महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Thursday, December 19, 2013

पूष का धुन्‍धलका

मार्गशीर्ष के उतरते-उतरते और पौष के झरते ही मौसम ठण्‍ड, धुन्‍ध में लिपट गया है। रविवार पन्‍द्रह दिसम्‍बर तक तो नोएडा और इसके आसपास का क्षेत्र सुबह से ही चटक धूप के आगोश में था, लेकिन सोमवार सोलह दिसम्‍बर की सुबह तो जैसे कोहरे, धुन्‍ध में से ही पैदा हुई थी। प्राय: ऐसा मौसम मुझे अवसादग्रस्‍त किए रहता था, पर लगता है अब इस अनाकर्षित मौसम के प्रति मेरी दृष्टि में सकारात्‍मक बदलाव आ गया है।
श्‍वेत सुन्‍दर चन्‍द्रमा
सोमवार को सुबह सात बजे बस अड्डे के लिए चला। वहां तक ऑटोवाला मुझे मेरे जोखिम पर ही ले गया। वह चलने को तैयार नहीं था। मैंने किराया बढ़ाया तो वह धुन्‍ध में अन्‍धेरी सड़क पर डरते-डरते चलने को राजी हुआ। रेंगते हुए जब बस अड्डा पहुंचा तो ओंस और कोहरे की नमी से जैकेट भीग गई थी। बस से चिपक कर मालूम हुआ कि ये कोटद्वार की बस है। धुन्‍ध ऐसी कि हाथ को हाथ नजर नहीं आ रहा था। कोटद्वार जाते हुए राजमार्ग के दोनों ओर क्‍या-क्‍या है और क्‍या-क्‍या हो रहा है, पता ही नहीं चला। सरसों के पीले फूल सफेद धुन्‍ध में बिलकुल बेजान दिखे। ज्‍यादातर खेतों में पका हुआ गन्‍ना पसरा था। वो भी जब आंखें फाड़कर नजर दौड़ाई तो ही यह नजारा दिख सका। इसके अलावा मैं राजमार्ग के दोनों ओर छह घण्‍टे तक कुछ भी नहीं देख पाया।
मुझे ठण्‍ड लग गई। अचानक बढ़ी ठण्‍ड से कै आने को हुई। सुबह उठने से लेकर और कोटद्वार पहुंचने तक किसी से एक शब्‍द भी न बोल सका। भावनाएं तो जैसे धुन्‍धीले मौसम से सन कर पग-पग पर तैयार मनुष्‍यगत अव्‍यवस्‍थाओं के कारण मर गईं थीं। विवेक बेहोश हो गया। पूरी यात्रा के दौरान सोता-जागता और ऊंगता-खिझाता रहा। कहीं कै न आ जाए, इस अहसास से घबराया हुआ मैं कोटद्वार पहुंचा तो देखा कि पर्वतों की घाटी पर बसा यह गढ़वाली शहर उस धुंए और धुन्‍ध को तो जैसे पहचानता ही नहीं था, जिससे मैं कई तरह से पिछले छह घण्‍टे से पीड़ित था।
कोटद्वार में सूर्य किरणें धरती को फाड़ कर उसके अन्‍दर तक पहुंची हुईं थीं। नंगे पैर भी अगर वहां की मिट्टी पर चलता तो भी ठण्‍ड नहीं लगती। सूर्य ताप इतना तीक्ष्‍ण कि दो पल भी सूर्यप्रकाश ले लेने पर ठण्‍ड के रोगी उठ खड़े हों। यात्रा के लिए बांधा हुआ खाना कोटद्वार में खाया। पर्वत घाटी के आंचल में बसा यह शहर प्राकृतिक रूप से अच्‍छा है, लेकिन आधुनिकता की निरुद्देश्‍य दौड़ यहां भी बड़े शहरों की तरह ही एक रीति बन गई है। जिन बातों, विचारों, व्‍यवहार, प्रयोग, कुसंस्‍कृति से बड़े शहर जकड़े हुए हैं वे यहां भी पैर जमा चुके हैं।    
आप्टिकल फाइबर केबल बिछाने के लिए सड़क के दोनों किनारे दूर-दूर तक चार फीट गहराई तक खुदे हुए थे। खोद कर निकाली गई मिट्टी वहीं सड़कों के किनारे फैली हुई थी। विद्यालय से लौटते छोटे और मासूम बच्‍चे उसी गीली, सूखी मिट्टी के छोटे-मोटे टीलों और गड्डों से होते हुए घर जा रहे थे। पैदल मार्ग की ऐसी अव्‍यवस्‍था से कोई बच्‍चा खड्डे में गिर जाए या पूरी तरह से अनियन्त्रित हो चल रहे वाहनों में से कोई वाहन उसे टक्‍कर मार दे तो! अपने आसपास और दूर-दूर, जहां तक भी नजर घुमाई किसी को उन बच्‍चों की उपस्थिति का ही भान नहीं था। सरकारी, सामाजिक अव्‍यवस्‍था उनके लिए दुर्घटना का कारण बन सकती है, ये सोच तो जैसे उस वातावरण और उसमें मौजूद वयस्‍कों में थी ही नहीं। यह सोच कर और भी आश्‍चर्य हुआ कि जान जोखिम में डाल घर की ओर जा रहे बच्‍चे अकेले ही थे। पता नहीं उनके अभिभावकों का हृदय इतना पत्‍थर क्‍यों है! 
ऐसे में संसार का भावी समय बड़ा ही बेचारा प्रतीत होता है। उस समय के मासूम बच्‍चों की चिंता होने लगती है। मेरे इस मनोभाव पर यदि कोई कहे कि ऐसा सोचना बेकार है, और होगा वही जो सांसारिक नियति में लिखा है तो मैं कहूंगा कि ऐसा सोचनेवाला भावी दुनिया के बच्‍चों की चिंता तो दूर है, अभी के बच्‍चों की फिक्र भी नहीं करता होगा।
काम निपटा कर मैं और पिताजी पैदल ही सम्‍बन्‍धी के घर की तरफ आ रहे थे। रात को चांद कोटद्वार शहर पर चांदनी का छिड़काव किए हुए था। पर्वत घाटियों में दिन में जितना प्रखर सूर्यप्रकाश होता है रात को उतनी ही ज्‍यादा ठण्‍ड भी होती है।
अगले दिन दोपहर दो बजे कोटद्वार से वापस नोएडा की ओर चला। पर्वतों, घाटियों के प्रभाव से निकलते ही दिल्‍ली की ओर दौड़ती बस के अन्‍दर बैठा मैं फिर धुन्‍ध में प्रवेश कर चुका था। लेकिन ये सांझ की धुन्‍ध थी, जो सुबह की अपेक्षा अच्‍छी लगी। आंखों के लिए जो दृश्‍य दूरस्‍थ थे वे शाम और रात के बीच की धुन्‍ध में बदले हुए थे। लगभग ओझल, बुझे-बुझे सूरज की अन्तिम किरणें इन दृश्‍यों पर से फिसल कर अदृश्‍य हो चुकी थीं। धुन्‍धपूर्ण और अन्‍धेरे का आकर्षण मेरे मन में प्रकृति के प्रति दया का तार गुंजा रहा था। मैं उस दूर दिखते कोहरे में डूबे आकाश, धरती और घने वृक्षों के अन्‍दर की, उनके आगे की समय-स्थितियों में विचरण करने लगा। वहां के पता नहीं किन जीवों के जीवन की यादें आने लगीं।
कल कोटद्वार जाते समय जितना अवसादग्रस्‍त था, आज वहां से लौटते हुए उतना ही प्रफुल्लित हूँ। मन लगा कर बहुत दूर तक देखता रहा। गन्‍ना, सरसों के खेत, जुते हुए खेतों की मिट्टी, उनके मेड़ों पर खड़े पेड़ों और प्रकृति के प्रत्‍येक अंश को कोहरा अपने धुंए के आवरण में ले चुका था। चन्‍द्रप्रकाश उस कोहरे पर फैल चुका था। हलके चन्‍द्रप्रकाश में उभरती ठण्‍डे धुन्‍धलके की छवि हृदय में गहरा सूराख कर गई। उसांसें शुरु हो गईं। मासूम बच्‍चे, भोली प्रकृति और न जाने कौन-कौन विचित्र तरीके से याद आने लगा। विचलित करती स्‍मृतियों की अनुगून्‍ज सुनाई देने लगी।

15 comments:

  1. जब प्रकृति अपना सौन्दर्य छिपा लेती है, सब अवसादग्रस्त हो जाता है।

    ReplyDelete
  2. बस इसी आधुनिकता की निरुद्देश्य दौड़ में अंधे होकर हम खुद ही अपने मासूम बच्चों और भोली प्रकृति को संकट में डाल रहे हैं। इसके पीछे कुछ हद तक हमारी आत्मिक जरूरत या ललक जो भी कह लीजिये है। और कुछ प्रशासन की अनदेखी भी जिसके चलते पहले भी ऐसी दुर्घटनाएँ होती रही है। मगर फिर भी उन दुर्घनाओं से ना हम सचेत होते है और ना प्रशासन ही कुछ करता हैं। सब भगवान भरोसे चलता है अपने देश में ....

    ReplyDelete
  3. उम्दा लेख |हर मौसम का अपना महत्व होता है |कुछ व्यक्ति पर भी निर्भर करता है वह कैसा अनुभव करता है |
    आशा |

    ReplyDelete
  4. पूष के धुंध का आँखों देखी वर्णन...... बहुत अच्छी आलेख....

    ReplyDelete
  5. बहुत ही खूबसूरत वर्णन.
    इन स्मृतियों की अनुगूँज बहुत मधुर थी.

    ReplyDelete
  6. ये पूष का धुंधलका विचारों के धुंध को और भी सुहावना बना रहा है.. अति सुन्दर प्रवाह..

    ReplyDelete
  7. पर्वत के धूप जैसा अमृतगुण सच में कहीं और नहीं मिलता.

    ReplyDelete
  8. वाह ! सुबह का कोहरा, सर्द हवा, ओस की बूँदें और हल्के बादलों का तिलस्मी तालमेल !!
    गोया के पौष की धुंध में ये फगुनाते ख़याल, कुछ जादुई से लगे !

    ReplyDelete
  9. हर मौसम का अपना एक अलग ही मज़ा होता है। हाँ यह बात और है कि किसी को ठंड पसंद होती है तो किसी को गर्मी। मुझे तो सारे ही मौसम बहुत पसंद है। लेकिन आपकी इस यात्रा ने ठंड और धुंध के सुहावने मौसम के प्रति आपकी सोच में सकरात्मक बदलाव ला दिया यही बहुत है।

    ReplyDelete
  10. काम निपटा कर मैं और पिताजी पैदल ही सम्‍बन्‍धी के घर की तरफ आ रहे थे। रात को चांद कोटद्वार शहर पर चांदनी का छिड़काव किए हुए था। पर्वत घाटियों में दिन में जितना प्रखर सूर्यप्रकाश होता है रात को उतनी ही ज्‍यादा ठण्‍ड भी होती है।
    सूरज के दर्शन न होना ४० मिनिट धुप में न बैठ पाना बे -चैनी का सबब बनता है यह शरीर की मांग है सूरज से नित भेंट हो उसका सेंक लगे
    .
    बहुत सुन्दर विश्लेषण परक यात्रा वृत्तांत।

    ReplyDelete
  11. विकेश भाई शुक्रिया आपकी टिपण्णी का। शोध की दिशा पर आपकी असहमति का स्वागत है।

    ReplyDelete
  12. प्रकृति का सौन्दर्य समाज की अव्यवस्थाओं को कुछ देर के लिए तो भुला सकता है लेकिन अव्यवस्थाएं फिर-फिर सामने खड़ी होकर चिल्लाती हैं

    ReplyDelete
  13. प्राकृति का सम्मोहन ऐसा ही है ... सब कुछ पल भर में ही भुला देता है ... पर कठोर यथार्थ को भूलना मंज़ूर नहीं होता ...
    नव वर्ष की मंगल कामनाएं ...

    ReplyDelete
  14. mujhe lagta hai ki aap yatra vivran achha likh sakte hain. mousam ka bahut achha description diya hai aapne. aur haan ye kotdwar naam maine pahle bhi padha hai aur aaj bhi ek story collection ki ek kahani mein ye naam aaya. agar aap is shahar ke baare mein alag se ek post likhenge toh thodi jaankaari badhegi.

    ReplyDelete
  15. बहुत बढ़िया प्रस्तुति...आप को मेरी ओर से नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं...

    नयी पोस्ट@एक प्यार भरा नग़मा:-तुमसे कोई गिला नहीं है

    ReplyDelete

Your comments are valuable. So after reading the blog materials please put your views as comments.
Thanks and Regards