसत्‍यत्‍व और महाप्रयाण बु‍द्ध पूर्णिमा की सर्वोच्‍च अभिव्‍यक्ति है। राज्‍य, धन, ऐश्‍वर्य, आत्‍मज-स्‍वजन, सब को छोड़ के परम जीवन सत्‍य के शोध एवं खोज में निकले और अंन्‍तत: जीवोचित बोधत्‍व को प्राप्‍त करनेवाले बुद्ध अभिज्ञान तथा आत्‍मबोध के महाप्रयाण सिद्ध हुए। वैर, ईर्ष्‍या, धर्माडम्‍बर, द्वि-चरित्रता, विश्‍वासघात, अनावश्‍यक मनुष्‍याभिनय, आग्रह-पूर्वाग्रह, भाग्‍यदुर्भाग्‍य, सम्‍बन्‍धनिबन्‍ध, आसक्ति-विरक्ति, स्‍वीकार-अस्‍वीकार, लगाव-अभाव जैसे अभिमानित मानुषिक दुर्गुणों से सुदूर आत्‍माकाश के टिमटिमाते सितारे महात्‍मा बुद्ध का जन्‍म लुम्बिनी नामक स्‍थान में हुआ था।
सिद्धार्थ भारतीय उपमहाद्वीप के उत्‍तरी क्षेत्र में एक आध्‍यात्मिक अध्‍यापक थे। उन्‍होंने बुद्धवाद की खोज की थी। सामान्‍य रुप से बुद्धों के समुदायों द्वारा उन्‍हें हमारे युग के प्रमुख बुद्धा के रुप में देखा गया। उनके जन्‍म और मृत्‍यु का समय अनिश्चित है। बीसवीं शताब्‍दी के इतिहासकार उनके जीवन समय को संभवत: 563 ईसवी से 483 ईसवी के मध्‍य मानते हैं। बुद्ध शाक्‍यमुनि के नाम से भी जाने जाते हैं। बुद्धवाद के अनेक अनुयायी मानते हैं कि उनका जीवन और उनके प्रवचन जीवन की सर्वोच्‍च सारांशित व्‍याख्‍या थे। सिद्धार्थ का जन्‍म लुम्बिनी में हुआ था। लेकिन उनका लालन-पालन एक छोटे साम्राज्‍य कपिलवस्‍तु में हुआ। ये दोनों क्षेत्र आज की तिथि में नेपाल में हैं। बुद्ध के जन्‍म के समय ये क्षेत्र या तो वैदिक सभ्‍यता की सीमा में थे या उसके बाहर, यह सुनिश्चित नहीं है। यह संभव है कि उनकी मातृभाषा एक इंडो-आर्यन भाषा नहीं थी। उनके समुदाय में जाति-प्रथा नहीं थी। उनकी सामाजिक संरचना ब्राह्मणवादी सिद्धान्‍त के अनुसार नहीं थी। उनका राज्‍य कोई राज्‍यतन्‍त्र नहीं था। वह या तो एक अल्‍पतन्‍त्र (गुटतन्‍त्र, कुलीनतन्‍त्र) के रुप में रहा होगा अथवा एक गणतन्‍त्र के रुप में निरुपित रहा होगा। परम्‍परागत जीवनी के अनुसार उनके पिता राजा सुद्धोधन शाक्‍य राष्‍ट्र के प्रमुख थे। शाक्‍य जनजाति कोसला के बढ़ते राज्‍य में कई पुरातन जनजातियों में से एक थी। महात्‍मा बुद्ध का पारिवारिक नाम गौतम था। उनकी माता रानी महामाया एक कोलियान राजकुमारी थी।
जिस रात सिद्धार्थ ने अपनी मां के गर्भ को धारण किया, रानी माया ने स्‍वप्‍न देखा कि छ: सफेद दांतोंवाला एक सफेद हाथी उसके पेट के दाईं ओर प्रवेश कर गया है। शाक्‍या प्रथानुसार रानी माया गर्भावस्‍था में कपिलवस्‍तु को छोड़कर अपने पिता के देश चली गई थी। लेकिन यात्रा के दौरान रास्‍ते में ही लुम्बिनी नाम के स्‍थान पर एक बाग में साल के वृक्ष के नीचे उसने एक शिशु जना। इस प्रकार दस चन्‍द्र माह के बाद अर्थात् पूर्णमासी को जब चन्‍द्रमा नभ में दैदीप्‍यमान था महात्‍मा बुद्ध ने जन्‍म लिया।
बुद्ध के जन्‍म दिवस को थेरेवाडा राज्‍यों में बैसाक के रुप में धूमधाम से मनाया जाता है। बहुत सी ऐतिहासिक जानकारियों के अनुसार बुद्ध के जन्‍म के सप्‍ताहभर बाद उनकी माता का देहावसान हो गया था। बालक का नामकरण संस्‍कार किया गया और उन्‍हें सिद्धार्थ नाम दिया गया, जिसका अर्थ अपने लक्ष्‍य प्राप्‍त करनेवाले से है। एकान्‍तवासी भविष्‍यद्रष्‍टा असिता अपने पर्वतों के खण्‍डहरों से बुद्ध के जन्‍मोत्‍सव में आए। संत असिता के सिर के लम्‍बे केशों में बालक सिद्धार्थ ने पैरों को फंसा लिया। इस घटना और सिद्धार्थ के अन्‍य जन्‍म चिन्‍हों का संज्ञान लेकर उन्‍होंने बड़ी विचित्र मनोस्थिति में घोषित किया कि यह बालक या तो एक महान चक्रवर्ती राजा बनेगा या एक महान सन्‍त योगी। अन्‍य मनीषियों ने भी उनके बारे में अपनी दो-दो भविष्‍यवाणियां कीं। केवल कौंडिन्‍या नामक नौजवान सन्‍त ही एक ऐसा अरहंत था, जिसने बिना किसी लाग-लपेट के स्‍पष्‍ट किया कि सिद्धार्थ एक बुद्धा बनेगा।
एक राजकुमार के रुप में सिद्धार्थ को नियति ने ऐश्‍वर्ययुक्‍त जीवन दिया था। उनके प्रतिदिन के कार्यों एवं मौसमीय भ्रमण को देखते हुए पिता राजा सुद्धोधन ने उनके लिए विशेष प्रकार के तीन राजभवन बनाए थे। पिता की इच्‍छा थी कि सिद्धार्थ एक महान राजा बने। उन्‍होंने अपने सुपुत्र को धार्मिक अध्‍ययनों और मानवीय कष्‍टों की गहन शिक्षा से अभिसिंचित किया था। सिद्धार्थ का पालन-पोषण उनकी माता की छोटी बहन महा पजापति द्वारा किया गया।
16 वर्ष की आयु में उनके पिता ने उनका विवाह यशोधरा नामक कन्‍या से व्‍यवस्थित किया। यह कन्‍या उनके समकक्ष आयु की उन्‍हीं की कोई सम्‍बन्‍धी थी। यद्यपि यह एक परम्‍परागत अनुमान है, इससे पूर्व के तथ्‍य उनके वैवाहिक जीवन के लिए ऐतिहासिक सन्‍देह उत्‍पन्‍न करते हैं। पारम्‍परिक आख्‍यानुसार यशोधरा ने राहुल नामक एक बालक को जन्‍म दिया। सिद्धार्थ ने राजकुमार के रुप में कपिलवस्‍तु में 29 वर्ष व्‍यतीत किए। यद्यपि उनके पिता पूर्णत: आश्‍वस्‍त थे कि सिद्धार्थ को उनकी इच्‍छा एवं आवश्‍यकतानुसार प्रत्‍येक सुविधा तथा वस्‍तु उपलब्‍ध कराई गई थी, तथापि सिद्धार्थ ने अनुभव किया कि उसके जीवन का परम एवं अन्तिम लक्ष्‍य सामग्री की समृद्धि नहीं है।
इस प्रकार अपने वास्‍तविक जीवन लक्ष्‍यों की खोज में 29 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ ने घर, परिवार और भव्‍य राजभवन त्‍याग दिया। वह एक अनिश्चित मार्ग पर बढ़ चले। यात्रा के दौरान सिद्धार्थ को रोग, बुढ़ापे और सार्वजनिक जीवन की कठिनाईयों से बचाने के लिए उनके पिता के अनेक प्रयासों के उपरान्‍त भी वे एक बूढ़े व्‍यक्ति के सदृश लगने लगे। जब उनके सारथी चन्‍ना ने उन्‍हें बताया कि सभी लोग और प्राणी समय के साथ-साथ बूढ़े एवं रोगग्रस्‍त हो अंतत: मृत्‍यु को प्राप्‍त होते हैं तो यह बात सुन राजकुमार सिद्धार्थ ने निर्णय किया कि वे अपनी यात्रा रोकेंगे नहीं और घर नहीं जाएंगे। यात्रा के समय उन्‍होंने अनेक रोगग्रस्‍त व्‍यक्तियों, क्षयमान शवों और अनेक सन्‍यासियों का सामना किया। इन दृश्‍यों को निकट से देख वे जीवन के प्रति गहराई तक हतोत्‍साहित हो गए। फलस्‍वरुप बुढ़ापे, रोग और मृत्‍यु से छुटकारा पाने के लिए उन्‍होंने एक तपस्‍वी का जीवन अंगीकार कर लिया। इस तरह सिद्धार्थ ने हमेशा के लिए अपने राजभवन का परित्‍याग कर दिया और अपने सारथी चन्‍ना के साथ अपने घोड़े कंथका पर सवार होकर भव्‍यतम् जीवन को पीछे छोड़ते हुए एक भिक्षु बनने के लिए महाप्रयाण किया। यह घटना परम्‍परागतात्‍मक रुप से (महान प्रयाण) के नाम से अभिवाचित की गई।
सिद्धार्थ ने भिक्षुक गृह के लिए राजागाह की गली-गली में भिक्षा मांगकर अपने तपस्‍वी जीवन का आरम्‍भ किया। राजा बिंबिसार ने सिद्धार्थ की खोज का औचित्‍य सुनने के उपरान्‍त और इससे प्रभावित होकर उन्‍हें अपना सिंहासन सौंपने का प्रस्‍ताव रखा। सिद्धार्थ ने प्रस्‍ताव अस्‍वीकार कर दिया। लेकिन उन्‍हें वचन दिया कि वे उनके राज्‍य मगध में सबसे पहले यात्रा करेंगे और वहां के लोगों को जीवन की सच्‍चाई से अवगत कराएंगे। बाद में सिद्धार्थ ने राजागाह भी त्‍याग दी और दो एकान्‍तवासी अध्‍यापकों के अधीन रहकर साधनाभ्‍यास किया। इनमें से एक अलारा कलामा द्वारा दी गई योग शिक्षा में विशेषज्ञता प्राप्ति के उपरान्‍त सिद्धार्थ को उन पर विजय पाने को कहा गया। लेकिन बुद्ध उनके अभ्‍यासों और ज्ञान से असन्‍तुष्‍ट होकर वहां से चले गए। इसके बाद वे उडाका रामापुत्‍ता के शिष्‍य बने। बुद्ध ने यद्यपि यहां पर उच्‍च स्‍तर की योगिक चेतना प्राप्‍त कर ली थी, लेकिन योगाभ्‍यास में रामापुत्‍ता की स्‍वयं को हराने की शर्त से क्षुब्‍ध हो वे यहां भी न टिक सके।
सिद्धार्थ एवं कोन्‍डाना के नेतृत्‍व में पांच संगठनों के एक समूह ने अपने तपस्‍या साधनों में उत्‍तरोत्‍तर वृद्धि करने के उद्देश्‍य से एक साथ तपस्‍या अभिक्रियाएं प्रारम्‍भ कीं। उन्‍होंने भोजन सहित लगभग समस्‍त सांसारिक वस्‍तुओं को आत्‍म-तप के माध्‍यम से त्‍याग दिया तथा अन्‍तर्ज्ञान की शोध साधना में लीन हो गए। अधिकांशत: भूखा रह कर अपने भोजन को प्रतिदिन केवल एक दाने या पत्‍ती तक सीमित कर बुद्ध अत्‍यन्‍त दुर्बल हो गए। ऐसी दुर्बलावस्‍था में एक दिन नदी में स्‍नान करते समय वे मूर्छित हो गिर पड़े। किसी तरह से वे नदी में डूबने से बच गए। सिद्धार्थ ने अपने मार्ग को साधना के विभिन्‍न संकेन्द्रित समरुपों के माध्‍यम से पुनर्प्रशस्‍त किया और आगे ही आगे बढ़ते गए।
महाप्रयाण की मुद्रा 
साधना अध्‍ययन के दौरान एकदा सहसा बुद्ध को उनके बालपन का एक क्षण याद आया, जिसमें वे अपने पिता की पर्यावरणीय व्‍याख्‍या की प्रारम्भिक अवस्‍था को देख रहे थे। इसे सुनकर सहसा वे एक ऐसी प्राकृतिक संकेन्‍द्रणा में स्थिर हो गए थे, जो आनन्‍दपूर्ण, ऊर्जायुक्‍त और ताजगीभरी थी।
तपस्‍या और योग साधना के पश्‍चात् प्राप्‍त अभिबोध तथा अनापान-सती (अन्‍दर-बाहर सांस लेने की जागृति) के बाद माना गया कि बुद्धवाद द्वारा पुकारा जानेवाला मध्‍यम पथ सिद्धार्थ ने ढूंढ निकाला। यह आत्‍मसंयम का ऐसा पथ था, जिसमें आत्‍ममुग्‍धता एवं आत्‍मवंचना के चरमोत्‍कर्ष से सुदूर होना सम्‍भव हो सका। उन्‍होंने सुजाता नामक किसी गांव की एक युवती की खीर स्‍वीकार की, जो उन पर अन्‍धविश्‍वास रखती थी कि उन्‍होंने उसकी एक इच्‍छा को पूर्ण किया है। इस प्रकार उनके दर्शन, साधना प्रकारों और परिणामस्‍वरुप दिखाई देनेवाली उनकी तेजोमय मुखाकृति से प्रत्‍येक प्राणी प्रभावित होता था।
बिहार, भारत में एक पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर उन्‍होंने कई-कई दिनों तक तपस्‍या की। यह वृक्ष बोधिवृक्ष के नाम से जाना जाता है। साधना प्रक्रिया के समय वे तब तक चक्षु नहीं खोलते थे जब तक सत्‍याध्‍ययन नहीं कर लेते थे। कौंडिन्‍या एवं चार संगठनों का विश्‍वास था कि बुद्ध ने अपने शोध का परित्‍याग कर दिया है और वे अनुशासनहीन बन गए हैं। पर उनका यह विश्‍वास शीघ्र ही असत्‍य बन गया। क्‍योंकि उनकी नकारात्‍मक धारणा के विपरीत बुद्ध ने 35 वर्ष की आयु में 49 दिनों के योग द्वारा अभिबोध प्राप्‍त किया। कुछ जीवन पद्वतियों और धर्म ग्रन्‍थों के अनुसार यह परिघटना पांचवें चन्‍द्रमास में तथा जीवन व धर्म की दूसरी आख्‍याओं के अनुसार यह लगभग बारहवें चन्‍द्रमास में हुई मानी जाती है। तब से गौतम को बुद्ध और (जागृत मनुष्‍य) के नाम से जाना गया। बुद्ध को (अभिबोधत्‍व व्‍यक्ति) के रुप में भी जाना जाता है। बुद्धवाद में प्राय: उनको शाक्‍यमुनि बुद्ध या (शाक्‍य क्‍लेन का जागृत व्‍यक्ति) भी कहा गया। इस स्‍तर पर यह विश्‍वास किया जाता है कि उन्‍होंने अभाव वंचना से ग्रसित मानव की प्रवृत्ति एवं कारण जैसी समस्‍याओं से उभरने के लिए सम्‍पूर्ण जागृति एवं आत्‍मोत्‍पत्ति को वास्‍तविकता से अनुभव किया। बुद्ध निर्णय नहीं ले पा रहे थे कि वे मनुष्‍यों को धर्म के बाबत बताएं या नहीं। उन्‍हें चिन्‍ता थी कि मानव लालच, ईर्ष्‍या और भ्रम की अतिशक्तियों के कारण धर्म की सर्वोचित सच्‍चाई समझने में असमर्थ होगा। क्‍योंकि धर्म को समझने के लिए इसकी गूढ़ता, सूक्ष्‍मता और कठिनता आड़े आएगी। किसी तरह ब्रह्मा सहमपति ने उन्‍हें आत्‍मजागृत किया और कहा कि वे धर्म के बारे में संसार को यह सोच कर बताएं कि यहां कुछ मानव ऐसे हैं जो धर्म को समझेंगे। ब्रह्माण्‍ड के समस्‍त प्राणियों से अपनी गहन लगन के कारण बुद्ध इस विषय पर उपदेश देने को सहमत हो गए।
अभिबोध अर्थात् ज्ञान प्राप्ति के बाद दो व्‍यापारी तपुसा एवं भालिका उनके प्रथम शिष्‍य बने। बुद्ध ने उनको शिक्षित करने के उपरान्‍त उन्‍हें अपने सिर के कुछ केश दिए। कहा जाता है कि आज भी वे बाल रंगून, बर्मा के श्‍वे डेगन मन्दिर में विद्यमान हैं। असिता (जिन्‍होंने बुद्ध के नामकरण पर उनके लिए भविष्‍यवाणी की थी) और अपने पूर्व गुरुओं अलारा कलामा एवं उडाका रामापुत्‍ता को अपने नवीन आत्‍मानुसन्‍धानों से अवगत कराने के लिए बुद्ध उनसे मिलने को उत्‍सुक थे। लेकिन उन्‍हें ज्ञात हुआ कि इन सभी की मृत्‍यु हो चुकी है।
अंगुलिमाल बुद्ध की शरण में
बुद्ध ने अपने शेष 45 वर्षों के जीवन में गंगा के मैदानी भागों की यात्राएं कीं। ये भाग आज उत्‍तर प्रदेश, बिहार एवं दक्षिण नेपाल में स्थित हैं। अपनी इस यात्रा में उन्‍होंने अनेक प्रकार के लोगों, जिनमें सम्‍मानित-अपमानित व्‍यक्ति, गलियों के सफाईकर्मी, अंगुलिमाल जैसे जनसंहारक भी थे, को अपने सिद्धातों एवं अनुशासन की शिक्षा प्रदान की। अंगुलिमाल उनसे इतना प्रभावित हुआ कि वह जनसंहार के कुकार्य छोड़कर उनके साथ चल पड़ा। बुद्ध के सिद्धांतों का प्रतिस्‍पर्द्धी दर्शनों एवं धर्मों की विभिन्‍न किंवदंतियों तक प्रसार हुआ।
बुद्ध धर्म समस्‍त जातियों एवं वर्गों के लिए खुला था। यहां कोई जातिगत व्‍यवस्‍था नहीं थी। कहा जाता है कि विपक्षी धार्मिक समूहों द्वारा उनकी हत्‍या का प्रयास किया गया तथा उन्‍हें कारावास में डालने का प्रयत्‍न भी किया गया। अपने धर्म के प्रचार के लिए बुद्ध के संघ ने भारत में एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान तक भ्रमण किया।
बुद्ध ने 80 वर्ष की आयु में घोषित किया कि वे शीघ्र पारिनिर्वाण स्थिति में पहुंचेंगे या एक ऐसी अवस्‍था में चिरस्थिर होंगे, जहां व्‍यावहारिक शरीर को त्‍याग कर वे अन्तिम मृत्‍युहीन दशा को प्राप्‍त होंगे। इसके उपरान्‍त बुद्ध ने अपना अन्तिम भोजन किया, जो उन्‍हें कुन्‍डा नामक लोहार ने भेंटस्‍वरुप दिया था। इसे ग्रहण करने के पश्‍चात् बुद्ध गम्‍भीर रोग से पीड़ित हो गए। रोगावस्‍था में उन्‍होंने अपने सहवर्त्‍ती को आदेश दिया कि कुन्‍डा के पास जा कर उससे कहो कि उसके द्वारा दिए गए भोजन में बुद्ध की सम्‍भावित मृत्‍यु का कोई कारण नहीं है, बल्कि उसके भोजन में तो गुण का वह परम तत्‍व छिपा था जिसने बुद्ध को अन्तिम भोजन उपलब्‍ध कराया।
महायाना विमलाकीर्ति सूत्र के अध्‍याय 3 में दावा किया गया है कि बुद्ध वास्‍तव में रोगी या वृद्ध नहीं हुए थे। उन्‍होंने समझबूझ कर सांसारिक लोगों के लिए ऐसी दशा बनाई थी ताकि वे समझ सकें कि क्षणभन्‍गुर संसार में कितने अन्‍तर्दुख और पीड़ाएं हैं तथा निर्वाण में कितनी आत्‍मशान्ति है। बुद्ध ने कहा कि तथागतों अर्थात् बौद्धों के पास धर्म का शरीर है। उनके पास पदार्थात्‍मक भोजन से चलनेवाला शरीर नहीं है। बुद्ध ने माला साम्राज्‍य कुशीनारा (वर्तमान में कुशीनगर, भारत) के परित्‍यक्‍त वनों में पारिनिर्वाण हेतु प्रवेश किया। बुद्ध के अन्तिम प्रवचन थे (कि सभी मिश्रित वस्‍तुएं समाप्‍त हो जाती हैं। अध्‍यवसाय के साथ हमेशा अपनी मुक्ति के लिए श्रम करो)। अन्‍त में वे मृत्‍यु को प्राप्‍त हुए अर्थात् महापरिनिर्वाण में विलीन हो गए। इसके उपरान्‍त उनके शरीर का दाह-संस्‍कार किया गया तथा उनके स्‍मृतिशेष स्‍मारकों और स्‍तूपों में रखे गए। इनमें से आज भी कुछ स्‍मृतिचिन्‍ह विद्यमान हैं। उदाहरण के लिए श्रीलंका का दांत का मन्दिर या (दलादा मालीगावा) नामक स्‍थान ऐसा ही एक स्‍थान है, जहां बुद्ध के दाईं ओर के दांत के अवशेष आज भी उपलब्‍ध हैं।
बुद्ध की मृत्‍यु की वास्‍तविक तिथि सदा सन्‍देह में रही। श्रीलंका के ऐतिहासिक शास्‍त्रों के अनुसार सम्राट अशोक का राज्‍याभिषेक बुद्ध की मृत्‍यु के 218 वर्ष पश्‍चात् हुआ। चीन के एक महायाना प्रलेख के अनुसार अशोक का अभिषेक बुद्ध की मृत्‍यु के 116 वर्ष पश्‍चात् हुआ था। इसलिए थरावाडा प्रलेखानुसार बुद्ध की मृत्‍यु का समय या तो 486 ईसवी अथवा महायाना प्रलेखानुसार 383 ईसवी है। तथापि पारम्‍परिक रुप से बुद्ध की मृत्‍यु की जो वास्‍तविक तिथि स्‍वीकार की गई थी, थरावाडा देशों में वह 544 या 543 ईसवी थी।
बुद्ध के अनुसार जीवन के चार महान सत्‍य हैं (1) कि दु:ख अस्तित्‍व का अन्‍तर्निहित भाग है (2) दुख की उत्पत्ति अज्ञान से होती है (3) अज्ञान का मुख्‍य लक्षण लालसा या लगाव है (4) लगाव या लालसा पर प्रतिबन्‍ध आवश्‍यक है। बुद्ध ने इनसे मुक्ति प्राप्ति हेतु महान अष्‍टगुण रास्‍तों का अनुसन्‍धान किया। महान अष्‍टगुण उपायों में समुचित समझ, भाषण, कार्यवाही, जीवनचर्या, प्रयास, मस्तिष्‍क दशा एवं संकेन्द्रण सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्‍त निर्भरता प्रवर्तन उपाय के अन्‍तर्गत कहीं भी कोई आभाष केवल तभी प्रकट होता है जब भूत, वर्तमान एवं भविष्‍य को समाविष्‍ट करते हुए कारण तथा प्रभाव के जटिल जाल में दूसरे अस्तित्‍व उभरते हैं। क्‍योंकि सभी वस्‍तुएं पारिस्थितिक एवं नश्‍वर हैं। वस्‍तुओं की कोई वास्‍तविक छवि नहीं है। स्‍वीकृत ग्रन्‍थों के भ्रमातीतत्‍व के अन्‍तर्गत शिक्षण को तब तक स्‍वीकार नहीं किया जाना चाहिए जब तक वे अनुभव से न जन्‍मे हों और बुद्धिमान द्वारा सराहे न गए हों। इसके अतिरिक्‍त (1) सभी वस्‍तुएं नश्‍वर हैं (2) कि (स्‍वयं) का निरन्‍तर बोध होना एक भ्रम है (3) कि सभी प्राणी समस्‍त परिस्थितियों से अस्‍पष्‍ट मानसिक दशा से पीड़ित होते हैं जैसे गुण भी उनके महान अष्‍टगुणों में सम्मिलित हैं। तब भी कुछ महायाना विद्यालयों में बुद्ध के इन विचारों को या तो अधिक अथवा कम सम्‍पूरक के रुप में सम्‍मानित किया गया।
बुद्ध के अध्‍यापन के अधिक गूढ़ पहलुओं त‍था मठवासियों हेतु कुछेक अनुशासनात्‍मक नियमों पर बुद्धवाद के विभिन्‍न विद्यालयों के मध्‍य कुछ मतभेद हैं। परम्‍परा के अनुसार बुद्ध ने नीतिशास्‍त्रों को सशक्‍त किया और मान्‍यताओं में सुधार किया। उन्‍होंने औसत स्‍तर के व्‍यक्तियों की ईश्‍वरत्‍व और मुक्ति की धारणाओं को चुनौती दी। उन्‍होंने व्‍यक्‍त किया कि मानवमात्र और देवत्‍व के मध्‍य कोई माध्‍यम नहीं है। हिंदुवाद में कई बार बुद्ध को विष्‍णु भगवान का अवतार माना गया। पुरातन ग्रन्‍थ भगवत पुराण में वे 25 अवतारों में 24वां अवतार हैं। कई हिन्‍दु मान्‍यताओं के अनुसार दशावतार में बुद्ध सबसे प्रमुख और नवीन अवतार हैं। अनेक हिन्‍दु मान्‍यताओं में बुद्ध को दशावतार (ईश्‍वर के दस अवतार) के प्रसिद्ध दस प्रमुख अवतारों में से एक के रुप में वर्णित किया गया। बुद्धों के दशारथा जटाका (जटाका अथाकथा 461) ने बोद्धिसत्‍व एवं समुचित विवेक के सर्वोच्‍च धार्मिक राजा के रुप में भगवान राम को बुद्ध के पूर्व के अवतार के रुप में निरुपित किया है।
गौतम बुद्ध ने मानव जाति की दूषित मनोवृत्ति को परिशुद्ध करने की जो आध्‍यात्मिक योग क्रियाएं निर्मित कीं, उनका महिमामण्‍डन हिन्‍दुओं के कई प्रमुख धर्म पुराणों में भी किया गया है। स्‍वामी विवेकानन्‍द ने भी उनकी व्‍यापक अभिप्रयाण प्रणालियों का सम्‍मानपूर्वक उल्‍लेख किया है। आज के भौतिकीय युग को बुद्ध के आत्‍मविकास के रास्‍तों पर चलने की अत्‍यन्‍त आवश्‍यकता है। तब ही धरती के मनुष्‍यों की सामग्री पिपासा और इससे उत्‍पन्‍न होनेवाली बुराईयों एवं विसंगतियों का अन्‍त हो सकेगा।
25.05.2013 बुद्ध पूर्णिमा के दिन राष्‍ट्रीय सहारा के सम्‍पादकीय पृष्‍ठ पर 

Monday, March 18, 2013

वैरागी दोपहर



मैं अकेला राह में, प्रसन्‍नचित मौसम प्रभाव से
दोपहर है और मैं कहीं से घर आ रहा हूँ। सड़क पर पैदल चलते हुए लग रहा है जैसे मौसम के उड़नखटोले में घूम रहा हूँ। याद आया कि छह या सात दिन बाद होली है। उसके स्‍वागत में मौसम की तैयारियां चरम पर हैं। वाह रे नीले आसमान कितना सुन्‍दर बना है तू! पेड़ों की हरी पत्तियां धूप में चमक रही हैं। कुछ पेड़ों की पीली और रंग-बिरंगी पत्तियां हवा के झोंकों से यहां-वहां झड़ रही हैं। कुछ झड़ के सड़क के दाएं और बाएं एक ढेर में बदल गई हैं। लोगों का आवागमन दोपहर में कम है। मैं स्‍वयं को सड़क का राजा मान कर, बहुत मध्‍यम गति से चलता हुआ मौसम के दिव्‍य अनुभवों को आत्‍मसात कर रहा हूँ।
सामान्‍य दिनों में नर्क लगनेवाला यह शहर, इसकी सड़कें, गलियां, लोग अचानक बहुत सुन्‍दर लगने लगे हैं। रास्‍ते में आते-जाते जो भी दिखता है बड़ा अच्‍छा लगता है। मैं उसका मुख देख कर प्रेमिल हो मुस्‍कुरा जाता हूँ। वह भी अचम्‍भे और खुशी से प्रसन्‍न हो जाता है। अपनी और मुझ से हाथ मिलाते व्‍यक्ति की रास्‍ते पर पड़ी परछाई देखता हूँ। धूप से आलिंगनबद्ध हो मन्‍द-मन्‍द लहराते वृक्षों की छायाएं निहारते हुए अपनी चाल और धीमी कर देता हूँ। हिलती छायाओं को जेब में भरने का विचार कौंधता है। मन ही मन खुद पर हंसता हूँ। गलियों के घर और इनकी काली परछाइयां उदार प्रतीत होती हैं। ये सोच कर कि घर आनेवाला है मैं चलना बंद कर एक जगह रुक जाता हूँ। इस प्रकृति निधि को अपने अन्‍दर भरपूर जमा कर लेना चाहता हूँ। आज के इस जीवन अनुभव को खूब जी लेने की इच्‍छा होती है। मोबाइल फोन बजता है। मोबाइल रिंग की टोन बहुत बनावटी लगती है। सोचा हवा की सरसराहट की कोई रिंग टोन होती तो कितना अच्‍छा होता! बेल का पेड़ हवा से ऐसे हिल रहा है जैसे मां का प्रेम दुधमुंहे बच्‍चे को लोरी सुना रहा हो। सड़कों पर उड़ते सूखे पत्‍तों की खड़खड़ाहट दोपहर को वैरागी बना रही है। हवा के संग लहराते शीशम के छोटे और गोल पत्‍तों के बीच से आकाश देखा तो अपनी उपस्थिति भ्रम लगने लगी।
वैरागी दोपहर
पीठ पर लगती धूप सर्वाइकल के दर्द को सेक रही है। मैं बीड़ी सिगरेट नहीं पीता। लेकिन अभी मन करता है कि एक सिगरेट पिऊं। उसके धुएं में अपने शरीर को विलीन करुं। अचानक मुझे शराब, बीड़ी और सिगरेट पीनेवालों से एक लगाव हो जाता है। अब मुझे कुछ भी ऐसा याद नहीं आ रहा, जो मेरी आंखों को अखरे। मेरी नजर ईर्ष्‍याविहीन हो गई है। आसमान और हवा के बीच नजरें टिकाए हुए हूँ। दृष्टि को हटाए बिना ही महसूस हुआ कि पास में कोई सिगरेट पी रहा है। उसकी गंध मुझे दोपहर की धूप में मन्दिर में जलती अगरबत्‍ती की सुगन्‍ध लगती है। ऊपर आसमान की ओर बढ़ता धुंआं रोटी सेकते गांव के चूल्‍हों से निकलनेवाले धुंएं सा लगता है। धुंएं के गुच्‍छे उड़ाता चेहरा देखने की सूझी तो पाया कि अधजली, पैर से मसली हुई सिगरेट के अलावा कोई नहीं था। 
सड़क छूट गई है। राजा रंक हो गया है। मैं वापस घर में हूँ। दोपहर का खाना खाते हुए खिड़की से देखता हूँ कि बिजली के तार पर दो कबूतर बैठे हुए हैं। आकाश, धरती, धूप, पेड़, हवा, मौसम से प्रभावित कबूतर धीरे-धीरे पास आए। दो एक बार उन्‍होंने चोंच से चोंच मिलाई। अन्‍त में संभोग किया और चलते बने। उन्‍हें देने के लिए पके हुए चावल के दाने मेरी हथेली में चिपके रह गए।
(१७ मार्च, २०१३ दोपहर का संस्‍मरण)

Thursday, March 14, 2013

आधुनिकता से लिपटा जीवन-भ्रम

जीवन का भ्रम, भ्रम का जाल

सानी से देखा मैंने भी अपने इर्द-गिर्द के मरनेवालों को। मरने से पहले उनमें कई लोग हंसते, रोते होंगे। दुखी और सुखी होते होंगे। बातों को दिल से महसूस करते होंगे। जीवन अनुभवों की आत्मिक समीक्षा करते होंगे। कईयों को छोटी सी छोटी सुविधा के लिए भी जीवन-संघर्ष से गुजरना पड़ा होगा। तो कई जन्‍म से ही अमीरी, विलासिता से पूर्ण रहे होंगे। इनमें से उदास लोगों की कदमों की आहट को मैं अच्‍छी तरह से भांप सकता था। कितनों की शक्‍ल ही देख कर बता सकता था कि कोई किस प्रवृत्ति या प्रकृति का व्‍यक्ति है। पर क्‍या करना इन सब बातों को थाम कर। क्‍योंकि जानेवाले अपने प्रभाव को इतना भी वैभवशाली नहीं बना पाए कि हम उन पर, उनके कार्यों पर कुछ अचरज कर सकें। मृत्‍यु के नाम पर कुछ दहल जाएं। बस भुलाना और सब कुछ बिसार देना हमारी आदत में घुल गया है। हम अपनी निकट जरुरतों को छोड़ बाकी सब कुछ भूलते जाते हैं। यदि मानवता की सेवा में उन्‍होंने कुछ कार्य किए होते तो वे हमेशा जीवित ही रहते। शरीर उनका भले ही मिट जाता पर उनकी यादें तो अमिट होतीं। लेकिन अपने साथ रहनेवालों को समाप्‍तप्राय: देख, अनुभव कर भी हम चेत नहीं रहे। उन्‍हीं की तरह हम भी जीवन-समय निरर्थक गुजार रहे हैं।
जनसंख्‍या ने इतना विशालकाय आकार धारण कर लिया कि हमें ओर-छोर की चिंता ही कहां रहती है। किसी को भी अपने अलावा कुछ नहीं दिख रहा है। अपने को देखने के लिए हमारी आंखें सम्‍पूर्ण हैं। शेष समय वे अन्‍धी प्रतीत होती हैं। आदमी पग-पग पर अभिनय कर अपना रुप और विचार बदल रहा है और ऐसे में उसके बारे में जानना कठिन लगने लगा है कि वह किस धारा का मनुष्‍य है। मनुष्‍य किस आधार पर मनुष्‍य है, यह विचार उत्‍तर के बिना ही रह जाता है। अन्‍तत: विचार करुण विलाप करता हुआ एक भाव बनता है और इस तरह दुनिया की बेरुखी से मटियामेट हो कर कालविलीन हो जाता है।
अपने को मैंने कई बार समझाया कि अन्‍तरात्‍मा की बात सुन कर निर्णय कर। पर न जाने क्‍यों निर्णयों के समय मैं अपंग हो पड़ा रहता हूँ। इस दौरान खुद पर विश्‍वास भी नहीं रहता। मैं कहता हूँ भगवान पहले किसी भी व्‍यक्ति को इतना मजबूत बनाया जाए कि वो बड़े से बड़ा कार्य भी सहजता से निपटता हुआ चले, तभी उसको जन्‍म दिया जाए। अन्‍यथा आदमी पैदा ही न हो धरती पर। क्‍योंकि तेरी बनाई इस दुनिया में तेज-तर्रार आदमी सीधे आदमी को सीधा भी नहीं देख सकता और अपने जैसा बनने पर उससे दुश्‍मनी भी करता है। ऐसे में सीधे मनुष्‍य के पास कौन सा रास्‍ता बचता है जीवन के लिए, इस प‍र अवश्‍य विचार करना प्रभु।
जीवन अंकुर फूटे हुए सदियां बीत चुकी हैं। तब से अब तक जीवन-स्‍तर कई चरणों से होता हुआ इस सदी के इस समय तक पहुंच चुका है। आज वैज्ञानिक आविष्‍कारों और अनुसन्‍धान से तैयार अनेक मानव सहायक मशीनों की उपलब्‍धता ने जहां एक ओर आदमी को बड़ी राहत दी है, वहीं दूसरी ओर इससे जीवन का स्‍वाभाविक चलन भी खत्‍म हुआ है। औरों के बारे में तो पता नहीं पर मैं मशीन और मानव की अवधारणा के बीच झूल रहा हूँ। मशीनीकरण की अपेक्षा मुझे मानवीय अवधारणा ज्‍यादा प्रभावित करती है। मेरी वैचारिक दृष्टि मानवता से प्रेम करती है। मुझे लगता है यदि मानवता की कीमत पर मशीनी उत्‍पादन ऐसे ही होता रहा तो आविष्‍कारक और उत्‍पादक ही दुनियाभर में नजर आएंगे। मनुष्‍य मिट जाएगा, और यदि मनुष्‍य ही नहीं रहेगा तो फिर मशीनी गठन-पुनर्गठन किस के लिए!
मशीनों से सजे आधुनिक जीवन को जीते-जीते और मौत आने तक मरनेवालों में गूढ़ मानवी भाव कभी नहीं जागा। वे अपने जीवित रहने के समय को स्‍थायी मान बैठे थे। शायद मौत से पहले भी उन्‍हें ऐसी किसी आधुनिक मशीन की लालसा रही हो, जो उन्‍हें वापस जीवनदान दे सके। लेकिन ऐसा कहां होता है कि मौत को भी आधुनिकता वश में कर ले। जीवन से आधुनिकता कितना भी खेले, कैसे भी खेले पर मौत के सामने ये भी बेबस है। आधुनिकता से लिपटे जीवन-भ्रम को सच का दर्पण दिखाने की सख्‍त जरुरत है। इसके लिए हमें परंपरा से जुड़ना होगा। उसे फिर से जीवन बनाना होगा। मानवता से प्रेम करना होगा। तब ही जीवन जीते हुए मानव सच्‍चे सुख से सम्‍पूर्ण होगा और मृत्‍यु को भी सहजता से स्‍वीकार कर सकेगा।

Wednesday, March 13, 2013

सोने जागने का संघर्ष



सोने से पहले
जब तक निश्चिंत रहा, खेलता-दौड़ता भागता फिरता रहा तब तक ही आठ और उससे ज्‍यादा घंटों की नींद सो सका था। इसके बाद नींद मुझसे रुठ गई और अभी तक रुठी हुई है। शुरु में तो मैं इस अनिद्रा रोग से खुश था। इस दौरान जो जागत है वो पावत है, जो सोवत है वो खोवत है वाक्‍य मुझे नींद पूरी नहीं होने जैसी बीमारी से लड़ने की शक्ति देता रहा। अपनी अधिकाधिक जागृत अवस्‍था से मैं अपने लिए दिव्‍य अनुभव बटोरता रहा। अनुभवों को लिखता रहा। तरह-बेतरह की परिस्थितियों के लिखे गए वर्णन पढ़ कर अच्‍छा लगता। दोस्‍तों को पढ़ाता। वे भी प्रभावित होते और निरंतर लिखने के लिए कहते। लेकिन उनको ये आभास नहीं था कि लिखने, पढ़ने और इससे प्रभावित होने का आनन्‍द स्रोत मेरी अनिद्रा थी। जवान शरीर और दिमाग के रहते तो नींद नहीं आने के दुष्‍परिणामों से बचा रहा, पर अब देर रात तक जागना यानि की नींद नहीं आना कष्‍ट देता है। आंखों में जैसे सारे शरीर का भारीपन आ कर स्थिर हो गया है। लेकिन इतना भार ढोते-ढोते भी थकावट से चूर आंखों में नींद का नाम नहीं है।

      कल रात भी पिछली रातों की तरह काली ही रही। सुबह सोचा कि आज रात दिमाग को सोचने पर नहीं लगाऊंगा। केवल सोऊंगा। लेकिन नींद आ भी जाए पर परिवेश के शोर को कैसे कम करुं, इससे छुटकारा कैसे पाऊं! किराए का दो कमरे का घर। सभी घर आपस में सिंगल ईंट से खड़ी दीवारों से जुड़े हुए। पास-पड़ोस में कोई अपना बाथरुम का दरवाजा भी जरा जोर से बंद करता है तो आस-पास के दो-तीन घर हिल जाते हैं। कोई अपने किचेन में खाना बना रहा है या बर्तन धो रहा है तो उसकी आवाज भी ऐसे सुनाई दे जैसे अपने ही घर में यह सब हो रहा है। जिस आदमी की नींद दीवार घड़ी की सेकेंडवाली सुई की टक-टक से भी उचट जाती हो, उसके लिए पास-पड़ोस के ऐसे हो-हल्‍ले किसी विस्‍फोट से कम नहीं हैं।

कल भी कुछ न सोचने के प्रण के साथ जैसे ही सोने की कोशिश की तो घर के पीछे की तरफ के घर से पति-पत्‍नी के लड़ने, चीखने, आपस में गाली-गलौज करने की कर्कश आवाजें आने लगीं। पति की आवाज तो बहुत कम सुनाई दी पर पत्‍नी तो ऐसे सुनाई दी जैसे उसके मुंह में हजारों कैंचियां लगी हुई हैं। बिना रुके और तुतलाए, स्‍पष्‍ट साफ शब्‍दों में उसने जितनी भी बातें कहीं उनसे उस घर की पूरी कहानी समझ आ गई। समय देखा तो रात के सवा एक बज रहे थे। भगवान शिव को याद करने लगा। प्रार्थना की कि हे प्रभु इन को सद्बुद्धि प्रदान कर। मेरी प्रार्थना का असर रहा हो या वे आपस में लड़ते-झगड़ते थक गए हों, आधे घण्‍टे बाद शांति छा गई। सोचा अब नींद का ध्‍यान करुं। इतने में गली के कुत्‍ते मिल कर जोर-जोर से भौंकने लगे। रात की शांति भंग करते हुए इतने कुत्‍तों का एक साथ भूंकना, लगा जैसे शोर का तूफान गलियों से उठकर आसमान की तरफ और तीसरे मंजिल के मेरे रहने के दो कमरों की तरफ ही बढ़ रहा है। अब तक तो सिर भन्‍ना रहा था और अब वह भारीपन से बुरी तरह दब गया था।

      जब सब शोर थम गया, आवाजें रुक गईं तो पानी पी कर  फिर  सो गया। घड़ी साढ़े तीन बता रही थी। अब तो सुबह होने तक करवट गिनने की बारी थी। पांच से छह बजे के बीच अगर थोड़ी नींद आती भी तो वह सुबह के कोलाहल से उचट जाती। अन्‍त में अखबार वालों, दूधिया, स्‍कूली बच्‍चों, मोटरसाइकिल, कार, खाना बनाने, बर्तन धोने की आवाजों के साथ विचित्र-विचित्र सपनों के आने-जाने के बीच सोने और जागने का संघर्ष।

बिटिया को स्‍कूल छोड़ आने के बाद पार्क में बैठ गया। पेड़, पौधे, हरी-हरी घास, रंग-बिरंगी कलियां और फूल, गिलहरी, कबूतर, चिड़िया, गीली मिट्टी को एक-डेढ़ घण्‍टे तक देखता रहा। प्राकृतिक ठण्‍डी हवा का सेवन करता रहा। रात के शोर, अनिद्रा, बेचैनी, थकावट से लड़ने के लिए सुबह मैं इन्‍हीं की सहायता लेता हूँ। रातभर नींद न आने के बावजूद भी दिनभर रोजगार करने के लिए प्रकृति ही मुझे जागृत करती है। पार्क से बाहर आ कर दोबारा वही तेज हार्न बजाते वाहनों का अनावश्‍यक ध्‍वनि-प्रदूषण, कबाड़ीवालों का गला फाड़ कर चिल्‍लाना, रेहड़ी-फेरीवालों का वस्‍तु बिक्री गान सुनाई देता है। रात को मेरे जैसों की नींद हराम करने के बाद कुत्‍ते यहां-वहां पसरे हुए सो रहे हैं। ये हाई टेक सिटी नोएडा की कहानी है। व्‍यक्ति के लिए इतनी दुश्‍वारियां होने के बावजूद कर्ताधर्ताओं के लिए तरक्‍की शब्‍द आकर्षण बना हुआ है। आदमी वाहन चला रहा है या पैदल चल रहा है, वह घर में है या बाहर सब जगह ध्‍वनि-प्रदूषण का आतंक है।

      मनोज कुमार अभिनीत शोर फिल्म याद आती है। उसमें अभिनेता जीवन परिवेश के शोर से इतना दुखी हो जाता है कि एक दुर्घटना में अपनी सुनने की शक्ति गंवाने के बाद उसे दुख नहीं होता। बहरा होना उसे श्रवणशक्ति से पूर्ण होने से ज्‍यादा भाता है। बहरेपन में जब कोई उसे इशारे से आसमान में उड़ता हवाई जहाज दिखाता है, तो वह उसको देखते हुए उसकी गड़गड़ाहट को नहीं सुनते हुए कितनी आत्‍मसं‍तुष्टि का अनुभव करता है। अपनी स्थिति भी शोर से आहत मनोज कुमार जैसी ही है।

       

Sunday, March 10, 2013

वो समय ये समय



समय की विडंबना

यह वो समय था जब नोएडा जैसे औद्योगिक शहर में हम बच्‍चे लोग लट्टू, कंचे, खो-खो, पकड़मपकड़ाई और छुपम-छुपाई खेल खेलते थे। गर्मियों की छुटि्टयों में हम लोग कुछ पैसे में उधार ला कर कॉमिक्‍स पढ़ते थे। लूडो, कैरम बोर्ड में तपते दिन कब निकल जाया करते पता ही नहीं चलता।

टी.वी. के नाम पर मात्र दूरदर्शन एक चैनल था। वह भी बड़ों और बच्‍चों द्वारा बड़े चाव से देखा जाता था। पांच-दस मिनट तक तो टेलीविजन पर आनेवाले कार्यक्रमों का क्रम ही चलता रहता था। उसमें भी टी.वी. मालिक की हिदायत होती कि कोई शोर न करो, चुपचाप देखो। टी.वी. और वीडियो के जिन फास्‍ट मूविंग चित्रों से दिमाग को आज परेशानी होती है, पहले वे बहुत ही आराम से टेलीविजन स्‍क्रीन पर आते-जाते थे। हम जमीन पर पालती मार के बैठ बहुत ही तन्‍मयता और शांति से कृषि-दर्शन का कार्यक्रम तक देखते थे। समाचार बुलेटिन के वक्‍त तो सब लोग टी.वी. देखने के लिए ऐसे स्थिर हो रहते जैसे दूसरे ग्रह के किसी प्राणी को धरती पर उतरते हुए देख रहे हों। हम बच्‍चों के लिए ही-मैन, रामायण, सिंहासन बत्‍तीसी, मालगुडी डेज जैसे नाटक किसी परीलोक के चलचित्र जैसे होते थे, जिन्‍हें हम इतना तल्‍लीन हो कर देखते कि नाटक के पात्रों के एक-एक संवाद को कंठस्‍थ कर लेते, एक-एक चलचित्र को वीडियो की रील की तरह अपनी स्‍मृति से चिपका देते। कभी-कभी किसी घर में शनिवार की रात को वीडियो दिखाया जाता था। रातभर तीन फिल्में  दिखाई जाती थीं। सब लोग वीडियो देखने के पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार अपने-अपने काम निपटा कर जमीन पर पंक्ति में बैठकर फिल्में  देखते थे। सबसे पहले संतोषी माता जैसी धार्मिक फिल्में  लगाई जातीं थीं। उसके बाद एक भूतोंवाली और एक साधारण फिल्म दिखाई जाती। सुबह तक लोग आंखें फाड़कर टी.वी. की स्‍क्रीन पर चिपके रहते थे।

ऐसा नहीं था कि हम सारा समय खेलते या टी.वी. ही देखते रहते थे। पढ़ाई-लिखाई से लेकर सभी जरुरी कामों को भी वक्‍त पर निपटाते थे। सुबह दूध लाते थे, बड़ों के कई रोजमर्रा के कार्य करते थे। छठी या सातवीं कक्षा में पढ़ते हुए मैं मकान बनाने के लिए सीमेंट, सरिया, रेत, रोड़ी, बदरपुर की खरीदारी करता था। भैंसाबुग्‍गी में ईंटें ढोनेवाले के साथ बैठ कर ईंट की दूकान से घर तक आता था। कहीं ईंटवाले ने कम ईंटें न रखीं हों या रस्‍ते में कहीं पर कोई ईंट गिर न जाए, यह देखने की जिम्‍मेदारी भी मेरी ही थी। ऐसी ही अनेक जिम्‍मेदारियों का निर्वाह करते हुए, खेलते-कूदते, पढ़ते-लिखते कब समय गुजर गया, पता ही नहीं चला। अस्‍सी के दशक के आखिरी दो-तीन और नब्‍बे के दशक के शुरुआती तीन-चार वर्षों तक शहरी जीवन थोड़ा शहरी होते हुए भी बहुत प्रेमिल, स्‍नेहिल, सहयोगी, जिम्‍मेदाराना और उमंग-तरंग से परिपूर्ण था।

नब्‍बे के दशक में भारत में उदारीकरण की शुरुआत हो रही थी। शायद बड़े-बुजुर्गों और संवेदनशील लोगों को इसके संभावित खतरे दिखाई देने लगे थे। इसलिए उस समय वे हमें देख कर कहते कि इन बच्‍चों के भविष्‍य के बारे में चिंता होती है। हममें से ज्‍यादा बच्‍चे उनकी बातों को हंसी-ठट्टे में उड़ा दिया करते और सोचते कि ये क्‍या और कौन सी बातें कर रहे हैं।

आज उनकी कही गईं और हमारे समझ से बाहर रहीं बातें गम्‍भीरता से याद आती हैं। वाकई हमारे भविष्‍य के बारे में उनकी चिंताएं उचित थीं। वे शायद हताश थे कि परम्‍परागत जीवन को बचा कर रखने में उनके प्रयास सफल नहीं हो रहे हैं। इससे भी बड़ा डर उन्‍हें अपनी जड़ों से खुद के खदेड़े जाने का था। वे आधुनिक विभीषिका के शुरुआती प्रयोगों से ही इतने विचलित हो गए थे कि उनका डर उनमें अकारण ही बार-बार उभर आता था।

आज के बच्‍चों को मोबाइल, इंटरनेट से लेकर तमाम आधुनिक सुविधाओं (दुविधाओं) का प्रयोग करते हुए देखता हूँ तो एक बार तो वे बड़े तेजतर्रार लगते हैं, पर दूसरे ही पल जब उनको असहाय व्‍यक्तियों, बड़े-बुजुर्गों की असभ्‍य तरीके से अनदेखी करते हुए देखता हूँ तो अपने बालपन के बुजुर्गों की हमारे भविष्‍य की चिंताओं को याद करने लगता हूँ। जब बच्‍चों, किशोर, युवक और युवतियों को इस हद तक गैर-जिम्‍मेदार पाता हूँ कि वे अपने घर का छोटे से छोटा काम भी बिना किसी आत्‍मप्रेरणा के और बगैर बताए करने को तैयार नहीं हैं तो मैं आत्‍मग्‍लानि से घिर जाता हूँ। पुरानी और नई पीढ़ी के बीच मध्‍यस्‍थता करने की बात पर अपनी उम्र के लोगों के लिए शुभकामनाएं करता हूँ। परम्‍परा और आधुनिकता दोनों में संतुलन स्‍थापित करने, विकास और विनाश के बीच के अन्‍तर को देखते हुए हम लोगों की यह बहुत बड़ी जिम्‍मेदारी है कि हम मानवता की परम्‍परा को भी बनाए रखें और आधुनिक विकास के सही-गलत परिणामों की भी पड़ताल करते रहें, ताकि नई पीढ़ी का संसार-बोध संतुलित हो सके।

Saturday, March 9, 2013

महाशिवरात्रि

ॐ नम: शिवाय
इस समय रा‍त के साढ़े ग्‍यारह बजे हैं। बाहर मन्‍द हवा चल रही है। हरे वृक्षों का धीमे-धीमे हिलना अद्भुत दृश्‍य प्रतीत हो रहा है। भागदौड़, प्रतियोगिता और घोर असंवेदना के इस युग में यह रात्रि का स्थिर समय कितना स्‍वप्निल लग रहा है। पवन के धीरे-धीरे आते झोंके, कोई इन्‍हें न रोके…..। दिनभर की व्‍यावसायिक व्‍यस्‍तता से पस्‍त शरीर और दिमाग इस शांत, शीतल हवा से जैसे नया जीवन पा रहे हैं।
      रात के बढ़ते रहने से दूर सड़कों पर कम होती वाहनों की संख्‍या इस बात को प्रगाढ़ बनाती है कि रात के पंजे शक्तिशाली हैं। सभी लोग इसके नियन्‍त्रण में आ कर आराम करते हैं। यह रात ही है जो मनुष्‍य और अन्‍य प्राणियों को अगले दिन की ऊर्जा प्रदान करने के लिए अपने पास ला कर सुलाती है, ताकि सभी प्राण एक दूसरा संघर्षभरा दिन व्‍यतीत करने के लिए आवश्‍यक शक्तियां प्राप्‍त कर लें।
      रात्रि की इस त‍टस्‍थता में सब कुछ थम जाता है। सारी संवेदनाएं इसी समय पुष्पित और पल्‍लवित होती हैं। सभी स्‍नेह प्रसंग इसी रजनी प्रहर में घटित होते हैं। कठोर से कठोर हृदय  भी अपने को कहीं न कहीं किसी अहसास में डूबा हुआ पाता है। सपनों का संसार मनुष्‍य को रोज एक नए भाव-संसार की सैर कराता है। स्‍वप्‍न दशा की गति मनुष्‍य की प्‍यार-भरी भावनाओं की सबसे बड़ी प्रतीक हैं।
सोने से पहले, नींद में समाने से पूर्व मैं घर की बॉलकनी में खड़ा यह सब कुछ सोच ही रहा था कि अचानक याद आया कि आज तो महाशिवरात्रि थी। कई लोगों ने आज शिव भगवान के लिए व्रत रखा हुआ था। लेकिन वे सब शीघ्र ही खा-पीकर सो गए। दूर कहीं किसी मन्दिर से भजन गाने की ध्‍वनियां आ रही हैं। मैं उनमें त्‍यौहार का सारांश ढूंढ रहा हूँ पर अचानक और कई प्रकार की ध्‍वनियों के मिश्रण से गाया जानेवाला भजन अस्‍पष्‍ट सुनाई दे रहा है।
मेरा अनुभव है कि कुछ त्‍यौहारों का स्‍वागत वर्षा भी करती है। महाशिवरात्रि, रक्षा बन्‍धन जैसे त्‍यौहारों के दिन बूंदाबांदी जरुर होती है। अपवादस्‍वरुप किसी वर्ष बारिश न होती हो तो वो अलग बात है। लेकिन अधिक अवसरों पर आसमानी जलधाराएं पृथ्‍वी को तर कर ही देती हैं। सुबह हुई बारिश और धूप-छांव के साथ व्‍यतीत हुआ पूरा दिन मनोहारी बना हुआ था और अब रात को मौसम थोड़ा ठंडा हो गया है।
      स्‍ट्रीट लाइट के प्रतिबिम्‍ब में धरती पर पड़तीं पेड़ों की छायाएं अपनी काली परत में कई विचित्र आकृतियों से सुसज्जित हैं और उनके धीरे-धीरे हिलने से उनकी काली आकृतियां भी हिल रही हैं। धरती पर, मिट्टी पर उन आकृतियों के हिलने से मेरा मस्तिष्‍क ठंडक प्राप्‍त कर रहा है। ऐसा वातावरण अत्‍यन्‍त भोला, सुन्‍दर और संवेदनामयी लग रहा है। इस समय आकाश साफ, निर्मल और तारों से युक्‍त है। एकाध व्‍यक्ति इतनी रात बीत जाने पर यदि दिख रहा है तो वह अचम्भित कर रहा है।
      इतने आलोकित बाह्य परिदृश्‍य से अनभिज्ञ लोग घरों में, नींद में हैं। उनके लिए शाम होते ही अपने घर का द्वार बन्‍द करना कितना सरल होता है, जबकि मेरे लिए घर के अन्‍दर जाना कितना कठिन! महाशिवरात्रि की यह रात मेरी दैनंदिन की समस्‍याओं को कहीं दूर फेंक चुकी है। मैं ईर्ष्‍या और द्वेष भूल चुका हूँ। इस समय मैं पवित्र मानव हूँ, मैं धार्मिक त्‍यौहार का सच्‍चा व्रती प्रतीत हो रहा हूँ। लेकिन फिर  भी एक कमी मुझमें उपस्थित हो रही है, जो ऐसी रातों के लिए सबसे अधिक अनुपयुक्‍त है कि मुझे भी नींद आ रही है और मैं भी साधारण मानव में परिवर्तित हो रहा हूँ। सुबह अपने पर झुंझलाने के लिए कि मूल्‍यवान जीवन का एक और दिन बेकाम गया। फाल्‍गुन मास की कृष्‍ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है।
(14 फरवरी, 1999 का महाशिवरात्रि का संस्‍मरण। 14 वर्ष पूर्व के वार-त्‍यौहारों से प्रभावित होता था इसलिए संस्‍मरण लिख दिया करता था। आधुनिकता के आक्रमण ने मेरा सब कुछ चूस और निचोड़ दिया है, इसलिए अब वार-त्‍यौहारों से प्रभावित हो कुछ लिखने की योग्‍यता ही नहीं रही)