Sunday, November 17, 2013

समय-समय के पूर्वाग्रह


पूर्वाग्रहों का क्‍या अर्थ है? यही कि अगर बिल्‍ली वो भी काली बिल्‍ली रास्‍ता काट दे तो अपशकुन तय है। काला कौवा घर के आंगन में कांय-कांय करे तो बुरी खबर मिलने के आसार हैं। इनके अलावा भी कितनी ही बातें पूर्वाग्रह के अन्‍दर आती होंगी। मेरे अबोध दिमाग में जब ये बातें पड़ी होंगी तो निश्चित रुप से मैं इन्‍हें नकार नहीं सकता था क्‍योंकि इनके बारे में मुझे मेरे बड़ों द्वारा बताया गया था। आज जब दीन-दुनिया को खुद समझ सकता हूँ तो अबोध स्‍मृति में कैद हुए पूर्वाग्रहजनित अनुभव मुझे अब भी कहीं न कहीं किसी न किसी बात पर या घटना होने पर विचलित करते हैं। मैं ही क्‍यों जीवन परिवेश के तमाम लोगों को मैंने ऐसे पूर्वाग्रहों से ग्रसित पाया। यह ठीक है या गलत इस बात की पड़ताल तो वही कर सकता है जिसके पास ऐसा कोई अहसास ही न हो। इनके बारे में जाननेवाला, सोचनेवाला तो इनसे छुटकारा पाने को भी छटपटाता है और किसी न किसी स्‍तर पर इनसे प्रभावित भी रहता है। 
कल रात घर की सीढ़ियों पर चढ़नेवाला ही था कि एक काली बिल्‍ली ने रास्‍ता काट दिया। इसे सामान्‍य घटना समझ कर भूलने के बजाय मैं इसकी आशंकाओं से घिर गया। पहला खयाल तो यही आया कि घर में सब ठीकठाक होगा या नहीं! तुरन्‍त अपने विचार को पलटा। काली बिल्‍ली, इसका रास्‍ता काटने की बात से ध्‍यान हट गया। याद आया कि मैं भारत के राज्‍य उत्‍तर प्रदेश में रहता हूँ। राज्‍य सरकार की कार्यप्रणाली प्रबुद्ध व्‍यक्तियों की दृष्टि में नकारा ही है। जिस हिसाब से पिछले दो-तीन साल से राज्‍य चल रहा है उस स्थिति में तो लाखों-करोड़ों काली बिल्लियों को लोगों का रास्‍ता प्रतिपल काटना चाहिए। इस प्रकार से तो यहां के कौओं के साथ-साथ प्रवासी कौओं को विशाल संख्‍या में आकर हमेशा के लिए यहीं हिन्‍दुस्‍तान में बसना होगा।
बात पूर्वाग्रह की है। बचपन में मेरे मस्तिष्‍क को जिन उपर्युक्‍त पूर्वाग्रहों से भरा गया था, एक प्रकार से ये मुझे या मेरे जैसों को किसी भावी अनहोनी के प्रति सचेत करते हैं। इनसे व्‍यक्ति विशेष दुर्घटनाओं की आशंका से भर जाता है। बेशक किन्‍हीं परिस्थितियों में ये आशंकाएं सच साबित हो जाया करती हैं, किन्‍तु इसका अर्थ यह नहीं कि इस प्रकार के पूर्वाग्रहों पर वाद-विवाद या विचार-विमर्श होता है। ऐसा भी नहीं कि इस विषय के विवाद व वितर्क मनुष्‍यों के बीच लड़ाई का कारण बनें।
इन पूर्वाग्रहों के सम्‍बन्‍ध में कई घटनाएं मेरे सामने घट चुकी हैं, जिनसे यही सिद्ध हुआ कि लोग, वो भी खास गाड़ी-घोड़ावाले इनके प्रभाव में मजबूती से जकड़े हुए हैं। यातायात नियमों का उल्‍लंघन करते हुए कान फोड़ सकनेवाले और दिल का दौरा ला सकनेवाले तीखे हॉर्नों पर न सरकार का और ना ही वाहन चलानेवालों का नियन्‍त्रण है। जरुरी काम से जा रहे हैं या बिना काम के गति के मामले में भी वाहन चालक कोई समझौता नहीं करते हैं।
एक बार कहीं जा रहा था। देखा पीछे से जोर से हॉर्न बजाता तीव्र गति से चलता चौपहिया आ रहा था। अपने को इससे बचाऊं, इसे आगे जाने दूं ये सोचकर मैं एक किनारे खड़ा हो गया। अचानक मेरे पैरों से होते हुए बिल्‍ली सड़क के दूसरी तरफ चली गई। वाहन चालक ने तीव्रगति में चलती गाड़ी को रोका और इंतजार करने लगा कि पहले मैं सड़क पार करुं। मतलब अब उसे कोई जल्‍दी नहीं थी। जब मैं भी अपनी जगह से नहीं हिला और हम दोनों के अलावा फौरन किसी तीसरे के आने की संभावना भी उस मार्ग पर नहीं रही तो वाहनचालक बिल्‍ली द्वारा काटे गए मार्ग से आगे नहीं बढ़ा। उसने गाड़ी को पीछे मोड़ा और उसी दिशा में चल दिया जहां से वह आ रहा था।
कहने का तात्‍पर्य ये कि मनुष्‍य पूर्वाग्रहों से इतना जकड़ा हुआ है कि वह इन्‍हें साथी मनुष्‍यों की जरूरतों, कष्‍टों, चिन्‍ताओं से ज्‍यादा सम्‍मान देता है। यातायात नियम भले ही उस व्‍यक्ति के नजर में कुछ नहीं थे, लेकिन बिल्‍ली द्वारा उसका रास्‍ता काटना और उसका उस रास्‍ते को पार न करना कितनी नियमबद्ध बात हो गई! बिल्‍ली के उसका रास्‍ता काटने से पहले वह यातायात के नियमों की धज्जियां उड़ाता हुआ, पैदल यात्रियों की जान को जोखिम में डालता हुआ, कानफोड़ू हॉर्न बजाता हुआ दनदनाता हुआ ऐसे भागा जा रहा था मानो अपने गंतव्‍य पर फौरन न पहुंचा तो दुनिया का कोई सामूहिक हित नहीं सधेगा।
लेकिन आज के सन्‍दर्भ में यदि इन पूर्वाग्रहों का अध्‍ययन हो तो एक गोपनीय और रहस्‍यमय जानकारी मिलती है। आज देश-विदेश के सूत्रधार पुरातन पूर्वाग्रहों के स्‍थान पर राजनीति, शासननीति के लालच में मनगढ़ंत पूर्वाग्रहों का सृजन करने पर लगे हुए हैं। पुराने पूर्वाग्रह अगर मानव-समाज की भलाई को केन्‍द्र में रखकर बनाए गए थे तो इस युग में आज पूर्वाग्रहों को सत्‍ता प्राप्ति के लिए नए कलेवर में ढाल दिया गया है। नए बच्‍चों की समझ में धर्मनिरपेक्षता, अल्‍पसंख्‍यक, आरक्षण इत्‍यादि के नाम पर आज जो पूर्वाग्रह डाले जा रहे हैं क्‍या उनके पीछे मानव और समाज कल्‍याण की कोई भावना परिलक्षित होती है? यदि नहीं तो क्‍यों इन्‍हें इस समयकाल के शिशुओं, उनकी अबोध स्‍मृति में जमाया जा रहा है? ये बच्‍चे जब बड़े होंगे और इन्‍हें इन पूर्वाग्रहों की सच्‍चाई ज्ञात होगी तो क्‍या ये चुप बैठ सकेंगे? क्‍या ये हमारी तरह अपने विवेक से अपने शिशुकाल के पूर्वाग्रहों का सही-गलत आकलन कर पाएंगे?
हमारे बचपन के पूर्वाग्रह बड़े होने पर विमर्श, विचार का आधार बन सके क्‍योंकि इनमें जो वैज्ञानिक-धार्मिक गुत्‍थी उलझी हुई थी, वह सार्थक समाजानुकूल थी। हमने उन्‍हें उनकी आवश्‍यकता-अनावश्‍यकता के अनुरुप स्‍वीकार-अस्‍वीकार किया है। लेकिन आज के समय के पूर्वाग्रह और इनको सीखनेवाले शिशु क्‍या भविष्‍य में इनसे कोई उपयुक्‍त सामंजस्‍य बिठा पाएंगे, ये सोचकर विनाश का आभास ही होता है।


18 comments:

  1. preconceptions and prejudices are part of every culture..
    we all have few.. but, as you said after a particular threshold it hampers our way..

    I think we should always remain open for unlearning and relearning.. !!

    Nice space u have.. !!

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  2. सुन्दर लेख लिखा है आपने विकेश जी, कुछ संकेत हमें अवश्य मिलते हैं।

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  3. मानव मन जाने या अनजाने सदैव किसी न किसी पूर्वाग्रहों से ग्रस्त रहता है...बहुत सारगर्भित चिंतन...

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  4. पूर्वाग्रह ठीक नहीं ये तो सत्य है ... फिर पूर्वाग्रह क्या हैं इसपे बहस हो सकती है ... कई बार कुछ तथ्य जिनके बारे में वैज्ञानिक दृष्टिकोण स्थापित नहीं हो पाता उन्हें हम पूर्वाग्रह मान लेते हों जो ठीक नहीं ... ये खोज का विषय है और विज्ञानं की तककी भी इसी से होनी है ... न की पूर्वघ्रह मान के छोड़ देने से ...

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  5. आपका लिखने का अंदाज़ पसंद आया । व्यंग्यात्मक शैली में लिखा ये लेख बढ़िया लगा |

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  6. इस मामले में मैं दिगंबर नासवा जी बात से पूरी तरह सहमत हूँ। मेरे विचार से आपने शुरुआत में जो उदाहरण दिये, उसे पूर्वाग्रह नहीं अंधविश्वास माना जाना चाहिए। क्यूंकि अंधविश्वास हमेशा गलत ही होता है। मगर पूर्वाग्रह शायद सही और गलत दोनों हो सकते है। ऐसा मेरा मानना है। वाकई यह खोज का विषय है।

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  7. विकेश बडोला जी आपने बहुत बढ़िया सवाल राजनीति के धंधेबाज़ों के सन्दर्भ में उठाया है जो शब्दों के दिग्भ्रमित करने वाले आग्रह मूलक अर्थ निकाल रहे हैं मसलन वो चर्च की एजेंट बी जे पी को सांप्रदायिक कहती है जिसे सम्प्रदाय शब्द का अर्थ ही नहीं पता यह नहीं पता भारत एक सम्प्रदाय प्रधान देश है। पहले जितने हिन्दू थे सबके अपने अपने देव थे। सम्प्रदाय समाज को कुछ देता था -वैषणव ,शैव ,शाक्य ये सब सम्प्रदाय ही थे। ये दल्ले कांग्रेसी धर्म -निरपेक्षता शब्द के मनमाने अर्थ निकाल रहे हैं। जबकि इस शब्द का अर्थ चर्च और स्टेट के अलहदगी से है न कि उसके गैर ज़रूरी दखल से इस या उस सम्प्रदाय की हिमायत करते हुए।

    साम्प्रदायिकता किस चिड़िया का नाम है कोई मुस्लमान आतताइयों के भारत पर हमलों से पूर्व जानता भी न था। कोई धार्मिक श्रेश्ठता को लेकर यहाँ कलह प्रियता नहीं थे सबके अपने अपने देव थे जिसको मर्जी पूजो। शिव मंदिर जाओ चाहे राम मंदिर या सिद्धि विनायक या फिर भगवान् कार्तिकेय के मंदिर में जाओ। ये झमेला यहाँ एक देव पूजकों ने आकर किया।

    भारत शुरू से ही एक सर्व-ग्राही सर्व समावेशी समाज रहा है। हिन्दू कैसे सांप्रदायिक हो सकता है आकर जिरह करें हमसे कथित सेकुलर तब हम उन्हें उनके पुराग्रहों के असली माने समझा देंगें।

    एक प्रतिक्रिया ब्लॉग पोस्ट :

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  8. पूर्वाग्रह जिसके प्रमाणित होने के कोई साइंटिफिक कारण मालूम नहीं होते.लेकिन हम मान लेते हैं.जो की अंधविश्वास है .. विचारणीय लेख

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  9. जाने -अनजाने कई बार इन पूर्वाग्रहों से मन ग्रस्त रहता ही है ..हम अपने आसपास से ही ऐसा बहुत कुछ सीखते रहते हैं .

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  10. बहुत गम्भीर विषय पर प्रकाश डाला है आपने, इस विषय पर गहन अध्‍ययन की आवश्यकता है...विचारणीय लेख

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  11. जो चीजें बचपन में पढ़ाई जाती हैं उसका असर तो होता है बालमन पर लेकिन परिपक्वता आते ही मनुष्य वही करता है जो वो करना चाहता है. नहीं तो आस्तिक माता पिता का पुत्र कभी नास्तिक नहीं होता या नास्तिक का आस्तिक.

    सच्चाई बाहर आये बिना कहाँ चैन पाती है. नहीं तो स्वतंत्रता के समय के जोड़-तोड़ की बातें कभी बाहर नहीं आती.

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  12. जो हो रहा है वो निश्चित रूप से भयभीत करने वाला है .... वैचारिक प्रश्न लिए पोस्ट

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  13. बहुत सुंदर आलेख.
    कभी-कभी कोई अन्धविश्वास जनश्रुतियों का रूप ले लेती हैं.ये कई पीढ़ियों तक इसी तरह चलती रहती हैं.आज के युग में भी इनका स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है.

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  14. जैसे बच्चों को बताया जाता कि आग जलाता है परन्तु वे बिना हाथ जलाये नहीं मानते हैं बैसे ही पूर्वाग्रहों को भी अपने निकष पर कस कर देखना चाहिए नहीं तो कूड़ेदान में फेंक देना चाहिए..

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  15. billi ko dosh dete samay ham log aksar bhool jaate hain ki wo bechari bhi kahin jaa rahi hogi aur ho sakta hai ki ham log hi uska rasta kaat rahe ho ??? bahut achha vishay uthaya aapne. ye bias hamaari aadat mein shamil ho gaye hain.

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  16. अच्छा लिखा है आपने..देर से ब्लॉग पर आने के लिए माफ़ी..

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  17. हथेली से तिनका छूटने का अहसास काफ़ी अच्छा लेख है , बहुत पसंद आया ऐसे ही लिखते रहे।
    अन्धविश्वास और विश्वास पर आधारित खोजो के लिए मेरे ब्लॉग अवश्य पढ़े -
    १-मेरे विचार : renikbafna.blogspot.com
    २-सत्य की खोज में (इन सर्च ऑफ़ ट्रुथ ) : renikjain.blogspot.com

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  18. हथेली से तिनका छूटने का अहसास काफ़ी अच्छा लेख है , बहुत पसंद आया ऐसे ही लिखते रहे।
    अन्धविश्वास और विश्वास पर आधारित खोजो के लिए मेरे ब्लॉग अवश्य पढ़े -
    १-मेरे विचार :renikbafna.blogspot.com
    २-सत्य की खोज में (इन सर्च ऑफ़ ट्रुथ ) : renikjain.blogspot.com

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